भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७
तरभावानुपपत्तौ सिद्धायां तद्धर्माणामपि सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः, इत्यतोऽस्म- त्प्रत्ययगोचरे विषयिणि चिदात्मके युष्मत्प्रत्ययगोचरस्य विषयस्य तद्धर्माणां चा-
भामती
विषयी, जडस्वभावा बुद्धीन्द्रियदेहविषयाः विषयाः । एते हि चिदात्मानं विसिन्वन्ति अवबध्नन्ति स्वेन रूपेण निरूपणीयं कुर्वन्तीति यावत् । परस्परानध्यासहेतावत्यन्तवैलक्षण्ये दृष्टान्तस्तमःप्रकाशवदिति । नहि जातु कश्चित्समुदाचरद्वृत्तिनी प्रकाशतमसी परस्परात्मतया प्रतिपत्तुमर्हति । तदिदमुक्तं ॐ इतरेतर-भावानुपपत्ताविति ॐ । इतरेतरभाव इतरेतरत्वं, तादात्म्यमिति यावत् । तस्यानुपपत्ताविति । स्यादे-तत्—मा भूद्धर्मिणोः परस्परभावस्तद्धर्माणां तु जाड्यचैतन्यनित्यत्वानित्यत्वादीनामितरेतराध्यासो भविष्यति । दृश्यते हि धर्मिणोरविवेकग्रहणेऽपि तद्धर्माणामध्यासः, यथा कुसुमाद्भेदेन गृह्यमाणेऽपि स्फटि-कमणावतिस्वच्छतया जपाकुसुमप्रतिबिम्बोद्ग्राहिण्यरूणः स्फटिक इत्यारूण्यविभ्रम इत्यत उक्तम् ॐ तद्धर्माणामपीति ॐ । इतरेतरत्र धर्मिणि धर्माणां भावो विनिमयस्तस्यानुपपत्तिः । अयमभिसन्धिः—
भामती-व्याख्या
शब्द रखा है, वैसे अनात्म पदार्थों का संग्रह करने के लिए 'इदम्' शब्द रखना चाहिये था, 'युष्मत्' शब्द नहीं, क्योंकि सभी अनात्म पदार्थ इदंकारास्पद ही होते हैं। तथापि आत्मा और अनात्म पदार्थों का पारस्परिक अत्यन्त विरोध प्रकट करने के लिए 'अस्मत्' पद के साथ 'युष्मत्' पद की योजना ही समुचित है, क्योंकि 'अहंकार' का विरोधी जैसा 'त्वंकार' होता है, वैसा 'इदंकार' नहीं, अस्मत्, के साथ युष्मत् का कभी प्रयोग नहीं होता, किन्तु इदमादि का सहप्रयोग हो जाता है—'इमे वयम्', 'एते वयमास्महे'। इससे यह अत्यन्त स्पष्ट है कि 'युष्मत्' और 'अस्मत्' प्रयोगों का प्रखर विरोध देखकर आक्षेपवादी ने आत्मा और अनात्मपदार्थों का अत्यन्त विरोध दिखाने के लिए युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः'—ऐसा प्रयोग ही उचित समझा।
चिदात्मा विषयी और बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर एवं शब्दादि—ये सब विषय कहे जाते हैं, क्योंकि विपूर्वक 'षीञ् बन्धने' धातु से पचाद्यच् करके 'विषय' शब्द बना है, इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'विसिन्वन्ति निबध्नन्ति विषयिणमिति विषयः' अर्थात् ज्ञानरूप विषयी पदार्थ को अपने साथ ऐसा बाँध देते हैं कि 'घटज्ञानम्', 'पटज्ञानम्'—इस प्रकार विषय का सहयोग पाये विना ज्ञान का निरूपण ही नहीं हो सकता । आत्मा और अनात्मजगत् के परस्पर-अध्यास की अनुपपत्ति का मुख्य कारण है—आत्मा और अनात्मपदार्थों का अत्यन्त विरोध या वैरूप्य, क्योंकि शुक्ति और रजत के समान रूपवाले पदार्थों का ही परस्पर विनिमयात्मक अध्यास लोक-प्रसिद्ध है । प्रखर प्रकाश और गाढ़ अन्धकार का कभी शुक्ति-रजत के समान तादात्म्याध्यास नहीं देखा जाता—यही भाष्यकार कहते हैं "तमःप्रकाशव-द्विरुद्धस्वभावयोरितरेतराभावानुपपत्तौ" । 'इतरेतरभाव' का अर्थ होता है—अन्य पदार्थ में अन्यरूपता [जैसे शुक्ति में रजतरूपता प्रतीत होती है, वैसे आत्मा और अनात्मा का] तादात्म्य जो अपेक्षित है, उसकी उपपत्ति (सिद्धि) न हो सकने के कारण आत्मा और अनात्मा का अध्यास नहीं हो सकता । यह जो आशङ्का होती है कि जैसे जपाकुसुम और स्फटिक रूप दो धर्मी पदार्थों का तादात्म्याध्यास न होने पर भी स्फटिक में जपाकुसुम के आरुण्य (रक्तिमा) धर्म का अध्यास देखा जाता है, वैसे ही आत्मा और अनात्म पदार्थों का परस्पर तादात्म्य-भ्रम या धर्म्यध्यास न हो सकने पर भी अनात्मभूत बुद्ध्यादि के कर्तृत्व, भोक्तृत्ववादि धर्मों का अध्यास उपपन्न क्यों नहीं हो सकता ? उस आशङ्का को निवृत्त करने के लिए कहा गया है—"तद्धर्माणां सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः"। यहाँ 'इतरेतरभाव' शब्द का अर्थ है—
| ८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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ध्यासः, तद्विपर्ययेण विषयिणस्तद्धर्माणाम् च विषयेऽध्यासो मिथ्येति भवितुं युक्तम्;
भामती
रूपवद्धि द्रव्यमतिस्वच्छतया रूपवतो द्रव्यान्तरस्य तद्विवेकेन गृह्यमाणस्यापि छायां गृह्णीयात् , चिदात्मा त्वरूपो विषयी न विषयच्छायामुद्ग्राहयितुमर्हति । यथाहुः—‘‘शब्दगन्धरसानां च कीदृशी प्रतिबिम्बता’’ इति । तदिह परिशेष्याद्विषयविषयिणोरन्योन्यात्मसम्भेदेनैव तद्धर्माणामपि परस्परसम्भेदेन विनिमयात्मना भवितव्यं, तौ चेद्धर्मिणावत्यन्तविवेकेन गृह्यमाणावसम्भिन्नौ, असम्भिन्नाः सुतरां तयोर्धर्माः, स्वाश्रयाभ्यां व्यवधानेन दूरापेतत्वात् , तदिदमुक्तं ॐसुतरामितिॐ । ॐतद्विपर्ययेणेतिॐ । विषयविपर्ययेणेत्यर्थः । मिथ्याशब्दोऽपह्नववचनः । एतदुक्तं भवति—अध्यासो भेदाग्रहेण व्याप्तस्तद्विरुद्धश्चेहास्ति भेदग्रहः स भेदाग्रहं निवर्त्तयंस्तद्बद्धासमध्यासमपि निवर्त्तयतीति । मिथ्येति भवितुं युक्तं यद्यपि तथापीति योजना । इदमत्राकूतम्—भवेदेतदेवं यद्यहमित्यनुभवे आत्मतत्त्वं प्रकाशेत, न त्वेतदस्ति । तथाहि सम्मस्तो-
भामती-व्याख्या
अन्यान्य धर्मी में धर्मों का भाव ( व्यत्यास ) अर्थात् धर्माध्यास की भी उपपत्ति नहीं हो सकती । आशय यह है कि धर्माध्यास दो प्रकार से होता हैं—(१) रूपवाले स्फटिकादि पदार्थों में जपाकुसुमादि के आरुण्य रूप का प्रतिबिम्ब पड़ने से और ( २ ) लोह-पिण्ड और अग्नि-जैसे धर्मी पदार्थों का तादात्म्य हो जाने पर अग्नि के दाहकत्वादि धर्मों का लोह-पिण्ड में अध्यास होता है । प्रथम प्रकार का धर्माध्यास नियमतः स्फटिक के समान रूप-युक्त पदार्थों में ही होता है, आत्मा रूपवान् नहीं, अतः धर्म-प्रतिबिम्बात्मक धर्माध्यास वहाँ सम्भव नहीं, श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—‘‘शब्दगन्धरसानां कीदृशी प्रतिबिम्बता’’ (श्लो. वा. पृ. २८०) । अर्थात् स्फटिकादि में रूप का प्रतिबिम्ब तो अनुभूत होता है, किन्तु रूप और रूपवान् द्रव्य को छोड़कर शब्द, स्पर्श, रस और गन्धादि का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता, तब आत्मा में अनात्मपदार्थों के अनित्यत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि धर्मों का प्रतिबिम्ब कैसे उपपन्न होगा ? परिशेषतः द्वितीय प्रकार से ही ( धर्म्यध्यासपूर्वक ) धर्माध्यास हो सकता था, किन्तु जब आत्मा और अनात्मरूप दोनों धर्मी अत्यन्त भिन्न प्रतीत हो रहे हैं, तब उनके धर्मों का व्यत्यास कभी भी संभव नहीं, क्योंकि पृथक्-पृथक् रहकर धर्मी अपने धर्मों का विनिमय या संक्रमण नहीं कर सकते—इस तथ्य को ध्वनित करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—‘‘तद्धर्माण सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः’’ ।
भाष्यकार ने जो कहा है—‘‘तद्विपर्ययेण विषयिणः तद्धर्माणां च विषयेऽध्यासः’’ । यहाँ ‘तद्विपर्यय’ पद का अर्थ है—विषयविपर्ययेण । अर्थात् ‘तद्विपर्यय’ पद के घटकीभूत ‘तत्’ शब्द के द्वारा अनात्मरूप विषय का परामर्श किया गया है । [ भाव यह है कि आत्मा और अनात्मपदार्थ—ये दोनों जब प्रकाश और अन्धकार के समान अत्यन्त विपरीत स्वभाव के हैं और दोनों का भेद प्रकट हो रहा है, तब न तो विषय के धर्मों का विषयी में अध्यास हो सकता है और न उसके विपरीत विषयी के धर्मों का विषय में विनिमय हो सकता है ] । भाष्य में प्रयुक्त ‘मिथ्या’ शब्द अपलापार्थक है । अर्थात् ‘अध्यासो मिथ्येति युक्तं भवितुम्’—इस भाष्य का अर्थ है—अध्यास नहीं हो सकता । अभिप्राय यह है कि ‘यत्र यत्राध्यासः, तत्र तत्र भेदाग्रहः’—इस प्रकार अध्यास व्याप्य और भेदाग्रह व्यापक है, व्यापकीभूत भेदाग्रह का विरोधी भेद-ग्रह यहाँ उपलब्ध हो रहा है, वह भेदाग्रह का निवर्त्तक है, भेदाग्रह की निवृत्ति से उसके व्याप्यभूत अध्यास की भी निवृत्ति हो जाती है, क्योंकि जहाँ जो व्यापक नहीं रहता, वहाँ उसका व्याप्य पदार्थ कभी नहीं रह सकता ।
यहाँ भाष्य की योजना इस प्रकार कर लेनी चाहिए—‘‘यद्यपि अध्यासो मिथ्येति
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९
भामती
पाद्यनवच्छिन्नमनन्तानन्दचैतन्यैकरसमुदासीनमेकमद्वितीयमात्मतत्त्वं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु गीयते। न चैतान्युपक्रमपरामर्शोपसंहारैः क्रियासमभिहारेणेदृगात्मतत्त्वमभिदधति तत्पराणि सन्ति शक्यानि शक्रेणाप्युपचरितार्थानि कर्तुम्। अभ्यासे हि भूयस्त्वमर्थस्य भवति 'यथाहो दर्शनीयाहो दर्शनीयेति' न न्यूनत्वं प्रागेवोपचरितत्वमिति। अहमनुभवस्तु प्रादेशिकमनेकविधशोकदुःखाविप्रपञ्चोपप्लुतमात्मानमादर्शयन् कथमात्मतत्त्वगोचरः कथं वाऽनुपप्लवः ? न च ज्येष्ठप्रमाणप्रत्यक्षविरोधादाम्नायस्यैव तदपेक्षस्याप्रामाण्यमुपचरितार्थत्वं चेति युक्तम्, तस्यांपौरुषेयतया निरस्तसमस्तदोषशङ्कस्य बोधकत्या च स्वतःसिद्ध-
भामती-व्याख्या
भवितुं युक्तम्, तथापि नैसर्गिकौऽयम्''। इसका आशय यह है कि आक्षेपवादी का कथन तब सत्य हो सकता था, जब कि 'अहम्-अहम्'—इस व्यावहारिक अनुभव में विशुद्ध आत्मतत्त्व परिलक्षित होता, किन्तु वह प्रकाश में नहीं आ रहा है, क्योंकि कर्तृत्वादि समस्त उपाधियों से रहित, अनन्त, आनन्दरूप, चैतन्य, एकरस, उदासीन, एक, अद्वितीय आत्मतत्त्व जो श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में प्रतिपादित है, वैसा शुद्ध आत्मतत्त्व व्यावहारिक 'अहम्' अनुभव का विषय नहीं, अतः आत्मतत्त्व का अननुभव या भेदाग्रह सुलभ हो जाता है, भेदाग्रह होने के कारण उक्त अध्यास भी उपपन्न हो जाता है।
आक्षेपवादी ने जो यह कहा था कि कर्तृत्वादि-रहित शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादक उपनिषदादि शास्त्र गौणार्थक हैं, वह कहना अत्यन्त अयुक्त है, क्योंकि जब शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादक श्रुत्यादि वाक्य, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल और उपपत्ति नाम के षड्विध तात्पर्य-ग्राहक लिङ्गों की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, जब विशुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादन में ही उनका तात्पर्य निश्चित है, तब उन्हें गौणार्थक इन्द्र भी सिद्ध नहीं कर सकता। जहाँ किसी एक ही तत्त्व का पुनः-पुनः संकीर्तन किया जाता है, वहाँ उस तत्त्व का उत्कर्ष उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है, जैसे किसी सुन्दरी के लिए कहा गया—'अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीया'। वहाँ बार-बार वैसा कहने से सुन्दरता में उत्कर्ष प्रकट होता है, किञ्चिन्मात्र भी ऊनता नहीं आती, गौणार्थता तो दूर रही [ श्री मण्डन मिश्र ने भी कहा है—एकमेवाद्वितीयमित्यवधारणाद्वितीयशब्दाभ्यां तस्यैवार्थस्य पुनः पुनरभिधानात् सर्वप्रकारभेदनिर्वृत्तिपरता श्रुतेर्लक्ष्यते, अभ्यासे हि भूयस्त्वमर्थस्य भवति, यथा अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीया इति, न न्यूनत्वमपि, दूरत एवोपचरितत्वम्'' (ब्र. सि. पृ. ६)]।
उपनिषद्वाक्य ही वास्तविक शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, व्यापक आत्मतत्त्व के प्रकाशक हैं, लौकिक अहमनुभाव नहीं, क्योंकि अहमनुभव तो प्रदेश भाग में सीमित (परिच्छिन्न) एवं अनेकविध शोक, दुःखादि प्रपञ्च में फँसे हुए आत्मा को ही विषय करता है, अतः वह अनुभव बाधितार्थविषयक (भ्रमात्मक) होकर शुद्ध आत्मतत्त्व का प्रकाशक क्योंकर होगा ?
शङ्का—यहाँ अहमनुभवरूप प्रत्यक्ष और उपनिषद्वाक्य जन्य शाब्द के बलाबल पर दृष्टिपात करने से अहमनुभव ही प्रबल ठहरता है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण सभी प्रमाणों में ज्येष्ठ (अग्रज) होने के कारण प्रबल है, अतः इससे विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक शब्द को ही अप्रमाण मानना न्यायसङ्गत है। प्रत्यक्ष प्रमाण को अपनी उत्पत्ति, ज्ञप्ति या अर्थक्रियाकारिता में शब्द प्रमाण की अपेक्षा नहीं, प्रत्युत शब्द प्रमाण को अपनी उत्पत्त्यादि में प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा है, लोक में निरपेक्ष प्रबल और सापेक्ष दुर्बल माना जाता है, महाभाष्यकार कहते हैं—'सापेक्षमसमर्थं भवति' (पा. सू. ३।१।८)। अतः उपनिषद्वाक्यों को अप्रमाण या गौणार्थक मानना ही युक्ति-युक्त है।
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| १० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
प्रमाणभावस्य स्वकार्ये प्रमितावनानपेक्षत्वात् । प्रमितानपेक्षत्वेऽप्युत्पत्तौ प्रत्यक्षापेक्षत्वात्तद्विरोधादनुत्पत्तिलक्षणमप्रामाण्यमिति चेन्न, उत्पादकाप्रतिद्वन्द्वित्वात् । न ह्यागमज्ञानं सांव्यवहारिकं प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यमुपहन्ति येन कारणाभावान्न भवेदपि तु तात्त्विकम् । न च तत्स्योत्पादकम् । अतात्त्विकप्रमाणभावेभ्योऽपि सांव्यवहारिकप्रमाणेभ्यस्तत्त्वज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् । तथा च वर्णे ह्रस्वदीर्घत्वादयोऽन्यधर्मा अपि समारोपितास्तत्त्वप्रतिपत्तिहेतवः, न हि लौकिका नाग इति वा नग इति वा पदात् कुञ्जरं वा तरुं वा प्रतिपद्यमाना भवन्ति भ्रान्ताः । न चानन्यपरं वाक्यं स्वार्थं उपचरितार्थं युक्तम् । उक्तं हि
भामती-व्याख्या
समाधान—उपनिषद्वाक्य उस वेद के एकदेश हैं, जो कि अपौरुषेय होने के कारण पुरुष-सम्बन्ध-सम्भावित समस्त भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और लोभादि दोषों से रहित हैं। उसमें किसी प्रकार का भी अप्रामाण्य प्रसक्त नहीं हो सकता। श्री कुमारिल भट्ट ने जो तीन प्रकार का अप्रामाण्य कहा है—"अप्रामाण्यं त्रिधा भिन्नं मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः" (श्लो. वा. पृ. ६१)। अर्थात् विपरीतार्थ-बोधकत्व, अबोधकत्व और सन्दिग्धार्थ-बोधकत्व इन तीन प्रकार के अप्रामाण्य-प्रकारों में प्रथम (विपरीतार्थ-बोधकत्व) वेद में इसलिए नहीं कि वह पुरुषगत भ्रमादि दोषों से दूषित नहीं। द्वितीय (अबोधकत्वरूप) अप्रामाण्य भी सम्भावित नहीं, क्योंकि उपनिषद्रूप वैदिक वाक्य अपने समुचित अर्थ के बोधक हैं और वेद में प्रामाण्य स्वतःसिद्ध होने के कारण सन्दिग्धार्थ-बोधकत्वरूप तृतीय प्रकार भी प्रसक्त नहीं होता। आगम-ज्ञान को अपने प्रमापनरूप कार्य में प्रत्यक्ष की अपेक्षा नहीं, अतः सापेक्षत्वरूप अप्रामाण्य भी प्राप्त नहीं होता।
शङ्का—प्रत्यक्ष प्रमाण की सहायता के बिना शब्द का प्रत्यक्ष एवं संगति-ग्रह नहीं होता और इसके बिना शब्द किसी ज्ञान का उत्पादक नहीं हो सकता, अतः आगम-ज्ञान को अपनी उत्पत्ति में प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा निश्चितरूप से है, श्री मण्डन मिश्र ने भी कहा है—"पदपदार्थविभागाधीन आम्नायार्थपरिच्छेदः, स च प्रत्यक्षादिबलादायत्तते" (ब्र. सि. पृ. ३९)। फलतः शब्द प्रमाण के स्वरूप की निष्पत्ति में प्रत्यक्ष अवश्य अपेक्षित है, प्रत्यक्ष की सहायता के बिना पद का ज्ञान एवं उसका पदार्थ के साथ संगति-ग्रहण न हो सकने के कारण शब्द अपना अर्थ-निश्चयरूप कार्य सम्पन्न नहीं करा सकता।
समाधान—आगम प्रमाण अपने उत्पादकीभूत व्यावहारिक प्रत्यक्ष का विरोधी नहीं, क्योंकि शब्द प्रमाण प्रत्यक्षगत पारमार्थिक प्रामाण्य का ही घातक है, व्यावहारिक प्रामाण्य का नहीं, व्यावहारिक प्रामाण्य ही आगम ज्ञान का उत्पादक है, श्री मण्डन मिश्र भी यही कहते हैं—"प्रत्यक्षादीनां तु व्यावहारिकं प्रामाण्यम्" (ब्र. सि. पृ. ४०)। आगम यदि प्रत्यक्षगत व्यावहारिक प्रामाण्य का निराकरण करता, तब अपनी उत्पादक सामग्री का ही हनन कर डालता, उत्पादक सामग्री के विना आगम का स्वरूप-लाभ ही नहीं होता। प्रत्यक्षगत जिस तात्त्विक प्रामाण्य का निषेध आगम करता है, वह आगम का उत्पादक नहीं, क्योंकि जिनमें तात्त्विक प्रामाण्य न होने पर भी केवल व्यावहारिक प्रामाण्य होता है, उन पदार्थों से भी तत्त्व-बोध का उत्पादन देखा जाता है, जैसे कि वर्णात्मक शब्दों में ह्रस्वत्व-दीर्घत्वादि धर्म अपने नहीं होते, अपि तु शब्द के व्यञ्जकीभूत ध्वनि (नादसंज्ञक वायवीय संयोग-विभाग) के धर्म शब्द में आरोपित किन्तु लोक-प्रसिद्ध व्यावहारिकमात्र माने जाते हैं, फिर भी वे तात्त्विक बोध के उद्भावक माने जाते हैं, जैसे कि दीर्घ नकाररूप वर्ण से घटित 'नाग' पद के द्वारा हस्ती और ह्रस्व नकार-गर्भित 'नग' के द्वारा वृक्षादि का बोध लोक में न तो
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११
भामती
‘‘न विधौ परः शब्दार्थः’’ इति । ज्येष्ठत्वं चानपेक्षितस्य बाध्यत्वे हेतुर्न बाधकत्वे, रजतज्ञानस्य ज्यायसः शुक्तिज्ञानेन कनीयसा बाधदर्शनात् । तदनपबाधने तदवबाधात्मनस्तस्योत्पत्तेरनुपपत्तेः । दर्शितं च तात्त्विकप्रमाणभावस्यानपेक्षितत्वम् । तथा च पारमर्षं सूत्रं “पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्” ( जै० सू० ६ । ५।५४ ) इति । तथा --
“पूर्वात्परबलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् ।
अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥” इति ।
भामती-व्याख्या
भ्रमात्मक माना जाता है और न उस बोध को प्राप्त करनेवाला व्यक्ति भ्रान्त, अपितु यथार्थ ज्ञानवाला ही माना जाता है [ श्री मण्डन मिश्र भी कहते हैं—“शब्दाच्च नित्यादसत्यदीर्घादि-विभागभाजोऽर्थप्रतिपत्तिर्न मिथ्या” ( ब्र. सि. पृ. १४ ) । महर्षि जैमिनि ने अपने “नादवृद्धि-परा” ( जै. सू. १।१।१७ ) इस सूत्र में सिद्ध किया है कि वर्णात्मक शब्द नित्य होते हैं, उनमें ह्रस्वत्व-दीर्घत्वादि विकार अपने नहीं होते, अपितु नाद पद-वाच्य वायवीय संयोग-विभाग या कण्ठ-ताल्वादि स्थानों पर जिह्वा के आघात के द्वारा जनित विशेष कम्पन से युक्त वायु के वेग की एक विधा ही दीर्घत्वादि के रूप में परिलक्षित होती हैं ] ।
व्यावहारिक प्रामाण्य के आश्रयीभूत प्रत्यक्षादि प्रमाणों से संवल पाकर उपनिषद्रूप आगम प्रमाण जब अपने स्वार्थ का बोध कराने में सक्षम और अनन्यार्थपरक है, तब अपने वाच्यार्थ के बोधन में ही उसे औपचारिक ( गौणार्थक ) कहना कभी भी उचित नहीं, श्री शबर स्वामी कहते हैं—“विधौ हि न परः शब्दार्थः प्रतीयते” ( शा. भा. पृ. १४१ ) अर्थात् विधेय अर्थ का प्रतिपादक ( स्वार्थ-बोधक ) वाक्य कभी परार्थक ( गौणार्थक ) प्रतीत नहीं होता । आगम की अपेक्षा जो प्रत्यक्ष प्रमाण में ज्येष्ठत्व कहा गया, वह प्रत्यक्षगत ज्येष्ठत्व यहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण में बाध्यता का साधक है, बाधकता का नहीं, क्योंकि ज्येष्ठ ( पूर्वोत्पन्न ) शुक्ति में रजत-ज्ञान का कनिष्ठ ( पश्चात् उत्पन्न ) शुक्ति में शुक्ति-ज्ञान के द्वारा बाध देखा जाता है, क्योंकि शुक्ति-ज्ञान जब तक पूर्वोत्पन्न रजत-ज्ञान का बाध नहीं करता, तब तक शुक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती जैसा कि कुमारिल भट्ट ने कहा है—“पूर्वाबाधेन नोत्पत्तिरुत्तरस्य हि सिध्यति” ( श्लो. वा. पृ. ६२ ) । यह भी कहा जा चुका है कि आगम को व्यावहारिक प्रामाण्य की अपेक्षा होने पर भी तात्त्विक प्रामाण्यवाले प्रत्यक्ष की अपेक्षा नहीं, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा यहाँ आगम का बाध सम्भव नहीं, अपितु आगम के द्वारा ही प्रत्यक्ष का बाध होता है, जैसा कि श्री जैमिनि महर्षि ने कहा है—“पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्” ( जै. सू. ६।५।५४ ) अर्थात् दो निरपेक्ष विरोधी पदार्थों के क्रमशः पूर्व और पर काल में उपस्थित होने पर पूर्वोपस्थित पदार्थ वैसे ही दुर्बल ( बाधित ) होता है, जैसे ‘प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या’—इस न्याय के द्वारा प्रकृतिभूत दर्शपूर्णमास कर्म में पठित पाँच प्रयाज कर्मों की प्राप्ति होने पर विकृति कर्म में “नव प्रयाजा इज्यन्ते”—इस वाक्य से विहित प्रयाजगत नवत्व संख्या के द्वारा पूर्वोपस्थित पञ्चत्व संख्या का बाध हो जाता है, श्री भट्टपाद की भी ऐसी ही व्यवस्था है—
पूर्वात् परबलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् ।
अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥
पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वाैव जायते ।
परस्यानन्यथोत्पादान्न त्वबाधेन सम्भवः ॥ (तं. वा. पृ. ८५९)
| १२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
अपि च येऽप्यहङ्कारास्पदमात्मानमास्थिषत तैरपि अस्य न तात्त्विकत्वमभ्युपेतव्यम्। अहमिहैवास्मि सदने जानान इति सर्वव्यापिनः प्रादेशिकत्वेन ग्रहात्। उच्चतरगिरिशिखरवर्त्तिषु महातरुषु भूमिष्ठस्य दूर्वाप्रवालनिर्भासप्रत्ययवत्। न चेदं देहस्य प्रादेशिकत्वमनुभूयते न स्वात्मन इति साम्प्रतं, नहि तथैवं भवत्यहमिति, गौणत्वे वा न जानामीति। अपि च परशब्दः परत्र लक्ष्यमाणगुणयोगेन वर्त्तत इति यत्र प्रयोक्तृप्रतिपत्त्रोः सम्प्रतिपत्तिः स गौणः स च भेदप्रत्ययपुरःसरः। तद्यथा नैयमिकाग्निहोत्रवचनोऽग्निहोत्रशब्दः (अ० १ पा० ४) प्रकरणान्तरावधृतभेदे कौण्डपायिनामयनगते कर्मणि मासर्माग्नहोत्रं जुहोतीत्यत्र साध्यसादृश्येन गौणः (अ० ७ पा० ३)। माणवके चानुभवसिद्धभेदे सिंहादिसिंहशब्दः। न
भामती-व्याख्या
[ कहीं पूर्व से उत्तर और कहीं उत्तर से पूर्व का बाध होता है, उसकी व्यवस्था यह है कि पूर्वोत्पन्न पदार्थ की अपेक्षा पश्चात् उत्पन्न पदार्थ का प्राबल्य वहाँ ही समझा जाता है, जहाँ दोनों पदार्थों की उत्पत्ति में परस्पर एक-दूसरे की अपेक्षा नहीं होती। पूर्वोत्पन्न पदार्थ के समय पश्चात् उत्पन्न पदार्थ था ही नही, अतः पर का बाध किए बिना ही पूर्व की उत्पत्ति हो जाती है किन्तु पश्चात् उत्पन्न पदार्थ की तब तक उत्पत्ति हो ही नहीं सकती, जब तक पूर्व का बाध न किया जाय ]।
दूसरी बात यह भी है कि जो लोग 'अहम्' — इस प्रतीति के विषयीभूत पदार्थ को ही आत्मा मान बैठे हैं, उन्हें भी उसे तात्त्विक (वास्तविक) नहीं समझना चाहिए, क्योंकि 'अहमिहैवास्मि सदने जानानः'— इस प्रतीति के द्वारा आत्मा को एक घर के कोने में ही परिच्छिन्न बताया जाता है, जबकि आत्मा व्यापक होता है। व्याप्तिभूत आत्मा में परिच्छिन्नत्व की प्रतीति वैसे ही भ्रमात्मक है, जैसे कि पर्वत के प्रोत्तुङ्ग शिखर पर अवस्थित विशाल विटप भी पृथिवी-तल पर खड़े हुए व्यक्ति को घास की छोटी सी पूली के समान दिखाई देते हैं। 'अहमिहैवास्मि'— इस प्रतीति में जो प्रादेशिकत्व (एतद्देशावच्छिन्नत्व) प्रतीत होता है, वह शरीरगत है — ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि शरीर के लिए अहम् — ऐसा प्रयोग नहीं हो सकता। 'अहम्' शब्द गौणी वृत्ति से शरीर का ही बोधक है'— ऐसा मानने पर 'अहं जानानः'— ऐसा व्यवहार न हो सकेगा, क्योंकि शरीर न तो ज्ञानस्वरूप है और न ज्ञान का आश्रय। 'अहं' शब्द का शरीर में गौण प्रयोग भी सम्भव नहीं, क्योंकि भट्टपाद ने कहा है— "लक्ष्यमाणगुणैर्योग्राद् वृत्तेरिष्टा तु गौणता।" (तं० वा० पृ० ३५४) अर्थात् 'जहाँ पर 'सिंह' शब्द माणवक में लक्ष्यमाण माणवकगत क्रूरत्व, शूरत्वादि गुणों के सम्बन्ध से प्रवृत्त हुआ है'— ऐसा वक्ता और श्रोता दोनों को निश्चय होता है, वहाँ ही सिंहादि शब्द गौण माने जाते हैं। गौण-प्रयोग के लिए मुख्यार्थ (सिंहादि) और गौणार्थ (माणवकादि) में भेद का निश्चय भी होना अनिवार्य है, जैसे कि 'अग्निहोत्र' नाम का कर्म दो प्रकार का श्रुत है— (१) नित्य अग्निहोत्र और (२) कुण्डपायी ऋषियों के द्वारा अनुष्ठीयमान सत्र कर्म का अङ्गभूत अग्निहोत्र [ "अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१) इस वाक्य से विहित अग्निहोत्र कर्म नित्य कर्म है, जिसका अनुष्ठान आहिताग्नि पुरुष जीवन-पर्यन्त नित्य सायं और प्रातः किया करता है। "मासमग्निहोत्रं जुहोति" (तां० ब्रा० २५।४।१) इस वाक्य से अवबोधित अग्निहोत्र कर्म कुण्डपायी ऋषियों के अयनसंज्ञक सत्रकर्म का अङ्ग कहलाता है]। नित्य अग्निहोत्र कर्म का वाचक 'अग्निहोत्र' शब्द सत्रविशेष के अङ्गभूत अग्निहोत्र कर्म के बोधन में गौणीवृत्ति से प्रवृत्त है। प्रकरणान्तराधिकरण (२।३।२१) में दोनों अग्निहोत्र कर्मों का भेद सिद्ध किया गया है। नित्य अग्निहोत्र कर्म 'अग्निहोत्र' शब्द का मुख्य और सत्राङ्गभूत कर्म
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३
भामती
त्वहङ्कारस्य मुख्योऽर्थो निर्लुंठितगर्भतया देहादिभ्यो भिन्नोऽनुभूयते येन परशब्दः शरीरादौ गौणो भवेत् । न चात्यन्तरूढतया गौणेऽपि न गौणत्वाभिमानः सार्षपादिषु तैलशब्दवदिति वेदितव्यम् । तत्रापि स्नेहात्तिलभवत्वभेदे सिद्ध एव. सार्षपादीनां तैलशब्दवाच्यत्वाभिमानो न त्वर्थयोस्तैलसार्षपयोरभेदाव्यवसायः । तत्सिद्धं गौणत्वमुभयदर्शिनो गौणमुख्यविवेकविज्ञानेन व्याप्तं तदिह व्यापकं विवेकज्ञानं निवर्तमानं गौणतामपि निवर्तयतीति । न च बालस्थविरशरीरभेदेऽपि सोऽहमित्येकस्यात्मनः प्रतिसन्धानाद्देहादिभ्यो भेदेनास्यात्मानुभव इति वाच्यम् । परीक्षकाणां खल्वियं कथा न लौकिकानाम् । परीक्षका अपि हि व्यवहारसमये न लोकसामान्यमतिवर्तन्ते । वक्ष्यत्यनन्तरमेव हि भगवान् भाष्यकारः। ॐ पश्वादिभिश्चाविशेषादिति ॐ । बाह्या अप्याहुः "शास्त्रचिन्तकाः खल्वेवं विवेचयन्ति न प्रतिपत्तारः" इति । तत्पारिशेष्याच्चिदात्मगोचरमहङ्कारमहमिहास्मि सदन इति प्रयुञ्जानो लौकिकः शरीराद्यभेदग्रहादात्मनः प्रादेशिकत्वमभिमन्यते नभस इव घटमणिकमल्लिकाद्युपाध्यवच्छेदादिति युक्तमुत्पश्यामः ।
भामती-व्याख्या
गौण अर्थ माना जाता है, क्योंकि दोनों कर्मों में साध्य-सादृश्य विद्यमान है । जहाँ माणवक में 'सिंह' शब्द का गौण प्रयोग होता है, वहाँ भी अनुभव के द्वारा माणव और सिंह का भेद सिद्ध होता है । इसी प्रकार यदि अहं शब्द का शरीर में गौण प्रयोग माना जाता है, तब 'अहं' शब्द के मुख्य और गौणभूत अर्थों का भेद किसी प्रमाण से सिद्ध होना चाहिए था, किन्तु अभी तक देहादि से भिन्न किसी अत्यन्त प्रसिद्ध आकार में प्रस्फुटित मुख्य अर्थ अनुभूत नहीं हुआ, जिसको मुख्य मानकर 'अहं' शब्द शरीर में गौणरूप से प्रवृत्त होता । यद्यपि कहीं-कहीं अत्यन्त निरूढ़ हो जाने के कारण 'गौण' शब्द में भी गौणता का स्पष्ट भान नहीं होता, जैसे तिल से निकले द्रव का मुख्य रूप से वाचक 'तैल' शब्द सरसों से निकले द्रव विशेष को गौणी वृत्ति से कहता है, किन्तु उसमें गौणता आपातत प्रतीत नहीं होती । तथापि वहाँ भी सरसों से निकले तेल का तिलोद्भूत तैल से भेद निश्चित होता है । सरसों के तेल में 'तैल' शब्द की वाच्यता का अभिमानमात्र होता है, अभेदाध्यवसाय नहीं । फलतः 'यत्र यत्र गौणार्थत्वम्, तत्र तत्र मुख्यार्थाद् भेदः'- इस प्रकार गौणत्व व्याप्य और मुख्यार्थप्रतियोगिक भेद व्यापक होता है । प्रकृत में व्यापक ( मुख्यार्थ-भेद ) सिद्ध न होने के कारण शरीरादि में 'अहम्' शब्द का गौण प्रयोग सम्भव नहीं ।
यह जो कहा जाता है कि बाल्य और वृद्धावस्था के शरीरों का भेद होने पर भी आत्मा की प्रत्यभिज्ञा होने के कारण अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा शरीरादि से आत्मरूप मुख्यार्थ का भेद निश्चित है । वह कथा विवेक-कुशल प्रेक्षा-दक्ष परीक्षक मनीषियों की है, साधारण व्यक्ति की नहीं । परीक्षक महापुरुष भी व्यवहार-काल में साधारण व्यक्तियों की मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया करते । भगवान् भाष्यकार भी कुछ आगे चलकर ही कहेंगे—"पश्वादिभिश्चाविशेषात्" (ब्र. सू. शां. भा. पृ. ४२) । वैदिक क्षेत्र से बहिर्भूत विद्वान् धर्मकीर्ति ने भी ऐसा ही कहा है—"शास्त्रचिन्तकाः खल्वेवं विवेचयन्ति, न प्रतिपत्तारः" अर्थात् शास्त्रार्थ का निरन्तर चिन्तन करने वाले विवेचक महापुरुष ही गम्भीर विवेचन प्रस्तुत कर सकते हैं, साधारण प्रतिपत्ता नहीं । इस प्रकार यहाँ गौणादि प्रयोगों के न हो सकने के कारण परिशेषतः 'अहमिहास्मि'—ऐसा प्रयोग करनेवाला लौकिक व्यक्ति शरीरादि से अविविक्त आत्मा को वैसे ही प्रादेशिक और परिच्छिन्न मानता है, जैसे एक व्यापक आकाश घट, मणिक ( मटका ) मल्लिका ( मलिया या हाँडी ) आदि उपाधियों के परिच्छेद से ( परिवेश में घिर कर ) परिच्छिन्न-सा प्रतीत होता है ।
| १४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
न चाहङ्कारप्रामाण्याय देहादिवदात्मापि प्रादेशिक इति युक्तम्। तदा खल्वयमणुपरिमाणो वा स्याद्देहपरिमाणो वा ? अणुपरिमाणत्वे स्थूलोऽहं दीर्घ इति च न स्यात्। देहपरिमाणत्वे तु सावयवतया देहवदनित्यत्वप्रसङ्गः। किं चास्मिन् पक्षेऽवयवसमुदायो वा चेतयेत् प्रत्येकं वाऽवयवाः। प्रत्येकं चेतनत्वपक्षे बहूनां चेतनानां स्वतन्त्राणामेकवाक्यताभावादपर्यायं विरुद्धदिक्क्रियतया शरीरमुन्मथ्येत, अक्रियं वा प्रसज्येत। समुदायस्य तु चैतन्ययोगे वृक्ण एकस्मिन्नवयवे चिदात्मनोऽप्यवयवो वृक्ण इति न चेतयेत्। न च बहूनामवयवानांमविनाभावनियमो दृष्टो य एवावयवो विशीर्णस्तदा तदभावे न चेतयेत्। विज्ञानालम्बनत्वेऽप्यहम्प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वं तदवस्थमेव। तस्य स्थिरवस्तुनिर्भासत्वाद्वास्थिरत्वाच्च विज्ञानानाम्। एतेन स्थूलोऽहमन्धोऽहं गच्छामीत्यादयोऽप्यध्यासतया व्याख्याताः तदेवमुक्तक्रमेणाहंप्रत्यये पूतिकूष्माण्डीकृते भगवती श्रुतिरप्रत्यूहं कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःखशोकाद्यात्मत्वमहमनुभवप्रसञ्जितमात्मनो निषेद्धुमीहीतिति। तदेवं सर्वप्रवादिश्श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणप्रथितमिथ्याभावस्याहम्प्रत्ययस्य स्वरूपनिमित्त-
भामती-व्याख्या
‘अहमिहैवास्मि’—इस भ्रमात्मक प्रतीति में प्रमाणता लाने के लिए शरीरादि के समान आत्मा को भी प्रादेशिक (प्रदेशमात्र में रहने वाला परिच्छिन्न) मान लेना उचित नहीं, क्योंकि प्रादेशिक मान लेने पर प्रश्न उठता है कि आत्मा को अणु परिमाण मानेंगे ? या मध्यम परिमाण का (शरीर के आकार का) ? अणु मानने पर आत्मा में 'स्थूलोऽहम्', 'दीर्घोऽहम्'—ऐसा व्यवहार न हो सकेगा और शरीर के समान मध्यम परिमाण का मान लेने पर आत्मा भी शरीर के समान हीं सावयव और अनित्य हो जायगा। यह भी इस पक्ष में जिज्ञासा होती है कि अवयवी आत्मा के अवयव-समुदाय में चैतन्य मानेंगे ? या प्रत्येक अवयव में पृथक्-पृथक् चैतन्य ? प्रत्येक अवयव को चेतन मानने पर एक ही शरीर को अनेक स्वतन्त्र चेतनों का साम्राज्य मानना होगा। अनेक स्वतन्त्र चेतनों में परस्पर एक-वाक्यता (गुण-प्रधानभाव) न होने के कारण एक ही शरीर का विरुद्ध विविध दिशाओं में संचालन प्राप्त होगा, फलस्वरूप शरीर या तो टुकड़े-टुकड़े हो जायगा या विपरीत आकर्षणों में पड़कर शरीर निष्क्रिय और स्तब्ध-सा होकर रह जायगा। सभी अवयवों के समूह में एक चैतन्य मानने पर किसी एक अवयव के टूट-फूट जाने पर आत्मा टूट-फूट जायेगा, चेतन नाम की वस्तु ही वहाँ नहीं रह जायगी। सभी अवयवों में अविनाभाव (परस्पर साथ-साथ रहने का स्वभाव) तो देखा नहीं जाता, फलतः जब भी कोई एक अवयव विशीर्ण हो (बिखर) जाता है, तभी उसका अभाव हो जाने से चैतन्य समाप्त हो जायगा।
बौद्ध-सम्मत विज्ञानक्षण को 'अहम्'—इस प्रतीति का विषय मानने पर भी अहं प्रतीति की भ्रमरूपता दूर नहीं होती, क्योंकि वह प्रतीति एक स्थिर वस्तु को विषय करती है, किन्तु विज्ञान अस्थिर और क्षणिक है। इस प्रकार अहंप्रतीति का कोई विशुद्ध एक विषय सिद्ध न हो सकने के कारण अध्यासात्मक मानना पड़ता है। जिस प्रत्यक्षभूत अहंप्रतीति के बल पर प्रत्यक्षवादी इतनी उछल-कूद मचाते थे, उसकी सड़े हुए कूष्माण्ड (कोहड़े) की सी दुर्गति हो जाने पर, अहंप्रतीति के विरोधाभास की नीहारिका (कुहासा) को फाड़ती हुई भगवती श्रुति की प्रखर ज्योति जगमगाती है और दहराकाश में छिपे कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख-दुःख, शोक-मोहादि की काली रेखाएँ मिटा कर रख देती है। इस प्रकार समस्त वाद, श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में प्रसिद्ध मिथ्याभूत अहमनुभव के स्वरूप (अन्योन्यात्मकत्व), निमित्त (इतरेतराविवेक) और लोकव्यवहाररूप फल का विश्लेषण प्रस्तुत
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५
तथाप्यन्योन्यस्मिन्नन्योन्यात्मकतामन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्येतरेतराविवेकेनात्यन्तविविक्तयोर्धर्मधर्मिणोर्मिथ्याज्ञाननिमित्तः सत्यानृते मिथुनीकृत्य 'अहमिदं' 'ममेदम्' इति नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः ।
भामती
फलैरुपव्याख्यानम् ॐ अन्योन्यस्मिन्नित्यादि ॐ । अत्र चान्योन्यस्मिन् धर्मिणि आत्मशरीरादावन्योन्यात्मकतामध्यस्याहमिदं शरीरादीति । इदमिति च वस्तुतो न प्रतीतिरितः । लोकव्यवहारो लोकानां व्यवहारः स चायमहमिति व्यपदेशः । इतिशब्दसूचितश्च शरीराद्यनुकूलं प्रतिकूलं च प्रमेयजातं प्रमाणेन प्रमाय तदुपादानपरिवर्जनादिः । अन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्यान्योन्यस्मिन् धर्मिणि देहादिधर्मान् जन्ममरणजराव्याध्यादीनात्मनि धर्मिणि अध्यस्तदेहात्मभावे समारोप्य तथा चैतन्यादीनात्मनि धर्मिणि अध्यस्तदेहात्मभावे समारोप्य तथा चैतन्यादीनामधर्मान् देहादावध्यस्तात्मभावे समारोप्य ममेदं जरामरणपुत्रपशुस्वाम्यादीति व्यवहारो व्यपदेशः इतिशब्दसूचितश्च तदनुरूपः प्रवृत्त्यादिः । अत्र चाध्यासव्यवहारक्रियाभ्यां यः कर्त्तोन्नीतः स समान इति समानकर्तृकत्वेनाध्यस्य व्यवहार इत्युपपन्नम् । पूर्वकालत्वसूचितमध्यासस्य व्यवहारकारणत्वं सूचयति ॐ मिथ्याज्ञाननिमित्तो व्यवहारः ॐ । मिथ्याज्ञानमध्यासस्तन्निमित्तस्तद्भावाभा-
भामती-व्याख्या
करते हुए भगवान् भाष्यकार कहते हैं—"अन्योन्यस्मिन्नन्योन्यात्मकतामन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्य लोकव्यवहारः।" यहाँ 'अन्योन्यस्मिन् धर्मिणि' का अर्थ है—आत्मा और शरीरादि धर्मियों में "अन्योन्यात्मकतामध्यस्याहमिदम्"—इस भाष्य में 'इदम्' पद से शरीरादि का ग्रहण किया गया है। यद्यपि 'मैं यह शरीर हूँ'—ऐसी प्रतीति नहीं होती, तथापि शरीर के साथ 'अहं स्थूलः' आदि अनुभवों के आधार पर सिद्ध तादात्म्याध्यास की वस्तु-स्थिति को लेकर भाष्यकार ने 'अहमिदम्'—ऐसा कहा है। 'लोकव्यवहारः'—यहाँ 'व्यवहार' के द्वारा 'अहम्-अहम्'—इस प्रकार का अभिवदन विवक्षित है। 'अहमिदम्' 'ममेदमिति'—यहाँ इति पद से सूचित व्यवहार है—प्रमाणों के द्वारा पदार्थों की अनुकूलता, तन्मूलक ग्राह्यता और प्रतिकूलता तन्मूलक परिवर्जनीयता आदि का निष्पादन। अन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्य'—इसका तात्पर्य यह है कि अन्योन्य धर्मियों में परस्पर के धर्मों [आत्मा में देह के जन्म, मरण, जरा, व्याधि आदि धर्मों एवं शरीर में आत्मा के चैतन्यादि धर्मों] का अध्यास करके व्यवहार करना—'ममेदं जरामरणपुत्रपशुस्वामित्वमिति'। 'व्यवहार' पद का वाच्यार्थ शब्द-प्रयोग है। 'इति' शब्द के द्वारा तदनुरूप प्रवृत्त्यादि व्यवहार सूचित किए गए हैं [विवरणकार ने चार प्रकार का व्यवहार कहा है—"अभिज्ञा, अभिवदनम्, उपादानम्, अर्थक्रिया इति चतुर्विधः" (पं० वि० पृ० ६२) अर्थात् घटादि पदार्थों का (१) ज्ञान, (२) संज्ञा पद का अभिधान, (३) प्रवृत्ति और (४) जलाहरणादि के भेद से सब व्यवहार चार प्रकार का होता है। यहाँ भाष्यकार ने कुछ व्यवहारों का अभिधान कर शेष को 'इति' पद से सूचित किया है]।
शङ्का— 'अध्यस्य व्यवहारः'—ऐसी भाष्य-योजना में यह विचारणीय है कि 'अध्यस्य' पद में प्रयुक्त 'ल्यप्' आदेश का स्थानीयभूत 'क्त्वा' प्रत्यय कैसे हुआ? "समानकर्तृकयोः पूर्वकाले" (पा. सू. ३।४।२१) इस सूत्र के द्वारा एककर्तृक दो क्रियाओं में से पूर्वकालीन क्रिया की उपस्थापक धातु के उत्तर 'क्त्वा' प्रत्यय का विधान किया जाता है, किन्तु यहाँ कोई ऐसा एक कर्त्ता प्रतीत नहीं होता, जिसकी पूर्वकालीन क्रिया की वाचक 'अस्' धातु हो।
समाधान— [वेदान्तियों का सभी व्यवहार श्री कुमारिल भट्ट की प्रक्रिया पर निर्भर है। भाट्टगण आख्यात की शक्ति भावना में मानते हैं, भावना पदार्थ चेतन का एक व्यापार
| १६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
वानुविधानाद्व्यवहारभावाभावयोरित्यर्थः । तदेवमध्यासस्वरूपं फलं च व्यवहारमुक्त्वा तस्य निमित्तमाह ॐ इतरेतराविवेकेन ॐ । विवेकाग्रहणेनेत्यर्थः । अथाविवेक एव कस्मान्न भवति, तथा च नाध्यास इत्यत आह ॐअत्यन्तविविक्तयोर्धर्मधर्मिणोःॐ । परमार्थतो धर्मिणोरतादात्म्यं विवेको धर्माणां चासङ्कीर्णता विवेकः ।
स्यादेतत् —विविक्तयोर्वस्तुसतोर्भदाग्रहनिबन्धनस्तादात्म्यविभ्रमो युज्यते शुक्तेरिव रजताद्भेदाग्रहे रजततादात्म्यविभ्रमः । इह तु परमार्थसतश्चिदात्मनो न भिन्नं देहाद्यस्ति वस्तुसत्तत् कुतश्चिदात्मनो भेदाग्रहः कुतश्च तादात्म्यविभ्रम इत्यत आह ॐ सत्यानृते मिथुनीकृत्य ॐ । विवेकाग्रहादध्यस्येति योजना । सत्यं चिदात्मा, अनृतं बुद्धीन्द्रियदेहादि, ते द्वे धर्मिणी मिथुनीकृत्य, युगलीकृत्येत्यर्थः । न च संवृतिपरमार्थसतोः पारमार्थिकं मिथुनमस्तीत्यभूतातद्भावात्थस्य च्वेः प्रयोगः । एतदुक्तं भवति — अप्रतीतस्यारापा-
भामती-व्याख्या
है, अपने आश्रयीभूत कर्त्ता के विना भावना उपपन्न नहीं हो सकती, अतः भावना के द्वारा कर्त्ता का आक्षेप या उन्नयन किया जाता है ]। यहाँ भी अध्यसन ओर व्यवहरण—इन दो क्रियाओं के द्वारा जो कर्त्ता उन्नीत होता है, वह एक ही है, अतः एक ही कर्त्ता की अध्यसन और व्यवहरण—इन दो क्रियाओं में अध्यसन क्रिया पूर्वकालीन है, अतः उसकी वाचकीभूत अधिपूर्वक अस् धातु के उत्तर क्त्वा प्रत्यय निष्पन्न हो जाता है । 'अधि' अव्यय पूर्व में होने के कारण “समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्” ( पा० सू० ७।१।३७ ) इस सूत्र के द्वारा क्त्वा को 'ल्यप्' का आदेश होकर 'अध्यस्य' पद सम्पन्न हो जाता है, उक्त प्रयोग का तात्पर्य 'अध्यस्य व्यवहरति लोकः'—इस प्रयोग में है ।
'अध्यस्य' पद में प्रयुक्त 'क्त्वा' प्रत्यय के द्वारा अध्यास में पूर्वकालभावित्व सूचित किया गया, अतः पूर्वकालभावी अध्यास में उत्तरभावी व्यवहार क्रिया की कारणता का स्पष्टीकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—“मिथ्याज्ञाननिमित्तो व्यवहारः”। 'मिथ्या ज्ञान' शब्द का अर्थ है—अध्यास, यही अध्यास उक्त व्यवहार का निमित्त है, अतः व्यवहार को अध्यास निमित्तक कहा गया है, क्योंकि 'अध्याससत्त्वे व्यवहारसत्त्वम्, अध्यासाभावे व्यवहाराभावः'—इस प्रकार अध्यास के भावाभाव का अनुविधान व्यवहार का भावाभाव करता है । इस प्रकार अध्यास के स्वरूप एवं उसके फलभूत व्यवहार का कथन करके उसका निमित्त कहते हैं—“इतरेतराविवेकेन”। यहाँ 'विवेक' पद से विवेक ( भेद ) का अग्रह विवक्षित है । 'विवेकाग्रह को अध्यास का निमित्त न मान कर अविवेक ( भेदाभाव ) को ही अध्यास का निमित्त क्यों नहीं माना जाता ?' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जहाँ अविवेक या भेदाभाव है, वहाँ अध्यास हो ही नहीं सकता—यह दिखाने के लिए कहा गया है—अत्यन्त-विविक्तयोः धर्मिणोः ।” आशय यह है कि अभिन्न पदार्थ में कभी अध्यास नहीं होता, शुक्ति और रजत के समान दो नितान्त विविक्त ( भिन्न ) धर्मियों में ही अध्यास होता है, हाँ उनमें विवेक ( भेद ) का भान नहीं होना चाहिए । विवेक दो प्रकार का होता है—( १ ) दो धर्मियों का आतादात्म्य धर्मिविवेक कहलाता है और ( २ ) आरुण्यादि धर्मों का असंकीर्णत्व ( स्फटिकाद्यवृत्तित्व ) धर्मविवेक है ।
यहाँ यह शङ्का होती है कि जो दो धर्मी वस्तुतः विविक्त हों किन्तु उनके विवेक ( भेद ) का ग्रह ( भान ) न हो रहा हो, तब उनमें तादात्म्य-विभ्रम ( शुक्ति में रजतरूपतादि का भ्रम ) घटित हो जाता है, जैसे कि शुक्ति और रजत—दो वस्तुतः भिन्न पदार्थ हैं, उनका भेद-ग्रह न होने के कारण उनका 'इदं रजतम्'—इस प्रकार तादात्म्य-भ्रम हो जाता है, किन्तु
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७
आह—कोऽयमध्यासो नामेति ? उच्यते—स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः । तं
भामती
योगादारोप्यस्य प्रतीतिरुपयुज्यते न वस्तुसत्तेति । स्यादेतत् — आरोप्यस्य प्रतीतौ सत्यां पूर्वदृष्टस्य समारोपः, समारोपनिबन्धना च प्रतीतिरिति दुर्वारं परस्पराश्रयत्वमित्यत आह— ꕤ नैसर्गिक इति ꕤ । स्वाभाविकोऽनादिरयं व्यवहारः । व्यवहारानादितया तत्कारणस्याध्यासस्यानादितोक्ता । ततश्च पूर्वपूर्वंमिथ्याज्ञानोपदर्शितस्य बुद्धीन्द्रियशरीरादेरुत्तरोत्तराध्यासोपयोग इत्यनादित्वाद्बीजाङ्कुरवन्न परस्पराश्रयत्वमित्यर्थः ।
स्यादेतद्—अद्धा पूर्वप्रतीतिमात्रमुपयुज्यत आरोप्ये, न तु प्रतीयमानस्य परमार्थसत्ता । प्रतीतिरेव त्वत्यन्तासतो गगनकमलिनीकल्पस्य देहेन्द्रियादेर्नोपपद्यते । प्रकाशमानत्वमेव हि चिदात्मनोऽपि सत्त्वं न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा, द्वैतापत्तेः । सत्तायाश्चार्थक्रियाकारितायाश्च सत्तान्तरार्थक्रियाकारितान्तरकल्पनेऽनवस्थापातात् प्रकाशमानतैव सत्ताऽभ्युपेतव्या । तथा च देहादयः प्रकाशमानत्वाद्भासन्तश्चिदात्मवद्, असत्त्वे वा न प्रकाशमानास्तत् कथं सन्तस्तयोर्मिथुनीभावस्तदभावे वा कस्य कुतो भेदाग्रहस्तदसम्भवे कुतोऽध्यास इत्याशयावानाह ꕤ आह आक्षेप्ता कोऽयमध्यासो नाम ? ꕤ क इत्याक्षेपे ।
भामती-व्याख्या
परमार्थसत् आत्मा से अत्यन्त भिन्न शरीरादि कुछ भी वस्तुसत् नहीं, तब चिदात्मा का किसके साथ भेदाग्रह और तादात्म्य-विभ्रम होगा ? इस शङ्का का समाधान करते हुए कहा गया है—“सत्यानृते मिथुनीकृत्य” । इसका अन्वय है— “विवेकाग्रहादध्यासः” इसके साथ । यहाँ सत्य पदार्थ है—चिदात्मा और असत्य है—बुद्धि, इन्द्रिय और देहादि । इन दोनों धर्मियों को एक युगल के रूप में बुद्धिस्थ करना ही मिथुनीकरण है, क्योंकि संवृतिसत् ( संवृतिसंज्ञक अविद्या का कार्य ) और परमार्थसत् ( ब्रह्म ) का वास्तविक युगलीकरण सम्भव नहीं, परिशेषतः अभूत पदार्थ को आरोप-प्रणाली के द्वारा ही भूत वस्तु बनाकर परमार्थ तत्त्व के साथ मिथुनीकरण करना होगा—इस प्रक्रिया की सूचना देने के लिए ‘मिथुनीकृत्य’ पद में ‘च्चि’ प्रत्यय का प्रयोग किया गया है [ “कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्त्तरि च्विः” ( पा. सू. ५।४।५० ) इस सूत्र के द्वारा स्वार्थ में ‘च्चि’ प्रत्यय का जो वैकल्पिक विधान किया गया है, उसके लिए वार्त्तिककार ने कहा है—“च्चिविधावभूततद्भावग्रहणम्” । फलतः जो वस्तु जैसी नहीं है, उसका वैसा बन जाना च्वि प्रत्यय से ध्वनित होता है । प्रकृत में पारमार्थिक युगलभाव सम्भव नहीं, अतः एक पदार्थ का अध्यास करके उसका दूसरे सत्य पदार्थ के साथ युगलभाव सम्पादित किया गया है—इस तथ्य को अभिसूचित करने के लिए ‘च्चि’ प्रत्यय का यहाँ प्रयोग किया गया है । ‘संवृति’ शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने अविद्या या अध्यास के अर्थ में किया है—
द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
लोकसंवृतिसत्यं सत्यं च परमार्थतः ॥ ( आगम. २४।८ )
चन्द्रकीर्ति ने इसकी वृत्ति में “समन्ताद्वरणं संवृत्तिरज्ञानम्” कहा है । प्रज्ञाकर गुप्त संवृति का अर्थ करते हैं—“संवृतिर्नाम विकल्पविज्ञानम्, अनादिवासनाबलायातः प्रतिभासः” ( प्र. वा. पृ. १८५ ) । श्री शान्तिदेव के बोधिचर्यावतार में श्री प्रज्ञाकरमति कहते हैं—“संव्रियते आव्रियते यथाभूतपरिज्ञानं स्वभावावरणादावृतप्रकाशनाच्च अनयेति संवृतिः, अविद्या, मोहो, विपर्यासः इति पर्यायः” ( बो. च. पं. पृ. १७० ) । फलतः संवृतिसत् का अर्थ है—आविद्यक या व्यावहारिक सत् ] । आशय यह है कि अप्रतीयमान पदार्थ का कभी आरोप
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| १८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
समाधाता लोकसिद्धमध्यासलक्षणमाचक्षाण एवाक्षेपं प्रतिक्षिपति ॐ उच्यते—स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः ॐ । अवसन्नोऽवमतो वा भासोऽवभासः । प्रत्ययान्तरबाधश्रास्यावसादोऽवमानो वा ।
भामती-व्याख्या
(अध्यास) नहीं होता, अतः अध्यास में आरोप्यमान (अध्यस्यमान) रजतादि पदार्थों की प्रतीति का उपयोग होता है, उनकी पारमार्थिक सत्ता अपेक्षित नहीं होती ।
यहाँ जो यह शङ्का होती है कि अध्यस्यमान पदार्थ की प्रतीति हो जानेपर वह पूर्व-दृष्ट कहलाता है और पूर्व-दृष्ट पदार्थ का अन्यत्र अध्यास होता है । किन्तु अध्यास हो जाने के पश्चात् ही रजतादि की प्रतीति होती है—इस प्रकार अध्यास और प्रतीति का अन्योऽन्याश्रय प्रसक्त क्यों न होगा ? इस शङ्का का परिहार करने के लिए कहा गया है—"नैसर्गिकः" । उक्त व्यवहार स्वाभाविक (अनादि) है । प्रतीत्यादिरूप व्यवहार अनादि है, अतः उसके कारणीभूत अध्यास में भी अनादिता ध्वनित हो जाती है, फलतः पूर्व-पूर्व मिथ्याज्ञानोपदर्शित पदार्थ का उत्तरोत्तर अध्यास में उपयोग होता जाता है । बीज-वृक्ष प्रवाह के समान अनादि पदार्थों में अन्योऽन्याश्रयता नहीं मानी जाती [जिस बीज व्यक्ति से जो वृक्ष उत्पन्न होता है, यदि उसी वृक्ष व्यक्ति से उसके जनकीभूत बीज की उत्पत्ति मानी जाती है, तब अवश्य अन्योऽन्याश्रयता होगी, किन्तु अन्य बीज से अन्य वृक्ष की उत्पत्ति मानने में परस्पराश्रयता नहीं होती । इसी प्रकार प्रकृत में प्रतीति और अध्यास का अनादि प्रवाह माना जा सकता है] ।
यह बात ठीक है कि अध्यास में अध्यस्यमान की केवल पूर्व प्रतीति उपयोगी है, परमार्थ सत्ता नहीं, किन्तु गगन-कुसुम के समान अत्यन्त असत् देह, इन्द्रियादि की प्रतीति ही सम्भव नहीं, क्योंकि असत्ता का अर्थ अप्रतीयमानता और सत्ता का अर्थ प्रतीयमानता ही किया जाता है । चिदात्मा में प्रतीयमानत्वरूप ही सत्त्व माना जाता है, उससे भिन्न वैशेषिक-सम्मत सत्ता जाति का समवाय वा बौद्ध-स्वीकृत अर्थक्रियाकारित्व को यहाँ सत्त्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि वैसा मानने पर 'सत्ता' जाति में सत्ता और 'अर्थक्रियाकारित्व' धर्म में अर्थक्रियाकारिता न होने के कारण सत्तादि प्रपञ्च को असत् मानना होगा । सत्तादि में भी दूसरी सत्तादि की कल्पना करने पर अनवस्था हो जाती है । फलतः प्रकाशमानता को ही सत्ता मानना आवश्यक है । तब तो देहादि को भी सत् ही मानना होगा, असत् नहीं—'देहादयः नासन्तः, प्रतीयमानत्वात्, चिदात्मवत्' । देहादि को यदि असत् माना जाता है, तब वे प्रतीयमान न हो सकेंगे, अतः सत् और असत् का मिथुनीभाव क्योंकर होगा ? मिथुनीभाव के बिना किसका किससे भेदाग्रह होगा ? एवं भेदाग्रह सम्भव न होने पर अध्यास कैसे होगा ? इस शङ्का को हृदय में रखकर आक्षेपवादी प्रश्न करता है—"कोऽयमध्यासो नाम ?" यहाँ 'किम्' शब्द आक्षेपार्थक है अर्थात् अध्यास उपपन्न नहीं हो सकता ।
इस आक्षेप के समाधान में समाधान करनेवाला अध्यास का लोक-प्रसिद्ध लक्षण प्रस्तुत करता है—"उच्यते स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः" । 'षदॢ विशरणगत्यवसादने' इस धातु से निष्पन्न अवसाद या अवमत का अर्थ ही 'अव' उपसर्ग से अवद्योतित है, अतः अवसन्न (अवसाद-युक्त) या अवमत (तिरस्कृत) अवभास ही अध्यास का शब्दार्थ सिद्ध होता है । यहाँ अधिष्ठान-ज्ञान के द्वारा उसका बाध होना ही अवसाद या अवमान है । इस प्रकार अवभास के द्वारा मिथ्या ज्ञान विवक्षित होने पर अध्यास का संक्षिप्त लक्षण 'मिथ्याज्ञान-मध्यासः'—ऐसा पर्यवसित होता है ।
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९
भामती
एतावता मिथ्याज्ञानमित्युक्तं भवति—तस्येदमुपख्यानं ॐ पूर्वदृष्टेत्यादि ॐ । पूर्वदृष्टस्यावभासः पूर्वदृष्टावभासः । मिथ्याप्रत्ययश्चारोपविषयारोपणीयस्य मिथुनमन्तरेण न भवतीति पूर्वदृष्टग्रहणेनानृतमारोपणीयमुपस्थापयति, तस्य च दृष्टत्वमात्रमुपयुज्यते न वस्तुसत्तेति दृष्टग्रहणम्, तथापि वर्त्तमानं दृष्टं दर्शनं नारोपोपयोगीति पूर्वेत्युक्तं, तत्र पूर्वदृष्टं स्वरूपेण सदप्यारोपणीयतयाऽनिर्व्वाच्यमित्यनृतम् । आरोपविषयं सत्यमाह ॐ परत्रेति ॐ । परत्र शुक्तिकादौ परमार्थसति, तदनेन सत्यानृतमिथुनमुक्तम् । स्यादेतत्—परत्र पूर्वदृष्टावभास इत्यलक्षणमतिव्यापकत्वात् । अस्ति हि स्वस्तिमत्यां गवि पूर्वदृष्टस्य गोत्वस्य परत्र कालाक्ष्यामवभासः । अस्ति च पाटलिपुत्रे पूर्वदृष्टस्य देवदत्तस्य परत्र माहिष्मत्यामवभासः समीचीनः । अवभासपदं च समीचीनेऽपि प्रत्यये प्रसिद्धं यथा नीलस्यावभासः पीतस्यावभास इत्यत आह ॐ स्मृतिरूप
भामती-व्याख्या
कहते हैं—"सामान्यविशेषधर्मपरिज्ञाने सति तद्विपरीतधर्माध्यारोपेण विपर्ययः सर्वत्र भवतीति । कः पुनरयं विपर्ययः ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः" (न्या. सू. १।१।२) । श्री कुमारिल भट्ट ने भी मिथ्याज्ञान विपर्यय को ही माना है, जैसा कि श्लो. वा. पृ. ६१-६२ में प्रयुक्त "मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः" और "साक्षाद् विपर्ययज्ञानाद् लब्ध्येव त्वप्रमाणता"—इत्यादि वाक्यों से स्पष्ट है। श्री ज्ञानश्री ने भी आरोप के अर्थ में ही 'अध्यास' शब्द का प्रयोग किया—"अर्थश्चेत्कोऽध्यासतो भासतेऽन्यः स्थाप्यो वाच्यस्तत्त्वतो नैव कश्चित्" (ज्ञानश्री. पृ. २०३) । किन्तु प्राचीन आचार्य वसुबन्धु ने अध्यास के लिए उपचार शब्द का प्रयोग उचित समझा है—"आत्मधर्मोपचारो हि विविधो यः प्रवर्तते" (विज्ञप्ति. पृ. ९६) । इसकी व्याख्या में कहा गया है—"यच्च यत्र नास्ति, तत् तत्रोपचर्यते।" जपाकुसुमादि के समीपवर्ती स्फटिकादि में जपाकुसुम की अरुणिमा का उपचार (उपसंक्रमण) प्रसिद्ध ही है]।
मिथ्याज्ञान का विस्तृत लक्षण किया गया है—"परत्र पूर्वदृष्टावभासः"। 'पूर्वदृष्टस्य अवभासः पूर्वदृष्टावभासः'—इस प्रकार यहाँ षष्ठी समास है। मिथ्या ज्ञान तब तक नहीं हो सकता, जब तक आरोप के विषय (अधिष्ठान) और आरोपणीय रजतादि पदार्थों के मिथुन (युगल) की उपस्थिति न हो, अतः यहाँ 'पूर्वदृष्ट' पद के द्वारा अनृत (असत्य) आरोपणीय की उपस्थिति कराई गई है। उस (आरोपणीय पदार्थ) की केवल दृष्टता (प्रतीति) अपेक्षित है, परमार्थ सत्ता नहीं—इस तथ्य का आविष्कार 'दृष्ट' पद के द्वारा किया गया है। उसमें भी वर्तमानकालीन दर्शन उपयोगी नहीं—यह दिखाने के लिए 'पूर्व' पद का ग्रहण किया गया है। यद्यपि पूर्वदृष्ट रजतादि पदार्थ स्वरूपतः सत् (व्यावहारिक) है, प्रातिभासिक नहीं, तथापि आरोपणीयत्व (ब्रह्मज्ञानेतरज्ञानबाध्यत्व) रूप से असत् होने के कारण अनृत कहा जाता है। अध्यास के विषय (अधिष्ठान) की अनृत-विरुद्ध सत्यता प्रकट करने के लिए 'परत्र' का प्रयोग किया गया है। शुक्त्यादि पर पदार्थ रजतादि की अपेक्षा सत्य (अधिकसत्ताक) होते हैं। इस प्रकार अनृत और ऋत (सत्य) का मिथुन (जोड़ा) प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ शङ्का होती है कि 'परत्र पूर्वदृष्टावभासः'—यह अध्यास का लक्षण निर्दुष्ट नहीं, क्योंकि स्वस्तिमती नाम की गो व्यक्ति में पूर्व दृष्ट 'गोत्व' जाति का परत्र (कालाक्षी नाम की गो व्यक्ति में) अवभास (सत्य ज्ञान) होता है। इसी प्रकार पाटलिपुत्र (पटना नगर) में पूर्व दृष्ट देवदत्त का परत्र (माहिष्मति नाम के नगर में) अवभास होता है। 'अवभास' पद सत्य ज्ञान में भी प्रयुक्त होता है, जैसे—'नीलस्यावभासः', 'पीतस्यावभासः'। इस प्रकार गोत्वादि जाति एवं देवदत्तादि व्यक्तियों की सत्य अनुभूति में प्रसक्त अतिव्याप्ति की इस
| २० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
इति ॐ । स्मृते रूपमिव रूपमस्येति स्मृतिरूपः । असन्निहितविषयत्वं च स्मृतिरूपत्वं सन्निहितविषयं च प्रत्यभिज्ञानं समीचीनमिति नातिव्याप्तिः । नाप्यव्याप्तिः स्वप्नज्ञानस्यापि स्मृतिविभ्रमरूपस्यैवंरूपत्वात्तत्रापि हि स्मर्यमाणे पित्रादौ निद्रोपप्लववशादसन्निधानापरामर्शे तत्र तत्र पूर्वदृष्टस्यैव सन्निहितदेशकालत्वस्य समारोपः ।
एवं पीतः शङ्खस्तिक्तो गुड इत्यत्राप्येतल्लक्षणं योजनीयम् । तथाहि—बहिर्वनिर्गच्छत्यच्छनयनरश्मिसंपृक्तपित्तद्रव्यवत्तिनीं पीततां पित्तद्रव्यरहितामनुभवन् शङ्खं च दोषाच्छादितशुक्लिमानं द्रव्यमात्रमनुभवन् पीततायाश्च शङ्खासम्बन्धमननुभवन्नसम्बन्धाग्रहणसारूप्येण पीतं तपनीयपिण्डं पीतं बिल्वफलमित्यादौ पूर्वदृष्टं सामानाधिकरण्यं पीतत्वशङ्खत्वयोरारोप्याह पीतः शङ्ख इति । एतेन तिक्तो गुड इति प्रत्ययो व्याख्यातः ।
एवं विज्ञातृपुरुषाभिमुख्येष्वादर्शादिकेषु स्वच्छेषु चाक्षुषं तेजो लग्नपि बलीयसा सौरेण तेजसा प्रतिस्रोतः प्रवर्तितं मुखसंयुक्तं मुखं ग्राहयद् दोषवशात्तद्देशतामनभिमुखतां च मुखस्याग्राहयत् पूर्वदृष्टाभि-
भामती-व्याख्या
शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—"स्मृतिरूपः" । [ "प्रशंसायां रूपप्" (पा. सू. ५।२।६६) इस सूत्र के द्वारा 'रूपप्' प्रत्यय करके जो 'स्मृतिरूप' पद निष्पन्न होता है, वह यहाँ अनुपयुक्त है, क्योंकि उससे स्मृति का प्रशस्तता या परिपूर्णता प्रतीत होती है, किन्तु यहाँ स्मृतिविषय का एक अंशमात्र विवक्षित है, अतः बहुव्रीहि समास के द्वारा 'स्मृतिरूपः' शब्द श्री मिश्र जी निष्पन्न कर रहे हैं ] 'स्मृते रूपमिव रूपमस्य'—इस प्रकार सम्पन्न 'स्मृतिरूप' पद के द्वारा असन्निकृष्टार्थविषयकत्व मात्र की उपस्थिति कराई जाती है, जिससे 'तदेवान्न गोत्वम्', 'स एवायं देवदत्तः'—इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक प्रमा ज्ञान में इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा ज्ञान सन्निहितविषयक होता है। इस लक्षण की कहीं अव्याप्ति भी नहीं, क्योंकि सभी भ्रमप्रकारों में इस लक्षण का सम्यक् समन्वय हो जाता है, जैसे कि—
( १ ) स्वाप्न ज्ञान—स्वप्न देखते समय स्मर्यमाण माता-पिता आदि पदार्थों में 'निद्रा' दोष के कारण उनकी असन्निधानता का भान नहीं हो पाता और पूर्व जाग्रत अवस्था में दृष्ट सन्निहित देश-कालवृत्तित्व का समारोप होकर 'इयं मे माता', 'अयं मे पिता' ऐसी प्रतीति हो जाती है।
( २ ) पीतः शङ्खः—ऐसा भ्रम पीलिया रोगवाले व्यक्ति को प्रायः होता है। उसके नेत्रों से निकली शुभ्र रश्मियों के साथ पीलिया का कारणीभूत कुपित पित्त द्रव्य वैसे ही चिपक जाता है, जैसे चाँदी के तारों पर सोने का रंग चढ़ा हो। उस पित्त द्रव्य को साथ चिपकाए नेत्र-रश्मियाँ बाहर निकल कर श्वेत शङ्ख पर फैल जाती है। 'अतिसामीप्य' दोष के कारण पित्त द्रव्य का ग्रहण नहीं हो पाता और पीलिया रोग के कारण शङ्खगत शुक्ल वर्ण का भान नहीं होता, पित्तगत पीत वर्ण और शङ्ख के वास्तविक असम्बन्ध का ग्रहण भी नहीं होता। जैसे 'पीतं स्वर्णपिण्डम्', 'पीतं बिल्वफलम्'—इत्यादि सत्य स्थल पर गुण और गुणी द्रव्य का असम्बन्धाग्रह होता है, वैसे ही 'पीतः शङ्खः'—इत्यादि भ्रम-स्थल पर पूर्वदृष्ट पीतत्व और तपनीयपिण्डत्वादि के सामानाधिकरण्य का पीतत्व और शङ्खत्व में आरोप करके पीलियावाला व्यक्ति व्यवहार करने लग जाता है—'पीतः शङ्खः' । इसी प्रकार 'तिक्तो गुडः' आदि भ्रमों की प्रक्रिया होती है।
( ३ ) प्रतिबिम्ब विभ्रम-स्थलों में द्रष्टा पुरुष के सम्मुखस्थ दर्पण या जलादि स्वच्छ पदार्थों पर उसकी नेत्र-रश्मियाँ जाती हैं और दर्पण-तल पर प्रसृत सूर्य के प्रखर प्रकाश से टकराकर द्रष्टा के मुख की ओर ही मुड़ जाती और मुख का ही पूर्णतया ग्रहण
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१
भामती
मुखादर्शोदकदेशतामाभिमुख्यं च मुखस्यारोपयतीति प्रतिबिम्बविभ्रमोऽपि लक्षितो भवति । एतेन द्विचन्द्रदिङ्मोहालातचक्रगन्धर्वनगरवंशोरगादिविभ्रमेष्वपि यथासम्भवं लक्षणं योजनीयम् ।
एतदुक्तं भवति – न प्रकाशमानतामात्रं सत्त्वं येन देहेन्द्रियादेः प्रकाशमानतया सद्भावो भवेत् । नहि सर्पादिभावेन रज्ज्वादयो वा स्फटिकादयो वा रक्तादिगुणयोगिनो न प्रतिभासन्ते, प्रतिभासमाना वा भवन्ति तदात्मानस्तद्धर्माणो वा । तथा सति मरुषु मरीचयमुच्चावचमुच्चलत्तुङ्गतरङ्गभङ्गमालेयमभ्यर्णमवतीर्णा मन्दाकिनीत्यभिसन्धाय प्रवृत्तः तत् तोयमापीय पिपासामुपशमयेत् । तस्मादकामेनापि आरोपितस्य प्रकाशमानस्यापि न वस्तुसत्त्वमभ्युपगमनीयम् । न च मरीचिरूपेण सलिलमवस्तुसत् स्वरूपेण तु परमार्थसदेव देहेन्द्रियादयस्तु स्वरूपेणापि असन्त इत्यनुभावगोचरत्वात्कथमारोध्यन्त इति साम्प्रतम् , यतो यद्यसन्तो नानुभवगोचराः कथं तर्हि मरीच्यादीनामसतां तोयतयानुभवगोचरत्वम् ? न च स्वरूपसत्त्वेन तोयात्मनापि सन्तो भवन्ति । यद्युच्येत नाभावो नाम भावादन्यः कश्चिदस्ति अपि तु भाव एव भावान्तरात्मनाऽभावः स्वरूपेण तु भावः । यथाहूः—“भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षयेति ।” ततश्च
भामती-व्याख्या
करती हैं । रश्मियों के मोड़-तोड़ दोष के कारण मुख की ग्रीवास्थता और अनभिमुखता का भान नहीं होता । फलतः द्रष्टा के द्वारा दर्पणादि में पूर्वदृष्ट दर्पणादि का देश और आभिमुख्य अपने मुख में आरोप करके व्यवहार किया जाता है—'अहं दर्पणे मुखं पश्यामि' । इसी प्रकार 'द्विचन्द्रभ्रम', 'दिग्भ्रम', 'अलातचक्र', 'गन्धर्वनगर', 'वंशोरग' ( बाँस के दण्ड में सर्प-भ्रम ) आदि भ्रमों में भी यथासम्भव यह लक्षण घटा लेना चाहिए ।
[ आक्षेपवादी ने जो कहा था कि चिदात्मा में जो प्रकाशमानता रूप सत्ता है, वही शरीरादि में भी विद्यमान है, अतः शरीरादि को असत् या अनृत नहीं कहा जा सकता, तब सत् और असत् का मिथुनीकरण कैसे होगा ? उस पर सिद्धान्ती कहता है कि ] प्रकाशमानत्वमात्र को सत्त्व नहीं कहा जाता कि शरीर और इन्द्रियादि भी प्रकाशमान होने के कारण सत् हो जाते । येन-केन रूपेण तो असत् पदार्थ भी प्रतीयमान हो जाते हैं, जैसे सर्पत्वरूप से रज्जु, आरुण्यादि के योग से स्फटिकादि प्रतीयमान होते हैं । जो जिस रूप में प्रतीयमान होता है, वैसा सत् नहीं हो जाता, अन्यथा रज्जु भी सर्प और स्फटिकादि भी अरुण हो जायेंगे और ग्रीष्म काल में तपते मरुस्थल पर ऊपर-नीचे लहराती सघन सूर्य-रश्मियाँ ही उन्नतावनत तरङ्गावलिसंकुल जाह्नवी के रूप में मूर्तिमान हो जाएँगी और प्यास से व्याकुल मृगों के यूथ उसी गंगा का जल पीकर अपनी चिरतृषा दूर कर लेंगे । इसलिए आरोपित पदार्थों की प्रकाशमानता को वस्तुसत्ता नहीं मानना चाहिए । यदि कहा जाय कि मरु-जल तो किरणों के रूप में असत् होने पर भी स्वरूपेण सत् ही होता है किन्तु देह, इन्द्रियादि तो स्वरूप से भी सत् नहीं, अतः अनुभव के अविषय होने के कारण क्योंकर आरोपित होंगे ? तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि यदि असत् पदार्थ अनुभव के विषय नहीं होते, तब जल के रूप में मरु-मरीचियाँ क्यों प्रतीयमान होती हैं ? मरीचियाँ स्वरूपतः सत् हैं, तो जलरूप में सत् हो जाएँगी—ऐसा कभी नहीं हो सकता ।
शङ्का—यदि कहा जाय कि भाव से भिन्न अभाव नाम की कोई वस्तु ही नहीं होती, अपितु एक ही भाव अन्य भाव के रूप में अभाव हो जाता है, किन्तु वह स्वरूपतः भाव ही रहता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—“भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया” ( श्लो. वा. पृ. ५६६ ) । अर्थात् एक भाव अन्य भाव की अपेक्षा अभाव होता है, जैसे घट स्वरूपेण भावरूप होने पर भी पटादि के रूप में अभाव ही होता है । अतः भावरूप
| २२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
भावात्मनोपाख्येयतयास्य युज्येतानुभवगोचरता, प्रपञ्चस्य पुनरत्यन्तासतो निरस्तसमस्तसामर्थ्यस्य निस्तत्त्वस्य कुतोऽनुभवविषयभावः ? कुतो वा चिदात्मन्यारोपः ?
न च विषयस्य समस्तसामर्थ्यस्य विरहेऽपि ज्ञानमेव तत्तादृशं स्वप्रत्ययसामर्थ्यासादितादृष्टान्तसिद्धस्वभावभेदमुपजातमसतः प्रकाशनं तस्मादसत्प्रकाशनशक्तिरेवाविद्येति साम्प्रतम् , यतो येयमसत्प्रकाशनशक्तिर्विज्ञानस्य किं पुनरस्याः शक्यम् ? असदिति चेत्, किमेतत्कार्यमाहोस्विदस्या ज्ञाप्यम् ? न तावत्कार्यमसत्तस्तस्यानुपपत्तेः । नापि ज्ञाप्यं, ज्ञानान्तरानुपलब्धेः । अनवस्थापाताच्च । विज्ञानस्वरूपमेवासतः प्रकाश इति चेत्, कः पुनरेष सदसतोः सम्बन्धः ? असदधीननिरूपणत्वं सतो ज्ञानस्यासता सम्बन्ध इति चेत्, अहो बतायमतिनिर्वृत्तः प्रत्ययतपस्वी यस्यासत्यपि निरूपणमायतते, न च प्रत्ययस्तल्लाभते किञ्चित् । असत आधारत्वायोगात् । असदन्तरेण प्रत्ययो न प्रथते इति प्रत्ययस्यैवैष स्वभावो न त्वसदधीनमस्य किञ्चिदिति चेत्, अहो बतास्यासत्पक्षपातो यदयमतदुत्पत्तिरतदात्मा च तदविनाभावनियतः प्रत्यय इति । तस्मादत्यन्तासन्तः शरीरेन्द्रियादयो निस्तत्त्वा नानुभवविषया भवितुमर्हन्तीति ।
अत्र ब्रूमः— निस्तत्त्वं चेन्नानुभवगोचरस्तत्किमिदानीं मरीचयोऽपि तोयात्मना सतत्त्वा यदनुभवगो-
भामती-व्याख्या
में प्रतीयमान होने के कारण मरीच्यादि में अनुभव-विषयता बन जाती है किन्तु कर्तृत्वादि प्रपञ्च तो अत्यन्त असत् और समस्तसामर्थ्य-रहित निस्तत्त्वमात्र है, इसमें अनुभवविषयता क्योंकर होगी और इसका आत्मा में आरोप कैसे होगा ? यदि कहा जाय कि यद्यपि विषय-प्रपञ्च अत्यन्त सामर्थ्य-शून्य है, तथापि उसका ज्ञान ही ऐसा है कि वह अपने समनन्तर प्रत्यय ( स्वसजातीय और अव्यवहित पूर्व ज्ञानरूप कारण ) से ऐसा लोकोत्तर सामर्थ्य प्राप्त करता है, जो किसी बाह्य दृष्टान्त में अनुभूत नहीं, उसी सामर्थ्य के बल पर असत् पदार्थों का प्रकाश कर देता है उसकी असत्प्रकाशनशक्ति का ही नाम अविद्या कहा जाता है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि यह जो विज्ञान की असत्प्रकाशन शक्ति है, उसका शक्य क्या है ? यदि असत् को शक्य माना जाता है, तब वह ( असत् पदार्थ ) इस शक्ति का कार्य ? अथवा उसका ज्ञाप्य है ? असत् पदार्थ को शक्ति का कार्य नहीं कह सकते, क्योंकि असत् पदार्थ में उत्पद्यमानत्वरूप कार्यत्व सम्भव नहीं। असत् को उस शक्ति का ज्ञाप्य भी नहीं कह सकते, क्योंकि ज्ञान-ज्ञाप्यता का अर्थ है—ज्ञानजन्य ज्ञान की विषयता। प्रकृत में दो ज्ञान पदार्थों का भान नहीं होता, केवल असत् का एक ही ज्ञान प्रतीत होता है। उसका भी ज्ञान मानने पर अनवस्था हो जायगी। असत् का प्रकाश उसके ज्ञान से भिन्न नहीं, अतः अनवस्था नहीं होती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सत् ज्ञान का असत् विषय के साथ क्या सम्बन्ध ? यदि कहा जाय कि ज्ञान अपने असद्भूत विषय के द्वारा निरूपित होता है—यही सत् और असत् का सम्बन्ध है। तो यह नहीं कह सकते, क्योंकि जिस ज्ञान का जीवन असत् पर निर्भर है, वह ज्ञान ही क्या होगा ? ज्ञान अपने ऐसे विषय पर कोई अतिशय का भी आधान नहीं कर सकता, क्योंकि असत् पदार्थ किसी भी धर्म का आश्रय नहीं बन सकता। 'ज्ञान अपने विषय पर कोई अतिशय उत्पन्न नहीं करता, अपितु असत् के बिना उसका भान नहीं हो सकता—यह ज्ञान का स्वभाव है'—ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह सम्भव नहीं कि जब ज्ञान न तो उस असत् से उत्पन्न है और असद्रूप है, तब असत् का अविनाभाव ( असत् के बिना न रह सकना ) ज्ञान में क्योंकर बनेगा ? फलतः देह, इन्द्रियादि अत्यन्त असत् और निस्तत्त्व हैं, उनमें अनुभव-विषयता कभी नहीं बन सकती और उसके बिना उनका आत्मा में अध्यास नहीं हो सकता।
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३
भामती
चराः स्युः, न सतस्त्वास्तदात्मना मरीचीनामसत्त्वात् । द्विविधं च वस्तूनां तत्त्वं सत्त्वमसत्त्वं च, तत्र पूर्वं स्वतः परं तु परतः । यथाहु—
"स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते किञ्चिद्रूपं कैश्चित्कदाचन ॥” इति ।
तत् किं मरीचिषु तोयनिर्भासप्रत्ययस्तत्त्वगोचरः ? तथा च समीचीन इति न भ्रान्तो नापि बाध्येत । अद्धा न बाध्येत, यदि मरीचीनतोयात्मत्सत्त्वान् अतोग्दात्मना गृह्णीयात् । तोयात्मना तु गृह्णन् कथमभ्रान्तः कथं वाऽबाध्यः ? हन्त तोयाभावात्मनां मरीचीनां तोयभावात्मत्वं तावन्न सत्, तेषां तोया-भावादभेदेन तोयभावात्मतानुपपत्तेः । नाप्यसत्, वस्त्वन्तरमेव हि वस्त्वन्तरस्यासत्त्वमास्थीयते भावा-न्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणादिति वदद्भिः । न चारोपितं रूपं वस्त्वन्तरं तद्धि मरीचयो वा भवेद्, गङ्गादिगतं तोयं वा ? पूर्वस्मिन् कल्पे मरीचय इति प्रत्ययः स्यात् न तोयमिति । उत्तरस्मिंस्तु गङ्गायां तोयमिति स्यान्न पुनरिहेति । देशभेदास्मरणे तोयमिति स्यान्न पुनरिहेति । न चेदमत्यन्तमसन्निभ्रस्तसमस्त-स्वरूपमलीकमेवास्त्विति साम्प्रतम् , नाप्यसत्, तस्यानुभवगोचरत्वानुपपत्तेरित्युक्तमधस्तात् । तस्मान्न सत्
भामती-व्याख्या
समाधान— असत् ( निस्तत्त्व ) भी अनुभव का विषय होता है । यदि वह अनुभव का विषय नहीं होता, तो क्या मरु-मरीचियाँ भी जलरूप में सतत्त्व ( सत् ) है कि अनुभव का विषय हो जाती हैं ? यदि कहा जाय कि 'जलरूप में मरीचियाँ असत् हैं । वस्तुओं का तत्त्व दो प्रकार का होता है—( १ ) सत्त्व और ( २ ) असत्त्व, जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है—"सतः सद्भावः, असतश्चासद्भावस्तत्त्वम्” ( न्या. सू. १।१।१ ) । इनमें प्रथम ( सत्त्व ) स्वतः ( पर-निरपेक्ष ) और द्वितीय ( असत्त्व ) परतः ( पर-सापेक्ष या प्रतियोगिनिरूपित ) होता है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट ने कहा है—
स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते किञ्चिद्रूपं कैश्चित्कदाचन ॥” ( श्लो. वा. पृ. ४७६ )
[ अर्थात् सभी पदार्थ स्वरूपतः सत् और पर-रूप से असत् होते हैं, जैसे घट घटत्वेन सत् और पटत्वेन असत् होता है । उन रूपों में किसी को कभी एक रूप और कभी अन्य रूप प्रतीत होता है ] ।' तो वैसा कहना समुचित नहीं, क्योंकि तब तो मरु-मरीचियों में जलज्ञान क्या तत्त्वगोचर है? यदि ऐसा है, तब वह समीचीन ज्ञान है, भ्रम नहीं, अतः उसका बाध नहीं होना चाहिए । यदि कहें कि वह तब बाधित न होता, जब कि अजलरूप से मरीचियों को वह ग्रहण करता, किन्तु जलरूपेण मरीचियों का ग्रहण करता है, अतः वह समीचीन ( अभ्रमरूप ) क्यों होगा और अबाध्य क्योंकर होगा ? तो वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जल से भिन्न मरीचियों में जलरूपता सत् नहीं, अन्यथा जलाभाव और जलभाव का अभेद प्रसक्त होगा । मरीचियों में जलरूपता को असत् भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह कहा जा चुका है कि अन्य वस्तु की अन्यरूपता ही असत्त्व है—"भावान्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणात्” ( श्लो. वा. पृ. ५६६ ) । आरोपित जलादि पदार्थ तृतीय वस्तु नहीं हो सकता । आरोपित जल या तो मरीचिरूप होगा या गङ्गादिगत जल । मरीचिरूप मानने पर 'मरीचयः'—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'जलम्'—ऐसी नहीं । गङ्गादिगत जलरूप मानने पर 'गङ्गायां जलम्'—ऐसी प्रतीति होगी, 'इह जलम्'—ऐसी प्रतीति नहीं । यदि गङ्गारूप देश का विस्मरण मान लिया जाय, तब भी 'जलम्'—ऐसी प्रतीति होगी, 'इह जलम्'—ऐसी नहीं । मरुमरीचि-जल को
| २४ | शारीरकशङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
नापि सदसद्, परस्परविरोधादिति अनिर्वाच्यमेवारोपणीयं मरीचिषु तोयमास्थेयं तदनेन क्रमेणाध्यस्तं तोयं परमार्थतोयमिव । अत एव पूर्वदृष्टमिव । तत्त्वतस्तु न तोयं न च पूर्वदृष्टं किं त्वनृतमनिर्वाच्यम् । एवं च देहेन्द्रियादिप्रपञ्चोऽप्यनिर्वाच्योऽपूर्वोऽपि पूर्वमिथ्याप्रत्ययोपदर्शित इव परत्र चिदात्मन्यध्यस्यत इति उपपन्नमध्यासलक्षणयोगाद् देहेन्द्रियादिप्रपञ्चबाधनं चोपपादयिष्यते । चिदात्मा तु श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणगोचरस्तन्मूलतदविरुद्धन्यायनिर्णीतशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सत्त्वेनैव निर्वाच्यः । अबाधिता स्वयम्प्रकाशतैवास्य सत्ता सा च स्वरूपमेव चिदात्मनो न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा इति सर्वमवदातम् ।
स चायमेवंलक्षणकोऽध्यासोऽनिर्वचनीयः सर्वेषामेव सम्मतः परीक्षकाणां तद्भेदे परं विप्रतिपत्तिरित्त्यनिर्वचनीयतां द्रढयितुमाह ॐ तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति ॐ । अन्यधर्मस्य, ज्ञानधर्मस्य
भामती-व्याख्या
खपुष्प के समान अत्यन्त अलीक कहना युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि अत्यन्त अलीक पदार्थ कभी अनुभव का विषय नहीं हो सकता । परिशेषतः अध्यस्यमान जलादि पदार्थों को सत्, असत् और सदसदुभयरूप न मानकर अनिर्वाच्य ही मानना होगा, अतः अध्यस्त जल व्यावहारिक जल के समान अत एव पूर्व-दृष्ट जैसा है । वस्तुतः न तो वह जल है और न पूर्वदृष्ट किन्तु अनृत और अनिर्वाच्यमात्र है । इस प्रकार देह इन्द्रियादि प्रपञ्च भी अनिर्वाच्य है, अपूर्व ( पूर्व सत् न ) होने पर भी मिथ्या ज्ञान के द्वारा पूर्व उपदर्शित एवं चिदात्मरूप अधिष्ठान में अध्यस्त है—यह उपपन्न हो गया, क्योंकि अध्यास का लक्षण उनमें घट जाता है ।
देह और इन्द्रियादि प्रपञ्च बाधित होने के कारण अनृत या मिथ्या है, इसके बाध का उपपादन आगे किया जायगा किन्तु चिदात्मा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में परमार्थ वस्तुत्वेन निर्णीत एवं श्रुतिमूलक उपक्रमादि न्यायों से अवधारित है, अतः शुद्ध, बुद्ध मुक्त स्वभाव के आत्मा का सत्त्वेन निर्वचन करना होगा । चिदात्मा की जो अबाधित स्वयं प्रकाशता है, वही उसका सत्त्व है, उससे अतिरिक्त सत्तारूप महासामान्य ( जाति ) का समवाय या अर्थक्रियाकारित्व को सत्त्व नहीं माना जाता [ सत् पदार्थों की सत्ता का निर्वचन दार्शनिकों ने विभिन्न प्रकार से किया है—वैशेषिकाचार्यों ने सत्ता नाम की एक जाति मानी है, जो द्रव्य, गुण और कर्म—इन पदार्थों में रहती है—"सामान्यं द्विविधम् परमपरं चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं सत्ता महाविषयत्वात्" ( प्र. भा. पृ. २६ ) । इसी के आधार पर सत्ता-समवायवान् पदार्थ को सत् और 'सत्तासमवाय' ( व्योम. पृ. १२६ ) को सत्त्व कहा गया है । बौद्धों ने सत्ता का लक्षण किया है—"सत्ता अर्थक्रियास्थितिः" ( प्र. वा. १११ ) किन्तु वेदान्त में 'सतो भावः सत्ता'—ऐसा भावार्थक 'तल्' प्रत्यय न कर 'देवता' शब्द के समान स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय मानकर सद्रूप ही सत्ता मानी है । वार्तिककार कहते हैं—
प्रकृत्यर्थातिरेकेण प्रत्ययार्थो न विद्यते ।
सत्तैत्यत्र ततः स्वार्थस्तद्धितोऽत्र भवन् भवेत् ॥ ( बृह. वा. पृ. १६७८ )
वैशेषिक-सम्मत सत्ता का निरास बौद्धों ने भी किया है—सच्छब्दनिमित्तं हि सतो भावः सत्ता, द्रव्यं प्रकृत्यर्थः, द्रव्यात्मसंग्रहः प्रत्ययार्थः । सक्रिया वोपचारसत्तारूपा । वैशेषिकसत्ता नोभयम्, अर्थान्तरत्वात्" ( अभिधर्मप्र. पृ. ६ ) ] ।
उक्त अनिर्वचनीय अध्यास प्रायः सभी दार्शनिकों को सम्मत है, केवल उसके स्वरूप विशेष में विप्रतिपत्ति ( मतभेद ) है, उसे दिखाने के लिए कहा गया है—"तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति" ।
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५
केचित्—अन्यत्रान्यधर्माध्यास-इति वदन्ति । केचित्तु - यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रह-
भामती रजतस्य, ज्ञानाकारस्येति यावत्, अध्यासोऽन्यत्र बाह्ये । सौत्रान्तिकनये तावद् बाह्यमस्ति वस्तुसत्तन्न ज्ञानाकारस्यारोपः । विज्ञानवादिनामपि यद्यपि न बाह्यं वस्तुसत्तथाप्यनाद्यविद्यावासनाटोपितमलीकं बाह्यं, तत्र ज्ञानाकारस्यारोपः । उपपत्तिश्च यद्यादृशमनुभवसिद्धं रूपं तत्तादृशमेवाभ्युपेयमित्युत्सर्गोऽन्यथात्वं पुनरस्य बलवद्बाधकप्रत्ययवशान्नेदं रजतमिति च बाधस्येदन्तामात्रवाधेनोपपत्तौ न रजतगोचरतोचिता । रजतस्य धर्मिणो बाधे हि रजतं च तस्य च धर्मं इदन्ता बाधिते भवेताम्, तद्वरमिदन्तैवास्य धर्मो बाध्यतां न पुना रजतमपि धर्मि, तथा च रजतं बहिर्बाधितमर्यादान्तरे ज्ञाने व्यवतिष्ठत इति ज्ञानाकारस्य बहिरध्यासः सिध्यति ।
केचित्तु ज्ञानाकारख्यातावपरितुष्यन्तो वदन्ति ꣸ यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रम इति ꣸ । अपरितोषकारणं चाहुः—विज्ञानाकारता रजतादेरनुभवाद्व्यवस्थाप्येतानुमानाद्वा ? तत्रानुमानमुपरिष्टान्निराकरिष्यते । अनुभवोऽपि रतजप्रत्ययो वा स्याद्, बाधकप्रत्ययो वा ? न तावद्रजतानुभवः । स हीदङ्कारास्पदं रजतमावेदयति न त्वान्तरम्, अह्मिति हि तदा स्यात् प्रतिपत्तुः प्रत्ययादव्यतिरेकात् ।
भामती-व्याख्या
( १ ) आत्मख्याति—बौद्धों का योगाचार निकाय अन्य पदार्थ ( ज्ञान ) के रजतादि धर्मों ( आकारों ) का आरोप अन्य पदार्थ ( बाह्य वस्तु ) में किया करता है । सौत्रान्तिक मत में बाह्य वस्तु अनुमित है, उसमें ज्ञान के आकार का समारोप हो सकता है । योगाचार के मत में यद्यपि बाह्य वस्तु सत् नहीं, तथापि अनादि अविद्या-वासना के द्वारा आरोपित अलीक बाह्य पदार्थ माना जाता है, उसी में ज्ञान के रजतादि आकारों का अध्यास हो जाता है । इस पक्ष में उपपत्ति का प्रदर्शन इस प्रकार किया जाता है कि जो वस्तु जैसी अनुभव में आती है, उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए—ऐसा नैसर्गिक नियम है । उसका अन्यथाकरण तो किसी प्रबल बाधक प्रत्यय के बल पर ही सम्भव हो सकता है । ‘नेदं रजतम्’—इस बाध की चरितार्थता जब रजतगत केवल इदन्ता धर्म का बाध कर देने मात्र से हो जाती है, तब रजतरूप धर्मी का वह बाध नहीं कर सकता, क्योंकि रजतरूप धर्मी का भी बाध करने पर रजत और उसके धर्मभूत इदन्ता—इन दोनों का बाध करना होगा, उससे लाघव तो इसी में है कि रजत के केवल ‘इदन्ता’ धर्म का ही बाध किया जाय, रजतरूप धर्मी का नहीं । रजत बाहर बाधित होकर आन्तरिक ज्ञान में अवस्थित हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान के आकार का बाहर आरोप उपपन्न हो जाता है ।
( २ ) अख्याति—कतिपय विद्वान् विज्ञानाकार ख्याति से सन्तुष्ट न होकर कहते हैं कि “यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रमः” अर्थात् शुक्त्यादि में जो रजतादि का अध्यास कहा जाता है, वह वस्तुतः शुक्ति और रजत का भेद-ग्रह न रहने के कारण ‘इदं रजतम्’—ऐसे ज्ञान में भ्रमरूपता का व्यवहार होने लग जाता है । ये लोग आत्मख्याति में अपनी अरुचि का कारण यह बताते हैं कि बाह्य पदार्थ में रजताकारता का जो आरोप माना जाता है, वह अनुभव के आधार पर वैसा माना जाता है ? अथवा अनुमान के बल पर ? अनुमान का निराकरण आगे तर्कपाद में किया जायगा । अनुभव वहाँ दो होते हैं—(१) इदं रजतम् और (२) नेदं रजतम् । ‘इदं रजतम्’—यह अनुभव रजत की ज्ञानाकारता में प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि वह रजत को इदन्त्वेन बाहर सिद्ध करता है आन्तरिक ज्ञानाकारता का व्यवस्थापक नहीं हो सकता । रजत को ज्ञान का आकार मानने पर ‘इदं रजतम्’— ऐसा अनुभव न होकर ‘अहं रजतम्’—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, क्योंकि विज्ञानवाद में विज्ञान
| २६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
भ्रान्तं विज्ञानं स्वाकारमेव बाह्यतयाऽध्यवस्यति। तथा च नाहङ्कारास्पदत्वमस्य गोचरो ज्ञानाकारता पुनरस्य बाधकप्रत्ययप्रवेदनीयेति चेत्, हन्त बाधकप्रत्ययमप्यालोचयत्वायुष्मान्। किं पुरोवर्तिद्रव्यं रजताद्विवेचय- त्याहो ज्ञानाकारतामध्यस्य दर्शयति। तत्र ज्ञानाकारतोपदर्शनव्यापारं बाधकप्रत्ययस्य ब्रुवाणः श्लाघनीय- प्रज्ञो देवानां प्रियः। पुरोवर्तित्वप्रतिषेधार्थदस्य ज्ञानाकारतेति चेत्, न; असन्निधानाग्रहणनिषेधाद् असन्निहितो भवति प्रतिपत्तुरत्यन्तसन्निधानं त्वस्य प्रतिपत्त्रात्मकं कुतस्त्यम्?
न चैष रजतस्य निषेधो न चेदन्तायाः, किन्तु विवेकाग्रहप्रसञ्जितस्य रजतमिदमिति रजतव्यवहारस्य। न च रजतमेव शुक्तिकायां प्रसञ्जितं रजतज्ञानेन, नहि रजतनिर्भासस्य शुक्तिकालम्बनं युक्तमनुभवविरोधात्। न खलु सत्तामात्रेणालम्बनम्, अतिप्रसङ्गात्। सर्वेषामर्थानां सत्त्वाविशेषादालम्बनत्वप्रसङ्गात्। नापि कारण- त्वेन, इन्द्रियादीनामपि कारणत्वात्। तथा च भासमानतैवालम्बनार्थः। न च रजतज्ञाने शुक्तिका भासत इति कथमालम्बनं भासमानताभ्युपगमे वा कथं नानुभावविरोधः? अपि चेन्द्रियादीनां समीचीनज्ञानोप-
भामती-व्याख्या
को ही अहंपदार्थ माना जाता है। यदि कहा जाय कि रजत है तो विज्ञान का अपना ही आकार किन्तु भ्रान्त विज्ञान अपने आकार को ही बाह्य पदार्थ पर आरोपित कर देता है, इसलिए 'अहं रजतम्'—ऐसी प्रतीति नहीं होती। यदि रजत की विज्ञानाकारता 'नेदं रजतम्'—इस बाधक ज्ञान के द्वारा सिद्ध होती है, तब बाधक ज्ञान की परीक्षा कर ली जाय। बाधक ज्ञान क्या पुरोवर्ती (शुक्ति) द्रव्य को रजत से केवल भिन्न बताता है? अथवा रजत में ज्ञानाकारता की भी सिद्धि करता है? 'नेदं रजतम्'—इस निषेध ज्ञान को रजत की ज्ञानाकारता का साधक मानना तो निरी मूर्खता है। यदि कहा जाय कि रजत में पुरोवर्तित्व का निषेध कर देने से अर्थात् अन्तरवर्ती ज्ञानाकारता पर्यवसित होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्ति और रजत का वस्तुतः असन्निधान है, किन्तु उसका ग्रहण न होने के कारण रजत को इदं रूप से सन्निहित समझ लिया गया था, अब उस असन्निधानाग्रह का 'नेदं रजतम्'—इस प्रकार निषेध कर देने से वास्तविक असन्निधान (ज्ञाता पुरुष से दूर आपण में अवस्थान) सिद्ध होना चाहिए, अत्यन्त सन्निधान (विज्ञानरूप ज्ञाता पुरुष का आकार) क्योंकर स्थिर होगा? वस्तु-स्थिति यह है कि 'नेदं रजतम्'—यह निषेध न तो रजत का निषेधक है और न रजतगत इदन्ता का, किन्तु शुक्ति और रजत के भेदाग्रह के द्वारा आपादित 'रजतमिदम्'—इस प्रकार के व्यवहारमात्र का निषेधक होता है।
'इदं रजतम्'—इस ज्ञान के द्वारा रजत ही शुक्ति में अध्यस्त होता है'—यह कहना संगत नहीं, क्योंकि रजत-भासक ज्ञान का शुक्ति को आलम्बन (विषय) मानना अनुभव से विरुद्ध है। सदैव अनुभव यही बताता है कि जो ज्ञान जिस पदार्थ का भासक होता है, उस ज्ञान का वही आलम्बन होता है। शुक्ति उस देश में विद्यमान होने मात्र से रजत-ज्ञान का आलम्बन हो जायगी—ऐसा मानने पर यह अतिप्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है कि वहाँ विद्यमान सभी पदार्थ सभी ज्ञानों के विषय हो जायेंगे। 'रजत-ज्ञान का कारण होने से शुक्ति उसका आलम्बन है'—ऐसा मानने पर इन्द्रियादि भी रजत-ज्ञान के आलम्बन हो जायेंगे, क्योंकि वे भी उस ज्ञान के कारण हैं। अतः 'भासमानत्वमेवालम्बनत्वम्'—ऐसा ही आलम्बन का लक्षण करना चाहिए, जब 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति भासित नहीं हो रही, तब वह उसका आलम्बन क्योंकर होगी? अतः 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान की भासमानता शुक्ति में मानना अनुभव-विरुद्ध है।
दूसरी बात यह भी हैं कि ज्ञानोत्पादक इन्द्रियादि पदार्थों में समीचीन (प्रमा) ज्ञान