भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७
तरभावानुपपत्तौ सिद्धायां तद्धर्माणामपि सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः, इत्यतोऽस्म- त्प्रत्ययगोचरे विषयिणि चिदात्मके युष्मत्प्रत्ययगोचरस्य विषयस्य तद्धर्माणां चा-
भामती
विषयी, जडस्वभावा बुद्धीन्द्रियदेहविषयाः विषयाः । एते हि चिदात्मानं विसिन्वन्ति अवबध्नन्ति स्वेन रूपेण निरूपणीयं कुर्वन्तीति यावत् । परस्परानध्यासहेतावत्यन्तवैलक्षण्ये दृष्टान्तस्तमःप्रकाशवदिति । नहि जातु कश्चित्समुदाचरद्वृत्तिनी प्रकाशतमसी परस्परात्मतया प्रतिपत्तुमर्हति । तदिदमुक्तं ॐ इतरेतर-भावानुपपत्ताविति ॐ । इतरेतरभाव इतरेतरत्वं, तादात्म्यमिति यावत् । तस्यानुपपत्ताविति । स्यादे-तत्—मा भूद्धर्मिणोः परस्परभावस्तद्धर्माणां तु जाड्यचैतन्यनित्यत्वानित्यत्वादीनामितरेतराध्यासो भविष्यति । दृश्यते हि धर्मिणोरविवेकग्रहणेऽपि तद्धर्माणामध्यासः, यथा कुसुमाद्भेदेन गृह्यमाणेऽपि स्फटि-कमणावतिस्वच्छतया जपाकुसुमप्रतिबिम्बोद्ग्राहिण्यरूणः स्फटिक इत्यारूण्यविभ्रम इत्यत उक्तम् ॐ तद्धर्माणामपीति ॐ । इतरेतरत्र धर्मिणि धर्माणां भावो विनिमयस्तस्यानुपपत्तिः । अयमभिसन्धिः—
भामती-व्याख्या
शब्द रखा है, वैसे अनात्म पदार्थों का संग्रह करने के लिए 'इदम्' शब्द रखना चाहिये था, 'युष्मत्' शब्द नहीं, क्योंकि सभी अनात्म पदार्थ इदंकारास्पद ही होते हैं। तथापि आत्मा और अनात्म पदार्थों का पारस्परिक अत्यन्त विरोध प्रकट करने के लिए 'अस्मत्' पद के साथ 'युष्मत्' पद की योजना ही समुचित है, क्योंकि 'अहंकार' का विरोधी जैसा 'त्वंकार' होता है, वैसा 'इदंकार' नहीं, अस्मत्, के साथ युष्मत् का कभी प्रयोग नहीं होता, किन्तु इदमादि का सहप्रयोग हो जाता है—'इमे वयम्', 'एते वयमास्महे'। इससे यह अत्यन्त स्पष्ट है कि 'युष्मत्' और 'अस्मत्' प्रयोगों का प्रखर विरोध देखकर आक्षेपवादी ने आत्मा और अनात्मपदार्थों का अत्यन्त विरोध दिखाने के लिए युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः'—ऐसा प्रयोग ही उचित समझा।
चिदात्मा विषयी और बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर एवं शब्दादि—ये सब विषय कहे जाते हैं, क्योंकि विपूर्वक 'षीञ् बन्धने' धातु से पचाद्यच् करके 'विषय' शब्द बना है, इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'विसिन्वन्ति निबध्नन्ति विषयिणमिति विषयः' अर्थात् ज्ञानरूप विषयी पदार्थ को अपने साथ ऐसा बाँध देते हैं कि 'घटज्ञानम्', 'पटज्ञानम्'—इस प्रकार विषय का सहयोग पाये विना ज्ञान का निरूपण ही नहीं हो सकता । आत्मा और अनात्मजगत् के परस्पर-अध्यास की अनुपपत्ति का मुख्य कारण है—आत्मा और अनात्मपदार्थों का अत्यन्त विरोध या वैरूप्य, क्योंकि शुक्ति और रजत के समान रूपवाले पदार्थों का ही परस्पर विनिमयात्मक अध्यास लोक-प्रसिद्ध है । प्रखर प्रकाश और गाढ़ अन्धकार का कभी शुक्ति-रजत के समान तादात्म्याध्यास नहीं देखा जाता—यही भाष्यकार कहते हैं "तमःप्रकाशव-द्विरुद्धस्वभावयोरितरेतराभावानुपपत्तौ" । 'इतरेतरभाव' का अर्थ होता है—अन्य पदार्थ में अन्यरूपता [जैसे शुक्ति में रजतरूपता प्रतीत होती है, वैसे आत्मा और अनात्मा का] तादात्म्य जो अपेक्षित है, उसकी उपपत्ति (सिद्धि) न हो सकने के कारण आत्मा और अनात्मा का अध्यास नहीं हो सकता । यह जो आशङ्का होती है कि जैसे जपाकुसुम और स्फटिक रूप दो धर्मी पदार्थों का तादात्म्याध्यास न होने पर भी स्फटिक में जपाकुसुम के आरुण्य (रक्तिमा) धर्म का अध्यास देखा जाता है, वैसे ही आत्मा और अनात्म पदार्थों का परस्पर तादात्म्य-भ्रम या धर्म्यध्यास न हो सकने पर भी अनात्मभूत बुद्ध्यादि के कर्तृत्व, भोक्तृत्ववादि धर्मों का अध्यास उपपन्न क्यों नहीं हो सकता ? उस आशङ्का को निवृत्त करने के लिए कहा गया है—"तद्धर्माणां सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः"। यहाँ 'इतरेतरभाव' शब्द का अर्थ है—