भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]
युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोर्विषयविषयिणोस्तमःप्रकाशवद्विरुद्धस्वभावयोरितरे-
भामती
ननुभवः, नह्यहमित्यनुभवादन्यदात्मयाथात्म्यज्ञानमस्ति । न चाहमिति सर्वजनीनस्फुटतरानुभवसमर्थित आत्मा देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तः शक्य उपनिषदां सहस्रैरपि अन्यथापयितुमनुभवविरोधात् । नह्यागमाः सहस्रमपि घटं पटयितुमीशते । तस्मादनुभवविरोधादुपचरितार्था एवोपनिषद इति युक्तमुत्पश्याम इत्याशयवानाशङ्क्य परिहरति ※ युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोरिति ※ । अत्र च युष्मदस्मदित्यादिर्मिथ्या भवितुं युक्तमित्यन्तः शङ्काग्रन्थः । तथापीत्यादिपरिहारग्रन्थः । तथापीत्यभिसम्बन्धाच्छङ्कायां यद्यपीति पठितव्यम् । इदमस्मत्प्रत्ययगोचरयोरिति वक्तव्ये युष्मद्ग्रहणमत्यन्तभेदोपलक्षणार्थम् । यथा ह्यहङ्कारप्रतियोगी त्वङ्कारो नैवमिदङ्कारः, एते वयमिमे वयमास्मह इति बहुलं प्रयोगदर्शनादिति । चित्स्वभाव आत्मा
भामती-व्याख्या
से साथ-साथ चले आ रहे हैं, उन दोनों में नाश्य-नाशकभाव सम्भव नहीं, क्योंकि साथ-साथ रहनेवाले पदार्थों का परस्पर विरोध ही नहीं माना जाता ।
यहाँ यह भी एक जिज्ञासा होती है कि कर्तृत्वादि के आरोप का निमित्त कारण जो आत्मतत्त्व का अननुभव (अज्ञान) माना जाता है, वह भी कभी सम्भावित नहीं, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार के अनुभव से भिन्न और कोई आत्मतत्त्व का अनुभव प्रसिद्ध नहीं, वह अनुभव तो सदैव विद्यमान ही है, उसके रहते-रहते आत्मतत्त्व का अननुभव क्योंकर होगा ? यह जो कहा जाता है कि उपनिषत्-प्रतिपाद्य अकर्त्ता अभोक्ता और देह, इन्द्रियादि से भिन्न निरुपाधि आत्मा का अनुभव ही तात्त्विक अनुभव है, वैसा आत्मतत्त्व का अनुभव उपनिषत् ग्रन्थों के श्रवणादि से पूर्व उत्पन्न नहीं हो सकता, वह अनादि नहीं, वही तत्त्वज्ञान आत्मा के अज्ञान का विरोधी और निवर्त्तक माना जाता है । वह कहना समुचित नहीं, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार के लौकिक अनुभव से सिद्ध कर्तृत्वादि धर्मयुक्त आत्मा के स्वरूप का अपलाप या अन्यथात्व एक उपनिषत् तो क्या, हजारों उपनिषत् ग्रन्थ मिलकर नहीं कर सकते । यह वस्तु-स्थिति है कि आत्मा को अकर्त्ता-अभोक्ता मानने पर उक्त लोक-प्रसिद्ध अनुभव विरुद्ध पड़ जाता है । सर्वजनीन स्फुटतर अनुभव से सिद्ध घट को कभी पट नहीं बनाया जा सकता । फलतः 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार के सुदृढ़ अनुभव से विरुद्ध अकर्त्ता-अभोक्ता आत्मा के प्रतिपादक उपनिषत् ग्रन्थों को औपचारिक या गौणार्थक मानना ही उचिततर प्रतीत होता है । पूर्वपक्ष के द्वारा उठाई गई इन सभी आशङ्काओं का परिहार करने के लिए भगवान् भाष्यकार ने उपक्रम किया है— "युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः"—यहाँ से लेकर "नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः"—यहाँ तक ।
अध्यास की अनुपपत्ति—
अध्यास-भाष्य के दो भाग हैं—(१) अध्यास पर आक्षेप ( अध्यास की अनुपपत्ति ) और (२) उसका समाधान ( अध्यास की उपपत्ति ) । आरम्भ से लेकर "मिथ्या भवितुं युक्तम्"—यहाँ तक का भाष्य आक्षेप और "तथापि"—यहाँ से लेकर "नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः"—यहाँ तक का भाष्य समाधान भाष्य कहलाता है । समाधान-भाष्य के आरम्भ में "तथापि" पद का प्रयोग हुआ है. अतः आक्षेप-भाष्य के आरम्भ में "यद्यपि"—ऐसा प्रयोग होना चाहिए था, किन्तु वैसा नहीं किया गया, अतः दोनों भाष्य खण्डों की संगति करने के लिए 'यद्यपि' पद का प्रयोग अपनी ओर से जोड़ लेना चाहिए, क्योंकि 'यद्यपि' और 'तथापि'—ये दोनों प्रयोग नित्य सापेक्ष हैं, एक के बिना दूसरा पद साकांक्ष रह कर अन्वय-बोध कराने में अक्षम हो जाता है । यहाँ यद्यपि आत्मा का बोध कराने के लिए जैसे 'अस्मत्'