भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३
भामती
ब्रह्मसूत्रकृते तस्मै वेदव्यासाय वेधसे ।
ज्ञानशक्त्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ ५ ॥
नत्वा विशुद्धविज्ञानं शङ्करं करुणाकरम् ।
भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तत्प्रणीतं विभज्यते ॥ ६ ॥
आचार्यकृतिनिवेशनमप्यवधूतं वचोऽस्मदादीनाम् ।
रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ॥ ७ ॥
अथ यदसन्दिग्धमप्रयोजनं च न तत्प्रेक्षावत्प्रतिपित्सागोचरः, यथा समनस्केन्द्रियसन्निकृष्टः स्फीतालोकमध्यवर्ती घटः करटदन्ता वा, तथा चेदं ब्रह्मेति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । तथाहि 'बृहत्त्वाद् बृंह-
भामती-व्याख्या
कृष्णद्वैपायन के पश्चात् आगामी द्वापर में द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा को उनतीसवाँ व्यास कहा गया है ] ॥ ५ ॥
विमलप्रज्ञ एवं करुणा-सागर भगवान् शङ्कराचार्य को नमस्कार करके उनके द्वारा प्रणीत प्रसन्न [ सुगम पदावलि एवं गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करनेवाले ] भाष्य ( ब्रह्मसूत्र के शाङ्कर भाष्य ) का व्याख्यान किया जा रहा है । [ प्रसाद नाम का शब्दालङ्कार काव्यादर्श में वर्णित है—
श्लेषः प्रसादः समता माधुर्यं सुकुमारता ।
अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजः कान्तिसमाधयः ॥ ( काव्या० १।४१ )
सुगम और सुप्रसिद्ध पदावलि का प्रयोग ही प्रसाद गुण माना जाता है । श्री पद्मपादाचार्य ने भी शाङ्कर भाष्य में प्रसाद गुण का उल्लेख किया है—
"भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तद्व्याख्यां श्रद्धयारभे" ( पञ्चपा० पृ० १ ) ] ॥ ६ ॥
जैसे गङ्गा में मिल जाने मात्र से गली-कूचों का अपवित्र जल पवित्र हो जाता है, वैसे ही भाष्य के साथ हमारी ( वाचस्पतिमिश्र की ) भामती नाम की व्याख्या का सम्बन्ध हो जाने मात्र से हमारी अपवित्र वाणी भी पवित्र हो जाती है ॥ ७ ॥
[ "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्र. सू. १।१।१ ) इस सूत्र के द्वारा भगवान् सूत्रकार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ब्रह्म की सहज-सिद्ध जिज्ञास्यता दिखा कर ब्रह्म-विचार का प्रस्ताव रख रहे हैं । उसकी व्याख्या में भगवान् भाष्यकार अध्यास का उपपादन ( आक्षेपपूर्वक स्वरूप-निरूपण ) कर रहे हैं । आपाततः प्रतीयमान सूत्र और भाष्य की इस असमञ्जसता को दूर करते हुए भामतीकार ब्रह्म की जिज्ञास्यता के साथ अध्यास का अन्वय-व्यतिरेक दिखाने के लिए एक सामान्य व्याप्ति प्रदर्शित कर रहे हैं— ] जो वस्तु असन्दिग्ध ( सन्देह-रहित ) और निष्प्रयोजन होती है, वह प्रेक्षक ( विचार में समर्थ ) मनीषिणों का जिज्ञासा का विषय नहीं होती, जैसे सजग पुरुष की आँखों के सामने प्रखर प्रकाश में रखा घट-जैसा असन्दिग्ध और काक-दन्त के समान निरर्थक पदार्थ, प्रकृत में ब्रह्म तत्त्व भी वैसा ही असन्दिग्ध और निष्प्रयोजन है—इस प्रकार यहाँ जिज्ञास्यता (विचारणीयता) की व्यापकीभूत सन्दिग्धता एवं सप्रयोजनता के विरोधी असन्दिग्धत्व एवं निष्प्रयोजनत्व की उपलब्धि ( सिद्धि ) है, अतः ब्रह्म की विचारणीयता कदापि न्यायोचित नहीं ठहराई जा सकती [ प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थकार श्री धर्मकीर्ति ने अपने न्यायबिन्दु में सद्धेतु के तीन भेद कहे हैं—"अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति" ( न्या० बिं० १।११ ) । अनुपलब्धि हेतु के ग्यारह भेदों में एक व्यापकविरुद्धोपलब्धि भी वर्णित है—"व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा नात्र तुषारस्पर्शो [वह्नेरिति]" (न्या० बिं० २।३८) । श्री वाचस्पतिमिश्र ने यहाँ उसी का प्रयोग प्रदर्शित किया है ] ।