भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28
१०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

प्रमाणभावस्य स्वकार्ये प्रमितावनानपेक्षत्वात् । प्रमितानपेक्षत्वेऽप्युत्पत्तौ प्रत्यक्षापेक्षत्वात्तद्विरोधादनुत्पत्तिलक्षणमप्रामाण्यमिति चेन्न, उत्पादकाप्रतिद्वन्द्वित्वात् । न ह्यागमज्ञानं सांव्यवहारिकं प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यमुपहन्ति येन कारणाभावान्न भवेदपि तु तात्त्विकम् । न च तत्स्योत्पादकम् । अतात्त्विकप्रमाणभावेभ्योऽपि सांव्यवहारिकप्रमाणेभ्यस्तत्त्वज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् । तथा च वर्णे ह्रस्वदीर्घत्वादयोऽन्यधर्मा अपि समारोपितास्तत्त्वप्रतिपत्तिहेतवः, न हि लौकिका नाग इति वा नग इति वा पदात् कुञ्जरं वा तरुं वा प्रतिपद्यमाना भवन्ति भ्रान्ताः । न चानन्यपरं वाक्यं स्वार्थं उपचरितार्थं युक्तम् । उक्तं हि

भामती-व्याख्या

समाधान—उपनिषद्वाक्य उस वेद के एकदेश हैं, जो कि अपौरुषेय होने के कारण पुरुष-सम्बन्ध-सम्भावित समस्त भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और लोभादि दोषों से रहित हैं। उसमें किसी प्रकार का भी अप्रामाण्य प्रसक्त नहीं हो सकता। श्री कुमारिल भट्ट ने जो तीन प्रकार का अप्रामाण्य कहा है—"अप्रामाण्यं त्रिधा भिन्नं मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः" (श्लो. वा. पृ. ६१)। अर्थात् विपरीतार्थ-बोधकत्व, अबोधकत्व और सन्दिग्धार्थ-बोधकत्व इन तीन प्रकार के अप्रामाण्य-प्रकारों में प्रथम (विपरीतार्थ-बोधकत्व) वेद में इसलिए नहीं कि वह पुरुषगत भ्रमादि दोषों से दूषित नहीं। द्वितीय (अबोधकत्वरूप) अप्रामाण्य भी सम्भावित नहीं, क्योंकि उपनिषद्रूप वैदिक वाक्य अपने समुचित अर्थ के बोधक हैं और वेद में प्रामाण्य स्वतःसिद्ध होने के कारण सन्दिग्धार्थ-बोधकत्वरूप तृतीय प्रकार भी प्रसक्त नहीं होता। आगम-ज्ञान को अपने प्रमापनरूप कार्य में प्रत्यक्ष की अपेक्षा नहीं, अतः सापेक्षत्वरूप अप्रामाण्य भी प्राप्त नहीं होता।

शङ्का—प्रत्यक्ष प्रमाण की सहायता के बिना शब्द का प्रत्यक्ष एवं संगति-ग्रह नहीं होता और इसके बिना शब्द किसी ज्ञान का उत्पादक नहीं हो सकता, अतः आगम-ज्ञान को अपनी उत्पत्ति में प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा निश्चितरूप से है, श्री मण्डन मिश्र ने भी कहा है—"पदपदार्थविभागाधीन आम्नायार्थपरिच्छेदः, स च प्रत्यक्षादिबलादायत्तते" (ब्र. सि. पृ. ३९)। फलतः शब्द प्रमाण के स्वरूप की निष्पत्ति में प्रत्यक्ष अवश्य अपेक्षित है, प्रत्यक्ष की सहायता के बिना पद का ज्ञान एवं उसका पदार्थ के साथ संगति-ग्रहण न हो सकने के कारण शब्द अपना अर्थ-निश्चयरूप कार्य सम्पन्न नहीं करा सकता।

समाधान—आगम प्रमाण अपने उत्पादकीभूत व्यावहारिक प्रत्यक्ष का विरोधी नहीं, क्योंकि शब्द प्रमाण प्रत्यक्षगत पारमार्थिक प्रामाण्य का ही घातक है, व्यावहारिक प्रामाण्य का नहीं, व्यावहारिक प्रामाण्य ही आगम ज्ञान का उत्पादक है, श्री मण्डन मिश्र भी यही कहते हैं—"प्रत्यक्षादीनां तु व्यावहारिकं प्रामाण्यम्" (ब्र. सि. पृ. ४०)। आगम यदि प्रत्यक्षगत व्यावहारिक प्रामाण्य का निराकरण करता, तब अपनी उत्पादक सामग्री का ही हनन कर डालता, उत्पादक सामग्री के विना आगम का स्वरूप-लाभ ही नहीं होता। प्रत्यक्षगत जिस तात्त्विक प्रामाण्य का निषेध आगम करता है, वह आगम का उत्पादक नहीं, क्योंकि जिनमें तात्त्विक प्रामाण्य न होने पर भी केवल व्यावहारिक प्रामाण्य होता है, उन पदार्थों से भी तत्त्व-बोध का उत्पादन देखा जाता है, जैसे कि वर्णात्मक शब्दों में ह्रस्वत्व-दीर्घत्वादि धर्म अपने नहीं होते, अपि तु शब्द के व्यञ्जकीभूत ध्वनि (नादसंज्ञक वायवीय संयोग-विभाग) के धर्म शब्द में आरोपित किन्तु लोक-प्रसिद्ध व्यावहारिकमात्र माने जाते हैं, फिर भी वे तात्त्विक बोध के उद्भावक माने जाते हैं, जैसे कि दीर्घ नकाररूप वर्ण से घटित 'नाग' पद के द्वारा हस्ती और ह्रस्व नकार-गर्भित 'नग' के द्वारा वृक्षादि का बोध लोक में न तो