भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32
१४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

न चाहङ्कारप्रामाण्याय देहादिवदात्मापि प्रादेशिक इति युक्तम्। तदा खल्वयमणुपरिमाणो वा स्याद्देहपरिमाणो वा ? अणुपरिमाणत्वे स्थूलोऽहं दीर्घ इति च न स्यात्। देहपरिमाणत्वे तु सावयवतया देहवदनित्यत्वप्रसङ्गः। किं चास्मिन् पक्षेऽवयवसमुदायो वा चेतयेत् प्रत्येकं वाऽवयवाः। प्रत्येकं चेतनत्वपक्षे बहूनां चेतनानां स्वतन्त्राणामेकवाक्यताभावादपर्यायं विरुद्धदिक्क्रियतया शरीरमुन्मथ्येत, अक्रियं वा प्रसज्येत। समुदायस्य तु चैतन्ययोगे वृक्ण एकस्मिन्नवयवे चिदात्मनोऽप्यवयवो वृक्ण इति न चेतयेत्। न च बहूनामवयवानांमविनाभावनियमो दृष्टो य एवावयवो विशीर्णस्तदा तदभावे न चेतयेत्। विज्ञानालम्बनत्वेऽप्यहम्प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वं तदवस्थमेव। तस्य स्थिरवस्तुनिर्भासत्वाद्वास्थिरत्वाच्च विज्ञानानाम्। एतेन स्थूलोऽहमन्धोऽहं गच्छामीत्यादयोऽप्यध्यासतया व्याख्याताः तदेवमुक्तक्रमेणाहंप्रत्यये पूतिकूष्माण्डीकृते भगवती श्रुतिरप्रत्यूहं कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःखशोकाद्यात्मत्वमहमनुभवप्रसञ्जितमात्मनो निषेद्धुमीहीतिति। तदेवं सर्वप्रवादिश्श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणप्रथितमिथ्याभावस्याहम्प्रत्ययस्य स्वरूपनिमित्त-

भामती-व्याख्या

‘अहमिहैवास्मि’—इस भ्रमात्मक प्रतीति में प्रमाणता लाने के लिए शरीरादि के समान आत्मा को भी प्रादेशिक (प्रदेशमात्र में रहने वाला परिच्छिन्न) मान लेना उचित नहीं, क्योंकि प्रादेशिक मान लेने पर प्रश्न उठता है कि आत्मा को अणु परिमाण मानेंगे ? या मध्यम परिमाण का (शरीर के आकार का) ? अणु मानने पर आत्मा में 'स्थूलोऽहम्', 'दीर्घोऽहम्'—ऐसा व्यवहार न हो सकेगा और शरीर के समान मध्यम परिमाण का मान लेने पर आत्मा भी शरीर के समान हीं सावयव और अनित्य हो जायगा। यह भी इस पक्ष में जिज्ञासा होती है कि अवयवी आत्मा के अवयव-समुदाय में चैतन्य मानेंगे ? या प्रत्येक अवयव में पृथक्-पृथक् चैतन्य ? प्रत्येक अवयव को चेतन मानने पर एक ही शरीर को अनेक स्वतन्त्र चेतनों का साम्राज्य मानना होगा। अनेक स्वतन्त्र चेतनों में परस्पर एक-वाक्यता (गुण-प्रधानभाव) न होने के कारण एक ही शरीर का विरुद्ध विविध दिशाओं में संचालन प्राप्त होगा, फलस्वरूप शरीर या तो टुकड़े-टुकड़े हो जायगा या विपरीत आकर्षणों में पड़कर शरीर निष्क्रिय और स्तब्ध-सा होकर रह जायगा। सभी अवयवों के समूह में एक चैतन्य मानने पर किसी एक अवयव के टूट-फूट जाने पर आत्मा टूट-फूट जायेगा, चेतन नाम की वस्तु ही वहाँ नहीं रह जायगी। सभी अवयवों में अविनाभाव (परस्पर साथ-साथ रहने का स्वभाव) तो देखा नहीं जाता, फलतः जब भी कोई एक अवयव विशीर्ण हो (बिखर) जाता है, तभी उसका अभाव हो जाने से चैतन्य समाप्त हो जायगा।

बौद्ध-सम्मत विज्ञानक्षण को 'अहम्'—इस प्रतीति का विषय मानने पर भी अहं प्रतीति की भ्रमरूपता दूर नहीं होती, क्योंकि वह प्रतीति एक स्थिर वस्तु को विषय करती है, किन्तु विज्ञान अस्थिर और क्षणिक है। इस प्रकार अहंप्रतीति का कोई विशुद्ध एक विषय सिद्ध न हो सकने के कारण अध्यासात्मक मानना पड़ता है। जिस प्रत्यक्षभूत अहंप्रतीति के बल पर प्रत्यक्षवादी इतनी उछल-कूद मचाते थे, उसकी सड़े हुए कूष्माण्ड (कोहड़े) की सी दुर्गति हो जाने पर, अहंप्रतीति के विरोधाभास की नीहारिका (कुहासा) को फाड़ती हुई भगवती श्रुति की प्रखर ज्योति जगमगाती है और दहराकाश में छिपे कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख-दुःख, शोक-मोहादि की काली रेखाएँ मिटा कर रख देती है। इस प्रकार समस्त वाद, श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में प्रसिद्ध मिथ्याभूत अहमनुभव के स्वरूप (अन्योन्यात्मकत्व), निमित्त (इतरेतराविवेक) और लोकव्यवहाररूप फल का विश्लेषण प्रस्तुत