भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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८                ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

का अनुवाद करके खण्डन किया है—"ये तु काशकृत्स्नीयमेव मतमास्थाय जीवं परमात्मनोऽशमाचख्युः" ( भामती. पृ. ५२२ ) ।

४. श्री भास्कराचार्य ने परिणामवाद का समर्थन करते हुए कहा है—"सूत्रकारः श्रुत्यनुकारी परिणामपक्षं सूत्रयाम्बभूव । अयमेव छान्दोग्ये वाक्यकारवृत्तिकाराभ्यां समाश्रितः, तथा च वाक्यम्—परिणामस्तु दध्यादिवदिति । विगीतं विच्छिन्नमूलं माहायानिकबौद्धगाथायितं मायावादं व्यावर्णयन्तो लोकान् व्यामोहयन्ति" ( भास्कर. पृ. ८५ ) । वाचस्पति मिश्र ने आचार्य ब्रह्मनन्दी के उक्त वाक्य का आशय बताते हुए कहा है—"इयं चोपादानपरिणामादिभाषा न विकाराभिप्रायेण, अपितु यथा सर्पस्योपादानं रज्जुरेवं ब्रह्म जगदुपादानम्" ( भामती० पृ० ५३० ) ।

२—भामती व्याख्या

व्याख्या तो सम्पूर्ण भामती की प्रकाशित हो रही है, किन्तु ग्रन्थके कलेवर को अप्रत्याशित बृंहण से बचाने के लिए पूरे ग्रन्थ को दो भागों में प्रकाशित करना ही उचित समझा गया। प्रथम अध्याय के चार पाद एवं द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद को मिलाकर सवा छः सौ पृष्ठ के लगभग हो गए हैं, आगे सम्भवतः इतना ही शेष है। प्रकाशन कार्य की विलम्बता से बहुत से प्रतीक्षकों का धैर्य भी टूट रहा है, अतः पञ्च पाद का यह प्रथम भाग प्रकाशित कर दिया गया है। द्वितीय भाग का प्रकाशन भी चालू है, उसके पूरा होने में कुछ समय तो लग ही जायगा।

पूरे ग्रन्थ का मुद्रण हो जाने के पश्चात् ही भूमिकादि पूर्वाङ्ग एवं परिशिष्टात्मक उत्तराङ्गों का सम्पादन सम्भव हो पाता है, अतः यहाँ मूल ग्रन्थ, भाष्य एवं भामती के रचयिता का स्वल्प परिचय ही दिया गया है, ग्रन्थ के विषय में शेष वक्तव्य द्वितीय भाग के आरम्भ में दिया जायगा।

के० ३७/२ ठठेरीबाजारस्वामी योगीन्द्रानन्द
वाराणसीन्यायाचार्य मीमांसातीर्थ