भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30
१२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

अपि च येऽप्यहङ्कारास्पदमात्मानमास्थिषत तैरपि अस्य न तात्त्विकत्वमभ्युपेतव्यम्। अहमिहैवास्मि सदने जानान इति सर्वव्यापिनः प्रादेशिकत्वेन ग्रहात्। उच्चतरगिरिशिखरवर्त्तिषु महातरुषु भूमिष्ठस्य दूर्वाप्रवालनिर्भासप्रत्ययवत्। न चेदं देहस्य प्रादेशिकत्वमनुभूयते न स्वात्मन इति साम्प्रतं, नहि तथैवं भवत्यहमिति, गौणत्वे वा न जानामीति। अपि च परशब्दः परत्र लक्ष्यमाणगुणयोगेन वर्त्तत इति यत्र प्रयोक्तृप्रतिपत्त्रोः सम्प्रतिपत्तिः स गौणः स च भेदप्रत्ययपुरःसरः। तद्यथा नैयमिकाग्निहोत्रवचनोऽग्निहोत्रशब्दः (अ० १ पा० ४) प्रकरणान्तरावधृतभेदे कौण्डपायिनामयनगते कर्मणि मासर्माग्नहोत्रं जुहोतीत्यत्र साध्यसादृश्येन गौणः (अ० ७ पा० ३)। माणवके चानुभवसिद्धभेदे सिंहादिसिंहशब्दः। न


भामती-व्याख्या

[ कहीं पूर्व से उत्तर और कहीं उत्तर से पूर्व का बाध होता है, उसकी व्यवस्था यह है कि पूर्वोत्पन्न पदार्थ की अपेक्षा पश्चात् उत्पन्न पदार्थ का प्राबल्य वहाँ ही समझा जाता है, जहाँ दोनों पदार्थों की उत्पत्ति में परस्पर एक-दूसरे की अपेक्षा नहीं होती। पूर्वोत्पन्न पदार्थ के समय पश्चात् उत्पन्न पदार्थ था ही नही, अतः पर का बाध किए बिना ही पूर्व की उत्पत्ति हो जाती है किन्तु पश्चात् उत्पन्न पदार्थ की तब तक उत्पत्ति हो ही नहीं सकती, जब तक पूर्व का बाध न किया जाय ]।

दूसरी बात यह भी है कि जो लोग 'अहम्' — इस प्रतीति के विषयीभूत पदार्थ को ही आत्मा मान बैठे हैं, उन्हें भी उसे तात्त्विक (वास्तविक) नहीं समझना चाहिए, क्योंकि 'अहमिहैवास्मि सदने जानानः'— इस प्रतीति के द्वारा आत्मा को एक घर के कोने में ही परिच्छिन्न बताया जाता है, जबकि आत्मा व्यापक होता है। व्याप्तिभूत आत्मा में परिच्छिन्नत्व की प्रतीति वैसे ही भ्रमात्मक है, जैसे कि पर्वत के प्रोत्तुङ्ग शिखर पर अवस्थित विशाल विटप भी पृथिवी-तल पर खड़े हुए व्यक्ति को घास की छोटी सी पूली के समान दिखाई देते हैं। 'अहमिहैवास्मि'— इस प्रतीति में जो प्रादेशिकत्व (एतद्देशावच्छिन्नत्व) प्रतीत होता है, वह शरीरगत है — ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि शरीर के लिए अहम् — ऐसा प्रयोग नहीं हो सकता। 'अहम्' शब्द गौणी वृत्ति से शरीर का ही बोधक है'— ऐसा मानने पर 'अहं जानानः'— ऐसा व्यवहार न हो सकेगा, क्योंकि शरीर न तो ज्ञानस्वरूप है और न ज्ञान का आश्रय। 'अहं' शब्द का शरीर में गौण प्रयोग भी सम्भव नहीं, क्योंकि भट्टपाद ने कहा है— "लक्ष्यमाणगुणैर्योग्राद् वृत्तेरिष्टा तु गौणता।" (तं० वा० पृ० ३५४) अर्थात् 'जहाँ पर 'सिंह' शब्द माणवक में लक्ष्यमाण माणवकगत क्रूरत्व, शूरत्वादि गुणों के सम्बन्ध से प्रवृत्त हुआ है'— ऐसा वक्ता और श्रोता दोनों को निश्चय होता है, वहाँ ही सिंहादि शब्द गौण माने जाते हैं। गौण-प्रयोग के लिए मुख्यार्थ (सिंहादि) और गौणार्थ (माणवकादि) में भेद का निश्चय भी होना अनिवार्य है, जैसे कि 'अग्निहोत्र' नाम का कर्म दो प्रकार का श्रुत है— (१) नित्य अग्निहोत्र और (२) कुण्डपायी ऋषियों के द्वारा अनुष्ठीयमान सत्र कर्म का अङ्गभूत अग्निहोत्र [ "अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१) इस वाक्य से विहित अग्निहोत्र कर्म नित्य कर्म है, जिसका अनुष्ठान आहिताग्नि पुरुष जीवन-पर्यन्त नित्य सायं और प्रातः किया करता है। "मासमग्निहोत्रं जुहोति" (तां० ब्रा० २५।४।१) इस वाक्य से अवबोधित अग्निहोत्र कर्म कुण्डपायी ऋषियों के अयनसंज्ञक सत्रकर्म का अङ्ग कहलाता है]। नित्य अग्निहोत्र कर्म का वाचक 'अग्निहोत्र' शब्द सत्रविशेष के अङ्गभूत अग्निहोत्र कर्म के बोधन में गौणीवृत्ति से प्रवृत्त है। प्रकरणान्तराधिकरण (२।३।२१) में दोनों अग्निहोत्र कर्मों का भेद सिद्ध किया गया है। नित्य अग्निहोत्र कर्म 'अग्निहोत्र' शब्द का मुख्य और सत्राङ्गभूत कर्म

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 30, कुल 639 में से · BharatKosha