भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १०६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २ |
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पेक्षा। न वस्तुयाथात्म्यज्ञानं पुरुषबुद्ध्यपेक्षम्। किं तर्हि ? वस्तुतन्त्रमेव तत्। न हि स्थाणावेकस्मिन्स्थाणुर्वा पुरुषोऽन्यो वेति तत्त्वज्ञानं भवति। तत्र पुरुषोऽन्यो वेति मिथ्याज्ञानम्, स्थाणुरेवेति तत्त्वज्ञानं, वस्तुतन्त्रत्वात्। एवं भूतवस्तुविषयाणां प्रामाण्यं वस्तुतन्त्रम्। तत्रैवं सति ब्रह्मज्ञानमपि वस्तुतन्त्रमेव, भूतवस्तुविषयत्वात्। ननु भूत-
भामती
विधिनिषेधाधीनप्रवृत्तिनिवृत्त्योरपि स्वातन्त्र्यं भवतीति। भूते वस्तुनि तु नैवमस्ति विधेत्याह ॐ न तु वस्त्वेवं नैवम् इति ॐ। तदनेन प्रकारविकल्पो निरस्तः। प्रकारिविकल्पं निषेधति ॐ अस्ति नास्ति इति ॐ। स्यादेतद्—भूतेऽपि वस्तुनि विकल्पो दृष्टः, यथा स्थाणुर्वा पुरुषो वेति, तत् कथं न वस्तु विकल्प्यत इत्यत आह ॐ विकल्पनास्तु इति ॐ। पुरुषबुद्धि ॐ अन्तःकरणं, तदपेक्षा विकल्पनाः संशयविपर्ययासाः, सवासनमनोमात्रयोनयो वा, यथा स्वप्ने, सवासनेन्द्रियमनोयोनयो वा, यथा स्थाणुर्वा पुरुषो वेति स्थाणौ संशयः, पुरुष एवेति वा विपर्यासः, अन्यशब्देन वस्तुतः स्थाणोरन्यस्य पुरुषस्याभिधानात्, न तु पुरुषतत्त्वं वा स्थाणुतत्त्वं वापेशन्ते। समानधर्मधर्मिदर्शनमात्राधीनजन्मत्वात्। तस्माद्यथा-वस्त्वो विकल्पना न वस्तु विकल्पयन्ति वाऽन्यथयन्ति वेत्यर्थः। तत्त्वज्ञानं तु न बुद्धितन्त्रं, किन्तु वस्तु-तन्त्रम्, अतस्ततो वस्तुविनिश्चयो युक्तः, न तु विकल्पनाभ्य इत्याह ॐ न वस्तुयाथात्म्येति ॐ। एवमुक्तेन प्रकारेण भूतवस्तुविषयाणां ज्ञानानां प्रामाण्यस्य वस्तुतन्त्रतां प्रसाध्य ब्रह्मज्ञानस्य वस्तुतन्त्रतामाह ॐ तत्रैवं सति इति ॐ।
भामती-व्याख्या
स्वातन्त्र्य अव्याहत रहता है, किन्तु अकार्यभूत (सिद्ध पदार्थ) के विषय में वैसी बात नहीं होती, अत एव भाष्यकार कहते हैं—"न तु वस्तु एवं नैवम्, अस्ति नास्तीति वा विकल्प्यते"। 'एवं नैवम्'—इस वाक्य के द्वारा प्रकार-विकल्प (करण और अन्यथाकरणरूप) और 'अस्ति नास्ति'—इस वाक्य के द्वारा करणाकारणरूप प्रकारि-विकल्प का निराकरण किया गया है।
यदि कहा जाय कि भूत (सिद्ध) पदार्थ में भी विकल्प देखा जाता है, जैसे—'स्थाणुर्वा पुरुषो वा'। तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि "विकल्पनास्तु पुरुष-बुद्धयपेक्षाः"। 'पुरुष-बुद्धि' पद से अन्तःकरण का ग्रहण किया गया है, उसकी अपेक्षा से संशय और विपर्ययरूप कल्पना ज्ञान उत्पन्न होते हैं। उनमें कुछ ज्ञान वासना (संस्कारों) से युक्त केवल मन के द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं, जैसे—स्वप्न में संशय और विपर्यय होते हैं। कतिपय ज्ञान वासना-युक्त मन और बाह्य इन्द्रिय—इन दोनों के द्वारा उत्पादित होते हैं, जैसे—'स्थाणुर्वा पुरुषो वा ? इस प्रकार का स्थाणु में संशय अथवा स्थाणु में 'पुरुष एव'—इस प्रकार का विपर्यय। भाष्यकार ने जो कहा है—"पुरुषो वाऽन्यो वा"। वहाँ 'अन्य' शब्द के द्वारा पुरुष का भी स्थाणु-भिन्नत्वेन अभिधान किया गया है, अतः संशय अथवा विपर्ययरूप कल्पना ज्ञान स्थाणु-तत्त्व या पुरुषतत्त्व को विषय नहीं करते, संशय केवल उच्चैस्त्वरूप समान धर्मवाले धर्मी के ज्ञान से और विपर्यय केवल सादृश्य ज्ञान से जनित होता है। फलतः संशयादि विकल्प ज्ञान यथावस्तु (वस्त्वनुसारी) न होकर बुद्धि-कल्पित आकार का ही ग्रहण करते हैं, स्थाण्वादिरूप वस्तु को न तो संशय विकल्पित करता है और न विपर्यय अन्यथा-करण कर सकता है। तत्त्व-ज्ञान बुद्धि-तन्त्र न होकर वस्तु-तन्त्र होता है, अतः उससे वस्तु-तत्त्व का निश्चय होना युक्त ही है, विकल्प ज्ञानों से वस्तु का निश्चय नहीं होता, भाष्यकार कहते हैं—न वस्तुयाथात्म्यज्ञानं पुरुषबुद्ध्यपेक्षम्।" इस प्रकार सामान्यतः सिद्धवस्तुविषयक ज्ञानों में प्रामाण्य और वस्तुतन्त्रता सिद्ध कर लेने के अनन्तर ब्रह्म-ज्ञान में वस्तु-तन्त्रता का प्रतिपादन करते हैं—"तत्रैवं ब्रह्मज्ञानमपि वस्तुतन्त्रमेव, भूतवस्तुविषयत्वात्"।