भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११


भामती

‘‘न विधौ परः शब्दार्थः’’ इति । ज्येष्ठत्वं चानपेक्षितस्य बाध्यत्वे हेतुर्न बाधकत्वे, रजतज्ञानस्य ज्यायसः शुक्तिज्ञानेन कनीयसा बाधदर्शनात् । तदनपबाधने तदवबाधात्मनस्तस्योत्पत्तेरनुपपत्तेः । दर्शितं च तात्त्विकप्रमाणभावस्यानपेक्षितत्वम् । तथा च पारमर्षं सूत्रं “पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्” ( जै० सू० ६ । ५।५४ ) इति । तथा --

“पूर्वात्परबलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् ।
अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥” इति ।


भामती-व्याख्या

भ्रमात्मक माना जाता है और न उस बोध को प्राप्त करनेवाला व्यक्ति भ्रान्त, अपितु यथार्थ ज्ञानवाला ही माना जाता है [ श्री मण्डन मिश्र भी कहते हैं—“शब्दाच्च नित्यादसत्यदीर्घादि-विभागभाजोऽर्थप्रतिपत्तिर्न मिथ्या” ( ब्र. सि. पृ. १४ ) । महर्षि जैमिनि ने अपने “नादवृद्धि-परा” ( जै. सू. १।१।१७ ) इस सूत्र में सिद्ध किया है कि वर्णात्मक शब्द नित्य होते हैं, उनमें ह्रस्वत्व-दीर्घत्वादि विकार अपने नहीं होते, अपितु नाद पद-वाच्य वायवीय संयोग-विभाग या कण्ठ-ताल्वादि स्थानों पर जिह्वा के आघात के द्वारा जनित विशेष कम्पन से युक्त वायु के वेग की एक विधा ही दीर्घत्वादि के रूप में परिलक्षित होती हैं ] ।

व्यावहारिक प्रामाण्य के आश्रयीभूत प्रत्यक्षादि प्रमाणों से संवल पाकर उपनिषद्रूप आगम प्रमाण जब अपने स्वार्थ का बोध कराने में सक्षम और अनन्यार्थपरक है, तब अपने वाच्यार्थ के बोधन में ही उसे औपचारिक ( गौणार्थक ) कहना कभी भी उचित नहीं, श्री शबर स्वामी कहते हैं—“विधौ हि न परः शब्दार्थः प्रतीयते” ( शा. भा. पृ. १४१ ) अर्थात् विधेय अर्थ का प्रतिपादक ( स्वार्थ-बोधक ) वाक्य कभी परार्थक ( गौणार्थक ) प्रतीत नहीं होता । आगम की अपेक्षा जो प्रत्यक्ष प्रमाण में ज्येष्ठत्व कहा गया, वह प्रत्यक्षगत ज्येष्ठत्व यहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण में बाध्यता का साधक है, बाधकता का नहीं, क्योंकि ज्येष्ठ ( पूर्वोत्पन्न ) शुक्ति में रजत-ज्ञान का कनिष्ठ ( पश्चात् उत्पन्न ) शुक्ति में शुक्ति-ज्ञान के द्वारा बाध देखा जाता है, क्योंकि शुक्ति-ज्ञान जब तक पूर्वोत्पन्न रजत-ज्ञान का बाध नहीं करता, तब तक शुक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती जैसा कि कुमारिल भट्ट ने कहा है—“पूर्वाबाधेन नोत्पत्तिरुत्तरस्य हि सिध्यति” ( श्लो. वा. पृ. ६२ ) । यह भी कहा जा चुका है कि आगम को व्यावहारिक प्रामाण्य की अपेक्षा होने पर भी तात्त्विक प्रामाण्यवाले प्रत्यक्ष की अपेक्षा नहीं, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा यहाँ आगम का बाध सम्भव नहीं, अपितु आगम के द्वारा ही प्रत्यक्ष का बाध होता है, जैसा कि श्री जैमिनि महर्षि ने कहा है—“पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्” ( जै. सू. ६।५।५४ ) अर्थात् दो निरपेक्ष विरोधी पदार्थों के क्रमशः पूर्व और पर काल में उपस्थित होने पर पूर्वोपस्थित पदार्थ वैसे ही दुर्बल ( बाधित ) होता है, जैसे ‘प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या’—इस न्याय के द्वारा प्रकृतिभूत दर्शपूर्णमास कर्म में पठित पाँच प्रयाज कर्मों की प्राप्ति होने पर विकृति कर्म में “नव प्रयाजा इज्यन्ते”—इस वाक्य से विहित प्रयाजगत नवत्व संख्या के द्वारा पूर्वोपस्थित पञ्चत्व संख्या का बाध हो जाता है, श्री भट्टपाद की भी ऐसी ही व्यवस्था है—

पूर्वात् परबलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् ।
अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥
पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वाैव जायते ।
परस्यानन्यथोत्पादान्न त्वबाधेन सम्भवः ॥ (तं. वा. पृ. ८५९)