भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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ध्यासः, तद्विपर्ययेण विषयिणस्तद्धर्माणाम् च विषयेऽध्यासो मिथ्येति भवितुं युक्तम्;
भामती
रूपवद्धि द्रव्यमतिस्वच्छतया रूपवतो द्रव्यान्तरस्य तद्विवेकेन गृह्यमाणस्यापि छायां गृह्णीयात् , चिदात्मा त्वरूपो विषयी न विषयच्छायामुद्ग्राहयितुमर्हति । यथाहुः—‘‘शब्दगन्धरसानां च कीदृशी प्रतिबिम्बता’’ इति । तदिह परिशेष्याद्विषयविषयिणोरन्योन्यात्मसम्भेदेनैव तद्धर्माणामपि परस्परसम्भेदेन विनिमयात्मना भवितव्यं, तौ चेद्धर्मिणावत्यन्तविवेकेन गृह्यमाणावसम्भिन्नौ, असम्भिन्नाः सुतरां तयोर्धर्माः, स्वाश्रयाभ्यां व्यवधानेन दूरापेतत्वात् , तदिदमुक्तं ॐसुतरामितिॐ । ॐतद्विपर्ययेणेतिॐ । विषयविपर्ययेणेत्यर्थः । मिथ्याशब्दोऽपह्नववचनः । एतदुक्तं भवति—अध्यासो भेदाग्रहेण व्याप्तस्तद्विरुद्धश्चेहास्ति भेदग्रहः स भेदाग्रहं निवर्त्तयंस्तद्बद्धासमध्यासमपि निवर्त्तयतीति । मिथ्येति भवितुं युक्तं यद्यपि तथापीति योजना । इदमत्राकूतम्—भवेदेतदेवं यद्यहमित्यनुभवे आत्मतत्त्वं प्रकाशेत, न त्वेतदस्ति । तथाहि सम्मस्तो-
भामती-व्याख्या
अन्यान्य धर्मी में धर्मों का भाव ( व्यत्यास ) अर्थात् धर्माध्यास की भी उपपत्ति नहीं हो सकती । आशय यह है कि धर्माध्यास दो प्रकार से होता हैं—(१) रूपवाले स्फटिकादि पदार्थों में जपाकुसुमादि के आरुण्य रूप का प्रतिबिम्ब पड़ने से और ( २ ) लोह-पिण्ड और अग्नि-जैसे धर्मी पदार्थों का तादात्म्य हो जाने पर अग्नि के दाहकत्वादि धर्मों का लोह-पिण्ड में अध्यास होता है । प्रथम प्रकार का धर्माध्यास नियमतः स्फटिक के समान रूप-युक्त पदार्थों में ही होता है, आत्मा रूपवान् नहीं, अतः धर्म-प्रतिबिम्बात्मक धर्माध्यास वहाँ सम्भव नहीं, श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—‘‘शब्दगन्धरसानां कीदृशी प्रतिबिम्बता’’ (श्लो. वा. पृ. २८०) । अर्थात् स्फटिकादि में रूप का प्रतिबिम्ब तो अनुभूत होता है, किन्तु रूप और रूपवान् द्रव्य को छोड़कर शब्द, स्पर्श, रस और गन्धादि का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता, तब आत्मा में अनात्मपदार्थों के अनित्यत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि धर्मों का प्रतिबिम्ब कैसे उपपन्न होगा ? परिशेषतः द्वितीय प्रकार से ही ( धर्म्यध्यासपूर्वक ) धर्माध्यास हो सकता था, किन्तु जब आत्मा और अनात्मरूप दोनों धर्मी अत्यन्त भिन्न प्रतीत हो रहे हैं, तब उनके धर्मों का व्यत्यास कभी भी संभव नहीं, क्योंकि पृथक्-पृथक् रहकर धर्मी अपने धर्मों का विनिमय या संक्रमण नहीं कर सकते—इस तथ्य को ध्वनित करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—‘‘तद्धर्माण सुतरामितरेतरभावानुपपत्तिः’’ ।
भाष्यकार ने जो कहा है—‘‘तद्विपर्ययेण विषयिणः तद्धर्माणां च विषयेऽध्यासः’’ । यहाँ ‘तद्विपर्यय’ पद का अर्थ है—विषयविपर्ययेण । अर्थात् ‘तद्विपर्यय’ पद के घटकीभूत ‘तत्’ शब्द के द्वारा अनात्मरूप विषय का परामर्श किया गया है । [ भाव यह है कि आत्मा और अनात्मपदार्थ—ये दोनों जब प्रकाश और अन्धकार के समान अत्यन्त विपरीत स्वभाव के हैं और दोनों का भेद प्रकट हो रहा है, तब न तो विषय के धर्मों का विषयी में अध्यास हो सकता है और न उसके विपरीत विषयी के धर्मों का विषय में विनिमय हो सकता है ] । भाष्य में प्रयुक्त ‘मिथ्या’ शब्द अपलापार्थक है । अर्थात् ‘अध्यासो मिथ्येति युक्तं भवितुम्’—इस भाष्य का अर्थ है—अध्यास नहीं हो सकता । अभिप्राय यह है कि ‘यत्र यत्राध्यासः, तत्र तत्र भेदाग्रहः’—इस प्रकार अध्यास व्याप्य और भेदाग्रह व्यापक है, व्यापकीभूत भेदाग्रह का विरोधी भेद-ग्रह यहाँ उपलब्ध हो रहा है, वह भेदाग्रह का निवर्त्तक है, भेदाग्रह की निवृत्ति से उसके व्याप्यभूत अध्यास की भी निवृत्ति हो जाती है, क्योंकि जहाँ जो व्यापक नहीं रहता, वहाँ उसका व्याप्य पदार्थ कभी नहीं रह सकता ।
यहाँ भाष्य की योजना इस प्रकार कर लेनी चाहिए—‘‘यद्यपि अध्यासो मिथ्येति