भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

णत्वाद्ब्रह्मत्वमेव ब्रह्मेति गीयते' । स चायमाकीटपतङ्गेभ्य आ च देवर्षिभ्यः प्राणभृन्मात्रस्येदङ्कारास्पदेभ्यो देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयेभ्यो विवेकेनाहमिति असन्दिग्धाविपर्य्यस्तापरोक्षानुभवसिद्ध इति न जिज्ञासास्पदं, न हि जातु कश्चिदत्र सन्दिग्धेऽहं वा नाहं वेति, न च विपर्य्यस्यति नाहमेवेति । न चाहं कृशः स्थूलो गच्छामीत्यादिदेहधर्मसामानाधिकरणदर्शनात् देहालम्बनोऽयमहङ्कार इति साम्प्रतम् । तदालम्बनत्वे हि योऽहं बाल्ये पितरावन्वभवं स एव स्थाविरे प्रणप्तॄननुभवामीति प्रतिसन्धानं न भवेत् । न हि बालस्थविरयोः शरीरयोरस्ति मनागपि प्रत्यभिज्ञानगन्धो येनैकत्वमध्यक्षवसीयेत । तस्माद्येषु व्यावर्तमानेषु यदनुवर्त्तते तत्तेभ्यो भिन्नं, यथा कुसुमेभ्यः सूत्रम् । तथा च बालादिशरीरेषु व्यावर्तमानेष्वपि परस्परमहङ्कारास्पदमनुवर्त्तमानं तेभ्यो भिद्यते ।

अपि च स्वप्नान्ते दिव्यं शरीरभेदमास्थाय तदुचितान् भोगान् भुञ्जान एव प्रतिबुद्धो मनुष्यशरीरमात्मानं पश्यन्नाहं देवो मनुष्य एवेति देवशरीरे बाध्यमानेऽप्यहमास्पदमबाध्यमानं शरीराद्भिन्नं प्रति-

भामती-व्याख्या

ब्रह्म में असन्दिग्धता का उपपादन—
विष्णुपुराण ( ३।२२ ) में कहा गया है—"बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्मेत्यभिधीयते ।” अर्थात् बृहत् ( व्यापक ) या बृंहण ( अपने शरीरादि की वृद्धि का कारण ) होने से जीवात्मा ही ब्रह्म कहलाता है, वह तो कीड़े-मकोड़ों से लेकर देवों और ऋषियों तक सभी प्राणियों को देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शब्दादिरूप इदंकारास्पद बाह्य पदार्थों से भिन्न 'अहम्'—इस प्रकार अपरोक्ष अनुभव के द्वारा अवगत है, अतः वह 'आत्मा क्या है?' इस प्रकार की जिज्ञासा का विषय नहीं हो सकता । इस ( आत्मा ) के विषय में न तो कोई प्राणी 'अहं वा नाहं वा ?' ऐसा सन्देह ही करता है और न 'नाहमेव' ऐसा विपरीत निश्चय । यदि कहा जाय कि 'अहं कृशः, स्थूलः, गच्छामि'—इत्यादि अनुभूतियों के द्वारा कृशत्व, स्थूलत्व और गमनादि क्रियारूप शरीर के धर्मों और अहन्त्वरूप आत्मा के धर्मों का एक अधिकरण में रहना सिद्ध होता है, अतः साधारण मनुष्य शरीर को ही आत्मा मानता है, शरीरादि से भिन्न आत्मा का अनुभव नहीं करता । तो वह कहना उचित नहीं, क्योंकि शरीर को 'अहम्'—इस प्रकार की प्रतीति का विषय नहीं माना जा सकता, अन्यथा अहंपदार्थ में पूर्व और पर काल की एकता का अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकेगी—'योऽहं बाल्यावस्थायां पितृ-पितामहादिकमनुभूतवान्, स एवाहं वृद्धावस्थायां पुत्रपौत्रादिकमनुभवामि ।” इसका कारण यह है कि बाल्य और वृद्धावस्था के शरीर एक नहीं रहते, स्पष्ट रूप से भिन्न हो जाया करते हैं, अतः शरीर से भिन्न ही अहंपदार्थ का होना निश्चित है । यदि बाल और वृद्ध शरीरों में कुछ भी एकरूपता होती, तब उसे अहंपदार्थ माना जा सकता था, किन्तु वैसा सम्भव नहीं। यह निश्चित व्याप्ति है कि जिन बाल्यकाल के शरीरादि पदार्थों के वृद्धावस्था में व्यावृत ( निवृत्त ) हो जाने पर भी जो अहंपदार्थ अनुवृत्त रहता है, वह शरीरादि व्यावृत हो जाने वाले पदार्थों से भिन्न होता है, जैसे एक धागे में पिरोए हुए फूल एक-दूसरे के स्थान से व्यावृत होते ( हटते ) जाते हैं, किन्तु धागा सर्वत्र अपनी एकता बनाए रखता है, अतः फूलों से धागा भिन्न तत्त्व होता है । वैसे ही बाल्य और वृद्धावस्था के शरीर परस्पर व्यावृत हैं, किन्तु अहंकारास्पद आत्मतत्त्व सर्वत्र अनुगत होने के कारण शरीरादि से भिन्न स्थिर होता है ।

केवल शरीरों की बाल्यादि अवस्थाओं के व्यावृत होने पर ही अहंकारास्पद पदार्थ की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती, अपि तु एक व्यक्ति अपने स्वप्न में देव-शरीर पाकर देव-सुलभ