भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५
तथाप्यन्योन्यस्मिन्नन्योन्यात्मकतामन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्येतरेतराविवेकेनात्यन्तविविक्तयोर्धर्मधर्मिणोर्मिथ्याज्ञाननिमित्तः सत्यानृते मिथुनीकृत्य 'अहमिदं' 'ममेदम्' इति नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः ।
भामती
फलैरुपव्याख्यानम् ॐ अन्योन्यस्मिन्नित्यादि ॐ । अत्र चान्योन्यस्मिन् धर्मिणि आत्मशरीरादावन्योन्यात्मकतामध्यस्याहमिदं शरीरादीति । इदमिति च वस्तुतो न प्रतीतिरितः । लोकव्यवहारो लोकानां व्यवहारः स चायमहमिति व्यपदेशः । इतिशब्दसूचितश्च शरीराद्यनुकूलं प्रतिकूलं च प्रमेयजातं प्रमाणेन प्रमाय तदुपादानपरिवर्जनादिः । अन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्यान्योन्यस्मिन् धर्मिणि देहादिधर्मान् जन्ममरणजराव्याध्यादीनात्मनि धर्मिणि अध्यस्तदेहात्मभावे समारोप्य तथा चैतन्यादीनात्मनि धर्मिणि अध्यस्तदेहात्मभावे समारोप्य तथा चैतन्यादीनामधर्मान् देहादावध्यस्तात्मभावे समारोप्य ममेदं जरामरणपुत्रपशुस्वाम्यादीति व्यवहारो व्यपदेशः इतिशब्दसूचितश्च तदनुरूपः प्रवृत्त्यादिः । अत्र चाध्यासव्यवहारक्रियाभ्यां यः कर्त्तोन्नीतः स समान इति समानकर्तृकत्वेनाध्यस्य व्यवहार इत्युपपन्नम् । पूर्वकालत्वसूचितमध्यासस्य व्यवहारकारणत्वं सूचयति ॐ मिथ्याज्ञाननिमित्तो व्यवहारः ॐ । मिथ्याज्ञानमध्यासस्तन्निमित्तस्तद्भावाभा-
भामती-व्याख्या
करते हुए भगवान् भाष्यकार कहते हैं—"अन्योन्यस्मिन्नन्योन्यात्मकतामन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्य लोकव्यवहारः।" यहाँ 'अन्योन्यस्मिन् धर्मिणि' का अर्थ है—आत्मा और शरीरादि धर्मियों में "अन्योन्यात्मकतामध्यस्याहमिदम्"—इस भाष्य में 'इदम्' पद से शरीरादि का ग्रहण किया गया है। यद्यपि 'मैं यह शरीर हूँ'—ऐसी प्रतीति नहीं होती, तथापि शरीर के साथ 'अहं स्थूलः' आदि अनुभवों के आधार पर सिद्ध तादात्म्याध्यास की वस्तु-स्थिति को लेकर भाष्यकार ने 'अहमिदम्'—ऐसा कहा है। 'लोकव्यवहारः'—यहाँ 'व्यवहार' के द्वारा 'अहम्-अहम्'—इस प्रकार का अभिवदन विवक्षित है। 'अहमिदम्' 'ममेदमिति'—यहाँ इति पद से सूचित व्यवहार है—प्रमाणों के द्वारा पदार्थों की अनुकूलता, तन्मूलक ग्राह्यता और प्रतिकूलता तन्मूलक परिवर्जनीयता आदि का निष्पादन। अन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्य'—इसका तात्पर्य यह है कि अन्योन्य धर्मियों में परस्पर के धर्मों [आत्मा में देह के जन्म, मरण, जरा, व्याधि आदि धर्मों एवं शरीर में आत्मा के चैतन्यादि धर्मों] का अध्यास करके व्यवहार करना—'ममेदं जरामरणपुत्रपशुस्वामित्वमिति'। 'व्यवहार' पद का वाच्यार्थ शब्द-प्रयोग है। 'इति' शब्द के द्वारा तदनुरूप प्रवृत्त्यादि व्यवहार सूचित किए गए हैं [विवरणकार ने चार प्रकार का व्यवहार कहा है—"अभिज्ञा, अभिवदनम्, उपादानम्, अर्थक्रिया इति चतुर्विधः" (पं० वि० पृ० ६२) अर्थात् घटादि पदार्थों का (१) ज्ञान, (२) संज्ञा पद का अभिधान, (३) प्रवृत्ति और (४) जलाहरणादि के भेद से सब व्यवहार चार प्रकार का होता है। यहाँ भाष्यकार ने कुछ व्यवहारों का अभिधान कर शेष को 'इति' पद से सूचित किया है]।
शङ्का— 'अध्यस्य व्यवहारः'—ऐसी भाष्य-योजना में यह विचारणीय है कि 'अध्यस्य' पद में प्रयुक्त 'ल्यप्' आदेश का स्थानीयभूत 'क्त्वा' प्रत्यय कैसे हुआ? "समानकर्तृकयोः पूर्वकाले" (पा. सू. ३।४।२१) इस सूत्र के द्वारा एककर्तृक दो क्रियाओं में से पूर्वकालीन क्रिया की उपस्थापक धातु के उत्तर 'क्त्वा' प्रत्यय का विधान किया जाता है, किन्तु यहाँ कोई ऐसा एक कर्त्ता प्रतीत नहीं होता, जिसकी पूर्वकालीन क्रिया की वाचक 'अस्' धातु हो।
समाधान— [वेदान्तियों का सभी व्यवहार श्री कुमारिल भट्ट की प्रक्रिया पर निर्भर है। भाट्टगण आख्यात की शक्ति भावना में मानते हैं, भावना पदार्थ चेतन का एक व्यापार