भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् |
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कार्ष्णाजिनि (४।३।१५, ६।७।२६), ऐतिशायन (३।२।४३, ३।४।२४, ६।१।६), कामुकायन (११।१।५६, ११।१।६१), कार्षापण (४।३।१७, ६।७।३५), लाबुलायन (६।७.३७), आलेखन (६।५।१७, १६।२।१) ।
५. बादरायण-सूत्र-उद्धृत आचार्य-जैमिनि (१।२।२८, १।२।३१, १।३।३१, १।४।१८, ३।२।४०, ३।४।२-७, ३।४।१८, ३.४.४०, ४।३।१२, ४।४.५, ४।४।११), बादरि (१।२।३०, ३।१।११, ४।३।७, ४।४।१०), आश्मरथ्य (१।२।२६, १।४।२०), आत्रेय (३।४।४४), काशकृत्स्न (१।४।२२), कार्ष्णाजिनि (३।१।२९), औडुलोमि (१।४।२१, १।४ ४५, ४।४।६) ।
२. भाष्यकार भगवान् शङ्कर
आज-कल ७८८ ई० से लेकर ८२० ई० तक का समय आचार्य शङ्कर का माना जाता है, क्योंकि आचार्य शङ्कर के समकालिक एवं प्रधान शिष्य श्री सुरेश्वराचार्य ने बौद्धाचार्य श्री धर्मकीर्ति का उल्लेख किया है। धर्मकीर्ति का समय ६०० ई० से लेकर ६५० ई० तक माना जाता है। अन्य विद्वानों का यह मत है कि आचार्य शङ्कर धर्मकीर्ति और दिङ्नाग के मध्य में हुए हैं, क्योंकि आचार्य ने अपने भाष्य में दिङ्नाग के प्रमाणसमुच्चय से एक वाक्य उद्धृत किया है²- 'सहोपलम्भनियमादभेदः' । किंतु प्रत्यक्ष के लक्षण में धर्मकीर्ति ने जो 'अभ्रांत' पद जोड़ा है, वह शां. भाष्य में उद्धृत नहीं । यद्यपि मठाम्नायों की परम्परा से उक्त समय का मेल नहीं खाता, तथापि श्री गोपीनाथ कविराज-जैसे इतिहासवेत्ता आस्तिक पुरुषों ने कहा है— "गोडपादाचार्य तक गुरु-परम्परा को ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत मानने में कोई मत-भेद नहीं है, परन्तु गौडपाद के गुरु शुकदेव तथा उनके गुरु व्यास—इसी क्रम से प्राचीन गुरु-परम्परा वर्तमान ऐतिहासिक विचार के बहिर्भूत है" (ब्र. सू. भूमिका पृ. १९) ।
३. भामतीकार श्रीवाचस्पतिमिश्र
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र श्री वाचस्पतिमिश्र ने तो न्यायसूचीनिबन्ध में अपने समय का उल्लेख कर ही दिया है⁴। उसके अनुसार ८९८ वि. संवत् या ८४१ ई. निश्चित होता है। भामती व्याख्या सम्भवतः इनकी अन्तिम रचना है, जैसा कि अपनी रचनाओं का क्रम-निर्देश स्वयं मिश्रजी ने भामती के अन्त में किया है—
यन्न्यायकर्णिकातत्त्वसमीक्षातत्त्वबिन्दुभिः ।
यन्न्यायसांख्ययोगानां वेदान्तानां निबन्धनैः ॥
सबसे पहले श्री मण्डनमिश्र के विधिविवेक की व्याख्या न्याय-कर्णिका की रचना की गई, उसके पश्चात् ब्रह्म-सिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा, तत्त्वबिन्दु (स्वतन्त्र भाट्टपक्षीय शाब्द-ग्रन्थ)। न्याय में उद्योतकर-वार्तिक की व्याख्या तात्पर्यटीका, सांख्य में ईश्वरकृष्ण-कृत कारिकाओं की व्याख्या सांख्यतत्त्वकौमुदी, योग में पातञ्जल सूत्रों के व्यास-भाष्य की व्याख्या तत्त्ववैशारदी—इन ग्रन्थरत्नों का निर्माण हुआ। सबसे अन्त में ब्रह्मसूत्र-शाङ्करभाष्य की व्याख्या भामती की रचना की गई।
१. "त्रिष्वेव त्वविनाभावादिति यद् धर्मकीर्तिना ।
प्रत्यज्ञायि प्रतिज्ञेयं हीयेतासौ न संशयः ॥" (बृह० वा० ४।३।७५३)
२. ब्र० सू० भा० २।२।२८ में उद्धृत वाक्य से भिन्न यह पद्य है—
सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः ।
भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानेर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ (प्र० वा० २।३९)
४. न्यायसूचीनिबन्धोऽयमकारि सुधिया मुदे ।
श्रीवाचस्पतिमिश्रेण वस्वङ्कवसुवत्सरे ॥