भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३


भामती

त्वहङ्कारस्य मुख्योऽर्थो निर्लुंठितगर्भतया देहादिभ्यो भिन्नोऽनुभूयते येन परशब्दः शरीरादौ गौणो भवेत् । न चात्यन्तरूढतया गौणेऽपि न गौणत्वाभिमानः सार्षपादिषु तैलशब्दवदिति वेदितव्यम् । तत्रापि स्नेहात्तिलभवत्वभेदे सिद्ध एव. सार्षपादीनां तैलशब्दवाच्यत्वाभिमानो न त्वर्थयोस्तैलसार्षपयोरभेदाव्यवसायः । तत्सिद्धं गौणत्वमुभयदर्शिनो गौणमुख्यविवेकविज्ञानेन व्याप्तं तदिह व्यापकं विवेकज्ञानं निवर्तमानं गौणतामपि निवर्तयतीति । न च बालस्थविरशरीरभेदेऽपि सोऽहमित्येकस्यात्मनः प्रतिसन्धानाद्देहादिभ्यो भेदेनास्यात्मानुभव इति वाच्यम् । परीक्षकाणां खल्वियं कथा न लौकिकानाम् । परीक्षका अपि हि व्यवहारसमये न लोकसामान्यमतिवर्तन्ते । वक्ष्यत्यनन्तरमेव हि भगवान् भाष्यकारः। ॐ पश्वादिभिश्चाविशेषादिति ॐ । बाह्या अप्याहुः "शास्त्रचिन्तकाः खल्वेवं विवेचयन्ति न प्रतिपत्तारः" इति । तत्पारिशेष्याच्चिदात्मगोचरमहङ्कारमहमिहास्मि सदन इति प्रयुञ्जानो लौकिकः शरीराद्यभेदग्रहादात्मनः प्रादेशिकत्वमभिमन्यते नभस इव घटमणिकमल्लिकाद्युपाध्यवच्छेदादिति युक्तमुत्पश्यामः ।


भामती-व्याख्या

गौण अर्थ माना जाता है, क्योंकि दोनों कर्मों में साध्य-सादृश्य विद्यमान है । जहाँ माणवक में 'सिंह' शब्द का गौण प्रयोग होता है, वहाँ भी अनुभव के द्वारा माणव और सिंह का भेद सिद्ध होता है । इसी प्रकार यदि अहं शब्द का शरीर में गौण प्रयोग माना जाता है, तब 'अहं' शब्द के मुख्य और गौणभूत अर्थों का भेद किसी प्रमाण से सिद्ध होना चाहिए था, किन्तु अभी तक देहादि से भिन्न किसी अत्यन्त प्रसिद्ध आकार में प्रस्फुटित मुख्य अर्थ अनुभूत नहीं हुआ, जिसको मुख्य मानकर 'अहं' शब्द शरीर में गौणरूप से प्रवृत्त होता । यद्यपि कहीं-कहीं अत्यन्त निरूढ़ हो जाने के कारण 'गौण' शब्द में भी गौणता का स्पष्ट भान नहीं होता, जैसे तिल से निकले द्रव का मुख्य रूप से वाचक 'तैल' शब्द सरसों से निकले द्रव विशेष को गौणी वृत्ति से कहता है, किन्तु उसमें गौणता आपातत प्रतीत नहीं होती । तथापि वहाँ भी सरसों से निकले तेल का तिलोद्भूत तैल से भेद निश्चित होता है । सरसों के तेल में 'तैल' शब्द की वाच्यता का अभिमानमात्र होता है, अभेदाध्यवसाय नहीं । फलतः 'यत्र यत्र गौणार्थत्वम्, तत्र तत्र मुख्यार्थाद् भेदः'- इस प्रकार गौणत्व व्याप्य और मुख्यार्थप्रतियोगिक भेद व्यापक होता है । प्रकृत में व्यापक ( मुख्यार्थ-भेद ) सिद्ध न होने के कारण शरीरादि में 'अहम्' शब्द का गौण प्रयोग सम्भव नहीं ।

यह जो कहा जाता है कि बाल्य और वृद्धावस्था के शरीरों का भेद होने पर भी आत्मा की प्रत्यभिज्ञा होने के कारण अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा शरीरादि से आत्मरूप मुख्यार्थ का भेद निश्चित है । वह कथा विवेक-कुशल प्रेक्षा-दक्ष परीक्षक मनीषियों की है, साधारण व्यक्ति की नहीं । परीक्षक महापुरुष भी व्यवहार-काल में साधारण व्यक्तियों की मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया करते । भगवान् भाष्यकार भी कुछ आगे चलकर ही कहेंगे—"पश्वादिभिश्चाविशेषात्" (ब्र. सू. शां. भा. पृ. ४२) । वैदिक क्षेत्र से बहिर्भूत विद्वान् धर्मकीर्ति ने भी ऐसा ही कहा है—"शास्त्रचिन्तकाः खल्वेवं विवेचयन्ति, न प्रतिपत्तारः" अर्थात् शास्त्रार्थ का निरन्तर चिन्तन करने वाले विवेचक महापुरुष ही गम्भीर विवेचन प्रस्तुत कर सकते हैं, साधारण प्रतिपत्ता नहीं । इस प्रकार यहाँ गौणादि प्रयोगों के न हो सकने के कारण परिशेषतः 'अहमिहास्मि'—ऐसा प्रयोग करनेवाला लौकिक व्यक्ति शरीरादि से अविविक्त आत्मा को वैसे ही प्रादेशिक और परिच्छिन्न मानता है, जैसे एक व्यापक आकाश घट, मणिक ( मटका ) मल्लिका ( मलिया या हाँडी ) आदि उपाधियों के परिच्छेद से ( परिवेश में घिर कर ) परिच्छिन्न-सा प्रतीत होता है ।

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