भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्

'भामती' नाम के विषय में कुछ लोगों का कहना है कि मिश्रजी की पत्नी का नाम भामती था, कुछ मिश्र जी की कन्या का नाम बताते हैं और कुछ विद्वानों का कहना है कि 'भामा' नाम की नगरी में रहने के कारण श्रीवाचस्पतिमिश्र ने अपनी व्याख्या का नाम भामती रखा है। कुछ हो, यह एक अमर कीर्ति है उस कीर्ति पुञ्ज की, जिसकी चका-चौन्ध समूचे दार्शनिक विश्व में व्याप्त है ।

१—भामती और भास्कर-भाष्य श्री वाचस्पति मिश्र ने भेदाभेदवादी आचार्य भास्कर की विशेषरूप में आलोचना की है, क्योंकि भास्कराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य के प्रणयन का मुख्य उद्देश्य शाङ्कर-भाष्य का निराकरण ही माना है—

सूत्राभिप्रायसंवृत्या स्वाभिप्रायप्रकाशनात् ।
व्याख्यातं यैरिदं शास्त्रं व्याख्येयं तन्निवृत्तये ॥ (भास्कर. पृ. १)

यहाँ 'यैः' पद से आचार्य शङ्कर का ही ग्रहण किया गया है। आचार्य शङ्कर से पहले भी आचार्य बोधायन और आचार्य उपवर्षादि के बृहत्काय वृत्ति-ग्रन्थ थे, जिनमें ब्रह्मसूत्रों की विशद व्याख्या की गई थी, किन्तु उनमें विशुद्ध अद्वैतवाद का सम्भवतः प्रतिपादन नहीं था। आचार्य शङ्कर के द्वारा उनकी अवहेलना अनिवार्य थी। वही अवहेलना आचार्य भास्कर और परवर्ती अन्य आचार्यों के मस्तिष्क में अद्वयवाद के प्रति भयङ्कर विस्फोट उत्पन्न करती आ रही है। आचार्य उपवर्ष और द्रविड़ाचार्यादि ने भी बोधायन की वृत्ति को कुछ संक्षेप और अर्थान्तर की ओर मोड़ दिया था, अत एव आचार्य रामानुज ने कहा है — "भगवद्बोधायनकृतां विस्तीर्णां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः, तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यायन्ते' (श्रीभा. पृ. १)।

प्रकृत में आचार्य भास्कर के द्वारा किए गए शाङ्कर भाष्य के निराकरण-प्रकारों का दिग्दर्शन कराना आवश्यक है, जिससे वाचस्पति मिश्र की भास्करीय आलोचना प्रशस्त हो सके—

१— "अक्षरमम्बरान्तधृतेः" (ब्र. सू. १।३।१०) इस सूत्र की व्याख्या में आचार्य भास्कर लिखते हैं— 'केचिद् अक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वादक्षरमोंकार इति पूर्वपक्षयन्ति,..... तदेतदधिकरणेनासम्बद्धम्" (भास्कर. पृ. ५४)। यहाँ 'केचित्' पद से भास्कर ने आचार्य शङ्कर का ग्रहण कर उनके पूर्वपक्ष को असंगत ठहराया है। वाचस्पतिमिश्र ने वहीं पर भास्करीय वक्तव्य का अनुवाद करके खण्डन किया है—"ये तु प्रधानं पूर्वपक्षयित्वा...'" (भामती पृ. ४४३)।

२. आचार्य भास्कर ने जीव और ईश्वर के भेदाभेद का उपपादन करते हुए कहा है—"ननु भेदाभेदौ कथं परस्पर विरुद्धौ सम्भवेताम् ? नैष दोषः—

प्रमाणतश्चेत् प्रतीयते को विरोधोऽयमुच्यते ।
विरोधे चाविरोघे च प्रमाणं कारणं मतम् ॥

(भास्कर. पृ. १०३)। आचार्य वाचस्पति कहते हैं—"अथ त्वगृह्यमाणविशेषतया..." (भामती पृ. ५१८)। मिश्र जी का भाव स्पष्ट करते हुए वहीं कल्पतरुकार ने कहा है— "भेदाभेदव्यवस्था चेत्"। श्री अप्पयदीक्षित ने इस ग्रन्थ का अवतरण दिया है— "भास्कर ग्रन्थेषु विरुद्धयोरपि समवलयोरपि भेदाभेदयोर्संकरोपपादनं कृतम्, तन्निरस्यति"।

३—श्री भास्कराचार्य ने जीव को ईश्वर का अंश बताते हुए एक लम्बा-सा वक्तव्य दिया है— "तदंशो जीवोऽस्ति....." (भास्कर. पृ. १४०)। आचार्य वाचस्पति ने उस वक्तव्य