भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वरानुमानविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १०५
न्यथा वा कर्तुं शक्यं लौकिकं वैदिकं च कर्म, यथाश्वेन गच्छति, पद्भ्यामन्यथा वा, न वा गच्छतीति । तथा 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति, नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति', 'उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति' इति विधिप्रतिषेधाश्चात्रार्थवन्तः स्युः, विकल्पोत्सर्गापवादाश्च । न तु वस्त्वेवं नैवमस्ति नास्तीति वा विकल्प्यते । विकल्पनास्तु पुरुषबुद्धय-
भामती
हरति ॐ यथाऽश्वेन इति ॐ । लौकिकेनोदाहरणेन सह वैदिकमुदाहरणं समुच्चिनोति ॐ तथाऽतिरात्र इति ॐ । कर्तुमकर्तुमित्यस्येदमुदाहरणमुक्तम् । कर्तुमन्यथा वा कर्तुमित्यस्योदाहरणमाह ॐ उदित इति ॐ । स्यादेतत्—पुरुषस्वात्तन्त्र्यात् कर्त्तव्ये विधिप्रतिषेधानामानर्थक्यम् , अतदधीनत्वात् पुरुषप्रवृत्तिनिवृत्त्योरित्यत आह ॐविधिप्रतिषेधाश्चात्रार्थवन्तः स्युःॐ । गृह्णातीति विधिः । न गृह्णातीति प्रतिषेधः । उदितानुदितहोमयोर्विधी । एवं नारास्थिस्पर्शननिषेधो लङ्घनस्य तद्धारणविधिरित्येवं जातीयका विधिःप्रतिषेधा अर्थवन्तः । कुत इत्यत आह ॐ विकल्पोत्सर्गापवादाश्च ॐ । चो हेतौ । यस्माद् ग्रहणाग्रहणयोरुदितानुदितहोमयोश्च विरोधात्समुच्चयासम्भवे तुल्यबलतया च बाध्यबाधकभावाभावे सत्यगत्या विकल्पः । नारास्थिस्पर्शननिषेधतद्धारणयोश्च विरुद्धयोरतुल्यबलतया न विकल्पः । किन्तु सामान्यशास्त्रस्य स्पर्शननिषेधस्य धारणविधिविषयेण विशेषशास्त्रेण बाधः ।
एतदुक्तं भवति—विधिप्रतिषेधैरेव स तादृशो विषयोऽनागतोत्पाद्यरूप उपनीतो येन पुरुषस्य
भामती-व्याख्या
और वैदिक कर्म (क्रिया) "कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्यम्" । जैसे लौकिक गमनादि कर्मों में पुरुष सर्वथा स्वतन्त्र है, चाहे वह अश्व के द्वारा गमन करे या पैदल, अथवा गमन ही न करे । वैसा ही "अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति" (मै. सं. ४।७।६), 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति" इत्यादि वाक्यों के आधार पर अतिरात्रसंस्थाक ज्योतिष्टोम याग में षोडशिसंज्ञक ग्रह (दारूमय पात्र) में सोमरस ग्रहण करे या न करे। इसी प्रकार "उदिते जुहोति" और "अनुदिते जुहोति"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा सूर्य के उदय हो जाने पर अग्निहोत्रसंज्ञक कर्म करे या सूर्य के उदय होने से पहले। 'यदि कर्म करने में पुरुष स्वतन्त्र है, तब विधि-निषेध शास्त्र व्यर्थ हैं, क्योंकि उनके अधीन होकर पुरुष प्रवृत्त या निवृत्त नहीं होता, अपितु वह अपनी स्वतन्त्रता के कारण प्रवृत्त-निवृत्त होता है'—इस आक्षेप का समाधान है—"विधिप्रतिषेधाश्चार्थवन्तः स्युः"। 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति"—यह विधि और "नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति"—यह निषेध है। उदित और अनुदितपद-घटित उक्त दोनों वाक्य विधिरूप हैं। इसी प्रकार "नारं स्पृष्ट्वाऽस्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्"—यह निषेध एवं "शिरःकपाल ध्वजवान् भिक्षाशी कर्म वेदयन् । ब्रह्महा द्वादशाब्दानि मितभुक् शुद्धिमाप्नुयात् ॥" (याज्ञ० ३।२४२) इत्यादि वाक्य ब्रह्मघाती के लिए शव की शिरोऽस्थि का ध्वजरूपेण धारण विहित है। कथित सभी विधि-निषेध शास्त्रों की तभी सार्थकता होती है, जब कि कर्म में पुरुष स्वतन्त्र है, क्योंकि षोडशिसंज्ञक पात्र के ग्रहण और अग्रहण, उदित होम और अनुदित होम परस्पर विरुद्ध हैं, उनका समुच्चय सम्भव नहीं, अतः समान बलवाले ग्रहणाग्रहणादि कर्मों का अगत्या विकल्प होता है, किन्तु मनुष्य की गीली हड्डी के स्पर्श का निषेध एवं ब्रह्मघाती के लिए उसके धारण की विधि का विकल्प नहीं माना जाता, क्योंकि निषेध सामान्यविषयक और विधि विशेषविषयक है, अतः समानबलता न होने से विधि शास्त्र के द्वारा निषेध शास्त्र का बाध हो जाता है। सारांश यह है कि विधि और प्रतिषेध शास्त्रों के द्वारा वैसा ही भविष्य में उत्पन्न होने वाला (कार्यरूप) विषय उपस्थापित किया जाता है, जिसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति के सम्पादन में पुरुष का
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