भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९


भामती

पाद्यनवच्छिन्नमनन्तानन्दचैतन्यैकरसमुदासीनमेकमद्वितीयमात्मतत्त्वं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु गीयते। न चैतान्युपक्रमपरामर्शोपसंहारैः क्रियासमभिहारेणेदृगात्मतत्त्वमभिदधति तत्पराणि सन्ति शक्यानि शक्रेणाप्युपचरितार्थानि कर्तुम्। अभ्यासे हि भूयस्त्वमर्थस्य भवति 'यथाहो दर्शनीयाहो दर्शनीयेति' न न्यूनत्वं प्रागेवोपचरितत्वमिति। अहमनुभवस्तु प्रादेशिकमनेकविधशोकदुःखाविप्रपञ्चोपप्लुतमात्मानमादर्शयन् कथमात्मतत्त्वगोचरः कथं वाऽनुपप्लवः ? न च ज्येष्ठप्रमाणप्रत्यक्षविरोधादाम्नायस्यैव तदपेक्षस्याप्रामाण्यमुपचरितार्थत्वं चेति युक्तम्, तस्यांपौरुषेयतया निरस्तसमस्तदोषशङ्कस्य बोधकत्या च स्वतःसिद्ध-


भामती-व्याख्या

भवितुं युक्तम्, तथापि नैसर्गिकौऽयम्''। इसका आशय यह है कि आक्षेपवादी का कथन तब सत्य हो सकता था, जब कि 'अहम्-अहम्'—इस व्यावहारिक अनुभव में विशुद्ध आत्मतत्त्व परिलक्षित होता, किन्तु वह प्रकाश में नहीं आ रहा है, क्योंकि कर्तृत्वादि समस्त उपाधियों से रहित, अनन्त, आनन्दरूप, चैतन्य, एकरस, उदासीन, एक, अद्वितीय आत्मतत्त्व जो श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में प्रतिपादित है, वैसा शुद्ध आत्मतत्त्व व्यावहारिक 'अहम्' अनुभव का विषय नहीं, अतः आत्मतत्त्व का अननुभव या भेदाग्रह सुलभ हो जाता है, भेदाग्रह होने के कारण उक्त अध्यास भी उपपन्न हो जाता है।

आक्षेपवादी ने जो यह कहा था कि कर्तृत्वादि-रहित शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादक उपनिषदादि शास्त्र गौणार्थक हैं, वह कहना अत्यन्त अयुक्त है, क्योंकि जब शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादक श्रुत्यादि वाक्य, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल और उपपत्ति नाम के षड्विध तात्पर्य-ग्राहक लिङ्गों की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, जब विशुद्ध आत्मतत्त्व के प्रतिपादन में ही उनका तात्पर्य निश्चित है, तब उन्हें गौणार्थक इन्द्र भी सिद्ध नहीं कर सकता। जहाँ किसी एक ही तत्त्व का पुनः-पुनः संकीर्तन किया जाता है, वहाँ उस तत्त्व का उत्कर्ष उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है, जैसे किसी सुन्दरी के लिए कहा गया—'अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीया'। वहाँ बार-बार वैसा कहने से सुन्दरता में उत्कर्ष प्रकट होता है, किञ्चिन्मात्र भी ऊनता नहीं आती, गौणार्थता तो दूर रही [ श्री मण्डन मिश्र ने भी कहा है—एकमेवाद्वितीयमित्यवधारणाद्वितीयशब्दाभ्यां तस्यैवार्थस्य पुनः पुनरभिधानात् सर्वप्रकारभेदनिर्वृत्तिपरता श्रुतेर्लक्ष्यते, अभ्यासे हि भूयस्त्वमर्थस्य भवति, यथा अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीया इति, न न्यूनत्वमपि, दूरत एवोपचरितत्वम्'' (ब्र. सि. पृ. ६)]।

उपनिषद्वाक्य ही वास्तविक शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, व्यापक आत्मतत्त्व के प्रकाशक हैं, लौकिक अहमनुभाव नहीं, क्योंकि अहमनुभव तो प्रदेश भाग में सीमित (परिच्छिन्न) एवं अनेकविध शोक, दुःखादि प्रपञ्च में फँसे हुए आत्मा को ही विषय करता है, अतः वह अनुभव बाधितार्थविषयक (भ्रमात्मक) होकर शुद्ध आत्मतत्त्व का प्रकाशक क्योंकर होगा ?

शङ्का—यहाँ अहमनुभवरूप प्रत्यक्ष और उपनिषद्वाक्य जन्य शाब्द के बलाबल पर दृष्टिपात करने से अहमनुभव ही प्रबल ठहरता है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण सभी प्रमाणों में ज्येष्ठ (अग्रज) होने के कारण प्रबल है, अतः इससे विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक शब्द को ही अप्रमाण मानना न्यायसङ्गत है। प्रत्यक्ष प्रमाण को अपनी उत्पत्ति, ज्ञप्ति या अर्थक्रियाकारिता में शब्द प्रमाण की अपेक्षा नहीं, प्रत्युत शब्द प्रमाण को अपनी उत्पत्त्यादि में प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा है, लोक में निरपेक्ष प्रबल और सापेक्ष दुर्बल माना जाता है, महाभाष्यकार कहते हैं—'सापेक्षमसमर्थं भवति' (पा. सू. ३।१।८)। अतः उपनिषद्वाक्यों को अप्रमाण या गौणार्थक मानना ही युक्ति-युक्त है।