भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १

जिज्ञास्यापेक्षत्वाज्जिज्ञासायाः, जिज्ञास्यान्तरानिर्देशाच्च । ननु शेषषष्ठीपरिग्रहेऽपि

भामती

च वेदे, यथा—ब्रह्मोज्झमिति अस्ति च परमात्मनि, यथा—ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति तमिमं संशयमपा- करोति ॐ ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणम् इति ॐ । यतो ब्रह्मजिज्ञासां प्रतिज्ञाय तज्ज्ञापनाय परमात्मलक्षणं प्रणयति ततोऽवगच्छामः परमात्मजिज्ञासैवेयं न विप्रत्वजात्यादिजिज्ञासेत्यर्थः ।

षष्ठीसमासपरिग्रहेऽपि नेयं कर्मषष्ठी, किन्तु शेषलक्षणा, सम्बन्धमात्रं च शेष इति ब्रह्मणो जिज्ञासे- त्युक्ते ब्रह्मसम्बन्धिनी जिज्ञासेत्युक्तं भवति । तथा च ब्रह्मस्वरूपप्रमाणयुक्तिसाधनप्रयोजनजिज्ञासाः सर्वा ब्रह्मजिज्ञासार्थ्या ब्रह्मजिज्ञासायाऽवरुद्धा भवन्ति । साक्षात्पारम्पर्येण च ब्रह्मसम्बन्धात् । कर्मषष्ठ्यां तु ब्रह्मशब्दार्थः कर्म, स च स्वरूपमेवेति तत्प्रमाणादयो नावरुध्येरन्, तथा चाप्रतिज्ञातार्थचिन्ता प्रमाणादिषु भवेदिति ये मन्यन्ते तान् प्रत्याह ॐ ब्रह्मणः इति । ॐ कर्मणि इति ॐ । अत्र हेतुमाह ॐ जिज्ञास्येति ॐ । इच्छायाः प्रतिपत्त्यनुबन्धो ज्ञानं, ज्ञानस्य च ज्ञेयं ब्रह्म, न खलु ज्ञानं ज्ञेयं विना निरूप्यते, न च जिज्ञासा ज्ञानं विनेति प्रतिपत्त्यनुबन्धत्वात् प्रथमं जिज्ञासा कर्मैवापेक्षते, न तु सम्बन्धमात्रम् । तदन्तरेणापि सति कर्मणि तन्निरूपणात् । नहि चन्द्रमसमादित्यं चोपलभ्य कस्यायमिति सम्बन्ध्यन्वेषणा भवति । भवति तु

भामती-व्याख्या

ब्रह्मैव भवति' ।

समाधान—उक्त शंका का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'ब्रह्म च वक्ष्य- माणलक्षणम्' । ब्रह्मजिज्ञासा की प्रतिज्ञा करने के अनन्तर द्वितीय सूत्र में सूत्रकार परमात्मा का लक्षण कर रहे हैं, उससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्म-जिज्ञासा पद में 'ब्रह्म' पद परमात्मा का ही वाचक है, विप्रत्वादि जाति का नहीं । षष्ठी-समास में भी कर्मषष्ठी नहीं अपितु शेषषष्ठी का ही परिग्रह किया जाता है । सम्बन्धमात्र का शेष पद से विधान किया गया है । ब्रह्मणो जिज्ञासा ऐसा कहने से ब्रह्मसम्बन्धी जिज्ञासा प्रतीत होती है । इस प्रकार ब्रह्म के स्वरूप, प्रमाण, युक्ति, साधन और प्रयोजन आदि की जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा में समाविष्ट हो जाती है । फलतः चतुर्लक्षणी वेदान्तमीमांसा का ग्रहण ब्रह्मजिज्ञासा पद से हो जाता है, क्योंकि साक्षात् या परम्पराया ब्रह्म का सम्बन्ध सर्वत्र है । कर्मषष्ठी का ग्रहण करने पर केवल ब्रह्मशब्दार्थ कर्म होता है वह केवल स्वरूप का ही उपस्थापक होता है, प्रमाणादि का संग्राहक नहीं । जो लोग प्रमाणादि के ग्रहण में अप्रतिज्ञात चर्चा का प्रसङ्ग उद्भावित करते हैं, उनके लिए कहा गया है—"ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी न शेषे" । उसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा गया है—जिज्ञास्यापेक्षत्वात् जिज्ञासायाः । इच्छा का विषय है ज्ञान और ज्ञान का ज्ञेय है ब्रह्म । ज्ञेय के बिना ज्ञान का निरूपण सम्भव नहीं और ज्ञान के बिना जिज्ञासा का निरूपण नहीं हो सकता । ज्ञानकर्मक इच्छारूप जिज्ञासा सर्वप्रथम ज्ञान की ही अपेक्षा करती है, सम्बन्धि-मात्र की नहीं । सम्बन्धिसामान्य के बिना भी कर्म का निरूपण किया जा सकता है, जैसे कि चन्द्रमा और आदित्य को देखकर 'कस्यायम्' इस प्रकार की सम्बन्धिसामान्य की अपेक्षा नहीं देखी जाती, किन्तु 'ज्ञानम्' ऐसा सुनने पर 'किविषयकं ज्ञानम् ?' इस प्रकार कर्म की ही अपेक्षा होती है । अतः प्रथम अपेक्षा के बल पर ब्रह्म का जिज्ञासा के साथ कर्मत्वेन ही सम्बन्ध होता है, सामान्य सम्बन्धितया नहीं, क्योंकि सामान्य सम्बन्धिता मुख्य नहीं, गौण मानी जाती है । इस प्रकार 'ब्रह्मणः' में कर्मार्थक षष्ठी विभक्ति मानी गई है । यदि कहा जाय कि जिज्ञास्य पदार्थ के बिना जिज्ञासा का निरूपण नहीं हो सकता—यह ठीक है किन्तु ब्रह्म को छोड़कर जिज्ञास्य कोई अन्य भी हो सकता है । तो वैसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि "जिज्ञास्यान्तरानिर्देशाच्च" ।

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