भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वरानुमानविचारः ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् १७७
वस्तुत्वे ब्रह्मणः प्रमाणान्तरविषयत्वमेवेति वेदान्तवाक्यविचारणानर्थक्यैव प्राप्ता। न; इन्द्रियाविषयत्वेन संबन्धाग्रहणात्। स्वभावतो विषयविषयाणीन्द्रियाणि; न ब्रह्मविषयाणि। सति हीन्द्रियविषयत्वे ब्रह्मणः इदं ब्रह्मणा संबद्धं कार्यमिति गृह्येत। कार्य-
भामती
अत्र चोदयति ॐ ननु भूतेति ॐ। यत् किल भूतार्थं वाक्यं तत्प्रमाणान्तरगोचरार्थतयाऽनुवादकं दृष्टम्, यथा नद्यास्तीरे फलानि सन्तीति, तथा च वेदान्ताः, तस्माद् भूतार्थतया प्रमाणान्तरदृष्टमेवार्थमनुवदेयुः। उक्तं च ब्रह्मणि जगज्जन्मादिहेतुकमनुमानं प्रमाणान्तरम्। एवं च मौलिकं तदेव परीक्षणीयं, न तु वेदान्तवाक्यानि तदधीन सत्यत्वादीनीति कथं वेदान्तवाक्यग्रथनार्थता सूत्राणामित्यर्थः। परिहरति ॐ नेन्द्रियाविषयत्वेति ॐ। कस्मात् पुनर्नेन्द्रियविषयत्वं प्रतीच इत्यत आह ॐ स्वभावतः इति ॐ। अत एव श्रुतिः।
'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः
तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्' इति।
ॐ सति हीन्द्रियेति ॐ। प्रत्यगात्मनस्त्वविषयत्वमुपपादितम्। यथा च सामान्यतो दृष्टमप्यनुमानं ब्रह्मणि न प्रवर्तते तथोपरिष्टान्निपुणतरमुपपादयिष्यामः। उपपादितं चैतदस्माभिर्विस्तरेण न्यायकर्णि-
भामती-व्याख्या
शङ्का—ब्रह्म यदि सिद्ध पदार्थ होने के कारण वेद से अन्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय है, तब ब्रह्म-ज्ञान के लिए वेदान्त-वाक्यों का विचार निरर्थक है, क्योंकि 'वेदान्त-वाक्यम्, अनुवादकम्, प्रमाणान्तरविषयीभूतभूतार्थविषयकत्वात्, लौकिकवाक्यवत्'—इस अनुमान के द्वारा वेदान्त-वाक्यों में अनुवादकता सिद्ध होने के कारण अनधिगतार्थ-बोधकत्वरूप प्रामाण्य ही सिद्ध नहीं होता। न्यायकर्णिका में भी कहा है—"मानान्तरविषयतया तदपेक्षत्वाद् वेदस्य प्रामाण्यं विहन्येत" (न्या० कर्णि० पृ० २)। अप्रमाणभूत विकल्पामक ज्ञानों से वस्तुतत्त्व का निश्चय नहीं होता—यह कहा जा चुका है। ब्रह्म में जगज्जन्मादिहेतुक अनुमानरूप प्रमाणान्तर की विषयता दिखाई जा चुकी है। अतः मूलभूत अनुमान प्रमाण का ही परीक्षणात्मक विचार करना चाहिए, वेदान्त का नहीं। इस प्रकार यह जो कहा गया कि 'वेदान्तवाक्यग्रथनार्थत्वात् सूत्राणाम्', वह कहना संगत नहीं।
समाधान—उक्त आशङ्का का निरास करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"न, इन्द्रियादिविषयत्वे सम्बन्धाग्रहणात्"। प्रत्यगात्मा में इन्द्रियों की विषयता क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—"स्वभावतो विषयविषयाणीन्द्रियाणि, न ब्रह्मविषयाणि"। अत एव श्रुति कहती है—"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्" (कठो० २।१।१) [अर्थात् स्वयम्भू (परमेश्वर) ने श्रोत्रादि इन्द्रियों की अन्तर्मुखता का हनन (अवरोध) कर बाह्यमुखता बनाई, जिससे इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों का ही स्वाभाविक ग्रहण होता है, आत्मादि आन्तरिक विषयों का ग्रहण नहीं]। ब्रह्म यदि इन्द्रियों का विषय होता, तब कार्य प्रपञ्च में ब्रह्म-जन्यत्वादिरूप सम्बन्ध का ग्रहण हो जाता और उस कार्य के द्वारा ब्रह्मरूप कर्त्ता का ग्रहण सामान्यतोदृष्ट अनुमान के द्वारा हो जाता [सामान्यतोदृष्ट अनुमान का स्वरूप बताते हुए न्यायभाष्यकार कहते हैं—"सामान्यतो दृष्टं नाम यत्राप्रत्यक्षे लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धे, केनचिदर्थेन लिङ्गस्य सामान्यादप्रत्यक्षो लिङ्गी गम्यते, यथेच्छादिभिरात्मा, इच्छादयो गुणाः, गुणाश्च द्रव्यसंस्थानाः, तद्येषां स्थानं स आत्मेति" (न्या० भा० १।१।५)। प्रकृत में यद्यपि आकाशादि कार्य और ब्रह्म का जन्य-जनकभाव सम्बन्ध गृहीत नहीं, तथापि घटादि कार्य का कुलालादि के साथ कार्य-कारणभाव देख कर क्षित्यादि कार्य के