भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

तत्सद्ब्रह्मणे नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्


समन्वयाध्याये प्रथमे

प्रथमः पादः


भामती

अनिर्वाच्याविद्याद्वितयसचिवस्य प्रभवतो विवर्त्ता यस्यैते वियदनिलतेजोऽबवनयः।
यतश्चाभूद्विश्वं चरमचरमुच्चावचमिदं नमामस्तद्ब्रह्मापरिमितसुखज्ञानममृतम् ॥ १ ॥


भामती-व्याख्या

सहस्रधारके यस्मिन्नृषयो नो मनीषिणः।
पुनन्ति स्वं वचस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥ १ ॥

यदावृत्याविद्या परिणतिविवर्त्ता विजयते,
अनिर्वाच्या चित्रा सदसदभिलापाप्रलपिता।
यदेवानादृत्य प्रकिरति विमुक्तिं मतिमतां,
तदेव ब्रह्माहं कथमपि नमस्यामि मननात् ॥ २ ॥

अश्रौततन्त्रकान्तारे श्रौतदर्शनविस्तरे।
श्रीवाचस्पतिमिश्राणां समं नृत्यति भारती ॥ ३ ॥

प्रसादो वदने यस्या हृदि गाम्भीर्यमद्भुतम्।
भाष्याभिरूपतामेति व्याख्या सैषेव भामती ॥ ४ ॥

भामतीपतिरेकाकी बभूवास्या रहस्यवित्।
वयं तु केवलमस्या वीक्षितं वीक्षितुं क्षमाः ॥ ५ ॥


स्वभावतः अनिर्वाच्य (सत् और असत् से भिन्न) एवं मूलाविद्या और तूलाविद्या के भेद से दो प्रकार की अविद्या (भावरूप अज्ञान) के सहयोग से ब्रह्म के 'आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी'—ये पाँच भूत विवर्त (अतात्त्विक कार्य) हो जाते हैं। इतना ही नहीं जिस ब्रह्म से समस्त चराचर (चल और अचल) प्रपञ्च समुद्भूत हो जाता है, उस असीम सुख-सिन्धु और शाश्वत ज्ञानरूप ब्रह्म को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। [इस शिखरिणी छन्द में ब्रह्म का द्वितीय-सूत्र-सूचित जगज्जन्मादिकर्तृत्वरूप तटस्थ लक्षण तथा सच्चिदानन्दत्वरूप स्वरूप लक्षण प्रस्तुत किया गया है] ॥ १ ॥

इसी ब्रह्म के द्वारा श्वास-प्रश्वास के समान ऋगादि वेद, दृष्टिपातमात्र के समान आकाशादि पाँच महाभूत एवं एक सहज मुस्कान के समान समग्र स्थावर-जङ्गम जगत्