भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १. पां. १ सू. १
भामती
निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि ।
स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ २ ॥
षड्भिरङ्गैरुपेताय विविधैरव्ययैरपि ।
शाश्वताय नमस्कुर्मो वेदाय च भवाय च ॥ ३ ॥
मार्तण्डतिलकस्वामिमहागणपतीन् वयम् ।
विश्ववन्द्यान् नमस्यामः सर्वसिद्धिविधायिनः ॥ ४ ॥
भामती-व्याख्या
अनायास ही रचा गया है। जैसे उसके सङ्कल्प मात्रसे विशाल विश्व की सृष्टि हो जाती है, वैसे ही उसका सुषुप्ति (गाढ़ निंद्रा) में सो जानामात्र महाप्रलय कहलाता है। [इस पद्य के द्वारा तृतीय सूत्र-प्रोक्त शास्त्रयोनित्व का स्पष्टीकरण “अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः” (बृह० उ० २।४।१०) इस श्रुति के प्रकाश में किया गया है। इससे ब्रह्म में सर्वज्ञता फलित होती है] ॥ २ ॥
छः अङ्ग और विविध अव्ययों से परिपूर्ण भगवान् शङ्कर और वेद को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। [भगवान् शङ्कर के छः अङ्ग शिवपुराण (विद्येश्वर-सं. १६।१२) में वर्णित हैं—
सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः ।
अचिन्त्यशक्तिश्च विभोर्विधिज्ञा षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य ॥
इसी प्रकार भगवान् वेद के छः अङ्ग मुण्डकोपनिषत् (१।१।५) में कहे गये हैं—“शिक्षा कल्पो व्याकरणं छन्दो ज्योतिषम् ।” भगवान् शङ्कर के दश अव्ययों का वर्णन वायु पुराण में किया गया है—
ज्ञानं विरागतैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।
स्रष्टृत्वमात्मसंबोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥
वेद में ‘च, ह, वा’ आदि अव्ययपदों का प्रयोग अत्यन्त प्रसिद्ध है] ॥ ३ ॥
मार्तण्ड (भगवान् सूर्य), तिलकस्वामी (भाल में तिलक लगाना जिन्हें अत्यन्त प्रिय है, ऐसे स्वामी कार्तिकेय) और महागणपति को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। ये सब देवगण विश्व-वन्द्य हैं, इनकी पूजा करने से सिद्धि प्राप्त होती है [जैसा कि याज्ञ-वल्क्यस्मृति (१।२९४) में कहा गया है—
आदित्यस्य सदा पूजां तिलक स्वामिनस्तथा ।
महागणपतेश्चैव कुर्वन् सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ] ॥ ४ ॥
वैष्णवी ज्ञान शक्ति के अवताररूप ब्रह्मसूत्रों के रचयिता, सर्वज्ञ महर्षि वेदव्यास को हमारा (वाचस्पति मिश्र का) नमस्कार है। [महर्षि पराशर ने अपने समय तक हुए अट्ठाईस वेदव्यासों को भगवान् विष्णु का अवतार बताते हुए अपने पितामह महर्षि वसिष्ठ को आठवें द्वापर का व्यास, अपने पिता महर्षि शक्ति को पच्चीसवां, अपने को छब्बीसवां तथा अपने पुत्र कृष्णद्वैपायन को अट्ठाईसवां व्यास कहा है—
द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपी महामुने ।
वेदमेकं सुबहुधा कुरुते जगतो हितः ॥ (विष्णुपु० ३।३।५)
तस्मादस्मत्पिता शक्तिर्व्यासस्तस्मादहं मुने ॥
जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः ।
अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः ॥ (विष्णुपु० ३।३।१६)