भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्


भामती

पद्यते। अपि च योगव्याघ्रः शरीरभेदेऽपि आत्मानमभिन्नमनुभवतीति नाहङ्कारालम्बनं देहः। अत एव नेन्द्रियाण्यपि अस्यालम्बनम् , इन्द्रियभेदेऽपि योऽहमद्राक्षं स एवैतर्हि स्पृशामीत्यहमालम्बनस्य प्रत्यभिज्ञानात्। विषयेभ्यस्त्वस्य विवेकः स्थवीयानेव। बुद्धिमनसोश्च करणयोरहमितिकर्तृप्रतिभासप्रख्यानालम्बनत्वायोगा। कृशोऽहमन्धोऽहमित्यादयश्च प्रयोगा असत्यपि अभेदे कथञ्चिन्मञ्चाः क्रोशन्तीत्याविवदौपचारिका इति युक्तमुत्पश्यामः। तस्माद्विवहङ्कारास्पदेभ्यो देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयेभ्यो व्यावृत्तः स्फुटतराहमनुभवगम्य आत्मा संशयाभावादजिज्ञास्य इति सिद्धम्। अप्रयोजनत्वाच्च। तथाहि—संसारनिवृत्तिरपवर्ग इह प्रयोजनं विवक्षितम्। संसारश्चात्मयाथात्म्याननुभवनिमित्त आत्मयाथात्म्यज्ञानेन निवर्त्तनीयः। स चेदयमनादिरनादिनात्मयाथात्म्यज्ञानेन सहानुवर्त्तते कुतोऽस्य निवृत्तिरविरोधात्। कुतश्चात्मयाथात्म्या-


भामती-व्याख्या

भोगों का उपभोग करता है, जागने पर वह व्यक्ति अपने को मनुष्य-शरीर में पाकर यह अनुभव करता है कि स्वप्न में प्राप्त देव-शरीर से यह मनुष्य-शरीर सर्वथा भिन्न है किन्तु मैं वही हूँ।

केवल स्वप्न में ही नहीं, जागरण-काल में भी कोई योगी अपने योग-बल के द्वारा अपने मानव-शरीर से भिन्न व्याघ्रादि का शरीर धारण कर लेता है,; किन्तु एक ही समय उस योगी को विभिन्न शरीरों में भी अपनी अनुवृत्ति और एकता का विस्पष्ट भान होता रहता है। इससे यह तथ्य निश्चित हो जाता है कि व्यावृत होनेवाले शरीरों से सर्वत्र अनुवृत्त अहंकारास्पद आत्मा भिन्न है।

इसी प्रकार इन्द्रियों को भी अहंप्रतीति का विषय नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन्द्रियों के भिन्न होने पर भी अहमर्थ की एकता अनुभूत होती है—'योऽहमदमद्राक्षम्, स एवाहमदानीमिदं स्पृशामि'। शब्दादि बाह्य विषयों से तो इस (आत्मा) का भेद अत्यन्त स्थूल और अतिस्पष्ट है। बुद्धि और मन को अहंकारास्पद नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'बुद्ध्याऽध्यवस्यामि', 'मनसा सङ्कल्पयामि'—इत्यादि व्यवहारों के द्वारा अध्यवसान क्रिया का करणता बुद्धि और सङ्कल्पन क्रिया की करणता मन में निश्चित होती है, अहंपदार्थ उन क्रियाओं का कर्त्ता है, करण कभी कर्त्ता नहीं हो सकता। यदि शरीर और इन्द्रियों को अहंपदार्थ नहीं कहा जा सकता, तब 'अहं कृश:' 'अहमन्धः'—इत्यादि व्यवहारों में कृशता के आश्रयीभूत शरीर और अन्धता के आधारभूत चक्षु इन्द्रिय को अहमास्पद क्यों कहा गया ? इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर है कि उक्त स्थल पर शरीरादि में जो आत्मरूपता का व्यवहार किया गया, वह वैसा ही गौण व्यवहार है, जैसा कि मञ्चादि में मञ्चस्थ पुरुषों का व्यवहार—'मञ्चाः क्रोशन्ति' ऐसी व्यवस्था ही उक्त स्थलों पर युक्ति-संगत प्रतीत होती है। फलतः 'इदम्-इदम्'—इस प्रकार प्रतीत होनेवाले शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शब्दादि विषयों से भिन्न 'अहम्'—इस प्रकार के स्फुटतर अनुभव (निश्चय) के विषयीभूत आत्मा में सन्दिग्धत्व न होने के कारण जिज्ञास्यत्व सम्भव नहीं।

सप्रयोजनत्वाभाव का उपपादन—

विचार के द्वारा निष्पादित होनेवाले आत्मज्ञान का कोई विशेष प्रयोजन भी नहीं सिद्ध होता, इस लिए भी जिज्ञास्यता सम्भव नहीं—'आत्मा जिज्ञास्यो न भवति, निष्प्रयोजनत्वात्, काकदन्तवत्'। कर्तृत्वादिरूप बन्धन की निवृत्ति ही वेदान्त-सिद्धान्त में मोक्ष विवक्षित है। आत्मा का जो अज्ञान (यथार्थाननुभव) ही कर्तृत्वादि प्रपञ्च का आत्मा में आरोपक है, वह अज्ञान आत्म-ज्ञान से ही निवृत्त हो सकता था, किन्तु कर्तृत्वादि प्रपञ्च अनादि है और आत्मज्ञान भी आत्मरूप होने के कारण अनादि है, जो दो पदार्थ अनादिकाल