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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

कार्ष्णाजिनि (४।३।१५, ६।७।२६), ऐतिशायन (३।२।४३, ३।४।२४, ६।१।६), कामुकायन (११।१।५६, ११।१।६१), कार्षापण (४।३।१७, ६।७।३५), लाबुलायन (६।७.३७), आलेखन (६।५।१७, १६।२।१) ।

५. बादरायण-सूत्र-उद्धृत आचार्य-जैमिनि (१।२।२८, १।२।३१, १।३।३१, १।४।१८, ३।२।४०, ३।४।२-७, ३।४।१८, ३.४.४०, ४।३।१२, ४।४.५, ४।४।११), बादरि (१।२।३०, ३।१।११, ४।३।७, ४।४।१०), आश्मरथ्य (१।२।२६, १।४।२०), आत्रेय (३।४।४४), काशकृत्स्न (१।४।२२), कार्ष्णाजिनि (३।१।२९), औडुलोमि (१।४।२१, १।४ ४५, ४।४।६) ।

२. भाष्यकार भगवान् शङ्कर

आज-कल ७८८ ई० से लेकर ८२० ई० तक का समय आचार्य शङ्कर का माना जाता है, क्योंकि आचार्य शङ्कर के समकालिक एवं प्रधान शिष्य श्री सुरेश्वराचार्य ने बौद्धाचार्य श्री धर्मकीर्ति का उल्लेख किया है। धर्मकीर्ति का समय ६०० ई० से लेकर ६५० ई० तक माना जाता है। अन्य विद्वानों का यह मत है कि आचार्य शङ्कर धर्मकीर्ति और दिङ्नाग के मध्य में हुए हैं, क्योंकि आचार्य ने अपने भाष्य में दिङ्नाग के प्रमाणसमुच्चय से एक वाक्य उद्धृत किया है²- 'सहोपलम्भनियमादभेदः' । किंतु प्रत्यक्ष के लक्षण में धर्मकीर्ति ने जो 'अभ्रांत' पद जोड़ा है, वह शां. भाष्य में उद्धृत नहीं । यद्यपि मठाम्नायों की परम्परा से उक्त समय का मेल नहीं खाता, तथापि श्री गोपीनाथ कविराज-जैसे इतिहासवेत्ता आस्तिक पुरुषों ने कहा है— "गोडपादाचार्य तक गुरु-परम्परा को ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत मानने में कोई मत-भेद नहीं है, परन्तु गौडपाद के गुरु शुकदेव तथा उनके गुरु व्यास—इसी क्रम से प्राचीन गुरु-परम्परा वर्तमान ऐतिहासिक विचार के बहिर्भूत है" (ब्र. सू. भूमिका पृ. १९) ।

३. भामतीकार श्रीवाचस्पतिमिश्र

सर्वतन्त्रस्वतन्त्र श्री वाचस्पतिमिश्र ने तो न्यायसूचीनिबन्ध में अपने समय का उल्लेख कर ही दिया है⁴। उसके अनुसार ८९८ वि. संवत् या ८४१ ई. निश्चित होता है। भामती व्याख्या सम्भवतः इनकी अन्तिम रचना है, जैसा कि अपनी रचनाओं का क्रम-निर्देश स्वयं मिश्रजी ने भामती के अन्त में किया है—

यन्न्यायकर्णिकातत्त्वसमीक्षातत्त्वबिन्दुभिः ।
यन्न्यायसांख्ययोगानां वेदान्तानां निबन्धनैः ॥

सबसे पहले श्री मण्डनमिश्र के विधिविवेक की व्याख्या न्याय-कर्णिका की रचना की गई, उसके पश्चात् ब्रह्म-सिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा, तत्त्वबिन्दु (स्वतन्त्र भाट्टपक्षीय शाब्द-ग्रन्थ)। न्याय में उद्योतकर-वार्तिक की व्याख्या तात्पर्यटीका, सांख्य में ईश्वरकृष्ण-कृत कारिकाओं की व्याख्या सांख्यतत्त्वकौमुदी, योग में पातञ्जल सूत्रों के व्यास-भाष्य की व्याख्या तत्त्ववैशारदी—इन ग्रन्थरत्नों का निर्माण हुआ। सबसे अन्त में ब्रह्मसूत्र-शाङ्करभाष्य की व्याख्या भामती की रचना की गई।


१. "त्रिष्वेव त्वविनाभावादिति यद् धर्मकीर्तिना ।
प्रत्यज्ञायि प्रतिज्ञेयं हीयेतासौ न संशयः ॥" (बृह० वा० ४।३।७५३)
२. ब्र० सू० भा० २।२।२८ में उद्धृत वाक्य से भिन्न यह पद्य है—
सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः ।
भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानेर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ (प्र० वा० २।३९)
४. न्यायसूचीनिबन्धोऽयमकारि सुधिया मुदे ।
श्रीवाचस्पतिमिश्रेण वस्वङ्कवसुवत्सरे ॥

हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्

'भामती' नाम के विषय में कुछ लोगों का कहना है कि मिश्रजी की पत्नी का नाम भामती था, कुछ मिश्र जी की कन्या का नाम बताते हैं और कुछ विद्वानों का कहना है कि 'भामा' नाम की नगरी में रहने के कारण श्रीवाचस्पतिमिश्र ने अपनी व्याख्या का नाम भामती रखा है। कुछ हो, यह एक अमर कीर्ति है उस कीर्ति पुञ्ज की, जिसकी चका-चौन्ध समूचे दार्शनिक विश्व में व्याप्त है ।

१—भामती और भास्कर-भाष्य श्री वाचस्पति मिश्र ने भेदाभेदवादी आचार्य भास्कर की विशेषरूप में आलोचना की है, क्योंकि भास्कराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य के प्रणयन का मुख्य उद्देश्य शाङ्कर-भाष्य का निराकरण ही माना है—

सूत्राभिप्रायसंवृत्या स्वाभिप्रायप्रकाशनात् ।
व्याख्यातं यैरिदं शास्त्रं व्याख्येयं तन्निवृत्तये ॥ (भास्कर. पृ. १)

यहाँ 'यैः' पद से आचार्य शङ्कर का ही ग्रहण किया गया है। आचार्य शङ्कर से पहले भी आचार्य बोधायन और आचार्य उपवर्षादि के बृहत्काय वृत्ति-ग्रन्थ थे, जिनमें ब्रह्मसूत्रों की विशद व्याख्या की गई थी, किन्तु उनमें विशुद्ध अद्वैतवाद का सम्भवतः प्रतिपादन नहीं था। आचार्य शङ्कर के द्वारा उनकी अवहेलना अनिवार्य थी। वही अवहेलना आचार्य भास्कर और परवर्ती अन्य आचार्यों के मस्तिष्क में अद्वयवाद के प्रति भयङ्कर विस्फोट उत्पन्न करती आ रही है। आचार्य उपवर्ष और द्रविड़ाचार्यादि ने भी बोधायन की वृत्ति को कुछ संक्षेप और अर्थान्तर की ओर मोड़ दिया था, अत एव आचार्य रामानुज ने कहा है — "भगवद्बोधायनकृतां विस्तीर्णां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः, तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यायन्ते' (श्रीभा. पृ. १)।

प्रकृत में आचार्य भास्कर के द्वारा किए गए शाङ्कर भाष्य के निराकरण-प्रकारों का दिग्दर्शन कराना आवश्यक है, जिससे वाचस्पति मिश्र की भास्करीय आलोचना प्रशस्त हो सके—

१— "अक्षरमम्बरान्तधृतेः" (ब्र. सू. १।३।१०) इस सूत्र की व्याख्या में आचार्य भास्कर लिखते हैं— 'केचिद् अक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वादक्षरमोंकार इति पूर्वपक्षयन्ति,..... तदेतदधिकरणेनासम्बद्धम्" (भास्कर. पृ. ५४)। यहाँ 'केचित्' पद से भास्कर ने आचार्य शङ्कर का ग्रहण कर उनके पूर्वपक्ष को असंगत ठहराया है। वाचस्पतिमिश्र ने वहीं पर भास्करीय वक्तव्य का अनुवाद करके खण्डन किया है—"ये तु प्रधानं पूर्वपक्षयित्वा...'" (भामती पृ. ४४३)।

२. आचार्य भास्कर ने जीव और ईश्वर के भेदाभेद का उपपादन करते हुए कहा है—"ननु भेदाभेदौ कथं परस्पर विरुद्धौ सम्भवेताम् ? नैष दोषः—

प्रमाणतश्चेत् प्रतीयते को विरोधोऽयमुच्यते ।
विरोधे चाविरोघे च प्रमाणं कारणं मतम् ॥

(भास्कर. पृ. १०३)। आचार्य वाचस्पति कहते हैं—"अथ त्वगृह्यमाणविशेषतया..." (भामती पृ. ५१८)। मिश्र जी का भाव स्पष्ट करते हुए वहीं कल्पतरुकार ने कहा है— "भेदाभेदव्यवस्था चेत्"। श्री अप्पयदीक्षित ने इस ग्रन्थ का अवतरण दिया है— "भास्कर ग्रन्थेषु विरुद्धयोरपि समवलयोरपि भेदाभेदयोर्संकरोपपादनं कृतम्, तन्निरस्यति"।

३—श्री भास्कराचार्य ने जीव को ईश्वर का अंश बताते हुए एक लम्बा-सा वक्तव्य दिया है— "तदंशो जीवोऽस्ति....." (भास्कर. पृ. १४०)। आचार्य वाचस्पति ने उस वक्तव्य

८                ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

का अनुवाद करके खण्डन किया है—"ये तु काशकृत्स्नीयमेव मतमास्थाय जीवं परमात्मनोऽशमाचख्युः" ( भामती. पृ. ५२२ ) ।

४. श्री भास्कराचार्य ने परिणामवाद का समर्थन करते हुए कहा है—"सूत्रकारः श्रुत्यनुकारी परिणामपक्षं सूत्रयाम्बभूव । अयमेव छान्दोग्ये वाक्यकारवृत्तिकाराभ्यां समाश्रितः, तथा च वाक्यम्—परिणामस्तु दध्यादिवदिति । विगीतं विच्छिन्नमूलं माहायानिकबौद्धगाथायितं मायावादं व्यावर्णयन्तो लोकान् व्यामोहयन्ति" ( भास्कर. पृ. ८५ ) । वाचस्पति मिश्र ने आचार्य ब्रह्मनन्दी के उक्त वाक्य का आशय बताते हुए कहा है—"इयं चोपादानपरिणामादिभाषा न विकाराभिप्रायेण, अपितु यथा सर्पस्योपादानं रज्जुरेवं ब्रह्म जगदुपादानम्" ( भामती० पृ० ५३० ) ।

२—भामती व्याख्या

व्याख्या तो सम्पूर्ण भामती की प्रकाशित हो रही है, किन्तु ग्रन्थके कलेवर को अप्रत्याशित बृंहण से बचाने के लिए पूरे ग्रन्थ को दो भागों में प्रकाशित करना ही उचित समझा गया। प्रथम अध्याय के चार पाद एवं द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद को मिलाकर सवा छः सौ पृष्ठ के लगभग हो गए हैं, आगे सम्भवतः इतना ही शेष है। प्रकाशन कार्य की विलम्बता से बहुत से प्रतीक्षकों का धैर्य भी टूट रहा है, अतः पञ्च पाद का यह प्रथम भाग प्रकाशित कर दिया गया है। द्वितीय भाग का प्रकाशन भी चालू है, उसके पूरा होने में कुछ समय तो लग ही जायगा।

पूरे ग्रन्थ का मुद्रण हो जाने के पश्चात् ही भूमिकादि पूर्वाङ्ग एवं परिशिष्टात्मक उत्तराङ्गों का सम्पादन सम्भव हो पाता है, अतः यहाँ मूल ग्रन्थ, भाष्य एवं भामती के रचयिता का स्वल्प परिचय ही दिया गया है, ग्रन्थ के विषय में शेष वक्तव्य द्वितीय भाग के आरम्भ में दिया जायगा।

के० ३७/२ ठठेरीबाजारस्वामी योगीन्द्रानन्द
वाराणसीन्यायाचार्य मीमांसातीर्थ

हिन्दीव्याख्यासहितभामतीसंवलितस्य

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यस्य

विषयानुक्रमणी


समन्वयाख्यप्रथमाध्यायस्य

(१) प्रथमे पादे—पृष्ठाङ्कः
१. मङ्गलश्लोकाः
२. अध्यासविचारः—
३. अध्यासानुपपत्तिशङ्का
४. तस्या निरासः१०
५. अध्यासस्य लक्षणम्१७
६. आत्मख्यातिः२५
७. अख्यातिः२५
८. अन्यथाख्यातिः२९
९. आत्मन्यविषये कथमध्यासः ?३३
१०. आत्मा नैकान्तेनाविषयः३८
११. अध्यास एवाविद्या४१
१२. अविद्यावद्विषयाणि प्रमाणानि४३
१३. विविधानि पातकानि४६
१४. ब्रह्मजिज्ञासाधिकरणम्—५५
१५. अथशब्दार्थविचारः५७
१६. आनन्तर्यार्थविचारः६५
१७. ज्ञाने कर्मोपयोगः७०
१८. अतःशब्दार्थविचारः८५
१९. जिज्ञासापदार्थः९०
२०. ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा ?९१
२१. तत्त्वमर्थविचारः९५
२२. जन्माद्यधिकरणम्—९७
२३. ब्रह्मलक्षणविचारः९७
२४. ईश्वरानुमानविचारः१०२
२५. शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्—१०९
२६. वेदकर्तृत्वविचारः१११
२७. शास्त्रकर्तृत्वविचारः११३

१० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

२८. समन्वयाधिकरणम्-- ११५
२९. वेदान्तसमन्वयः ११५
३०. कार्यार्थत्वविचारः १२०
३१. सिद्धार्थत्वविचारः १२१
३२. ब्रह्मणः प्रतिपत्तिविधिविषयत्वशङ्का १२५
३३. तस्या निराकरणम् १३३
३४. कूटस्थनित्यत्वादिविचारः १३६
३५. सम्यग्रूपज्ञानविचारः १४३
३६. शास्त्रमविद्यावद्भेदवारकम् १४७
३७. मोक्षस्योपाद्यत्वादिविचारः १४६
३८. ज्ञानं न मानसी क्रिया १५३
३९. वेदान्तेषु लिङाद्यर्थविचारः १५४
४०. औपनिषदः पुरुषः १५७
४१. ब्रह्मणोऽविनाशित्वम् १६१
४२. कर्मविबोधमात्रे न वेदस्य तात्पर्यम् १६३
४३. वेदान्तेषु सिद्धार्थोपदेशः १६४
४४. निषेधवाक्येषु कार्याभावः १६६
४५. देहादावात्माभिमानो गौणः १७७
४६. जीवतोऽशरीरत्वम् १७९
४७. उपनिषदामैदम्पर्यम् १८०
४८. ईक्षत्यधिकरणम्-- १८४
४९. प्रधानस्य जगदुपादानत्वशङ्का १८५
५०. तस्या भङ्गः १९०
५१. प्रधानस्य न सच्छब्दार्थता २००
५२. सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणम् २०५
५३. आनन्दमयाधिकरणम्-- २०६
५४. प्रधानस्यानन्दमयत्वशङ्का २०६
५५. जीवस्यानन्दमयत्वशङ्का २०७
५६. ब्रह्मण एवानन्दमयत्वम् २११
५७. अन्तरधिकरणम्-- २२३
५८. आदित्यपुरुषस्य जीवत्वाशङ्का २२३
५९. आदित्यपुरुषो ब्रह्मैव २२५
६०. आकाशाधिकरणम् २२८
६१. नामाद्याधारमाकाशं ब्रह्मैव २२८
६२. प्राणाधिकरणम् -- २३५
६३. प्राणदेवताया वायुरूपत्वशङ्का २३५
६४. ब्रह्मलिङ्गत्वान् प्राणो ब्रह्म २३७
६५. ज्योतिरधिकरणम्-- २४१
६६. ज्योतिषः तैजसत्वम् २४१

हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११

६७. ज्योतिरिह ब्रह्म २४५
६८. प्रतर्दनाधिकरणम्— २५५
६६. प्रज्ञात्मा प्राणो देवतादिरूपः २५७
७०. प्राणशब्दं ब्रह्मैव २५८

(२) द्वितीये पादे—

७१. सर्वत्र प्रसिद्धधिकरणम्— २६५
७२. मनोमयत्वादिभिरुपास्यं ब्रह्म २६९
७३. अत्रधिकरणम्— २७६
७४. अत्ता परमात्मैव २७७
७५. गुहाधिकरणम्— २७९
७६. ऋतं पिबन्तौ जीवपरमात्मानौ २७९
७७. अन्तराधिकरणम् २८७
७८. अक्षिपुरुषो ब्रह्म २८७
७६. अन्तर्याम्यधिकरणम् २९७
८०. सर्वान्तर्यामी परमात्मैव ३०३
८१. अदृश्यत्वाधिकरणम्-- ३०३
८२. अदृश्यत्वादिगुणकः परमेश्वरः ३०५
८३. भूतयोनिः परमात्मा ३०७
८४. वैश्वानराधिकरणम्— ३१२
८५. वैश्वानरः परमेश्वरः ३१३

(३) तृतीये पादे—

८६. द्युभ्वाद्यधिकरणम्— ३२३
८७. द्युलोकादेरधिकरणं ब्रह्म ३२३
८८. भूमाधिकरणम् - ३३२
८९. भूमा ब्रह्मैव ३३३
९०. अक्षराधिकरणम्— ३४०
९१. अक्षरशब्दं ब्रह्म ३४२
९२. प्रशासनं ब्रह्मणः कर्म ३४५
९३. ईक्षतिकर्मव्यपदेशाधिकरणम्— ३४६
९४. अभिध्यातव्यं ब्रह्म ३४७
९५. दहराधिकरणम्--- ३४८
९६. दहराकाशं ब्रह्मैव ३५२
९७. अनुकृत्यधिकरणम्— ३७४
६८. ब्रह्मभानस्यैव भाण्वादावनुकरणम्— ३७६
६६. प्रमिताधिकरणम् ३७९
१००. अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ब्रह्म ३८०
१०१. देवताधिकरणम्— ३८४
१०२. देवादीनामपि ज्ञानेऽधिकारः ३८५
१०३. देवानां विग्रहादिमत्त्वम् ३८६

१९ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्
१०४.देवविग्रहादेः शब्दव्यङ्ग्यत्वम्३९०
१०५.स्फोटवादनिरासः४०१
१०६.वेदानाम्नादित्वम्४०६
१०७.जैमिनिमतविरोधः४११
१०८.वादरायणमतेन तस्य निरासः४१७
१०९.अर्थबादानामुपयोगः४१९
११०.अपशूद्राधिकरणम्—४२८
१११.ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः४३१
११२.कम्पनाधिकरणम्—४४०
११३.जगदेजयितुप्राणो ब्राह्मौ४४१
११४.ज्योतिरधिकरणम्—४४३
११५.ज्योतिशब्दं ब्रह्म४४४
११६.अर्थान्तरत्वव्यपदेशाधिकरणम्—४४७
११७.नामादिधारकमाकाशं ब्रह्मैव४४८
११८.सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरणम् —४४९
११९.विज्ञानमयशब्दं ब्रह्म४५०

(४) चतुर्थ पादे—

१२०.आनुमानिकाधिकरणम्—४५४
१२१.अव्यक्तपदं शरीरम्४५६
१२२.अव्यक्तपदं न प्रधानपरम्४६६
१२३.चमसाधिकरणम्—४७६
१२४.अजापदं न प्रधानपरम्४७७
१२५.अजापदं भूतप्रकृतिपरम्४७७
१२६.संख्योपसंग्रहाधिकरणम्४८०
१२७.पञ्चजनशब्दः प्राणादिपरः४८१
२२८.कारणत्वाधिकरणम्—४९१
१२६.सृष्टिक्रमविवादेऽपि स्रष्टर्यविवादः४९३
१३०.बालाक्यधिकरणम्—४९८
१३१.पुरुषाणां कर्त्ता ब्रह्मैव५०१
१३२.जैमिनिमतम्५०५
१३३.वाक्यान्वयाधिकरणम्—५०७
१३४.द्रष्टव्यत्वादिरूपेण ब्रह्मण एव निर्देशः५०७
१३५.प्रकृत्यधिकरणम्—५२४
१३६.अभिन्ननिमित्तोपादानं ब्रह्म५२५
१३७.सर्वव्याख्यानाधिकरणम्२३०
१३८.परमाण्वादिकारणवादनिरासः५३१

हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् १३

अविरोधाख्यद्वितीयोध्यायस्य

(१) प्रथमे पादे—

१.स्मृत्यधिकरणम्—५३३
२.सांख्यस्मृतिविरोधपरिहारः५३३
३.योगप्रत्युक्त्यधिकरणम्—५४१
४.योगशास्त्रविरोधनिरासः५४१
५.विलक्षणत्वाधिकरणम्—५४५
६.सांख्यतर्कविरोधोद्धारः५४५
७.शिष्टापरिग्रहाधिकरणम्—५६२
८.कणादादितर्कविरोधापसारणम्—५६५
९.भोक्त्रापत्त्यधिकरणम्—५६६
१०.भोक्त्रादिविभागो लोकवत्५६६
११.आरम्भणाधिकरणम्—५६७
१२.कार्यस्य कारणव्यतिरेकेणाभावः५६८
१३.ब्रह्मभेदाभेदनिरासः५७६
१४.असत्यात् सत्यस्योत्पत्तिः५७७
१५.कार्यकारणयोरभेदः५८५
१६.सत्कार्यवादः५८६
१७.समवायनिरासः५९१
१८.सत्कार्यवादः५९३
१९.इतरव्यपदेशाधिकरणम्—५९८
२०.स्रष्टुर्हिताकरणदोषनिरासः५९९
२१.उपसंहारदर्शनाधिकरणम्—६००
२२.असहायस्यैव ब्रह्मणः स्रष्टृत्वम्६०१
२३.कृत्स्नप्रसक्त्यधिकरणम्—६०३
२४.निरवयवस्यैवोपादानत्वम्६०४
२५.सर्वोपेताधिकरणम्—६०८
२६.एकरसस्यापि ब्रह्मणो विचित्रा सृष्टिः६०८
२७.न प्रयोजनवत्त्वाधिकरणम्—६०९
२८.लीलामात्रा सृष्टिः६०९
२९.वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम्—६१३
३०.जीवकर्मापेक्षा सृष्टिः६१३
३१.अनादिः संसारः६१५
३२.सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम्—६१७
३३.निर्गुणस्यैव ब्रह्मणः स्रष्टृत्वम्६१७

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्,
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा,
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥
( श्रीमद्भा० १।१।१। )

तत्सद्ब्रह्मणे नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्


समन्वयाध्याये प्रथमे

प्रथमः पादः


भामती

अनिर्वाच्याविद्याद्वितयसचिवस्य प्रभवतो विवर्त्ता यस्यैते वियदनिलतेजोऽबवनयः।
यतश्चाभूद्विश्वं चरमचरमुच्चावचमिदं नमामस्तद्ब्रह्मापरिमितसुखज्ञानममृतम् ॥ १ ॥


भामती-व्याख्या

सहस्रधारके यस्मिन्नृषयो नो मनीषिणः।
पुनन्ति स्वं वचस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥ १ ॥

यदावृत्याविद्या परिणतिविवर्त्ता विजयते,
अनिर्वाच्या चित्रा सदसदभिलापाप्रलपिता।
यदेवानादृत्य प्रकिरति विमुक्तिं मतिमतां,
तदेव ब्रह्माहं कथमपि नमस्यामि मननात् ॥ २ ॥

अश्रौततन्त्रकान्तारे श्रौतदर्शनविस्तरे।
श्रीवाचस्पतिमिश्राणां समं नृत्यति भारती ॥ ३ ॥

प्रसादो वदने यस्या हृदि गाम्भीर्यमद्भुतम्।
भाष्याभिरूपतामेति व्याख्या सैषेव भामती ॥ ४ ॥

भामतीपतिरेकाकी बभूवास्या रहस्यवित्।
वयं तु केवलमस्या वीक्षितं वीक्षितुं क्षमाः ॥ ५ ॥


स्वभावतः अनिर्वाच्य (सत् और असत् से भिन्न) एवं मूलाविद्या और तूलाविद्या के भेद से दो प्रकार की अविद्या (भावरूप अज्ञान) के सहयोग से ब्रह्म के 'आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी'—ये पाँच भूत विवर्त (अतात्त्विक कार्य) हो जाते हैं। इतना ही नहीं जिस ब्रह्म से समस्त चराचर (चल और अचल) प्रपञ्च समुद्भूत हो जाता है, उस असीम सुख-सिन्धु और शाश्वत ज्ञानरूप ब्रह्म को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। [इस शिखरिणी छन्द में ब्रह्म का द्वितीय-सूत्र-सूचित जगज्जन्मादिकर्तृत्वरूप तटस्थ लक्षण तथा सच्चिदानन्दत्वरूप स्वरूप लक्षण प्रस्तुत किया गया है] ॥ १ ॥

इसी ब्रह्म के द्वारा श्वास-प्रश्वास के समान ऋगादि वेद, दृष्टिपातमात्र के समान आकाशादि पाँच महाभूत एवं एक सहज मुस्कान के समान समग्र स्थावर-जङ्गम जगत्

२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १. पां. १ सू. १

भामती

निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि ।
स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ २ ॥
षड्भिरङ्गैरुपेताय विविधैरव्ययैरपि ।
शाश्वताय नमस्कुर्मो वेदाय च भवाय च ॥ ३ ॥
मार्तण्डतिलकस्वामिमहागणपतीन् वयम् ।
विश्ववन्द्यान् नमस्यामः सर्वसिद्धिविधायिनः ॥ ४ ॥


भामती-व्याख्या

अनायास ही रचा गया है। जैसे उसके सङ्कल्प मात्रसे विशाल विश्व की सृष्टि हो जाती है, वैसे ही उसका सुषुप्ति (गाढ़ निंद्रा) में सो जानामात्र महाप्रलय कहलाता है। [इस पद्य के द्वारा तृतीय सूत्र-प्रोक्त शास्त्रयोनित्व का स्पष्टीकरण “अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः” (बृह० उ० २।४।१०) इस श्रुति के प्रकाश में किया गया है। इससे ब्रह्म में सर्वज्ञता फलित होती है] ॥ २ ॥

छः अङ्ग और विविध अव्ययों से परिपूर्ण भगवान् शङ्कर और वेद को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। [भगवान् शङ्कर के छः अङ्ग शिवपुराण (विद्येश्वर-सं. १६।१२) में वर्णित हैं—
सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः ।
अचिन्त्यशक्तिश्च विभोर्विधिज्ञा षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य ॥
इसी प्रकार भगवान् वेद के छः अङ्ग मुण्डकोपनिषत् (१।१।५) में कहे गये हैं—“शिक्षा कल्पो व्याकरणं छन्दो ज्योतिषम् ।” भगवान् शङ्कर के दश अव्ययों का वर्णन वायु पुराण में किया गया है—
ज्ञानं विरागतैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।
स्रष्टृत्वमात्मसंबोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥
वेद में ‘च, ह, वा’ आदि अव्ययपदों का प्रयोग अत्यन्त प्रसिद्ध है] ॥ ३ ॥

मार्तण्ड (भगवान् सूर्य), तिलकस्वामी (भाल में तिलक लगाना जिन्हें अत्यन्त प्रिय है, ऐसे स्वामी कार्तिकेय) और महागणपति को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। ये सब देवगण विश्व-वन्द्य हैं, इनकी पूजा करने से सिद्धि प्राप्त होती है [जैसा कि याज्ञ-वल्क्यस्मृति (१।२९४) में कहा गया है—
आदित्यस्य सदा पूजां तिलक स्वामिनस्तथा ।
महागणपतेश्चैव कुर्वन् सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ] ॥ ४ ॥

वैष्णवी ज्ञान शक्ति के अवताररूप ब्रह्मसूत्रों के रचयिता, सर्वज्ञ महर्षि वेदव्यास को हमारा (वाचस्पति मिश्र का) नमस्कार है। [महर्षि पराशर ने अपने समय तक हुए अट्ठाईस वेदव्यासों को भगवान् विष्णु का अवतार बताते हुए अपने पितामह महर्षि वसिष्ठ को आठवें द्वापर का व्यास, अपने पिता महर्षि शक्ति को पच्चीसवां, अपने को छब्बीसवां तथा अपने पुत्र कृष्णद्वैपायन को अट्ठाईसवां व्यास कहा है—
द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपी महामुने ।
वेदमेकं सुबहुधा कुरुते जगतो हितः ॥ (विष्णुपु० ३।३।५)
तस्मादस्मत्पिता शक्तिर्व्यासस्तस्मादहं मुने ॥
जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः ।
अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः ॥ (विष्णुपु० ३।३।१६)

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३


भामती

ब्रह्मसूत्रकृते तस्मै वेदव्यासाय वेधसे ।
ज्ञानशक्त्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ ५ ॥
नत्वा विशुद्धविज्ञानं शङ्करं करुणाकरम् ।
भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तत्प्रणीतं विभज्यते ॥ ६ ॥
आचार्यकृतिनिवेशनमप्यवधूतं वचोऽस्मदादीनाम् ।
रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ॥ ७ ॥

अथ यदसन्दिग्धमप्रयोजनं च न तत्प्रेक्षावत्प्रतिपित्सागोचरः, यथा समनस्केन्द्रियसन्निकृष्टः स्फीतालोकमध्यवर्ती घटः करटदन्ता वा, तथा चेदं ब्रह्मेति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । तथाहि 'बृहत्त्वाद् बृंह-


भामती-व्याख्या

कृष्णद्वैपायन के पश्चात् आगामी द्वापर में द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा को उनतीसवाँ व्यास कहा गया है ] ॥ ५ ॥

विमलप्रज्ञ एवं करुणा-सागर भगवान् शङ्कराचार्य को नमस्कार करके उनके द्वारा प्रणीत प्रसन्न [ सुगम पदावलि एवं गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करनेवाले ] भाष्य ( ब्रह्मसूत्र के शाङ्कर भाष्य ) का व्याख्यान किया जा रहा है । [ प्रसाद नाम का शब्दालङ्कार काव्यादर्श में वर्णित है—

श्लेषः प्रसादः समता माधुर्यं सुकुमारता ।
अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजः कान्तिसमाधयः ॥ ( काव्या० १।४१ )

सुगम और सुप्रसिद्ध पदावलि का प्रयोग ही प्रसाद गुण माना जाता है । श्री पद्मपादाचार्य ने भी शाङ्कर भाष्य में प्रसाद गुण का उल्लेख किया है—

"भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तद्व्याख्यां श्रद्धयारभे" ( पञ्चपा० पृ० १ ) ] ॥ ६ ॥

जैसे गङ्गा में मिल जाने मात्र से गली-कूचों का अपवित्र जल पवित्र हो जाता है, वैसे ही भाष्य के साथ हमारी ( वाचस्पतिमिश्र की ) भामती नाम की व्याख्या का सम्बन्ध हो जाने मात्र से हमारी अपवित्र वाणी भी पवित्र हो जाती है ॥ ७ ॥

[ "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्र. सू. १।१।१ ) इस सूत्र के द्वारा भगवान् सूत्रकार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ब्रह्म की सहज-सिद्ध जिज्ञास्यता दिखा कर ब्रह्म-विचार का प्रस्ताव रख रहे हैं । उसकी व्याख्या में भगवान् भाष्यकार अध्यास का उपपादन ( आक्षेपपूर्वक स्वरूप-निरूपण ) कर रहे हैं । आपाततः प्रतीयमान सूत्र और भाष्य की इस असमञ्जसता को दूर करते हुए भामतीकार ब्रह्म की जिज्ञास्यता के साथ अध्यास का अन्वय-व्यतिरेक दिखाने के लिए एक सामान्य व्याप्ति प्रदर्शित कर रहे हैं— ] जो वस्तु असन्दिग्ध ( सन्देह-रहित ) और निष्प्रयोजन होती है, वह प्रेक्षक ( विचार में समर्थ ) मनीषिणों का जिज्ञासा का विषय नहीं होती, जैसे सजग पुरुष की आँखों के सामने प्रखर प्रकाश में रखा घट-जैसा असन्दिग्ध और काक-दन्त के समान निरर्थक पदार्थ, प्रकृत में ब्रह्म तत्त्व भी वैसा ही असन्दिग्ध और निष्प्रयोजन है—इस प्रकार यहाँ जिज्ञास्यता (विचारणीयता) की व्यापकीभूत सन्दिग्धता एवं सप्रयोजनता के विरोधी असन्दिग्धत्व एवं निष्प्रयोजनत्व की उपलब्धि ( सिद्धि ) है, अतः ब्रह्म की विचारणीयता कदापि न्यायोचित नहीं ठहराई जा सकती [ प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थकार श्री धर्मकीर्ति ने अपने न्यायबिन्दु में सद्धेतु के तीन भेद कहे हैं—"अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति" ( न्या० बिं० १।११ ) । अनुपलब्धि हेतु के ग्यारह भेदों में एक व्यापकविरुद्धोपलब्धि भी वर्णित है—"व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा नात्र तुषारस्पर्शो [वह्नेरिति]" (न्या० बिं० २।३८) । श्री वाचस्पतिमिश्र ने यहाँ उसी का प्रयोग प्रदर्शित किया है ] ।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

णत्वाद्ब्रह्मत्वमेव ब्रह्मेति गीयते' । स चायमाकीटपतङ्गेभ्य आ च देवर्षिभ्यः प्राणभृन्मात्रस्येदङ्कारास्पदेभ्यो देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयेभ्यो विवेकेनाहमिति असन्दिग्धाविपर्य्यस्तापरोक्षानुभवसिद्ध इति न जिज्ञासास्पदं, न हि जातु कश्चिदत्र सन्दिग्धेऽहं वा नाहं वेति, न च विपर्य्यस्यति नाहमेवेति । न चाहं कृशः स्थूलो गच्छामीत्यादिदेहधर्मसामानाधिकरणदर्शनात् देहालम्बनोऽयमहङ्कार इति साम्प्रतम् । तदालम्बनत्वे हि योऽहं बाल्ये पितरावन्वभवं स एव स्थाविरे प्रणप्तॄननुभवामीति प्रतिसन्धानं न भवेत् । न हि बालस्थविरयोः शरीरयोरस्ति मनागपि प्रत्यभिज्ञानगन्धो येनैकत्वमध्यक्षवसीयेत । तस्माद्येषु व्यावर्तमानेषु यदनुवर्त्तते तत्तेभ्यो भिन्नं, यथा कुसुमेभ्यः सूत्रम् । तथा च बालादिशरीरेषु व्यावर्तमानेष्वपि परस्परमहङ्कारास्पदमनुवर्त्तमानं तेभ्यो भिद्यते ।

अपि च स्वप्नान्ते दिव्यं शरीरभेदमास्थाय तदुचितान् भोगान् भुञ्जान एव प्रतिबुद्धो मनुष्यशरीरमात्मानं पश्यन्नाहं देवो मनुष्य एवेति देवशरीरे बाध्यमानेऽप्यहमास्पदमबाध्यमानं शरीराद्भिन्नं प्रति-

भामती-व्याख्या

ब्रह्म में असन्दिग्धता का उपपादन—
विष्णुपुराण ( ३।२२ ) में कहा गया है—"बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्मेत्यभिधीयते ।” अर्थात् बृहत् ( व्यापक ) या बृंहण ( अपने शरीरादि की वृद्धि का कारण ) होने से जीवात्मा ही ब्रह्म कहलाता है, वह तो कीड़े-मकोड़ों से लेकर देवों और ऋषियों तक सभी प्राणियों को देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शब्दादिरूप इदंकारास्पद बाह्य पदार्थों से भिन्न 'अहम्'—इस प्रकार अपरोक्ष अनुभव के द्वारा अवगत है, अतः वह 'आत्मा क्या है?' इस प्रकार की जिज्ञासा का विषय नहीं हो सकता । इस ( आत्मा ) के विषय में न तो कोई प्राणी 'अहं वा नाहं वा ?' ऐसा सन्देह ही करता है और न 'नाहमेव' ऐसा विपरीत निश्चय । यदि कहा जाय कि 'अहं कृशः, स्थूलः, गच्छामि'—इत्यादि अनुभूतियों के द्वारा कृशत्व, स्थूलत्व और गमनादि क्रियारूप शरीर के धर्मों और अहन्त्वरूप आत्मा के धर्मों का एक अधिकरण में रहना सिद्ध होता है, अतः साधारण मनुष्य शरीर को ही आत्मा मानता है, शरीरादि से भिन्न आत्मा का अनुभव नहीं करता । तो वह कहना उचित नहीं, क्योंकि शरीर को 'अहम्'—इस प्रकार की प्रतीति का विषय नहीं माना जा सकता, अन्यथा अहंपदार्थ में पूर्व और पर काल की एकता का अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकेगी—'योऽहं बाल्यावस्थायां पितृ-पितामहादिकमनुभूतवान्, स एवाहं वृद्धावस्थायां पुत्रपौत्रादिकमनुभवामि ।” इसका कारण यह है कि बाल्य और वृद्धावस्था के शरीर एक नहीं रहते, स्पष्ट रूप से भिन्न हो जाया करते हैं, अतः शरीर से भिन्न ही अहंपदार्थ का होना निश्चित है । यदि बाल और वृद्ध शरीरों में कुछ भी एकरूपता होती, तब उसे अहंपदार्थ माना जा सकता था, किन्तु वैसा सम्भव नहीं। यह निश्चित व्याप्ति है कि जिन बाल्यकाल के शरीरादि पदार्थों के वृद्धावस्था में व्यावृत ( निवृत्त ) हो जाने पर भी जो अहंपदार्थ अनुवृत्त रहता है, वह शरीरादि व्यावृत हो जाने वाले पदार्थों से भिन्न होता है, जैसे एक धागे में पिरोए हुए फूल एक-दूसरे के स्थान से व्यावृत होते ( हटते ) जाते हैं, किन्तु धागा सर्वत्र अपनी एकता बनाए रखता है, अतः फूलों से धागा भिन्न तत्त्व होता है । वैसे ही बाल्य और वृद्धावस्था के शरीर परस्पर व्यावृत हैं, किन्तु अहंकारास्पद आत्मतत्त्व सर्वत्र अनुगत होने के कारण शरीरादि से भिन्न स्थिर होता है ।

केवल शरीरों की बाल्यादि अवस्थाओं के व्यावृत होने पर ही अहंकारास्पद पदार्थ की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती, अपि तु एक व्यक्ति अपने स्वप्न में देव-शरीर पाकर देव-सुलभ

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्


भामती

पद्यते। अपि च योगव्याघ्रः शरीरभेदेऽपि आत्मानमभिन्नमनुभवतीति नाहङ्कारालम्बनं देहः। अत एव नेन्द्रियाण्यपि अस्यालम्बनम् , इन्द्रियभेदेऽपि योऽहमद्राक्षं स एवैतर्हि स्पृशामीत्यहमालम्बनस्य प्रत्यभिज्ञानात्। विषयेभ्यस्त्वस्य विवेकः स्थवीयानेव। बुद्धिमनसोश्च करणयोरहमितिकर्तृप्रतिभासप्रख्यानालम्बनत्वायोगा। कृशोऽहमन्धोऽहमित्यादयश्च प्रयोगा असत्यपि अभेदे कथञ्चिन्मञ्चाः क्रोशन्तीत्याविवदौपचारिका इति युक्तमुत्पश्यामः। तस्माद्विवहङ्कारास्पदेभ्यो देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयेभ्यो व्यावृत्तः स्फुटतराहमनुभवगम्य आत्मा संशयाभावादजिज्ञास्य इति सिद्धम्। अप्रयोजनत्वाच्च। तथाहि—संसारनिवृत्तिरपवर्ग इह प्रयोजनं विवक्षितम्। संसारश्चात्मयाथात्म्याननुभवनिमित्त आत्मयाथात्म्यज्ञानेन निवर्त्तनीयः। स चेदयमनादिरनादिनात्मयाथात्म्यज्ञानेन सहानुवर्त्तते कुतोऽस्य निवृत्तिरविरोधात्। कुतश्चात्मयाथात्म्या-


भामती-व्याख्या

भोगों का उपभोग करता है, जागने पर वह व्यक्ति अपने को मनुष्य-शरीर में पाकर यह अनुभव करता है कि स्वप्न में प्राप्त देव-शरीर से यह मनुष्य-शरीर सर्वथा भिन्न है किन्तु मैं वही हूँ।

केवल स्वप्न में ही नहीं, जागरण-काल में भी कोई योगी अपने योग-बल के द्वारा अपने मानव-शरीर से भिन्न व्याघ्रादि का शरीर धारण कर लेता है,; किन्तु एक ही समय उस योगी को विभिन्न शरीरों में भी अपनी अनुवृत्ति और एकता का विस्पष्ट भान होता रहता है। इससे यह तथ्य निश्चित हो जाता है कि व्यावृत होनेवाले शरीरों से सर्वत्र अनुवृत्त अहंकारास्पद आत्मा भिन्न है।

इसी प्रकार इन्द्रियों को भी अहंप्रतीति का विषय नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन्द्रियों के भिन्न होने पर भी अहमर्थ की एकता अनुभूत होती है—'योऽहमदमद्राक्षम्, स एवाहमदानीमिदं स्पृशामि'। शब्दादि बाह्य विषयों से तो इस (आत्मा) का भेद अत्यन्त स्थूल और अतिस्पष्ट है। बुद्धि और मन को अहंकारास्पद नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'बुद्ध्याऽध्यवस्यामि', 'मनसा सङ्कल्पयामि'—इत्यादि व्यवहारों के द्वारा अध्यवसान क्रिया का करणता बुद्धि और सङ्कल्पन क्रिया की करणता मन में निश्चित होती है, अहंपदार्थ उन क्रियाओं का कर्त्ता है, करण कभी कर्त्ता नहीं हो सकता। यदि शरीर और इन्द्रियों को अहंपदार्थ नहीं कहा जा सकता, तब 'अहं कृश:' 'अहमन्धः'—इत्यादि व्यवहारों में कृशता के आश्रयीभूत शरीर और अन्धता के आधारभूत चक्षु इन्द्रिय को अहमास्पद क्यों कहा गया ? इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर है कि उक्त स्थल पर शरीरादि में जो आत्मरूपता का व्यवहार किया गया, वह वैसा ही गौण व्यवहार है, जैसा कि मञ्चादि में मञ्चस्थ पुरुषों का व्यवहार—'मञ्चाः क्रोशन्ति' ऐसी व्यवस्था ही उक्त स्थलों पर युक्ति-संगत प्रतीत होती है। फलतः 'इदम्-इदम्'—इस प्रकार प्रतीत होनेवाले शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शब्दादि विषयों से भिन्न 'अहम्'—इस प्रकार के स्फुटतर अनुभव (निश्चय) के विषयीभूत आत्मा में सन्दिग्धत्व न होने के कारण जिज्ञास्यत्व सम्भव नहीं।

सप्रयोजनत्वाभाव का उपपादन—

विचार के द्वारा निष्पादित होनेवाले आत्मज्ञान का कोई विशेष प्रयोजन भी नहीं सिद्ध होता, इस लिए भी जिज्ञास्यता सम्भव नहीं—'आत्मा जिज्ञास्यो न भवति, निष्प्रयोजनत्वात्, काकदन्तवत्'। कर्तृत्वादिरूप बन्धन की निवृत्ति ही वेदान्त-सिद्धान्त में मोक्ष विवक्षित है। आत्मा का जो अज्ञान (यथार्थाननुभव) ही कर्तृत्वादि प्रपञ्च का आत्मा में आरोपक है, वह अज्ञान आत्म-ज्ञान से ही निवृत्त हो सकता था, किन्तु कर्तृत्वादि प्रपञ्च अनादि है और आत्मज्ञान भी आत्मरूप होने के कारण अनादि है, जो दो पदार्थ अनादिकाल

६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]


युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोर्विषयविषयिणोस्तमःप्रकाशवद्विरुद्धस्वभावयोरितरे-

भामती

ननुभवः, नह्यहमित्यनुभवादन्यदात्मयाथात्म्यज्ञानमस्ति । न चाहमिति सर्वजनीनस्फुटतरानुभवसमर्थित आत्मा देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तः शक्य उपनिषदां सहस्रैरपि अन्यथापयितुमनुभवविरोधात् । नह्यागमाः सहस्रमपि घटं पटयितुमीशते । तस्मादनुभवविरोधादुपचरितार्था एवोपनिषद इति युक्तमुत्पश्याम इत्याशयवानाशङ्क्य परिहरति ※ युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोरिति ※ । अत्र च युष्मदस्मदित्यादिर्मिथ्या भवितुं युक्तमित्यन्तः शङ्काग्रन्थः । तथापीत्यादिपरिहारग्रन्थः । तथापीत्यभिसम्बन्धाच्छङ्कायां यद्यपीति पठितव्यम् । इदमस्मत्प्रत्ययगोचरयोरिति वक्तव्ये युष्मद्ग्रहणमत्यन्तभेदोपलक्षणार्थम् । यथा ह्यहङ्कारप्रतियोगी त्वङ्कारो नैवमिदङ्कारः, एते वयमिमे वयमास्मह इति बहुलं प्रयोगदर्शनादिति । चित्स्वभाव आत्मा

भामती-व्याख्या

से साथ-साथ चले आ रहे हैं, उन दोनों में नाश्य-नाशकभाव सम्भव नहीं, क्योंकि साथ-साथ रहनेवाले पदार्थों का परस्पर विरोध ही नहीं माना जाता ।

यहाँ यह भी एक जिज्ञासा होती है कि कर्तृत्वादि के आरोप का निमित्त कारण जो आत्मतत्त्व का अननुभव (अज्ञान) माना जाता है, वह भी कभी सम्भावित नहीं, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार के अनुभव से भिन्न और कोई आत्मतत्त्व का अनुभव प्रसिद्ध नहीं, वह अनुभव तो सदैव विद्यमान ही है, उसके रहते-रहते आत्मतत्त्व का अननुभव क्योंकर होगा ? यह जो कहा जाता है कि उपनिषत्-प्रतिपाद्य अकर्त्ता अभोक्ता और देह, इन्द्रियादि से भिन्न निरुपाधि आत्मा का अनुभव ही तात्त्विक अनुभव है, वैसा आत्मतत्त्व का अनुभव उपनिषत् ग्रन्थों के श्रवणादि से पूर्व उत्पन्न नहीं हो सकता, वह अनादि नहीं, वही तत्त्वज्ञान आत्मा के अज्ञान का विरोधी और निवर्त्तक माना जाता है । वह कहना समुचित नहीं, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार के लौकिक अनुभव से सिद्ध कर्तृत्वादि धर्मयुक्त आत्मा के स्वरूप का अपलाप या अन्यथात्व एक उपनिषत् तो क्या, हजारों उपनिषत् ग्रन्थ मिलकर नहीं कर सकते । यह वस्तु-स्थिति है कि आत्मा को अकर्त्ता-अभोक्ता मानने पर उक्त लोक-प्रसिद्ध अनुभव विरुद्ध पड़ जाता है । सर्वजनीन स्फुटतर अनुभव से सिद्ध घट को कभी पट नहीं बनाया जा सकता । फलतः 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार के सुदृढ़ अनुभव से विरुद्ध अकर्त्ता-अभोक्ता आत्मा के प्रतिपादक उपनिषत् ग्रन्थों को औपचारिक या गौणार्थक मानना ही उचिततर प्रतीत होता है । पूर्वपक्ष के द्वारा उठाई गई इन सभी आशङ्काओं का परिहार करने के लिए भगवान् भाष्यकार ने उपक्रम किया है— "युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः"—यहाँ से लेकर "नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः"—यहाँ तक ।

अध्यास की अनुपपत्ति—

अध्यास-भाष्य के दो भाग हैं—(१) अध्यास पर आक्षेप ( अध्यास की अनुपपत्ति ) और (२) उसका समाधान ( अध्यास की उपपत्ति ) । आरम्भ से लेकर "मिथ्या भवितुं युक्तम्"—यहाँ तक का भाष्य आक्षेप और "तथापि"—यहाँ से लेकर "नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः"—यहाँ तक का भाष्य समाधान भाष्य कहलाता है । समाधान-भाष्य के आरम्भ में "तथापि" पद का प्रयोग हुआ है. अतः आक्षेप-भाष्य के आरम्भ में "यद्यपि"—ऐसा प्रयोग होना चाहिए था, किन्तु वैसा नहीं किया गया, अतः दोनों भाष्य खण्डों की संगति करने के लिए 'यद्यपि' पद का प्रयोग अपनी ओर से जोड़ लेना चाहिए, क्योंकि 'यद्यपि' और 'तथापि'—ये दोनों प्रयोग नित्य सापेक्ष हैं, एक के बिना दूसरा पद साकांक्ष रह कर अन्वय-बोध कराने में अक्षम हो जाता है । यहाँ यद्यपि आत्मा का बोध कराने के लिए जैसे 'अस्मत्'

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्

तरभावानुपपत्तौ सिद्धायां तद्धर्माणामपि सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः, इत्यतोऽस्म- त्प्रत्ययगोचरे विषयिणि चिदात्मके युष्मत्प्रत्ययगोचरस्य विषयस्य तद्धर्माणां चा-

भामती

विषयी, जडस्वभावा बुद्धीन्द्रियदेहविषयाः विषयाः । एते हि चिदात्मानं विसिन्वन्ति अवबध्नन्ति स्वेन रूपेण निरूपणीयं कुर्वन्तीति यावत् । परस्परानध्यासहेतावत्यन्तवैलक्षण्ये दृष्टान्तस्तमःप्रकाशवदिति । नहि जातु कश्चित्समुदाचरद्वृत्तिनी प्रकाशतमसी परस्परात्मतया प्रतिपत्तुमर्हति । तदिदमुक्तं ॐ इतरेतर-भावानुपपत्ताविति ॐ । इतरेतरभाव इतरेतरत्वं, तादात्म्यमिति यावत् । तस्यानुपपत्ताविति । स्यादे-तत्—मा भूद्धर्मिणोः परस्परभावस्तद्धर्माणां तु जाड्यचैतन्यनित्यत्वानित्यत्वादीनामितरेतराध्यासो भविष्यति । दृश्यते हि धर्मिणोरविवेकग्रहणेऽपि तद्धर्माणामध्यासः, यथा कुसुमाद्भेदेन गृह्यमाणेऽपि स्फटि-कमणावतिस्वच्छतया जपाकुसुमप्रतिबिम्बोद्ग्राहिण्यरूणः स्फटिक इत्यारूण्यविभ्रम इत्यत उक्तम् ॐ तद्धर्माणामपीति ॐ । इतरेतरत्र धर्मिणि धर्माणां भावो विनिमयस्तस्यानुपपत्तिः । अयमभिसन्धिः—

भामती-व्याख्या

शब्द रखा है, वैसे अनात्म पदार्थों का संग्रह करने के लिए 'इदम्' शब्द रखना चाहिये था, 'युष्मत्' शब्द नहीं, क्योंकि सभी अनात्म पदार्थ इदंकारास्पद ही होते हैं। तथापि आत्मा और अनात्म पदार्थों का पारस्परिक अत्यन्त विरोध प्रकट करने के लिए 'अस्मत्' पद के साथ 'युष्मत्' पद की योजना ही समुचित है, क्योंकि 'अहंकार' का विरोधी जैसा 'त्वंकार' होता है, वैसा 'इदंकार' नहीं, अस्मत्, के साथ युष्मत् का कभी प्रयोग नहीं होता, किन्तु इदमादि का सहप्रयोग हो जाता है—'इमे वयम्', 'एते वयमास्महे'। इससे यह अत्यन्त स्पष्ट है कि 'युष्मत्' और 'अस्मत्' प्रयोगों का प्रखर विरोध देखकर आक्षेपवादी ने आत्मा और अनात्मपदार्थों का अत्यन्त विरोध दिखाने के लिए युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः'—ऐसा प्रयोग ही उचित समझा।

चिदात्मा विषयी और बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर एवं शब्दादि—ये सब विषय कहे जाते हैं, क्योंकि विपूर्वक 'षीञ् बन्धने' धातु से पचाद्यच् करके 'विषय' शब्द बना है, इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'विसिन्वन्ति निबध्नन्ति विषयिणमिति विषयः' अर्थात् ज्ञानरूप विषयी पदार्थ को अपने साथ ऐसा बाँध देते हैं कि 'घटज्ञानम्', 'पटज्ञानम्'—इस प्रकार विषय का सहयोग पाये विना ज्ञान का निरूपण ही नहीं हो सकता । आत्मा और अनात्मजगत् के परस्पर-अध्यास की अनुपपत्ति का मुख्य कारण है—आत्मा और अनात्मपदार्थों का अत्यन्त विरोध या वैरूप्य, क्योंकि शुक्ति और रजत के समान रूपवाले पदार्थों का ही परस्पर विनिमयात्मक अध्यास लोक-प्रसिद्ध है । प्रखर प्रकाश और गाढ़ अन्धकार का कभी शुक्ति-रजत के समान तादात्म्याध्यास नहीं देखा जाता—यही भाष्यकार कहते हैं "तमःप्रकाशव-द्विरुद्धस्वभावयोरितरेतराभावानुपपत्तौ" । 'इतरेतरभाव' का अर्थ होता है—अन्य पदार्थ में अन्यरूपता [जैसे शुक्ति में रजतरूपता प्रतीत होती है, वैसे आत्मा और अनात्मा का] तादात्म्य जो अपेक्षित है, उसकी उपपत्ति (सिद्धि) न हो सकने के कारण आत्मा और अनात्मा का अध्यास नहीं हो सकता । यह जो आशङ्का होती है कि जैसे जपाकुसुम और स्फटिक रूप दो धर्मी पदार्थों का तादात्म्याध्यास न होने पर भी स्फटिक में जपाकुसुम के आरुण्य (रक्तिमा) धर्म का अध्यास देखा जाता है, वैसे ही आत्मा और अनात्म पदार्थों का परस्पर तादात्म्य-भ्रम या धर्म्यध्यास न हो सकने पर भी अनात्मभूत बुद्ध्यादि के कर्तृत्व, भोक्तृत्ववादि धर्मों का अध्यास उपपन्न क्यों नहीं हो सकता ? उस आशङ्का को निवृत्त करने के लिए कहा गया है—"तद्धर्माणां सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः"। यहाँ 'इतरेतरभाव' शब्द का अर्थ है—

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

ध्यासः, तद्विपर्ययेण विषयिणस्तद्धर्माणाम् च विषयेऽध्यासो मिथ्येति भवितुं युक्तम्;


भामती

रूपवद्धि द्रव्यमतिस्वच्छतया रूपवतो द्रव्यान्तरस्य तद्विवेकेन गृह्यमाणस्यापि छायां गृह्णीयात् , चिदात्मा त्वरूपो विषयी न विषयच्छायामुद्ग्राहयितुमर्हति । यथाहुः—‘‘शब्दगन्धरसानां च कीदृशी प्रतिबिम्बता’’ इति । तदिह परिशेष्याद्विषयविषयिणोरन्योन्यात्मसम्भेदेनैव तद्धर्माणामपि परस्परसम्भेदेन विनिमयात्मना भवितव्यं, तौ चेद्धर्मिणावत्यन्तविवेकेन गृह्यमाणावसम्भिन्नौ, असम्भिन्नाः सुतरां तयोर्धर्माः, स्वाश्रयाभ्यां व्यवधानेन दूरापेतत्वात् , तदिदमुक्तं ॐसुतरामितिॐ । ॐतद्विपर्ययेणेतिॐ । विषयविपर्ययेणेत्यर्थः । मिथ्याशब्दोऽपह्नववचनः । एतदुक्तं भवति—अध्यासो भेदाग्रहेण व्याप्तस्तद्विरुद्धश्चेहास्ति भेदग्रहः स भेदाग्रहं निवर्त्तयंस्तद्बद्धासमध्यासमपि निवर्त्तयतीति । मिथ्येति भवितुं युक्तं यद्यपि तथापीति योजना । इदमत्राकूतम्—भवेदेतदेवं यद्यहमित्यनुभवे आत्मतत्त्वं प्रकाशेत, न त्वेतदस्ति । तथाहि सम्मस्तो-


भामती-व्याख्या

अन्यान्य धर्मी में धर्मों का भाव ( व्यत्यास ) अर्थात् धर्माध्यास की भी उपपत्ति नहीं हो सकती । आशय यह है कि धर्माध्यास दो प्रकार से होता हैं—(१) रूपवाले स्फटिकादि पदार्थों में जपाकुसुमादि के आरुण्य रूप का प्रतिबिम्ब पड़ने से और ( २ ) लोह-पिण्ड और अग्नि-जैसे धर्मी पदार्थों का तादात्म्य हो जाने पर अग्नि के दाहकत्वादि धर्मों का लोह-पिण्ड में अध्यास होता है । प्रथम प्रकार का धर्माध्यास नियमतः स्फटिक के समान रूप-युक्त पदार्थों में ही होता है, आत्मा रूपवान् नहीं, अतः धर्म-प्रतिबिम्बात्मक धर्माध्यास वहाँ सम्भव नहीं, श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—‘‘शब्दगन्धरसानां कीदृशी प्रतिबिम्बता’’ (श्लो. वा. पृ. २८०) । अर्थात् स्फटिकादि में रूप का प्रतिबिम्ब तो अनुभूत होता है, किन्तु रूप और रूपवान् द्रव्य को छोड़कर शब्द, स्पर्श, रस और गन्धादि का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता, तब आत्मा में अनात्मपदार्थों के अनित्यत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि धर्मों का प्रतिबिम्ब कैसे उपपन्न होगा ? परिशेषतः द्वितीय प्रकार से ही ( धर्म्यध्यासपूर्वक ) धर्माध्यास हो सकता था, किन्तु जब आत्मा और अनात्मरूप दोनों धर्मी अत्यन्त भिन्न प्रतीत हो रहे हैं, तब उनके धर्मों का व्यत्यास कभी भी संभव नहीं, क्योंकि पृथक्-पृथक् रहकर धर्मी अपने धर्मों का विनिमय या संक्रमण नहीं कर सकते—इस तथ्य को ध्वनित करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—‘‘तद्धर्माण सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः’’ ।

भाष्यकार ने जो कहा है—‘‘तद्विपर्ययेण विषयिणः तद्धर्माणां च विषयेऽध्यासः’’ । यहाँ ‘तद्विपर्यय’ पद का अर्थ है—विषयविपर्ययेण । अर्थात् ‘तद्विपर्यय’ पद के घटकीभूत ‘तत्’ शब्द के द्वारा अनात्मरूप विषय का परामर्श किया गया है । [ भाव यह है कि आत्मा और अनात्मपदार्थ—ये दोनों जब प्रकाश और अन्धकार के समान अत्यन्त विपरीत स्वभाव के हैं और दोनों का भेद प्रकट हो रहा है, तब न तो विषय के धर्मों का विषयी में अध्यास हो सकता है और न उसके विपरीत विषयी के धर्मों का विषय में विनिमय हो सकता है ] । भाष्य में प्रयुक्त ‘मिथ्या’ शब्द अपलापार्थक है । अर्थात् ‘अध्यासो मिथ्येति युक्तं भवितुम्’—इस भाष्य का अर्थ है—अध्यास नहीं हो सकता । अभिप्राय यह है कि ‘यत्र यत्राध्यासः, तत्र तत्र भेदाग्रहः’—इस प्रकार अध्यास व्याप्य और भेदाग्रह व्यापक है, व्यापकीभूत भेदाग्रह का विरोधी भेद-ग्रह यहाँ उपलब्ध हो रहा है, वह भेदाग्रह का निवर्त्तक है, भेदाग्रह की निवृत्ति से उसके व्याप्यभूत अध्यास की भी निवृत्ति हो जाती है, क्योंकि जहाँ जो व्यापक नहीं रहता, वहाँ उसका व्याप्य पदार्थ कभी नहीं रह सकता ।

यहाँ भाष्य की योजना इस प्रकार कर लेनी चाहिए—‘‘यद्यपि अध्यासो मिथ्येति

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९


भामती

पाद्यनवच्छिन्नमनन्तानन्दचैतन्यैकरसमुदासीनमेकमद्वितीयमात्मतत्त्वं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु गीयते। न चैतान्युपक्रमपरामर्शोपसंहारैः क्रियासमभिहारेणेदृगात्मतत्त्वमभिदधति तत्पराणि सन्ति शक्यानि शक्रेणाप्युपचरितार्थानि कर्तुम्। अभ्यासे हि भूयस्त्वमर्थस्य भवति 'यथाहो दर्शनीयाहो दर्शनीयेति' न न्यूनत्वं प्रागेवोपचरितत्वमिति। अहमनुभवस्तु प्रादेशिकमनेकविधशोकदुःखाविप्रपञ्चोपप्लुतमात्मानमादर्शयन् कथमात्मतत्त्वगोचरः कथं वाऽनुपप्लवः ? न च ज्येष्ठप्रमाणप्रत्यक्षविरोधादाम्नायस्यैव तदपेक्षस्याप्रामाण्यमुपचरितार्थत्वं चेति युक्तम्, तस्यांपौरुषेयतया निरस्तसमस्तदोषशङ्कस्य बोधकत्या च स्वतःसिद्ध-


भामती-व्याख्या

भवितुं युक्तम्, तथापि नैसर्गिकौऽयम्''। इसका आशय यह है कि आक्षेपवादी का कथन तब सत्य हो सकता था, जब कि 'अहम्-अहम्'—इस व्यावहारिक अनुभव में विशुद्ध आत्मतत्त्व परिलक्षित होता, किन्तु वह प्रकाश में नहीं आ रहा है, क्योंकि कर्तृत्वादि समस्त उपाधियों से रहित, अनन्त, आनन्दरूप, चैतन्य, एकरस, उदासीन, एक, अद्वितीय आत्मतत्त्व जो श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में प्रतिपादित है, वैसा शुद्ध आत्मतत्त्व व्यावहारिक 'अहम्' अनुभव का विषय नहीं, अतः आत्मतत्त्व का अननुभव या भेदाग्रह सुलभ हो जाता है, भेदाग्रह होने के कारण उक्त अध्यास भी उपपन्न हो जाता है।

आक्षेपवादी ने जो यह कहा था कि कर्तृत्वादि-रहित शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादक उपनिषदादि शास्त्र गौणार्थक हैं, वह कहना अत्यन्त अयुक्त है, क्योंकि जब शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादक श्रुत्यादि वाक्य, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल और उपपत्ति नाम के षड्विध तात्पर्य-ग्राहक लिङ्गों की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, जब विशुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादन में ही उनका तात्पर्य निश्चित है, तब उन्हें गौणार्थक इन्द्र भी सिद्ध नहीं कर सकता। जहाँ किसी एक ही तत्त्व का पुनः-पुनः संकीर्तन किया जाता है, वहाँ उस तत्त्व का उत्कर्ष उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है, जैसे किसी सुन्दरी के लिए कहा गया—'अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीया'। वहाँ बार-बार वैसा कहने से सुन्दरता में उत्कर्ष प्रकट होता है, किञ्चिन्मात्र भी ऊनता नहीं आती, गौणार्थता तो दूर रही [ श्री मण्डन मिश्र ने भी कहा है—एकमेवाद्वितीयमित्यवधारणाद्वितीयशब्दाभ्यां तस्यैवार्थस्य पुनः पुनरभिधानात् सर्वप्रकारभेदनिर्वृत्तिपरता श्रुतेर्लक्ष्यते, अभ्यासे हि भूयस्त्वमर्थस्य भवति, यथा अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीया इति, न न्यूनत्वमपि, दूरत एवोपचरितत्वम्'' (ब्र. सि. पृ. ६)]।

उपनिषद्वाक्य ही वास्तविक शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, व्यापक आत्मतत्त्व के प्रकाशक हैं, लौकिक अहमनुभाव नहीं, क्योंकि अहमनुभव तो प्रदेश भाग में सीमित (परिच्छिन्न) एवं अनेकविध शोक, दुःखादि प्रपञ्च में फँसे हुए आत्मा को ही विषय करता है, अतः वह अनुभव बाधितार्थविषयक (भ्रमात्मक) होकर शुद्ध आत्मतत्त्व का प्रकाशक क्योंकर होगा ?

शङ्का—यहाँ अहमनुभवरूप प्रत्यक्ष और उपनिषद्वाक्य जन्य शाब्द के बलाबल पर दृष्टिपात करने से अहमनुभव ही प्रबल ठहरता है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण सभी प्रमाणों में ज्येष्ठ (अग्रज) होने के कारण प्रबल है, अतः इससे विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक शब्द को ही अप्रमाण मानना न्यायसङ्गत है। प्रत्यक्ष प्रमाण को अपनी उत्पत्ति, ज्ञप्ति या अर्थक्रियाकारिता में शब्द प्रमाण की अपेक्षा नहीं, प्रत्युत शब्द प्रमाण को अपनी उत्पत्त्यादि में प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा है, लोक में निरपेक्ष प्रबल और सापेक्ष दुर्बल माना जाता है, महाभाष्यकार कहते हैं—'सापेक्षमसमर्थं भवति' (पा. सू. ३।१।८)। अतः उपनिषद्वाक्यों को अप्रमाण या गौणार्थक मानना ही युक्ति-युक्त है।

१०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

प्रमाणभावस्य स्वकार्ये प्रमितावनानपेक्षत्वात् । प्रमितानपेक्षत्वेऽप्युत्पत्तौ प्रत्यक्षापेक्षत्वात्तद्विरोधादनुत्पत्तिलक्षणमप्रामाण्यमिति चेन्न, उत्पादकाप्रतिद्वन्द्वित्वात् । न ह्यागमज्ञानं सांव्यवहारिकं प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यमुपहन्ति येन कारणाभावान्न भवेदपि तु तात्त्विकम् । न च तत्स्योत्पादकम् । अतात्त्विकप्रमाणभावेभ्योऽपि सांव्यवहारिकप्रमाणेभ्यस्तत्त्वज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् । तथा च वर्णे ह्रस्वदीर्घत्वादयोऽन्यधर्मा अपि समारोपितास्तत्त्वप्रतिपत्तिहेतवः, न हि लौकिका नाग इति वा नग इति वा पदात् कुञ्जरं वा तरुं वा प्रतिपद्यमाना भवन्ति भ्रान्ताः । न चानन्यपरं वाक्यं स्वार्थं उपचरितार्थं युक्तम् । उक्तं हि

भामती-व्याख्या

समाधान—उपनिषद्वाक्य उस वेद के एकदेश हैं, जो कि अपौरुषेय होने के कारण पुरुष-सम्बन्ध-सम्भावित समस्त भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और लोभादि दोषों से रहित हैं। उसमें किसी प्रकार का भी अप्रामाण्य प्रसक्त नहीं हो सकता। श्री कुमारिल भट्ट ने जो तीन प्रकार का अप्रामाण्य कहा है—"अप्रामाण्यं त्रिधा भिन्नं मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः" (श्लो. वा. पृ. ६१)। अर्थात् विपरीतार्थ-बोधकत्व, अबोधकत्व और सन्दिग्धार्थ-बोधकत्व इन तीन प्रकार के अप्रामाण्य-प्रकारों में प्रथम (विपरीतार्थ-बोधकत्व) वेद में इसलिए नहीं कि वह पुरुषगत भ्रमादि दोषों से दूषित नहीं। द्वितीय (अबोधकत्वरूप) अप्रामाण्य भी सम्भावित नहीं, क्योंकि उपनिषद्रूप वैदिक वाक्य अपने समुचित अर्थ के बोधक हैं और वेद में प्रामाण्य स्वतःसिद्ध होने के कारण सन्दिग्धार्थ-बोधकत्वरूप तृतीय प्रकार भी प्रसक्त नहीं होता। आगम-ज्ञान को अपने प्रमापनरूप कार्य में प्रत्यक्ष की अपेक्षा नहीं, अतः सापेक्षत्वरूप अप्रामाण्य भी प्राप्त नहीं होता।

शङ्का—प्रत्यक्ष प्रमाण की सहायता के बिना शब्द का प्रत्यक्ष एवं संगति-ग्रह नहीं होता और इसके बिना शब्द किसी ज्ञान का उत्पादक नहीं हो सकता, अतः आगम-ज्ञान को अपनी उत्पत्ति में प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा निश्चितरूप से है, श्री मण्डन मिश्र ने भी कहा है—"पदपदार्थविभागाधीन आम्नायार्थपरिच्छेदः, स च प्रत्यक्षादिबलादायत्तते" (ब्र. सि. पृ. ३९)। फलतः शब्द प्रमाण के स्वरूप की निष्पत्ति में प्रत्यक्ष अवश्य अपेक्षित है, प्रत्यक्ष की सहायता के बिना पद का ज्ञान एवं उसका पदार्थ के साथ संगति-ग्रहण न हो सकने के कारण शब्द अपना अर्थ-निश्चयरूप कार्य सम्पन्न नहीं करा सकता।

समाधान—आगम प्रमाण अपने उत्पादकीभूत व्यावहारिक प्रत्यक्ष का विरोधी नहीं, क्योंकि शब्द प्रमाण प्रत्यक्षगत पारमार्थिक प्रामाण्य का ही घातक है, व्यावहारिक प्रामाण्य का नहीं, व्यावहारिक प्रामाण्य ही आगम ज्ञान का उत्पादक है, श्री मण्डन मिश्र भी यही कहते हैं—"प्रत्यक्षादीनां तु व्यावहारिकं प्रामाण्यम्" (ब्र. सि. पृ. ४०)। आगम यदि प्रत्यक्षगत व्यावहारिक प्रामाण्य का निराकरण करता, तब अपनी उत्पादक सामग्री का ही हनन कर डालता, उत्पादक सामग्री के विना आगम का स्वरूप-लाभ ही नहीं होता। प्रत्यक्षगत जिस तात्त्विक प्रामाण्य का निषेध आगम करता है, वह आगम का उत्पादक नहीं, क्योंकि जिनमें तात्त्विक प्रामाण्य न होने पर भी केवल व्यावहारिक प्रामाण्य होता है, उन पदार्थों से भी तत्त्व-बोध का उत्पादन देखा जाता है, जैसे कि वर्णात्मक शब्दों में ह्रस्वत्व-दीर्घत्वादि धर्म अपने नहीं होते, अपि तु शब्द के व्यञ्जकीभूत ध्वनि (नादसंज्ञक वायवीय संयोग-विभाग) के धर्म शब्द में आरोपित किन्तु लोक-प्रसिद्ध व्यावहारिकमात्र माने जाते हैं, फिर भी वे तात्त्विक बोध के उद्भावक माने जाते हैं, जैसे कि दीर्घ नकाररूप वर्ण से घटित 'नाग' पद के द्वारा हस्ती और ह्रस्व नकार-गर्भित 'नग' के द्वारा वृक्षादि का बोध लोक में न तो

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११


भामती

‘‘न विधौ परः शब्दार्थः’’ इति । ज्येष्ठत्वं चानपेक्षितस्य बाध्यत्वे हेतुर्न बाधकत्वे, रजतज्ञानस्य ज्यायसः शुक्तिज्ञानेन कनीयसा बाधदर्शनात् । तदनपबाधने तदवबाधात्मनस्तस्योत्पत्तेरनुपपत्तेः । दर्शितं च तात्त्विकप्रमाणभावस्यानपेक्षितत्वम् । तथा च पारमर्षं सूत्रं “पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्” ( जै० सू० ६ । ५।५४ ) इति । तथा --

“पूर्वात्परबलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् ।
अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥” इति ।


भामती-व्याख्या

भ्रमात्मक माना जाता है और न उस बोध को प्राप्त करनेवाला व्यक्ति भ्रान्त, अपितु यथार्थ ज्ञानवाला ही माना जाता है [ श्री मण्डन मिश्र भी कहते हैं—“शब्दाच्च नित्यादसत्यदीर्घादि-विभागभाजोऽर्थप्रतिपत्तिर्न मिथ्या” ( ब्र. सि. पृ. १४ ) । महर्षि जैमिनि ने अपने “नादवृद्धि-परा” ( जै. सू. १।१।१७ ) इस सूत्र में सिद्ध किया है कि वर्णात्मक शब्द नित्य होते हैं, उनमें ह्रस्वत्व-दीर्घत्वादि विकार अपने नहीं होते, अपितु नाद पद-वाच्य वायवीय संयोग-विभाग या कण्ठ-ताल्वादि स्थानों पर जिह्वा के आघात के द्वारा जनित विशेष कम्पन से युक्त वायु के वेग की एक विधा ही दीर्घत्वादि के रूप में परिलक्षित होती हैं ] ।

व्यावहारिक प्रामाण्य के आश्रयीभूत प्रत्यक्षादि प्रमाणों से संवल पाकर उपनिषद्रूप आगम प्रमाण जब अपने स्वार्थ का बोध कराने में सक्षम और अनन्यार्थपरक है, तब अपने वाच्यार्थ के बोधन में ही उसे औपचारिक ( गौणार्थक ) कहना कभी भी उचित नहीं, श्री शबर स्वामी कहते हैं—“विधौ हि न परः शब्दार्थः प्रतीयते” ( शा. भा. पृ. १४१ ) अर्थात् विधेय अर्थ का प्रतिपादक ( स्वार्थ-बोधक ) वाक्य कभी परार्थक ( गौणार्थक ) प्रतीत नहीं होता । आगम की अपेक्षा जो प्रत्यक्ष प्रमाण में ज्येष्ठत्व कहा गया, वह प्रत्यक्षगत ज्येष्ठत्व यहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण में बाध्यता का साधक है, बाधकता का नहीं, क्योंकि ज्येष्ठ ( पूर्वोत्पन्न ) शुक्ति में रजत-ज्ञान का कनिष्ठ ( पश्चात् उत्पन्न ) शुक्ति में शुक्ति-ज्ञान के द्वारा बाध देखा जाता है, क्योंकि शुक्ति-ज्ञान जब तक पूर्वोत्पन्न रजत-ज्ञान का बाध नहीं करता, तब तक शुक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती जैसा कि कुमारिल भट्ट ने कहा है—“पूर्वाबाधेन नोत्पत्तिरुत्तरस्य हि सिध्यति” ( श्लो. वा. पृ. ६२ ) । यह भी कहा जा चुका है कि आगम को व्यावहारिक प्रामाण्य की अपेक्षा होने पर भी तात्त्विक प्रामाण्यवाले प्रत्यक्ष की अपेक्षा नहीं, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा यहाँ आगम का बाध सम्भव नहीं, अपितु आगम के द्वारा ही प्रत्यक्ष का बाध होता है, जैसा कि श्री जैमिनि महर्षि ने कहा है—“पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्” ( जै. सू. ६।५।५४ ) अर्थात् दो निरपेक्ष विरोधी पदार्थों के क्रमशः पूर्व और पर काल में उपस्थित होने पर पूर्वोपस्थित पदार्थ वैसे ही दुर्बल ( बाधित ) होता है, जैसे ‘प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या’—इस न्याय के द्वारा प्रकृतिभूत दर्शपूर्णमास कर्म में पठित पाँच प्रयाज कर्मों की प्राप्ति होने पर विकृति कर्म में “नव प्रयाजा इज्यन्ते”—इस वाक्य से विहित प्रयाजगत नवत्व संख्या के द्वारा पूर्वोपस्थित पञ्चत्व संख्या का बाध हो जाता है, श्री भट्टपाद की भी ऐसी ही व्यवस्था है—

पूर्वात् परबलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् ।
अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥
पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वाैव जायते ।
परस्यानन्यथोत्पादान्न त्वबाधेन सम्भवः ॥ (तं. वा. पृ. ८५९)