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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५

तथाप्यन्योन्यस्मिन्नन्योन्यात्मकतामन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्येतरेतराविवेकेनात्यन्तविविक्तयोर्धर्मधर्मिणोर्मिथ्याज्ञाननिमित्तः सत्यानृते मिथुनीकृत्य 'अहमिदं' 'ममेदम्' इति नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः ।

भामती

फलैरुपव्याख्यानम् ॐ अन्योन्यस्मिन्नित्यादि ॐ । अत्र चान्योन्यस्मिन् धर्मिणि आत्मशरीरादावन्योन्यात्मकतामध्यस्याहमिदं शरीरादीति । इदमिति च वस्तुतो न प्रतीतिरितः । लोकव्यवहारो लोकानां व्यवहारः स चायमहमिति व्यपदेशः । इतिशब्दसूचितश्च शरीराद्यनुकूलं प्रतिकूलं च प्रमेयजातं प्रमाणेन प्रमाय तदुपादानपरिवर्जनादिः । अन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्यान्योन्यस्मिन् धर्मिणि देहादिधर्मान् जन्ममरणजराव्याध्यादीनात्मनि धर्मिणि अध्यस्तदेहात्मभावे समारोप्य तथा चैतन्यादीनात्मनि धर्मिणि अध्यस्तदेहात्मभावे समारोप्य तथा चैतन्यादीनामधर्मान् देहादावध्यस्तात्मभावे समारोप्य ममेदं जरामरणपुत्रपशुस्वाम्यादीति व्यवहारो व्यपदेशः इतिशब्दसूचितश्च तदनुरूपः प्रवृत्त्यादिः । अत्र चाध्यासव्यवहारक्रियाभ्यां यः कर्त्तोन्नीतः स समान इति समानकर्तृकत्वेनाध्यस्य व्यवहार इत्युपपन्नम् । पूर्वकालत्वसूचितमध्यासस्य व्यवहारकारणत्वं सूचयति ॐ मिथ्याज्ञाननिमित्तो व्यवहारः ॐ । मिथ्याज्ञानमध्यासस्तन्निमित्तस्तद्भावाभा-

भामती-व्याख्या

करते हुए भगवान् भाष्यकार कहते हैं—"अन्योन्यस्मिन्नन्योन्यात्मकतामन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्य लोकव्यवहारः।" यहाँ 'अन्योन्यस्मिन् धर्मिणि' का अर्थ है—आत्मा और शरीरादि धर्मियों में "अन्योन्यात्मकतामध्यस्याहमिदम्"—इस भाष्य में 'इदम्' पद से शरीरादि का ग्रहण किया गया है। यद्यपि 'मैं यह शरीर हूँ'—ऐसी प्रतीति नहीं होती, तथापि शरीर के साथ 'अहं स्थूलः' आदि अनुभवों के आधार पर सिद्ध तादात्म्याध्यास की वस्तु-स्थिति को लेकर भाष्यकार ने 'अहमिदम्'—ऐसा कहा है। 'लोकव्यवहारः'—यहाँ 'व्यवहार' के द्वारा 'अहम्-अहम्'—इस प्रकार का अभिवदन विवक्षित है। 'अहमिदम्' 'ममेदमिति'—यहाँ इति पद से सूचित व्यवहार है—प्रमाणों के द्वारा पदार्थों की अनुकूलता, तन्मूलक ग्राह्यता और प्रतिकूलता तन्मूलक परिवर्जनीयता आदि का निष्पादन। अन्योन्यधर्मांश्चाध्यस्य'—इसका तात्पर्य यह है कि अन्योन्य धर्मियों में परस्पर के धर्मों [आत्मा में देह के जन्म, मरण, जरा, व्याधि आदि धर्मों एवं शरीर में आत्मा के चैतन्यादि धर्मों] का अध्यास करके व्यवहार करना—'ममेदं जरामरणपुत्रपशुस्वामित्वमिति'। 'व्यवहार' पद का वाच्यार्थ शब्द-प्रयोग है। 'इति' शब्द के द्वारा तदनुरूप प्रवृत्त्यादि व्यवहार सूचित किए गए हैं [विवरणकार ने चार प्रकार का व्यवहार कहा है—"अभिज्ञा, अभिवदनम्, उपादानम्, अर्थक्रिया इति चतुर्विधः" (पं० वि० पृ० ६२) अर्थात् घटादि पदार्थों का (१) ज्ञान, (२) संज्ञा पद का अभिधान, (३) प्रवृत्ति और (४) जलाहरणादि के भेद से सब व्यवहार चार प्रकार का होता है। यहाँ भाष्यकार ने कुछ व्यवहारों का अभिधान कर शेष को 'इति' पद से सूचित किया है]।

शङ्का— 'अध्यस्य व्यवहारः'—ऐसी भाष्य-योजना में यह विचारणीय है कि 'अध्यस्य' पद में प्रयुक्त 'ल्यप्' आदेश का स्थानीयभूत 'क्त्वा' प्रत्यय कैसे हुआ? "समानकर्तृकयोः पूर्वकाले" (पा. सू. ३।४।२१) इस सूत्र के द्वारा एककर्तृक दो क्रियाओं में से पूर्वकालीन क्रिया की उपस्थापक धातु के उत्तर 'क्त्वा' प्रत्यय का विधान किया जाता है, किन्तु यहाँ कोई ऐसा एक कर्त्ता प्रतीत नहीं होता, जिसकी पूर्वकालीन क्रिया की वाचक 'अस्' धातु हो।

समाधान— [वेदान्तियों का सभी व्यवहार श्री कुमारिल भट्ट की प्रक्रिया पर निर्भर है। भाट्टगण आख्यात की शक्ति भावना में मानते हैं, भावना पदार्थ चेतन का एक व्यापार

१६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

वानुविधानाद्व्यवहारभावाभावयोरित्यर्थः । तदेवमध्यासस्वरूपं फलं च व्यवहारमुक्त्वा तस्य निमित्तमाह ॐ इतरेतराविवेकेन ॐ । विवेकाग्रहणेनेत्यर्थः । अथाविवेक एव कस्मान्न भवति, तथा च नाध्यास इत्यत आह ॐअत्यन्तविविक्तयोर्धर्मधर्मिणोःॐ । परमार्थतो धर्मिणोरतादात्म्यं विवेको धर्माणां चासङ्कीर्णता विवेकः ।

स्यादेतत् —विविक्तयोर्वस्तुसतोर्भदाग्रहनिबन्धनस्तादात्म्यविभ्रमो युज्यते शुक्तेरिव रजताद्भेदाग्रहे रजततादात्म्यविभ्रमः । इह तु परमार्थसतश्चिदात्मनो न भिन्नं देहाद्यस्ति वस्तुसत्तत् कुतश्चिदात्मनो भेदाग्रहः कुतश्च तादात्म्यविभ्रम इत्यत आह ॐ सत्यानृते मिथुनीकृत्य ॐ । विवेकाग्रहादध्यस्येति योजना । सत्यं चिदात्मा, अनृतं बुद्धीन्द्रियदेहादि, ते द्वे धर्मिणी मिथुनीकृत्य, युगलीकृत्येत्यर्थः । न च संवृतिपरमार्थसतोः पारमार्थिकं मिथुनमस्तीत्यभूतातद्भावात्थस्य च्वेः प्रयोगः । एतदुक्तं भवति — अप्रतीतस्यारापा-

भामती-व्याख्या

है, अपने आश्रयीभूत कर्त्ता के विना भावना उपपन्न नहीं हो सकती, अतः भावना के द्वारा कर्त्ता का आक्षेप या उन्नयन किया जाता है ]। यहाँ भी अध्यसन ओर व्यवहरण—इन दो क्रियाओं के द्वारा जो कर्त्ता उन्नीत होता है, वह एक ही है, अतः एक ही कर्त्ता की अध्यसन और व्यवहरण—इन दो क्रियाओं में अध्यसन क्रिया पूर्वकालीन है, अतः उसकी वाचकीभूत अधिपूर्वक अस् धातु के उत्तर क्त्वा प्रत्यय निष्पन्न हो जाता है । 'अधि' अव्यय पूर्व में होने के कारण “समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्” ( पा० सू० ७।१।३७ ) इस सूत्र के द्वारा क्त्वा को 'ल्यप्' का आदेश होकर 'अध्यस्य' पद सम्पन्न हो जाता है, उक्त प्रयोग का तात्पर्य 'अध्यस्य व्यवहरति लोकः'—इस प्रयोग में है ।

'अध्यस्य' पद में प्रयुक्त 'क्त्वा' प्रत्यय के द्वारा अध्यास में पूर्वकालभावित्व सूचित किया गया, अतः पूर्वकालभावी अध्यास में उत्तरभावी व्यवहार क्रिया की कारणता का स्पष्टीकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—“मिथ्याज्ञाननिमित्तो व्यवहारः”। 'मिथ्या ज्ञान' शब्द का अर्थ है—अध्यास, यही अध्यास उक्त व्यवहार का निमित्त है, अतः व्यवहार को अध्यास निमित्तक कहा गया है, क्योंकि 'अध्याससत्त्वे व्यवहारसत्त्वम्, अध्यासाभावे व्यवहाराभावः'—इस प्रकार अध्यास के भावाभाव का अनुविधान व्यवहार का भावाभाव करता है । इस प्रकार अध्यास के स्वरूप एवं उसके फलभूत व्यवहार का कथन करके उसका निमित्त कहते हैं—“इतरेतराविवेकेन”। यहाँ 'विवेक' पद से विवेक ( भेद ) का अग्रह विवक्षित है । 'विवेकाग्रह को अध्यास का निमित्त न मान कर अविवेक ( भेदाभाव ) को ही अध्यास का निमित्त क्यों नहीं माना जाता ?' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जहाँ अविवेक या भेदाभाव है, वहाँ अध्यास हो ही नहीं सकता—यह दिखाने के लिए कहा गया है—अत्यन्त-विविक्तयोः धर्मिणोः ।” आशय यह है कि अभिन्न पदार्थ में कभी अध्यास नहीं होता, शुक्ति और रजत के समान दो नितान्त विविक्त ( भिन्न ) धर्मियों में ही अध्यास होता है, हाँ उनमें विवेक ( भेद ) का भान नहीं होना चाहिए । विवेक दो प्रकार का होता है—( १ ) दो धर्मियों का आतादात्म्य धर्मिविवेक कहलाता है और ( २ ) आरुण्यादि धर्मों का असंकीर्णत्व ( स्फटिकाद्यवृत्तित्व ) धर्मविवेक है ।

यहाँ यह शङ्का होती है कि जो दो धर्मी वस्तुतः विविक्त हों किन्तु उनके विवेक ( भेद ) का ग्रह ( भान ) न हो रहा हो, तब उनमें तादात्म्य-विभ्रम ( शुक्ति में रजतरूपतादि का भ्रम ) घटित हो जाता है, जैसे कि शुक्ति और रजत—दो वस्तुतः भिन्न पदार्थ हैं, उनका भेद-ग्रह न होने के कारण उनका 'इदं रजतम्'—इस प्रकार तादात्म्य-भ्रम हो जाता है, किन्तु

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७


आह—कोऽयमध्यासो नामेति ? उच्यते—स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः । तं

भामती

योगादारोप्यस्य प्रतीतिरुपयुज्यते न वस्तुसत्तेति । स्यादेतत् — आरोप्यस्य प्रतीतौ सत्यां पूर्वदृष्टस्य समारोपः, समारोपनिबन्धना च प्रतीतिरिति दुर्वारं परस्पराश्रयत्वमित्यत आह— ꕤ नैसर्गिक इति ꕤ । स्वाभाविकोऽनादिरयं व्यवहारः । व्यवहारानादितया तत्कारणस्याध्यासस्यानादितोक्ता । ततश्च पूर्वपूर्वंमिथ्याज्ञानोपदर्शितस्य बुद्धीन्द्रियशरीरादेरुत्तरोत्तराध्यासोपयोग इत्यनादित्वाद्बीजाङ्कुरवन्न परस्पराश्रयत्वमित्यर्थः ।

स्यादेतद्—अद्धा पूर्वप्रतीतिमात्रमुपयुज्यत आरोप्ये, न तु प्रतीयमानस्य परमार्थसत्ता । प्रतीतिरेव त्वत्यन्तासतो गगनकमलिनीकल्पस्य देहेन्द्रियादेर्नोपपद्यते । प्रकाशमानत्वमेव हि चिदात्मनोऽपि सत्त्वं न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा, द्वैतापत्तेः । सत्तायाश्चार्थक्रियाकारितायाश्च सत्तान्तरार्थक्रियाकारितान्तरकल्पनेऽनवस्थापातात् प्रकाशमानतैव सत्ताऽभ्युपेतव्या । तथा च देहादयः प्रकाशमानत्वाद्भासन्तश्चिदात्मवद्, असत्त्वे वा न प्रकाशमानास्तत् कथं सन्तस्तयोर्मिथुनीभावस्तदभावे वा कस्य कुतो भेदाग्रहस्तदसम्भवे कुतोऽध्यास इत्याशयावानाह ꕤ आह आक्षेप्ता कोऽयमध्यासो नाम ?क इत्याक्षेपे ।


भामती-व्याख्या

परमार्थसत् आत्मा से अत्यन्त भिन्न शरीरादि कुछ भी वस्तुसत् नहीं, तब चिदात्मा का किसके साथ भेदाग्रह और तादात्म्य-विभ्रम होगा ? इस शङ्का का समाधान करते हुए कहा गया है—“सत्यानृते मिथुनीकृत्य” । इसका अन्वय है— “विवेकाग्रहादध्यासः” इसके साथ । यहाँ सत्य पदार्थ है—चिदात्मा और असत्य है—बुद्धि, इन्द्रिय और देहादि । इन दोनों धर्मियों को एक युगल के रूप में बुद्धिस्थ करना ही मिथुनीकरण है, क्योंकि संवृतिसत् ( संवृतिसंज्ञक अविद्या का कार्य ) और परमार्थसत् ( ब्रह्म ) का वास्तविक युगलीकरण सम्भव नहीं, परिशेषतः अभूत पदार्थ को आरोप-प्रणाली के द्वारा ही भूत वस्तु बनाकर परमार्थ तत्त्व के साथ मिथुनीकरण करना होगा—इस प्रक्रिया की सूचना देने के लिए ‘मिथुनीकृत्य’ पद में ‘च्चि’ प्रत्यय का प्रयोग किया गया है [ “कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्त्तरि च्विः” ( पा. सू. ५।४।५० ) इस सूत्र के द्वारा स्वार्थ में ‘च्चि’ प्रत्यय का जो वैकल्पिक विधान किया गया है, उसके लिए वार्त्तिककार ने कहा है—“च्चिविधावभूततद्भावग्रहणम्” । फलतः जो वस्तु जैसी नहीं है, उसका वैसा बन जाना च्वि प्रत्यय से ध्वनित होता है । प्रकृत में पारमार्थिक युगलभाव सम्भव नहीं, अतः एक पदार्थ का अध्यास करके उसका दूसरे सत्य पदार्थ के साथ युगलभाव सम्पादित किया गया है—इस तथ्य को अभिसूचित करने के लिए ‘च्चि’ प्रत्यय का यहाँ प्रयोग किया गया है । ‘संवृति’ शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने अविद्या या अध्यास के अर्थ में किया है—

द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
लोकसंवृतिसत्यं सत्यं च परमार्थतः ॥ ( आगम. २४।८ )

चन्द्रकीर्ति ने इसकी वृत्ति में “समन्ताद्वरणं संवृत्तिरज्ञानम्” कहा है । प्रज्ञाकर गुप्त संवृति का अर्थ करते हैं—“संवृतिर्नाम विकल्पविज्ञानम्, अनादिवासनाबलायातः प्रतिभासः” ( प्र. वा. पृ. १८५ ) । श्री शान्तिदेव के बोधिचर्यावतार में श्री प्रज्ञाकरमति कहते हैं—“संव्रियते आव्रियते यथाभूतपरिज्ञानं स्वभावावरणादावृतप्रकाशनाच्च अनयेति संवृतिः, अविद्या, मोहो, विपर्यासः इति पर्यायः” ( बो. च. पं. पृ. १७० ) । फलतः संवृतिसत् का अर्थ है—आविद्यक या व्यावहारिक सत् ] । आशय यह है कि अप्रतीयमान पदार्थ का कभी आरोप

१८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

समाधाता लोकसिद्धमध्यासलक्षणमाचक्षाण एवाक्षेपं प्रतिक्षिपति ॐ उच्यते—स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः ॐ । अवसन्नोऽवमतो वा भासोऽवभासः । प्रत्ययान्तरबाधश्रास्यावसादोऽवमानो वा ।

भामती-व्याख्या

(अध्यास) नहीं होता, अतः अध्यास में आरोप्यमान (अध्यस्यमान) रजतादि पदार्थों की प्रतीति का उपयोग होता है, उनकी पारमार्थिक सत्ता अपेक्षित नहीं होती ।

यहाँ जो यह शङ्का होती है कि अध्यस्यमान पदार्थ की प्रतीति हो जानेपर वह पूर्व-दृष्ट कहलाता है और पूर्व-दृष्ट पदार्थ का अन्यत्र अध्यास होता है । किन्तु अध्यास हो जाने के पश्चात् ही रजतादि की प्रतीति होती है—इस प्रकार अध्यास और प्रतीति का अन्योऽन्याश्रय प्रसक्त क्यों न होगा ? इस शङ्का का परिहार करने के लिए कहा गया है—"नैसर्गिकः" । उक्त व्यवहार स्वाभाविक (अनादि) है । प्रतीत्यादिरूप व्यवहार अनादि है, अतः उसके कारणीभूत अध्यास में भी अनादिता ध्वनित हो जाती है, फलतः पूर्व-पूर्व मिथ्याज्ञानोपदर्शित पदार्थ का उत्तरोत्तर अध्यास में उपयोग होता जाता है । बीज-वृक्ष प्रवाह के समान अनादि पदार्थों में अन्योऽन्याश्रयता नहीं मानी जाती [जिस बीज व्यक्ति से जो वृक्ष उत्पन्न होता है, यदि उसी वृक्ष व्यक्ति से उसके जनकीभूत बीज की उत्पत्ति मानी जाती है, तब अवश्य अन्योऽन्याश्रयता होगी, किन्तु अन्य बीज से अन्य वृक्ष की उत्पत्ति मानने में परस्पराश्रयता नहीं होती । इसी प्रकार प्रकृत में प्रतीति और अध्यास का अनादि प्रवाह माना जा सकता है] ।

यह बात ठीक है कि अध्यास में अध्यस्यमान की केवल पूर्व प्रतीति उपयोगी है, परमार्थ सत्ता नहीं, किन्तु गगन-कुसुम के समान अत्यन्त असत् देह, इन्द्रियादि की प्रतीति ही सम्भव नहीं, क्योंकि असत्ता का अर्थ अप्रतीयमानता और सत्ता का अर्थ प्रतीयमानता ही किया जाता है । चिदात्मा में प्रतीयमानत्वरूप ही सत्त्व माना जाता है, उससे भिन्न वैशेषिक-सम्मत सत्ता जाति का समवाय वा बौद्ध-स्वीकृत अर्थक्रियाकारित्व को यहाँ सत्त्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि वैसा मानने पर 'सत्ता' जाति में सत्ता और 'अर्थक्रियाकारित्व' धर्म में अर्थक्रियाकारिता न होने के कारण सत्तादि प्रपञ्च को असत् मानना होगा । सत्तादि में भी दूसरी सत्तादि की कल्पना करने पर अनवस्था हो जाती है । फलतः प्रकाशमानता को ही सत्ता मानना आवश्यक है । तब तो देहादि को भी सत् ही मानना होगा, असत् नहीं—'देहादयः नासन्तः, प्रतीयमानत्वात्, चिदात्मवत्' । देहादि को यदि असत् माना जाता है, तब वे प्रतीयमान न हो सकेंगे, अतः सत् और असत् का मिथुनीभाव क्योंकर होगा ? मिथुनीभाव के बिना किसका किससे भेदाग्रह होगा ? एवं भेदाग्रह सम्भव न होने पर अध्यास कैसे होगा ? इस शङ्का को हृदय में रखकर आक्षेपवादी प्रश्न करता है—"कोऽयमध्यासो नाम ?" यहाँ 'किम्' शब्द आक्षेपार्थक है अर्थात् अध्यास उपपन्न नहीं हो सकता ।

इस आक्षेप के समाधान में समाधान करनेवाला अध्यास का लोक-प्रसिद्ध लक्षण प्रस्तुत करता है—"उच्यते स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः" । 'षदॢ विशरणगत्यवसादने' इस धातु से निष्पन्न अवसाद या अवमत का अर्थ ही 'अव' उपसर्ग से अवद्योतित है, अतः अवसन्न (अवसाद-युक्त) या अवमत (तिरस्कृत) अवभास ही अध्यास का शब्दार्थ सिद्ध होता है । यहाँ अधिष्ठान-ज्ञान के द्वारा उसका बाध होना ही अवसाद या अवमान है । इस प्रकार अवभास के द्वारा मिथ्या ज्ञान विवक्षित होने पर अध्यास का संक्षिप्त लक्षण 'मिथ्याज्ञान-मध्यासः'—ऐसा पर्यवसित होता है ।

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९

भामती

एतावता मिथ्याज्ञानमित्युक्तं भवति—तस्येदमुपख्यानं ॐ पूर्वदृष्टेत्यादि ॐ । पूर्वदृष्टस्यावभासः पूर्वदृष्टावभासः । मिथ्याप्रत्ययश्चारोपविषयारोपणीयस्य मिथुनमन्तरेण न भवतीति पूर्वदृष्टग्रहणेनानृतमारोपणीयमुपस्थापयति, तस्य च दृष्टत्वमात्रमुपयुज्यते न वस्तुसत्तेति दृष्टग्रहणम्, तथापि वर्त्तमानं दृष्टं दर्शनं नारोपोपयोगीति पूर्वेत्युक्तं, तत्र पूर्वदृष्टं स्वरूपेण सदप्यारोपणीयतयाऽनिर्व्वाच्यमित्यनृतम् । आरोपविषयं सत्यमाह ॐ परत्रेति ॐ । परत्र शुक्तिकादौ परमार्थसति, तदनेन सत्यानृतमिथुनमुक्तम् । स्यादेतत्—परत्र पूर्वदृष्टावभास इत्यलक्षणमतिव्यापकत्वात् । अस्ति हि स्वस्तिमत्यां गवि पूर्वदृष्टस्य गोत्वस्य परत्र कालाक्ष्यामवभासः । अस्ति च पाटलिपुत्रे पूर्वदृष्टस्य देवदत्तस्य परत्र माहिष्मत्यामवभासः समीचीनः । अवभासपदं च समीचीनेऽपि प्रत्यये प्रसिद्धं यथा नीलस्यावभासः पीतस्यावभास इत्यत आह ॐ स्मृतिरूप


भामती-व्याख्या

कहते हैं—"सामान्यविशेषधर्मपरिज्ञाने सति तद्विपरीतधर्माध्यारोपेण विपर्ययः सर्वत्र भवतीति । कः पुनरयं विपर्ययः ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः" (न्या. सू. १।१।२) । श्री कुमारिल भट्ट ने भी मिथ्याज्ञान विपर्यय को ही माना है, जैसा कि श्लो. वा. पृ. ६१-६२ में प्रयुक्त "मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः" और "साक्षाद् विपर्ययज्ञानाद् लब्ध्येव त्वप्रमाणता"—इत्यादि वाक्यों से स्पष्ट है। श्री ज्ञानश्री ने भी आरोप के अर्थ में ही 'अध्यास' शब्द का प्रयोग किया—"अर्थश्चेत्कोऽध्यासतो भासतेऽन्यः स्थाप्यो वाच्यस्तत्त्वतो नैव कश्चित्" (ज्ञानश्री. पृ. २०३) । किन्तु प्राचीन आचार्य वसुबन्धु ने अध्यास के लिए उपचार शब्द का प्रयोग उचित समझा है—"आत्मधर्मोपचारो हि विविधो यः प्रवर्तते" (विज्ञप्ति. पृ. ९६) । इसकी व्याख्या में कहा गया है—"यच्च यत्र नास्ति, तत् तत्रोपचर्यते।" जपाकुसुमादि के समीपवर्ती स्फटिकादि में जपाकुसुम की अरुणिमा का उपचार (उपसंक्रमण) प्रसिद्ध ही है]।

मिथ्याज्ञान का विस्तृत लक्षण किया गया है—"परत्र पूर्वदृष्टावभासः"। 'पूर्वदृष्टस्य अवभासः पूर्वदृष्टावभासः'—इस प्रकार यहाँ षष्ठी समास है। मिथ्या ज्ञान तब तक नहीं हो सकता, जब तक आरोप के विषय (अधिष्ठान) और आरोपणीय रजतादि पदार्थों के मिथुन (युगल) की उपस्थिति न हो, अतः यहाँ 'पूर्वदृष्ट' पद के द्वारा अनृत (असत्य) आरोपणीय की उपस्थिति कराई गई है। उस (आरोपणीय पदार्थ) की केवल दृष्टता (प्रतीति) अपेक्षित है, परमार्थ सत्ता नहीं—इस तथ्य का आविष्कार 'दृष्ट' पद के द्वारा किया गया है। उसमें भी वर्तमानकालीन दर्शन उपयोगी नहीं—यह दिखाने के लिए 'पूर्व' पद का ग्रहण किया गया है। यद्यपि पूर्वदृष्ट रजतादि पदार्थ स्वरूपतः सत् (व्यावहारिक) है, प्रातिभासिक नहीं, तथापि आरोपणीयत्व (ब्रह्मज्ञानेतरज्ञानबाध्यत्व) रूप से असत् होने के कारण अनृत कहा जाता है। अध्यास के विषय (अधिष्ठान) की अनृत-विरुद्ध सत्यता प्रकट करने के लिए 'परत्र' का प्रयोग किया गया है। शुक्त्यादि पर पदार्थ रजतादि की अपेक्षा सत्य (अधिकसत्ताक) होते हैं। इस प्रकार अनृत और ऋत (सत्य) का मिथुन (जोड़ा) प्रस्तुत किया गया है।

यहाँ शङ्का होती है कि 'परत्र पूर्वदृष्टावभासः'—यह अध्यास का लक्षण निर्दुष्ट नहीं, क्योंकि स्वस्तिमती नाम की गो व्यक्ति में पूर्व दृष्ट 'गोत्व' जाति का परत्र (कालाक्षी नाम की गो व्यक्ति में) अवभास (सत्य ज्ञान) होता है। इसी प्रकार पाटलिपुत्र (पटना नगर) में पूर्व दृष्ट देवदत्त का परत्र (माहिष्मति नाम के नगर में) अवभास होता है। 'अवभास' पद सत्य ज्ञान में भी प्रयुक्त होता है, जैसे—'नीलस्यावभासः', 'पीतस्यावभासः'। इस प्रकार गोत्वादि जाति एवं देवदत्तादि व्यक्तियों की सत्य अनुभूति में प्रसक्त अतिव्याप्ति की इस

२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

इति ॐ । स्मृते रूपमिव रूपमस्येति स्मृतिरूपः । असन्निहितविषयत्वं च स्मृतिरूपत्वं सन्निहितविषयं च प्रत्यभिज्ञानं समीचीनमिति नातिव्याप्तिः । नाप्यव्याप्तिः स्वप्नज्ञानस्यापि स्मृतिविभ्रमरूपस्यैवंरूपत्वात्तत्रापि हि स्मर्यमाणे पित्रादौ निद्रोपप्लववशादसन्निधानापरामर्शे तत्र तत्र पूर्वदृष्टस्यैव सन्निहितदेशकालत्वस्य समारोपः ।

एवं पीतः शङ्खस्तिक्तो गुड इत्यत्राप्येतल्लक्षणं योजनीयम् । तथाहि—बहिर्वनिर्गच्छत्यच्छनयनरश्मिसंपृक्तपित्तद्रव्यवत्तिनीं पीततां पित्तद्रव्यरहितामनुभवन् शङ्खं च दोषाच्छादितशुक्लिमानं द्रव्यमात्रमनुभवन् पीततायाश्च शङ्खासम्बन्धमननुभवन्नसम्बन्धाग्रहणसारूप्येण पीतं तपनीयपिण्डं पीतं बिल्वफलमित्यादौ पूर्वदृष्टं सामानाधिकरण्यं पीतत्वशङ्खत्वयोरारोप्याह पीतः शङ्ख इति । एतेन तिक्तो गुड इति प्रत्ययो व्याख्यातः ।

एवं विज्ञातृपुरुषाभिमुख्येष्वादर्शादिकेषु स्वच्छेषु चाक्षुषं तेजो लग्नपि बलीयसा सौरेण तेजसा प्रतिस्रोतः प्रवर्तितं मुखसंयुक्तं मुखं ग्राहयद् दोषवशात्तद्देशतामनभिमुखतां च मुखस्याग्राहयत् पूर्वदृष्टाभि-


भामती-व्याख्या

शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—"स्मृतिरूपः" । [ "प्रशंसायां रूपप्" (पा. सू. ५।२।६६) इस सूत्र के द्वारा 'रूपप्' प्रत्यय करके जो 'स्मृतिरूप' पद निष्पन्न होता है, वह यहाँ अनुपयुक्त है, क्योंकि उससे स्मृति का प्रशस्तता या परिपूर्णता प्रतीत होती है, किन्तु यहाँ स्मृतिविषय का एक अंशमात्र विवक्षित है, अतः बहुव्रीहि समास के द्वारा 'स्मृतिरूपः' शब्द श्री मिश्र जी निष्पन्न कर रहे हैं ] 'स्मृते रूपमिव रूपमस्य'—इस प्रकार सम्पन्न 'स्मृतिरूप' पद के द्वारा असन्निकृष्टार्थविषयकत्व मात्र की उपस्थिति कराई जाती है, जिससे 'तदेवान्न गोत्वम्', 'स एवायं देवदत्तः'—इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक प्रमा ज्ञान में इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा ज्ञान सन्निहितविषयक होता है। इस लक्षण की कहीं अव्याप्ति भी नहीं, क्योंकि सभी भ्रमप्रकारों में इस लक्षण का सम्यक् समन्वय हो जाता है, जैसे कि—

( १ ) स्वाप्न ज्ञान—स्वप्न देखते समय स्मर्यमाण माता-पिता आदि पदार्थों में 'निद्रा' दोष के कारण उनकी असन्निधानता का भान नहीं हो पाता और पूर्व जाग्रत अवस्था में दृष्ट सन्निहित देश-कालवृत्तित्व का समारोप होकर 'इयं मे माता', 'अयं मे पिता' ऐसी प्रतीति हो जाती है।

( २ ) पीतः शङ्खः—ऐसा भ्रम पीलिया रोगवाले व्यक्ति को प्रायः होता है। उसके नेत्रों से निकली शुभ्र रश्मियों के साथ पीलिया का कारणीभूत कुपित पित्त द्रव्य वैसे ही चिपक जाता है, जैसे चाँदी के तारों पर सोने का रंग चढ़ा हो। उस पित्त द्रव्य को साथ चिपकाए नेत्र-रश्मियाँ बाहर निकल कर श्वेत शङ्ख पर फैल जाती है। 'अतिसामीप्य' दोष के कारण पित्त द्रव्य का ग्रहण नहीं हो पाता और पीलिया रोग के कारण शङ्खगत शुक्ल वर्ण का भान नहीं होता, पित्तगत पीत वर्ण और शङ्ख के वास्तविक असम्बन्ध का ग्रहण भी नहीं होता। जैसे 'पीतं स्वर्णपिण्डम्', 'पीतं बिल्वफलम्'—इत्यादि सत्य स्थल पर गुण और गुणी द्रव्य का असम्बन्धाग्रह होता है, वैसे ही 'पीतः शङ्खः'—इत्यादि भ्रम-स्थल पर पूर्वदृष्ट पीतत्व और तपनीयपिण्डत्वादि के सामानाधिकरण्य का पीतत्व और शङ्खत्व में आरोप करके पीलियावाला व्यक्ति व्यवहार करने लग जाता है—'पीतः शङ्खः' । इसी प्रकार 'तिक्तो गुडः' आदि भ्रमों की प्रक्रिया होती है।

( ३ ) प्रतिबिम्ब विभ्रम-स्थलों में द्रष्टा पुरुष के सम्मुखस्थ दर्पण या जलादि स्वच्छ पदार्थों पर उसकी नेत्र-रश्मियाँ जाती हैं और दर्पण-तल पर प्रसृत सूर्य के प्रखर प्रकाश से टकराकर द्रष्टा के मुख की ओर ही मुड़ जाती और मुख का ही पूर्णतया ग्रहण

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१

भामती

मुखादर्शोदकदेशतामाभिमुख्यं च मुखस्यारोपयतीति प्रतिबिम्बविभ्रमोऽपि लक्षितो भवति । एतेन द्विचन्द्रदिङ्मोहालातचक्रगन्धर्वनगरवंशोरगादिविभ्रमेष्वपि यथासम्भवं लक्षणं योजनीयम् ।

एतदुक्तं भवति – न प्रकाशमानतामात्रं सत्त्वं येन देहेन्द्रियादेः प्रकाशमानतया सद्भावो भवेत् । नहि सर्पादिभावेन रज्ज्वादयो वा स्फटिकादयो वा रक्तादिगुणयोगिनो न प्रतिभासन्ते, प्रतिभासमाना वा भवन्ति तदात्मानस्तद्धर्माणो वा । तथा सति मरुषु मरीचयमुच्चावचमुच्चलत्तुङ्गतरङ्गभङ्गमालेयमभ्यर्णमवतीर्णा मन्दाकिनीत्यभिसन्धाय प्रवृत्तः तत् तोयमापीय पिपासामुपशमयेत् । तस्मादकामेनापि आरोपितस्य प्रकाशमानस्यापि न वस्तुसत्त्वमभ्युपगमनीयम् । न च मरीचिरूपेण सलिलमवस्तुसत् स्वरूपेण तु परमार्थसदेव देहेन्द्रियादयस्तु स्वरूपेणापि असन्त इत्यनुभावगोचरत्वात्कथमारोध्यन्त इति साम्प्रतम् , यतो यद्यसन्तो नानुभवगोचराः कथं तर्हि मरीच्यादीनामसतां तोयतयानुभवगोचरत्वम् ? न च स्वरूपसत्त्वेन तोयात्मनापि सन्तो भवन्ति । यद्युच्येत नाभावो नाम भावादन्यः कश्चिदस्ति अपि तु भाव एव भावान्तरात्मनाऽभावः स्वरूपेण तु भावः । यथाहूः—“भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षयेति ।” ततश्च

भामती-व्याख्या

करती हैं । रश्मियों के मोड़-तोड़ दोष के कारण मुख की ग्रीवास्थता और अनभिमुखता का भान नहीं होता । फलतः द्रष्टा के द्वारा दर्पणादि में पूर्वदृष्ट दर्पणादि का देश और आभिमुख्य अपने मुख में आरोप करके व्यवहार किया जाता है—'अहं दर्पणे मुखं पश्यामि' । इसी प्रकार 'द्विचन्द्रभ्रम', 'दिग्भ्रम', 'अलातचक्र', 'गन्धर्वनगर', 'वंशोरग' ( बाँस के दण्ड में सर्प-भ्रम ) आदि भ्रमों में भी यथासम्भव यह लक्षण घटा लेना चाहिए ।

[ आक्षेपवादी ने जो कहा था कि चिदात्मा में जो प्रकाशमानता रूप सत्ता है, वही शरीरादि में भी विद्यमान है, अतः शरीरादि को असत् या अनृत नहीं कहा जा सकता, तब सत् और असत् का मिथुनीकरण कैसे होगा ? उस पर सिद्धान्ती कहता है कि ] प्रकाशमानत्वमात्र को सत्त्व नहीं कहा जाता कि शरीर और इन्द्रियादि भी प्रकाशमान होने के कारण सत् हो जाते । येन-केन रूपेण तो असत् पदार्थ भी प्रतीयमान हो जाते हैं, जैसे सर्पत्वरूप से रज्जु, आरुण्यादि के योग से स्फटिकादि प्रतीयमान होते हैं । जो जिस रूप में प्रतीयमान होता है, वैसा सत् नहीं हो जाता, अन्यथा रज्जु भी सर्प और स्फटिकादि भी अरुण हो जायेंगे और ग्रीष्म काल में तपते मरुस्थल पर ऊपर-नीचे लहराती सघन सूर्य-रश्मियाँ ही उन्नतावनत तरङ्गावलिसंकुल जाह्नवी के रूप में मूर्तिमान हो जाएँगी और प्यास से व्याकुल मृगों के यूथ उसी गंगा का जल पीकर अपनी चिरतृषा दूर कर लेंगे । इसलिए आरोपित पदार्थों की प्रकाशमानता को वस्तुसत्ता नहीं मानना चाहिए । यदि कहा जाय कि मरु-जल तो किरणों के रूप में असत् होने पर भी स्वरूपेण सत् ही होता है किन्तु देह, इन्द्रियादि तो स्वरूप से भी सत् नहीं, अतः अनुभव के अविषय होने के कारण क्योंकर आरोपित होंगे ? तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि यदि असत् पदार्थ अनुभव के विषय नहीं होते, तब जल के रूप में मरु-मरीचियाँ क्यों प्रतीयमान होती हैं ? मरीचियाँ स्वरूपतः सत् हैं, तो जलरूप में सत् हो जाएँगी—ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

शङ्का—यदि कहा जाय कि भाव से भिन्न अभाव नाम की कोई वस्तु ही नहीं होती, अपितु एक ही भाव अन्य भाव के रूप में अभाव हो जाता है, किन्तु वह स्वरूपतः भाव ही रहता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—“भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया” ( श्लो. वा. पृ. ५६६ ) । अर्थात् एक भाव अन्य भाव की अपेक्षा अभाव होता है, जैसे घट स्वरूपेण भावरूप होने पर भी पटादि के रूप में अभाव ही होता है । अतः भावरूप

२२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

भावात्मनोपाख्येयतयास्य युज्येतानुभवगोचरता, प्रपञ्चस्य पुनरत्यन्तासतो निरस्तसमस्तसामर्थ्यस्य निस्तत्त्वस्य कुतोऽनुभवविषयभावः ? कुतो वा चिदात्मन्यारोपः ?

न च विषयस्य समस्तसामर्थ्यस्य विरहेऽपि ज्ञानमेव तत्तादृशं स्वप्रत्ययसामर्थ्यासादितादृष्टान्तसिद्धस्वभावभेदमुपजातमसतः प्रकाशनं तस्मादसत्प्रकाशनशक्तिरेवाविद्येति साम्प्रतम् , यतो येयमसत्प्रकाशनशक्तिर्विज्ञानस्य किं पुनरस्याः शक्यम् ? असदिति चेत्, किमेतत्कार्यमाहोस्विदस्या ज्ञाप्यम् ? न तावत्कार्यमसत्तस्तस्यानुपपत्तेः । नापि ज्ञाप्यं, ज्ञानान्तरानुपलब्धेः । अनवस्थापाताच्च । विज्ञानस्वरूपमेवासतः प्रकाश इति चेत्, कः पुनरेष सदसतोः सम्बन्धः ? असदधीननिरूपणत्वं सतो ज्ञानस्यासता सम्बन्ध इति चेत्, अहो बतायमतिनिर्वृत्तः प्रत्ययतपस्वी यस्यासत्यपि निरूपणमायतते, न च प्रत्ययस्तल्लाभते किञ्चित् । असत आधारत्वायोगात् । असदन्तरेण प्रत्ययो न प्रथते इति प्रत्ययस्यैवैष स्वभावो न त्वसदधीनमस्य किञ्चिदिति चेत्, अहो बतास्यासत्पक्षपातो यदयमतदुत्पत्तिरतदात्मा च तदविनाभावनियतः प्रत्यय इति । तस्मादत्यन्तासन्तः शरीरेन्द्रियादयो निस्तत्त्वा नानुभवविषया भवितुमर्हन्तीति ।

अत्र ब्रूमः— निस्तत्त्वं चेन्नानुभवगोचरस्तत्किमिदानीं मरीचयोऽपि तोयात्मना सतत्त्वा यदनुभवगो-


भामती-व्याख्या

में प्रतीयमान होने के कारण मरीच्यादि में अनुभव-विषयता बन जाती है किन्तु कर्तृत्वादि प्रपञ्च तो अत्यन्त असत् और समस्तसामर्थ्य-रहित निस्तत्त्वमात्र है, इसमें अनुभवविषयता क्योंकर होगी और इसका आत्मा में आरोप कैसे होगा ? यदि कहा जाय कि यद्यपि विषय-प्रपञ्च अत्यन्त सामर्थ्य-शून्य है, तथापि उसका ज्ञान ही ऐसा है कि वह अपने समनन्तर प्रत्यय ( स्वसजातीय और अव्यवहित पूर्व ज्ञानरूप कारण ) से ऐसा लोकोत्तर सामर्थ्य प्राप्त करता है, जो किसी बाह्य दृष्टान्त में अनुभूत नहीं, उसी सामर्थ्य के बल पर असत् पदार्थों का प्रकाश कर देता है उसकी असत्प्रकाशनशक्ति का ही नाम अविद्या कहा जाता है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि यह जो विज्ञान की असत्प्रकाशन शक्ति है, उसका शक्य क्या है ? यदि असत् को शक्य माना जाता है, तब वह ( असत् पदार्थ ) इस शक्ति का कार्य ? अथवा उसका ज्ञाप्य है ? असत् पदार्थ को शक्ति का कार्य नहीं कह सकते, क्योंकि असत् पदार्थ में उत्पद्यमानत्वरूप कार्यत्व सम्भव नहीं। असत् को उस शक्ति का ज्ञाप्य भी नहीं कह सकते, क्योंकि ज्ञान-ज्ञाप्यता का अर्थ है—ज्ञानजन्य ज्ञान की विषयता। प्रकृत में दो ज्ञान पदार्थों का भान नहीं होता, केवल असत् का एक ही ज्ञान प्रतीत होता है। उसका भी ज्ञान मानने पर अनवस्था हो जायगी। असत् का प्रकाश उसके ज्ञान से भिन्न नहीं, अतः अनवस्था नहीं होती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सत् ज्ञान का असत् विषय के साथ क्या सम्बन्ध ? यदि कहा जाय कि ज्ञान अपने असद्भूत विषय के द्वारा निरूपित होता है—यही सत् और असत् का सम्बन्ध है। तो यह नहीं कह सकते, क्योंकि जिस ज्ञान का जीवन असत् पर निर्भर है, वह ज्ञान ही क्या होगा ? ज्ञान अपने ऐसे विषय पर कोई अतिशय का भी आधान नहीं कर सकता, क्योंकि असत् पदार्थ किसी भी धर्म का आश्रय नहीं बन सकता। 'ज्ञान अपने विषय पर कोई अतिशय उत्पन्न नहीं करता, अपितु असत् के बिना उसका भान नहीं हो सकता—यह ज्ञान का स्वभाव है'—ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह सम्भव नहीं कि जब ज्ञान न तो उस असत् से उत्पन्न है और असद्रूप है, तब असत् का अविनाभाव ( असत् के बिना न रह सकना ) ज्ञान में क्योंकर बनेगा ? फलतः देह, इन्द्रियादि अत्यन्त असत् और निस्तत्त्व हैं, उनमें अनुभव-विषयता कभी नहीं बन सकती और उसके बिना उनका आत्मा में अध्यास नहीं हो सकता।

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३


भामती

चराः स्युः, न सतस्त्वास्तदात्मना मरीचीनामसत्त्वात् । द्विविधं च वस्तूनां तत्त्वं सत्त्वमसत्त्वं च, तत्र पूर्वं स्वतः परं तु परतः । यथाहु—

"स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते किञ्चिद्रूपं कैश्चित्कदाचन ॥” इति ।

तत् किं मरीचिषु तोयनिर्भासप्रत्ययस्तत्त्वगोचरः ? तथा च समीचीन इति न भ्रान्तो नापि बाध्येत । अद्धा न बाध्येत, यदि मरीचीनतोयात्मत्सत्त्वान् अतोग्दात्मना गृह्णीयात् । तोयात्मना तु गृह्णन् कथमभ्रान्तः कथं वाऽबाध्यः ? हन्त तोयाभावात्मनां मरीचीनां तोयभावात्मत्वं तावन्न सत्, तेषां तोया-भावादभेदेन तोयभावात्मतानुपपत्तेः । नाप्यसत्, वस्त्वन्तरमेव हि वस्त्वन्तरस्यासत्त्वमास्थीयते भावा-न्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणादिति वदद्भिः । न चारोपितं रूपं वस्त्वन्तरं तद्धि मरीचयो वा भवेद्, गङ्गादिगतं तोयं वा ? पूर्वस्मिन् कल्पे मरीचय इति प्रत्ययः स्यात् न तोयमिति । उत्तरस्मिंस्तु गङ्गायां तोयमिति स्यान्न पुनरिहेति । देशभेदास्मरणे तोयमिति स्यान्न पुनरिहेति । न चेदमत्यन्तमसन्निभ्रस्तसमस्त-स्वरूपमलीकमेवास्त्विति साम्प्रतम् , नाप्यसत्, तस्यानुभवगोचरत्वानुपपत्तेरित्युक्तमधस्तात् । तस्मान्न सत्


भामती-व्याख्या

समाधान— असत् ( निस्तत्त्व ) भी अनुभव का विषय होता है । यदि वह अनुभव का विषय नहीं होता, तो क्या मरु-मरीचियाँ भी जलरूप में सतत्त्व ( सत् ) है कि अनुभव का विषय हो जाती हैं ? यदि कहा जाय कि 'जलरूप में मरीचियाँ असत् हैं । वस्तुओं का तत्त्व दो प्रकार का होता है—( १ ) सत्त्व और ( २ ) असत्त्व, जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है—"सतः सद्भावः, असतश्चासद्भावस्तत्त्वम्” ( न्या. सू. १।१।१ ) । इनमें प्रथम ( सत्त्व ) स्वतः ( पर-निरपेक्ष ) और द्वितीय ( असत्त्व ) परतः ( पर-सापेक्ष या प्रतियोगिनिरूपित ) होता है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट ने कहा है—

स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते किञ्चिद्रूपं कैश्चित्कदाचन ॥” ( श्लो. वा. पृ. ४७६ )

[ अर्थात् सभी पदार्थ स्वरूपतः सत् और पर-रूप से असत् होते हैं, जैसे घट घटत्वेन सत् और पटत्वेन असत् होता है । उन रूपों में किसी को कभी एक रूप और कभी अन्य रूप प्रतीत होता है ] ।' तो वैसा कहना समुचित नहीं, क्योंकि तब तो मरु-मरीचियों में जलज्ञान क्या तत्त्वगोचर है? यदि ऐसा है, तब वह समीचीन ज्ञान है, भ्रम नहीं, अतः उसका बाध नहीं होना चाहिए । यदि कहें कि वह तब बाधित न होता, जब कि अजलरूप से मरीचियों को वह ग्रहण करता, किन्तु जलरूपेण मरीचियों का ग्रहण करता है, अतः वह समीचीन ( अभ्रमरूप ) क्यों होगा और अबाध्य क्योंकर होगा ? तो वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जल से भिन्न मरीचियों में जलरूपता सत् नहीं, अन्यथा जलाभाव और जलभाव का अभेद प्रसक्त होगा । मरीचियों में जलरूपता को असत् भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह कहा जा चुका है कि अन्य वस्तु की अन्यरूपता ही असत्त्व है—"भावान्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणात्” ( श्लो. वा. पृ. ५६६ ) । आरोपित जलादि पदार्थ तृतीय वस्तु नहीं हो सकता । आरोपित जल या तो मरीचिरूप होगा या गङ्गादिगत जल । मरीचिरूप मानने पर 'मरीचयः'—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'जलम्'—ऐसी नहीं । गङ्गादिगत जलरूप मानने पर 'गङ्गायां जलम्'—ऐसी प्रतीति होगी, 'इह जलम्'—ऐसी प्रतीति नहीं । यदि गङ्गारूप देश का विस्मरण मान लिया जाय, तब भी 'जलम्'—ऐसी प्रतीति होगी, 'इह जलम्'—ऐसी नहीं । मरुमरीचि-जल को

२४शारीरकशङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

नापि सदसद्, परस्परविरोधादिति अनिर्वाच्यमेवारोपणीयं मरीचिषु तोयमास्थेयं तदनेन क्रमेणाध्यस्तं तोयं परमार्थतोयमिव । अत एव पूर्वदृष्टमिव । तत्त्वतस्तु न तोयं न च पूर्वदृष्टं किं त्वनृतमनिर्वाच्यम् । एवं च देहेन्द्रियादिप्रपञ्चोऽप्यनिर्वाच्योऽपूर्वोऽपि पूर्वमिथ्याप्रत्ययोपदर्शित इव परत्र चिदात्मन्यध्यस्यत इति उपपन्नमध्यासलक्षणयोगाद् देहेन्द्रियादिप्रपञ्चबाधनं चोपपादयिष्यते । चिदात्मा तु श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणगोचरस्तन्मूलतदविरुद्धन्यायनिर्णीतशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सत्त्वेनैव निर्वाच्यः । अबाधिता स्वयम्प्रकाशतैवास्य सत्ता सा च स्वरूपमेव चिदात्मनो न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा इति सर्वमवदातम् ।

स चायमेवंलक्षणकोऽध्यासोऽनिर्वचनीयः सर्वेषामेव सम्मतः परीक्षकाणां तद्भेदे परं विप्रतिपत्तिरित्त्यनिर्वचनीयतां द्रढयितुमाह ॐ तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति ॐ । अन्यधर्मस्य, ज्ञानधर्मस्य

भामती-व्याख्या

खपुष्प के समान अत्यन्त अलीक कहना युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि अत्यन्त अलीक पदार्थ कभी अनुभव का विषय नहीं हो सकता । परिशेषतः अध्यस्यमान जलादि पदार्थों को सत्, असत् और सदसदुभयरूप न मानकर अनिर्वाच्य ही मानना होगा, अतः अध्यस्त जल व्यावहारिक जल के समान अत एव पूर्व-दृष्ट जैसा है । वस्तुतः न तो वह जल है और न पूर्वदृष्ट किन्तु अनृत और अनिर्वाच्यमात्र है । इस प्रकार देह इन्द्रियादि प्रपञ्च भी अनिर्वाच्य है, अपूर्व ( पूर्व सत् न ) होने पर भी मिथ्या ज्ञान के द्वारा पूर्व उपदर्शित एवं चिदात्मरूप अधिष्ठान में अध्यस्त है—यह उपपन्न हो गया, क्योंकि अध्यास का लक्षण उनमें घट जाता है ।

देह और इन्द्रियादि प्रपञ्च बाधित होने के कारण अनृत या मिथ्या है, इसके बाध का उपपादन आगे किया जायगा किन्तु चिदात्मा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में परमार्थ वस्तुत्वेन निर्णीत एवं श्रुतिमूलक उपक्रमादि न्यायों से अवधारित है, अतः शुद्ध, बुद्ध मुक्त स्वभाव के आत्मा का सत्त्वेन निर्वचन करना होगा । चिदात्मा की जो अबाधित स्वयं प्रकाशता है, वही उसका सत्त्व है, उससे अतिरिक्त सत्तारूप महासामान्य ( जाति ) का समवाय या अर्थक्रियाकारित्व को सत्त्व नहीं माना जाता [ सत् पदार्थों की सत्ता का निर्वचन दार्शनिकों ने विभिन्न प्रकार से किया है—वैशेषिकाचार्यों ने सत्ता नाम की एक जाति मानी है, जो द्रव्य, गुण और कर्म—इन पदार्थों में रहती है—"सामान्यं द्विविधम् परमपरं चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं सत्ता महाविषयत्वात्" ( प्र. भा. पृ. २६ ) । इसी के आधार पर सत्ता-समवायवान् पदार्थ को सत् और 'सत्तासमवाय' ( व्योम. पृ. १२६ ) को सत्त्व कहा गया है । बौद्धों ने सत्ता का लक्षण किया है—"सत्ता अर्थक्रियास्थितिः" ( प्र. वा. १११ ) किन्तु वेदान्त में 'सतो भावः सत्ता'—ऐसा भावार्थक 'तल्' प्रत्यय न कर 'देवता' शब्द के समान स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय मानकर सद्रूप ही सत्ता मानी है । वार्तिककार कहते हैं—

प्रकृत्यर्थातिरेकेण प्रत्ययार्थो न विद्यते ।
सत्तैत्यत्र ततः स्वार्थस्तद्धितोऽत्र भवन् भवेत् ॥ ( बृह. वा. पृ. १६७८ )

वैशेषिक-सम्मत सत्ता का निरास बौद्धों ने भी किया है—सच्छब्दनिमित्तं हि सतो भावः सत्ता, द्रव्यं प्रकृत्यर्थः, द्रव्यात्मसंग्रहः प्रत्ययार्थः । सक्रिया वोपचारसत्तारूपा । वैशेषिकसत्ता नोभयम्, अर्थान्तरत्वात्" ( अभिधर्मप्र. पृ. ६ ) ] ।

उक्त अनिर्वचनीय अध्यास प्रायः सभी दार्शनिकों को सम्मत है, केवल उसके स्वरूप विशेष में विप्रतिपत्ति ( मतभेद ) है, उसे दिखाने के लिए कहा गया है—"तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति" ।

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५

केचित्—अन्यत्रान्यधर्माध्यास-इति वदन्ति । केचित्तु - यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रह-

भामती रजतस्य, ज्ञानाकारस्येति यावत्, अध्यासोऽन्यत्र बाह्ये । सौत्रान्तिकनये तावद् बाह्यमस्ति वस्तुसत्तन्न ज्ञानाकारस्यारोपः । विज्ञानवादिनामपि यद्यपि न बाह्यं वस्तुसत्तथाप्यनाद्यविद्यावासनाटोपितमलीकं बाह्यं, तत्र ज्ञानाकारस्यारोपः । उपपत्तिश्च यद्यादृशमनुभवसिद्धं रूपं तत्तादृशमेवाभ्युपेयमित्युत्सर्गोऽन्यथात्वं पुनरस्य बलवद्बाधकप्रत्ययवशान्नेदं रजतमिति च बाधस्येदन्तामात्रवाधेनोपपत्तौ न रजतगोचरतोचिता । रजतस्य धर्मिणो बाधे हि रजतं च तस्य च धर्मं इदन्ता बाधिते भवेताम्, तद्वरमिदन्तैवास्य धर्मो बाध्यतां न पुना रजतमपि धर्मि, तथा च रजतं बहिर्बाधितमर्यादान्तरे ज्ञाने व्यवतिष्ठत इति ज्ञानाकारस्य बहिरध्यासः सिध्यति ।

केचित्तु ज्ञानाकारख्यातावपरितुष्यन्तो वदन्ति ꣸ यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रम इति ꣸ । अपरितोषकारणं चाहुः—विज्ञानाकारता रजतादेरनुभवाद्व्यवस्थाप्येतानुमानाद्वा ? तत्रानुमानमुपरिष्टान्निराकरिष्यते । अनुभवोऽपि रतजप्रत्ययो वा स्याद्, बाधकप्रत्ययो वा ? न तावद्रजतानुभवः । स हीदङ्कारास्पदं रजतमावेदयति न त्वान्तरम्, अह्मिति हि तदा स्यात् प्रतिपत्तुः प्रत्ययादव्यतिरेकात् ।


भामती-व्याख्या

( १ ) आत्मख्याति—बौद्धों का योगाचार निकाय अन्य पदार्थ ( ज्ञान ) के रजतादि धर्मों ( आकारों ) का आरोप अन्य पदार्थ ( बाह्य वस्तु ) में किया करता है । सौत्रान्तिक मत में बाह्य वस्तु अनुमित है, उसमें ज्ञान के आकार का समारोप हो सकता है । योगाचार के मत में यद्यपि बाह्य वस्तु सत् नहीं, तथापि अनादि अविद्या-वासना के द्वारा आरोपित अलीक बाह्य पदार्थ माना जाता है, उसी में ज्ञान के रजतादि आकारों का अध्यास हो जाता है । इस पक्ष में उपपत्ति का प्रदर्शन इस प्रकार किया जाता है कि जो वस्तु जैसी अनुभव में आती है, उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए—ऐसा नैसर्गिक नियम है । उसका अन्यथाकरण तो किसी प्रबल बाधक प्रत्यय के बल पर ही सम्भव हो सकता है । ‘नेदं रजतम्’—इस बाध की चरितार्थता जब रजतगत केवल इदन्ता धर्म का बाध कर देने मात्र से हो जाती है, तब रजतरूप धर्मी का वह बाध नहीं कर सकता, क्योंकि रजतरूप धर्मी का भी बाध करने पर रजत और उसके धर्मभूत इदन्ता—इन दोनों का बाध करना होगा, उससे लाघव तो इसी में है कि रजत के केवल ‘इदन्ता’ धर्म का ही बाध किया जाय, रजतरूप धर्मी का नहीं । रजत बाहर बाधित होकर आन्तरिक ज्ञान में अवस्थित हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान के आकार का बाहर आरोप उपपन्न हो जाता है ।

( २ ) अख्याति—कतिपय विद्वान् विज्ञानाकार ख्याति से सन्तुष्ट न होकर कहते हैं कि “यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रमः” अर्थात् शुक्त्यादि में जो रजतादि का अध्यास कहा जाता है, वह वस्तुतः शुक्ति और रजत का भेद-ग्रह न रहने के कारण ‘इदं रजतम्’—ऐसे ज्ञान में भ्रमरूपता का व्यवहार होने लग जाता है । ये लोग आत्मख्याति में अपनी अरुचि का कारण यह बताते हैं कि बाह्य पदार्थ में रजताकारता का जो आरोप माना जाता है, वह अनुभव के आधार पर वैसा माना जाता है ? अथवा अनुमान के बल पर ? अनुमान का निराकरण आगे तर्कपाद में किया जायगा । अनुभव वहाँ दो होते हैं—(१) इदं रजतम् और (२) नेदं रजतम् । ‘इदं रजतम्’—यह अनुभव रजत की ज्ञानाकारता में प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि वह रजत को इदन्त्वेन बाहर सिद्ध करता है आन्तरिक ज्ञानाकारता का व्यवस्थापक नहीं हो सकता । रजत को ज्ञान का आकार मानने पर ‘इदं रजतम्’— ऐसा अनुभव न होकर ‘अहं रजतम्’—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, क्योंकि विज्ञानवाद में विज्ञान

२६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

भ्रान्तं विज्ञानं स्वाकारमेव बाह्यतयाऽध्यवस्यति। तथा च नाहङ्कारास्पदत्वमस्य गोचरो ज्ञानाकारता पुनरस्य बाधकप्रत्ययप्रवेदनीयेति चेत्, हन्त बाधकप्रत्ययमप्यालोचयत्वायुष्मान्। किं पुरोवर्तिद्रव्यं रजताद्विवेचय- त्याहो ज्ञानाकारतामध्यस्य दर्शयति। तत्र ज्ञानाकारतोपदर्शनव्यापारं बाधकप्रत्ययस्य ब्रुवाणः श्लाघनीय- प्रज्ञो देवानां प्रियः। पुरोवर्तित्वप्रतिषेधार्थदस्य ज्ञानाकारतेति चेत्, न; असन्निधानाग्रहणनिषेधाद् असन्निहितो भवति प्रतिपत्तुरत्यन्तसन्निधानं त्वस्य प्रतिपत्त्रात्मकं कुतस्त्यम्?

न चैष रजतस्य निषेधो न चेदन्तायाः, किन्तु विवेकाग्रहप्रसञ्जितस्य रजतमिदमिति रजतव्यवहारस्य। न च रजतमेव शुक्तिकायां प्रसञ्जितं रजतज्ञानेन, नहि रजतनिर्भासस्य शुक्तिकालम्बनं युक्तमनुभवविरोधात्। न खलु सत्तामात्रेणालम्बनम्, अतिप्रसङ्गात्। सर्वेषामर्थानां सत्त्वाविशेषादालम्बनत्वप्रसङ्गात्। नापि कारण- त्वेन, इन्द्रियादीनामपि कारणत्वात्। तथा च भासमानतैवालम्बनार्थः। न च रजतज्ञाने शुक्तिका भासत इति कथमालम्बनं भासमानताभ्युपगमे वा कथं नानुभावविरोधः? अपि चेन्द्रियादीनां समीचीनज्ञानोप-

भामती-व्याख्या

को ही अहंपदार्थ माना जाता है। यदि कहा जाय कि रजत है तो विज्ञान का अपना ही आकार किन्तु भ्रान्त विज्ञान अपने आकार को ही बाह्य पदार्थ पर आरोपित कर देता है, इसलिए 'अहं रजतम्'—ऐसी प्रतीति नहीं होती। यदि रजत की विज्ञानाकारता 'नेदं रजतम्'—इस बाधक ज्ञान के द्वारा सिद्ध होती है, तब बाधक ज्ञान की परीक्षा कर ली जाय। बाधक ज्ञान क्या पुरोवर्ती (शुक्ति) द्रव्य को रजत से केवल भिन्न बताता है? अथवा रजत में ज्ञानाकारता की भी सिद्धि करता है? 'नेदं रजतम्'—इस निषेध ज्ञान को रजत की ज्ञानाकारता का साधक मानना तो निरी मूर्खता है। यदि कहा जाय कि रजत में पुरोवर्तित्व का निषेध कर देने से अर्थात् अन्तरवर्ती ज्ञानाकारता पर्यवसित होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्ति और रजत का वस्तुतः असन्निधान है, किन्तु उसका ग्रहण न होने के कारण रजत को इदं रूप से सन्निहित समझ लिया गया था, अब उस असन्निधानाग्रह का 'नेदं रजतम्'—इस प्रकार निषेध कर देने से वास्तविक असन्निधान (ज्ञाता पुरुष से दूर आपण में अवस्थान) सिद्ध होना चाहिए, अत्यन्त सन्निधान (विज्ञानरूप ज्ञाता पुरुष का आकार) क्योंकर स्थिर होगा? वस्तु-स्थिति यह है कि 'नेदं रजतम्'—यह निषेध न तो रजत का निषेधक है और न रजतगत इदन्ता का, किन्तु शुक्ति और रजत के भेदाग्रह के द्वारा आपादित 'रजतमिदम्'—इस प्रकार के व्यवहारमात्र का निषेधक होता है।

'इदं रजतम्'—इस ज्ञान के द्वारा रजत ही शुक्ति में अध्यस्त होता है'—यह कहना संगत नहीं, क्योंकि रजत-भासक ज्ञान का शुक्ति को आलम्बन (विषय) मानना अनुभव से विरुद्ध है। सदैव अनुभव यही बताता है कि जो ज्ञान जिस पदार्थ का भासक होता है, उस ज्ञान का वही आलम्बन होता है। शुक्ति उस देश में विद्यमान होने मात्र से रजत-ज्ञान का आलम्बन हो जायगी—ऐसा मानने पर यह अतिप्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है कि वहाँ विद्यमान सभी पदार्थ सभी ज्ञानों के विषय हो जायेंगे। 'रजत-ज्ञान का कारण होने से शुक्ति उसका आलम्बन है'—ऐसा मानने पर इन्द्रियादि भी रजत-ज्ञान के आलम्बन हो जायेंगे, क्योंकि वे भी उस ज्ञान के कारण हैं। अतः 'भासमानत्वमेवालम्बनत्वम्'—ऐसा ही आलम्बन का लक्षण करना चाहिए, जब 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति भासित नहीं हो रही, तब वह उसका आलम्बन क्योंकर होगी? अतः 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान की भासमानता शुक्ति में मानना अनुभव-विरुद्ध है।

दूसरी बात यह भी हैं कि ज्ञानोत्पादक इन्द्रियादि पदार्थों में समीचीन (प्रमा) ज्ञान

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७


भामती

जनने सामर्थ्यमुपलब्धमिति कथमेभ्यो मिथ्याज्ञानसम्भवः ? दोषसहितानां तेषां मिथ्याप्रत्ययेऽपि सामर्थ्य- मिति चेत्, न, दोषाणां कार्योपजननसामर्थ्यविघातमात्रे हेतुत्वात् । अन्यथा दुष्टादपि कुटजबीजाद् वटा- ङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । अपि च स्वगोचरव्यभिचारे विज्ञानानां सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गः । तस्मात् सर्वं ज्ञानं समीचीनमास्थेयम् । तथा च रजतमदमिति च द्वे विज्ञाने स्मृत्यनुभवरूपे तत्रेदमिति पुरोवर्त्तिद्रव्यमात्र- ग्रहणं दोषवशात् तद्गतशुक्तित्वसामान्यविशेषस्याग्रहणात् तन्मात्रं च गृहीतं सदृशतया संस्कारोद्बोधक्रमेण रजते स्मृतिं जनयति । सा च गृहीतग्रहणस्वभावापि दोषवशाद् गृहीतत्वांशप्रमोषाद् ग्रहणमात्रमवतिष्ठते । तथा च रजतस्मृतेः पुरोवर्त्तिद्रव्यमात्रग्रहणस्य च मिथः स्वरूपतो विषयतश्च भेदाग्रहात् सन्निहितरजत- गोचरज्ञानसारूप्येणेदं रजतमिति भिन्ने अपि स्मरणग्रहणे अभेदव्यवहारं च सामानाधिकरण्यव्यपदेशं च


भामती-व्याख्या

के उत्पादन का ही सामर्थ्य और स्वभाव पाया जाता है, उनसे मिथ्या ज्ञान की उत्पत्ति क्योंकर होगी ? यदि कहा जाय कि किसी दोष से युक्त हो जाने पर उन्हीं कारणों में मिथ्या ज्ञान के उत्पादन का सामर्थ्य आ जाता है । तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि दोष सदैव नैसर्गिक सामर्थ्य के घातक होते हैं, कार्यान्तर के जनक नहीं होते, अन्यथा कुटज (कुटवेर) के दुष्ट बीज से वट अङ्कुरित हो जाना चाहिए ।

'सभी ज्ञान नियमतः अपने विषय के ही भासक होते हैं'—इस नियम का यदि कहीं भी व्यभिचार माना जाता है, तब सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा, अतः सभी ज्ञानों को प्रमात्मक ही मानना चाहिए [ श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—

“यथार्थं सर्वमेवेह विज्ञानमिति सिद्धये ।
प्रभाकरगुरोर्भावः समीचीनः प्रकाश्यते ॥
अत्र ब्रूमो य एवार्थो यस्यां संविदि भासते ।
वेद्यः स एव नान्यद्धि विद्याद्वेद्यस्य लक्षणम् ॥
इदं रजतमित्यत्र रजतं चावभासते ।
तदेव तेन वेद्यं स्यान्न तु शुक्तिरवेदनात् ॥
तेनान्यस्यान्यथाभानं प्रतीत्यैव पराहतम् ।
परस्मिन् भासमाने हि परं भासते यतः ॥ ( प्र. पं. पृ. ४८ )
अहो बत महानेष प्रमादो धीमतामपि ।
ज्ञानस्य व्यभिचारे हि विश्वासः किंनिबन्धनः ॥ ( प्र. पं. पृ. ५९ ) ] ।

अख्यातिवाद के अनुसार 'इदं रजतम्'—यहाँ पर 'रजतम्'—यह ज्ञान स्मृति और 'इदम्'—यह ज्ञान अनुभवरूप है । 'इदम्'—इस ज्ञान के द्वारा पुरोवर्ती शुक्ति का केवल द्रव्यत्वेन सामान्य-ज्ञान मात्र होता है, नेत्रगत दोष के कारण शुक्तिकात्वरूप विशेष जाति का ग्रहण नहीं हो पाता । चमकीले द्रव्यमात्र के ग्रहण से वैसे ही चमकीले रजत द्रव्य के संस्कार उद्बुद्ध होकर रजत का स्मरण करा देते हैं । यद्यपि स्मृति ज्ञान गृहीतमात्र का ग्राहक होता है, अतः वहाँ भी 'रजतं स्मरामि' या 'तद् रजतम्'—ऐसा स्मरण होना चाहिए, तथापि दोष-वश गृहीतत्त्वादि अंशों का प्रमोष (विस्मरण) होकर वह स्मृतिज्ञान केवल ज्ञान के रूप में अवस्थित होता है । इस प्रकार 'रजत का स्मरण' और 'पुरोवर्ती द्रव्यमात्र का प्रत्यक्ष'—इन दोनों ज्ञानों के न तो स्वरूपों का भेद-भान होता है और न उनके विषयों का । वहाँ 'इदम्' और 'रजतम्'—ये दोनों ज्ञान वैसे ही अभेद-व्यवहार और सामानाधिकरण्य-बोधक 'इदं रजतम्'—इस प्रकार शब्द-प्रयोग के प्रवर्तक हो जाते हैं, जैसे, 'इदं रजतम्'—इस

२८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

प्रवर्त्तयतः ।

क्वचित् पुनर्गहण एव मिथोऽगृहीतभेदे, यथा पीतः शङ्ख इति । अत्र हि विनिर्गच्छन्नयनरश्मिवच्छिन्नः पित्तद्रव्यस्य काचस्येवातिस्वच्छस्य पीतत्वं गृह्यते पित्तं तु न गृह्यते, शङ्खोऽपि दोषवशात् शुक्लगुणरहितः स्वरूपमात्रेण गृह्यते । तदनयोर्गुणगुणिनोरसंसर्गाग्रहसारूप्यात् पीततपनीयपिण्डप्रत्ययाविशेषेणाभेदव्यवहारः सामानाधिकरण्यव्यपदेशश्च, भेदाग्रहप्रसञ्जिताभेदव्यवहारबाधनाच्च नेदमिति विवेकप्रत्ययस्य बाधकत्वमप्युपपद्यते, तदुपपत्तौ च प्राक्तनस्य प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वमपि लोकसिद्धं सिद्धं भवति । तस्माद्यथार्थाः सर्वे विप्रतिपन्नाः सन्देहविभ्रमाः प्रत्ययत्वात् घटादिप्रत्ययवत् । तदिदमुक्तं ॐ यदध्यास इति ॐ । यस्मिन् शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यास इति लोकप्रसिद्धिः नासावन्यथाख्यातिनिबन्धना, किन्तु गृहीतस्य रजतादेस्तत्स्मरणस्य च गृहीततांशप्रमोषेण गृहीतमात्रस्य य इदमिति पुरोऽवस्थिताद् द्रव्यमात्रात्तत्प्रज्ञानाच्च विवेकस्तदग्रहणनिबन्धनो भ्रमः । भ्रान्तत्वं च ग्रहणस्मरणयोरितरेतरसामानाधिकरण्यव्यपदेशो रजतादिव्यवहारश्चेति ।

भामती-व्याख्या

प्रकार का समीचीन ज्ञान, क्योंकि दोनों में असंसर्ग का अग्रह समान है।

कहीं-कहीं दो प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अगृहीतभेदक होकर वैसे ही व्यवहार के जनक हो जाते हैं, जैसे 'पीतः शङ्खः'—यहाँ पर गोलक से बाहर निकलती हुई अति स्वच्छ नेत्र-रश्मियाँ अपने साथ चिपके काँच के समान पारदर्शी पित्त द्रव्य का ग्रहण न करके उसके केवल पीत वर्ण का ग्रहण करती हैं। शङ्ख का शुक्ल वर्ण भी उसी दोष के कारण गृहीत न होकर केवल शङ्ख द्रव्य ही गृहीत होता है। पीत गुण और शङ्खरूप गुणी (द्रव्य) में वैसे ही अभेद-व्यवहार और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश प्रवृत्त हो जाता है, जैसे, 'पीतं स्वर्णपिण्डम्', 'पीतं बिल्वम्'—इत्यादि प्रमा ज्ञानों के द्वारा प्रवृत्त होता है, क्योंकि उन दोनों ज्ञानों में समीचीन ज्ञान का असंसर्गाग्रह रूप सादृश्य है। भेदाग्रह के द्वारा प्रापित उक्त अभेद-व्यवहार का बाध कर देने मात्र से 'नेदम्'—इस प्रकार के भेद-ज्ञान में बाधकत्व का भी निर्वाह हो जाता है। उसका निर्वाह हो जाने के कारण उससे पूर्ववर्ती 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में लोक-प्रसिद्ध भ्रमरूपता भी उपपन्न हो जाती है। फलतः सभी ज्ञानों में यथार्थत्व की सिद्धि पर्यवसित हो जाती है—'सर्वे विप्रतिपन्ना विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वाद्, घटादिप्रत्ययवत्' । इस अख्याति का लक्षण भाष्य में किया गया है—"यदध्यासः"। जिन शुक्त्यादि आधारों में जिन रजतादि का अध्यास लोक में प्रसिद्ध है, वह अन्यथा-ख्याति-प्रयुक्त नहीं, अपितु पूर्व-गृहीत और पश्चात् स्मर्यमाण रजतादि पदार्थों के गृहीतत्व धर्म का विस्मरण हो जाता है, अतः केवल रजतरूप धर्मी का जो पुरोवर्ती इदं पदार्थ से एवं स्मरणरूप रजत-ज्ञान का जो प्रत्यक्षात्मक इदमाकार ज्ञान से भेद है, उसका ग्रहण न होने के कारण भ्रम-व्यवहार हो जाता है। उसकी भ्रम-रूपता यही है, जो कि इदमाकार प्रत्यक्षज्ञान और रजताकार स्मरण ज्ञान की एकात्मता का भान और शुक्ति में रजत पद का प्रयोग होता है [श्रीशालिकनाथ मिश्र कहते हैं—

"नन्वेवं रजताभासः कथमेष घटिष्यति ।
उच्यते शुक्तिशकलं गृहीतं भेदवर्जितम् ॥
शुक्तिकाया विशेषा ये रजताद्भेदहेतवः ।
ते न ज्ञाता अभिभवाद् ज्ञाता सामान्यरूपतः ॥
अनन्तरं च रजते स्मृतिर्जाता तथापि च ।
मनोदोषात् तदित्यंशपरामर्शविवर्जितम् ॥

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९

भामती

अन्ये त्वत्राप्यपरितुष्यन्तो यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते। अत्रेवमाकूतम्—अस्ति तावद्रजतार्थिनो रजतमिदमिति प्रत्ययात् पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये प्रवृत्तिः सामानाधिकरण्यव्यपदेशश्चेति सर्वजनीनम्। तदेतन्न तावद् ग्रहणस्मरणयोस्तद्गोचरयोश्च मिथो भेदाग्रहमात्राद्भवितुमर्हति। ग्रहणनिबन्धनो हि चेतनस्य व्यवहारव्यपदेशौ कथमग्रहणमात्राद्भवेताम् ? ननूक्तं नाग्रहणमात्रात् किन्तु ग्रहणस्मरणे एव मिथः स्वरूपतो विषयतश्चागृहीतभेदे समीचीनपुरःस्थितरजतविज्ञानसादृश्येन अभेदव्यवहारं सामानाधिकरण्यव्यपदेशं च प्रवर्त्तयतः। अथ समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोर्गृह्यमाणं वा व्यवहारप्रवृत्तिहेतुरगृह्यमाणं वा सत्तामात्रेण ? गृह्यमाणत्वेऽपि समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोरिदमिति रजतमिति च ज्ञानयोरिति ग्रहणमथवा तयोरेव स्वरूपतो विषयतश्च मिथो भेदाग्रह इति ग्रहणम् ? तत्र न तावत्समीचीनज्ञानसदृशो इति ज्ञानं समीचीनज्ञानवद्व्यवहारप्रवर्त्तकम्। नहि गोसदृशो गवय इति ज्ञानं गवार्थिनं गवये प्रवर्त्तयति। अनयोरेव भेदाग्रह इति

भामती-व्याख्या

रजतं विषयीकृत्य नैव शुक्तेर्विवेचितम् ।
स्मृत्याऽतो रजताभास उपपन्नो भविष्यति ॥
ग्रहणस्मरणे चेमे विवेकानवभासिनी ।
सन्निहितरजतशकले रजतमतिर्भवति यादृशी सत्या ।
भेदानध्यवसायादियमपि तादृक् परिस्फुरति ॥
बाधकप्रत्ययस्यापि बाधकत्वमता मतम् ।
प्रसज्यमानरजतव्यवहारनिवारणात् ॥ (प्र० पं० पृ० ४९) ]।

( ३ ) अन्यथाख्याति—अन्य आचार्य कहते हैं कि जिस शुक्त्यादि पदार्थ में रजतादि का जो अध्यास होता है, वह शुक्ति में रजतत्वरूप विपरीत धर्म का आरोप है। इन आचार्यों का आशय यह है कि रजतार्थी पुरुष की 'रजतमिदम्'—इस प्रतीति के आधार पर पुरोवर्ती शुक्तिरूप द्रव्य में प्रवृत्ति होती है, केवल प्रवृत्ति ही नहीं, 'रजतमिदम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश भी होता है—यह सर्व-सम्मत तथ्य है। यह सब कुछ प्रत्यक्ष और स्मरण ज्ञानों और उनके विषयीभूत शुक्ति और रजतादि विषयों के पारस्परिक भेद के अग्रहण मात्र से सम्पादित नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन पुरुष की प्रत्येक क्रिया और शब्द-व्यवहार तभी सम्भव होते हैं, जब कि विषय वस्तु का ग्रहण (ज्ञान) हो जाय, अतः अग्रहण मात्र के बल पर पुरोदेश में प्रवृत्ति और 'इदं रजतम्'—ऐसा शब्द-प्रयोग क्योंकर होगा ? यह जो कहा जाता है कि केवल अग्रहण को ही प्रवृत्त्यादि का कारण नहीं माना जाता, अपितु रजत का स्मरण और इदं पदार्थ का ग्रहण (प्रत्यक्ष ज्ञान) ये दोनों ज्ञान ऐसे हैं कि जिन के न तो स्वरूपों का भेद-ग्रह होता है और न उनके विषयों का। इन दोनों ज्ञानों में 'रजत-मिदम्'—इस प्रकार के समीचीन ज्ञान का सारूप्य (असंसर्गाग्रह) भी है, अत एव ये दोनों ज्ञान शुक्ति और रजत के अभेद-व्यवहार एवं सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के प्रवर्तक माने जाते हैं। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि ('इदम्' और 'रजतम्') इन दोनों ज्ञानों में समीचीन ज्ञान का सादृश्य गृह्यमाण होकर उक्त व्यवहार का हेतु है? अथवा अगृह्यमाण होकर सत्तामात्र से ? गृह्यमाणत्व-पक्ष में भी 'समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोर्ज्ञानयोः'—इस प्रकार सादृश्य का ग्रहण माना जाता है ? या 'अनयोः ज्ञानयोः स्वरूपतो विषयतश्च भेदाग्रहः'—इस रीति से ग्रहण होता है ? प्रथम कल्प युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि किसी वस्तु में उसका सादृश्य-ज्ञान मात्र प्रवर्तक नहीं होता, अन्यथा गवय में 'गोसदृशोऽयम्'—इस प्रकार गौ का सादृश्य-बोध रहने के कारण गवय की ओर उस व्यक्ति की प्रवृत्ति होनी चाहिए, जो गौ चाहता है ! द्वितीय कल्प में जो

३०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

तु ज्ञानं पराहतं, नहि भेदाग्रहेऽनयोरिति भवति, अनयोरिति ग्रहे भेदाग्रहणमिति च भवति । तस्मात्सत्तामात्रेण भेदाग्रहोऽगृहीत एव व्यवहारहेतुरिति वक्तव्यम् । तत्र किमयमारोपोत्पादक्रमेण व्यवहारहेतुराहो अनुत्पादितारोप एव स्वत इति ? वयं तु पश्यामः—चेतनव्यवहारस्याज्ञानपूर्वकत्वानुपपत्तेरारोपज्ञानोत्पादक्रमेणैवेति । ननु सत्यं चेतनव्यवहारो नाज्ञानपूर्वकः किन्त्वविविक्तविवेकग्रहणस्मरणपूर्वक इति । मैवम्, नहि रजतप्रातिपदिकार्थमात्रस्मरणं प्रवृत्तावुपयुज्यते । इदङ्कारास्पदाभिमुखी खलु रजतार्थिनां प्रवृत्तिरित्यविवादम् । कथं चायमिदाङ्कारास्पदे प्रवर्त्तेत, यदि तु न तदिच्छेत् ? अन्यदिच्छत्यन्यत्करोतीति व्याहतम् । न चेदिदङ्कारास्पदं रजतमिति जानीयात् कथं रजतार्थी तदिच्छेत् ? यद्यतथात्वेनाग्रहणादिति ब्रूयात च प्रतिवक्तव्योऽथ तथात्वेनाग्रहणात् कस्मान्नोपेक्षेतेति ? सोऽयमुपादानोपेक्षाभ्यामभित आकृष्यमाणश्चेतनोऽव्यवस्थित इदङ्कारास्पदे रजतसमारोपेणोपादान एव व्यवस्थाप्यत इति भेदाग्रहः समारोपोत्पादक्रमेण चेतनप्रवृत्तिहेतुः । तथाहि—भेदाग्रहाद्विदङ्कारास्पदे रजतत्वं समारोप्य तज्जातीयस्योपकारहेतुभावमनुचिन्त्य तज्जातीयतयेदङ्कारास्पदे रजते तमनुमाय तदर्थी प्रवर्त्तते इत्यानुपूर्व्यं सिद्धम् । न च तटस्थरजत-

भामती-व्याख्या

कहा गया—'अनयोः भेदाग्रहः' । वह अत्यन्त विरुद्ध है, क्योंकि जिन पदार्थों में भेद-ग्रह नहीं, होता, उनके लिए 'अनयोः'—इस प्रकार द्विवचन का प्रयोग कैसे होगा ? यदि उनमें द्वित्व का निश्चय है, तब अनयोः का प्रयोग सम्भव हो जाने पर भी 'भेदाग्रह'—यह कहना विरुद्ध पड़ जाता है । फलतः भेदाग्रह स्वयं अगृहीत होकर सत्ता मात्र से व्यवहार का जनक है—ऐसा मानना होगा । तब जिज्ञासा होती है कि वह अज्ञात भेदाग्रह रजतादि का आरोप कराकर व्यवहार का हेतु होता है ? या रजतादि का आरोप कराए बिना ही अकेला रजार्थी का प्रवर्त्तक होता है ? वहाँ हमारा तो कहना यह है कि चेतन मनुष्य का व्यवहार केवल अग्रहण ( अज्ञान ) के आधार पर नहीं देखा जाता, अतः रजतादि का अवभास कराकर ही वह रजतार्थी का प्रवर्त्तक होगा ।

यह जो कहा जाता है कि यद्यपि चेतन पुरुष का कोई भी व्यवहार केवल अज्ञान से नहीं होता, तथापि कथित अगृहीतभेदक इदमाकार प्रत्यक्ष और रजताकार स्मरण—ये दोनों ज्ञान व्यवहार के निर्वाहक हो जाते हैं। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि प्रकृत में केवल 'रजत' पद के अर्थ का स्वतन्त्र ज्ञान प्रवृत्ति का साधक नहीं हो सकता, क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि रजतार्थी पुरुष की प्रवृत्ति इदंकारास्पद पदार्थ की ओर हो रही है । इदंकारास्पद पदार्थ की ओर उसकी प्रवृत्ति तभी बनेगी, जब कि उसे उसकी इच्छा होगी, क्योंकि अन्य वस्तु की इच्छा से अन्य वस्तु में प्रवृत्ति सम्भव नहीं । यदि इदंकारास्पद वस्तु को रजत न समझे, तब उसकी इच्छा ही क्यों होगा ? यदि अरजतरूपेण अग्रहण को प्रवर्त्तक माना जाता है, तब रजतरूपेण अग्रहण को रजतार्थी का निवर्तक मानना होगा । फलतः प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप विरोधी पदार्थों के आकर्षण में पड़ कर जब चेतन पुरुष किंकर्त्तव्य-विमूढ़ हो जाता है, तब रजतारोपपूर्वक ही भेदाग्रह उस पुरुष की प्रवृत्ति का व्यवस्थापक हो सकेगा ।

उसका क्रम इस प्रकार है कि भेदाग्रह से इदंकारास्पद पदार्थ में रजतत्वरूप धर्म का आरोप होता है, रजतजातीय पदार्थ की इष्ट-साधनता का स्मरण होता है, उसके पश्चात् इदंकारास्पदीभूत रजत में तज्जातीयत्वरूप हेतु के द्वारा इष्ट-साधनता का अनुमान होता है—'इदं मम ( रजतार्थिनः ) इष्टसाधनम्, रजतजातीयत्वाद्, आपणस्थरजतवत्' । तब रजतार्थी व्यक्ति पुरःस्थित द्रव्य की ओर प्रवृत्त होता है । इदंकारास्पद पदार्थ से भिन्न तटस्थ रजत की स्मृति इदंकारास्पद पदार्थ में इष्ट-साधनत्व का अनुमान नहीं करा सकती, क्योंकि 'इदं

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३१

भामती

स्मृतिरिवेद्वारास्पद्योपकारहेतुभावमनुमापयितुमर्हति, रजतत्वस्य हेतोरपक्षधर्मत्वात् । एकदेशदर्शनं खल्वनुमापकं न त्वनेकदेशदर्शनम् । यथाहूः—"ज्ञातसम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादिति" । समारोपे त्वेकदेशदर्शनमस्ति । तत्सिद्धमेतद्विवादाध्यासितं रजतादिज्ञानं पुरोवर्तितस्तुविषयं रजतार्थिनस्तत्र नियमेन प्रवर्त्तकत्वात् । यद्यदर्थिनं यत्र नियमेन प्रवर्त्तयति तज्ज्ञानं तद्विषयं, यथोभयसिद्धसमीचीनरजतज्ञानं, तथा चेदं, तस्मात्तथेति ।

यच्चोक्तमनवभासमानतया न शुक्तिरालम्बनमिति, तत्र भवान् पृष्टो व्याचष्टां, किं शुक्तिकात्वस्येवं रजतमिति ज्ञानं प्रत्यगालम्बनत्वमाहोस्विद् द्रव्यमात्रस्य पुरःस्थितस्य सितभास्वरस्य ? यदि शुक्तिकात्वस्यानालम्बनत्वम्, अद्धा । उत्तरस्यानालम्बनत्वं ब्रुवाणस्य तथैवानुभवविरोधः । तथाहि—रजतमिदमित्यनुभवन्ननुभविता पुरोवर्त्ति वस्त्वङ्गुल्यादिना निर्दिशति । दृष्टं च दुष्टानां कारणानामोत्सर्गिककार्य्यप्रतिबन्धेन कार्य्यान्तरोपजननसामर्थ्यम् , यथा दावाग्निदग्धानां वेत्रबीजानां कदलीकाण्डजनकत्वम्, भस्मकदुष्टस्य चौदर्य्यस्य तेजसो बह्वन्नपचनमिति । प्रत्यक्षबाधापहृतविषयं च विभ्रमाणां यथार्थत्वानुमान-


भामती-व्याख्या

मदिष्टसाधनम्, रजतत्वात्'—इस अनुमान का रजतत्त्व हेतु इदंकारास्पदंरूप पक्ष में न रह कर स्मर्यमाण तटस्थ रजत में रहता है, [ अतः प्रकृत अनुमान स्वरूपासिद्धि दोष से दूषित होने के कारण अपने साध्य की सिद्धि नहीं करा सकता ] । एकदेश ( पक्षवृत्तिहेतु ) का दर्शन ही अनुमिति का जनक माना जाता है, पक्ष से भिन्न देश में रहनेवाले हेतु का दर्शन नहीं, जैसा कि श्री शबरस्वामी कहते हैं—"अनुमानं ज्ञातसम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादेकदेशान्तरेऽसन्निकृष्टेऽर्थे बुद्धिः" ( शा, भा. पृ. ३६ ) [ पर्वत में अग्नि और धूम—दोनों एकदेशवृत्ति या ( समानाधिकरण या पक्षवृत्ति ) पदार्थ हैं ! उनमें धूमरूप एकदेशीय ( पक्षवृत्ति ) पदार्थ के द्वारा अग्निरूप दूसरे एकदेशीय ( पक्षवृत्ति ) पदार्थ का जो ज्ञान होता है, वही अनुमान हैं ] । जब पुरोवर्ती द्रव्य में रजतत्व का समारोप हो जाता हैं, तब 'रजतत्व' हेतु पक्षवृत्ति हो जाता है । अतः यह अनुमान फलित होता है कि ( १ ) 'एतद्विवादास्पदाध्यस्तरजतादिज्ञानं, पुरोवर्तितस्तुविषयम्, ( २ ) रजतार्थिनस्तत्र नियमेन प्रवर्त्तकत्वाद्, ( ३ ) यज्ज्ञानं यदर्थिनं यत्र नियमेन प्रवर्त्तयति, तज्ज्ञानं तद्विषयं यथोभयसिद्धसमीचीनरजतज्ञानम्, ( ४ ) तथा चेदम्, (५) तस्मात्तथा' [ नैयायिकगण परार्थानुमान के पाँच अवयव मानते हैं—"प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः" ( न्या. सू. १।१।३२ ) । उन्हीं पाँच अवयवों का प्रयोग यहाँ किया है ] ।

अख्यातिवादियों का यह जो कहना है कि 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति अवभासित नहीं हो रही है, अतः इस ज्ञान का शुक्ति को विषय नहीं माना जा सकता । वहाँ जिज्ञासा होती है कि शुक्तित्व को उक्त ज्ञान का विषय नहीं माना जा सकता ? अथवा पुरोवर्ती भास्वर ( चमकीले ) द्रव्य मात्र को ? शुक्तित्व को तो उस ज्ञान का विषय हम भी नहीं मानते किन्तु सित भास्वर द्रव्यमात्र को उक्त ज्ञान का अविषय मानना अनुभव-विरुद्ध है, क्योंकि 'रजतमिदम्'—इस प्रकार अनुभव करनेवाला व्यक्ति पुरोवर्ती द्रव्य को ही उँगली से दिखाता है कि यह रजत है । दोषपूर्ण नेत्र के द्वारा शुक्ति में रजत का दर्शन असम्भव नहीं । यह जो कहा गया कि दोष सदैव नियत शक्ति का विघातक ही होता है, कार्यान्तर-जनन शक्ति का जनक नहीं होता । वह कहना भी अनुचित है, क्योंकि दोषों में कार्यान्तरोपजनन शक्ति की जनकता भी देखी जाती है, जैसे—दावाग्नि ( वन में बाँसादि की रगड़ से पैदा हुई आग ) में जले हुए बेत के बीजों से केले का अङ्कुर उत्पन्न होता है, इसी प्रकार पेट में भस्मक रोग से ग्रस्त जठराग्नि में अधिक अन्न-पचन की शक्ति देखी जाती है ।

३२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

निबन्धनो भ्रम इति । अन्ये तु-यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते इति । सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति । तथा च लोकेऽ-

भामती

माभासो हुतवहानुष्णत्वानुमानवत् । यच्चोक्तं मिथ्याप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वप्रमाणेष्वनाश्वास इति । तद्बोधकत्वेन स्वतः प्रामाण्यं नाव्‍यभिचारेणेति व्युत्पाद्योद्दूरमस्माभिः परिहृतं न्यायकणिकायामिति नेह प्रतन्यते । दिङ्मात्रं चास्य स्मृतिप्रमोषभङ्गस्योक्तम् । विस्तरस्तु ब्रह्मतत्त्वसमीक्षायामवगन्तव्य इति तदिदमुक्तम् ॐ अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते इति ॐ । यत्र शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यासस्तस्यैव शुक्तिकादेर्विपरीतधर्मकल्पनं रजतत्वधर्मकल्पनमिति योजना । ननु सन्तु नाम परीक्षकाणां विप्रतिपत्तयः प्रकृते तु किमायातमित्यत आह ॐ सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभि-

भामती-व्याख्या

सभी भ्रम ज्ञानों में जो यथार्थत्व का अनुमान किया जाता है—'विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वात्' । वह अनुमान अग्नि में अनुष्णत्व-साधक अनुमान के समान ही प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है, क्योंकि इदं रजतमित्यादि ज्ञानों में तदभाववति तत्प्रकारकत्वरूप अयथार्थत्व प्रत्यक्षतः सिद्ध है । यह जो कहा गया कि यदि किसी ज्ञान को विषय-व्यभिचारी माना गया तो सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा । वह संगत नहीं, क्योंकि ज्ञानगत प्रामाण्य स्वतः होता है, अव्यभिचार-प्रयुक्त नहीं । जब कि ज्ञान स्वभावतः विषय-प्रकाशक है, तब अबोधकत्व-रूप अप्रामाण्य उसमें रह ही कैसे सकता है—यह सब कुछ न्यायकणिका में कहा गया है । यहाँ तो उसका दिग्दर्शनमात्र कराया गया है, विस्तार ब्रह्मसिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में किया गया है । [न्यायकणिका में अनाश्वासापत्ति का प्रतीकार करते हुए कहा गया है— "यत्तूक्तमनाश्वासादिति तदन्यत्र ( ब्र. सि. पृ. १४४ ) आचार्येण—

बोधादेव प्रमाणत्वमिति मीमांसकस्थितिम् ।
विदन्नव्यभिचारेण तां व्युदस्यत्यपण्डितः ॥

इत्यादिना प्रबन्धेन दूषितमिति नेह दूषितम् । तथापि दूषणकणिकेह सूच्यते—किमव्यभिचारित्वैव प्रामाण्यम् ? अथ तत्कारणम् ? तद्व्यापिका वा ? येन क्वचिद् व्यभिचारदर्शनात् तदभावे सति ज्ञानमात्रेऽनाश्वासः स्यात् । न तावदव्यभिचारितैव प्रामाण्यम्, अव्यभिचारिणामपि वह्न्यादौ धूमादीनां कुतश्चिन्निमित्तादनुपजनितकृशानुप्रत्ययानामप्रामाण्यं स्यात् । व्यभिचारिणामपि चक्षुरादीनां नीलादिभेदे तद्विषयज्ञानहेतूनां प्रामाण्यमिति साम्प्रतम्, प्रमितिक्रिया प्रति साधकतमत्वाभावसम्भवात्, अन्यथा काष्ठादीनामपि पाकादावपि असाधनत्वप्रसङ्गात्" ( न्या. क. पृ. १६२ ) इसी प्रकार अन्य पक्षों का भी खण्डन किया गया है । ब्रह्मसिद्धि में मण्डन मिश्र ने इस वाद का विस्तारपूर्वक निरास किया है, अतः उसकी व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में अवश्य पूर्ण विस्तार किया गया होगा, किन्तु इस समय तक वह कहीं उपलब्ध नहीं हुई है ] ।

भाष्यकार ने अन्यथाख्याति का स्वरूप बताया है—"अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते" । जिस (शुक्त्यादि) में जिस (रजतादि) का अध्यास लोक-प्रसिद्ध है, वह शुक्त्यादि में विपरीत (स्वावृत्ति) रजतत्व धर्म की कल्पना है [न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका में श्री वाचस्पति मिश्र ने कहा है—"कस्मात् पुनरयं शुक्तौ रजतार्थी प्रवर्तते न पुनः रजताभावे ? कस्माच्चेदं पुरोवर्तिद्रव्यमङ्गुल्या निर्दिश्य रजतत्वं निषेधति—नेदं रजतमिति, यदि तत्र न प्रसञ्जितं रजतत्वं पूर्वविज्ञानेन" (ता. टी. १।२।१) ]

परीक्षक विद्वानों के विवाद का पर्यवसित अर्थ बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३३

नुभवः–शुक्तिका हि रजतवदवभासते, एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति । कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ? सर्वो हि पुरोऽवस्थिते

भामती

चरति ॐ । अन्यस्यान्यधर्मकल्पनानृतता, सा चानिर्वचनीयतेत्यधस्तादुपपादितम् । तेन सर्वेषामेव परीक्षकाणां मतेऽन्यस्यान्यधर्मकल्पनानिर्वचनीयताऽवश्यम्भाविनीत्यनिर्वचनीयता सर्वतन्त्राविरुद्धोऽर्थ इत्यर्थः । अख्यातिवादिभिरकामैरपि सामानाधिकरण्यव्यपदेशप्रवृत्तिनियमस्नेहादिदमभ्युपेयमिति भावः । न केवलमियमनृतता परीक्षकाणां सिद्धाऽपितु लौकिकानामपीत्याह । ॐ तथा च लोकेऽनुभवः । शुक्तिका हि रजतवदवभासत इति ॐ । न पुना रजतमिदमिति शेषः । स्यादेतत्–अन्यस्यान्यात्मताविभ्रमो लोकसिद्धः, एकस्य त्वभिन्नस्य भेदभ्रमो न दृष्ट इति कुतश्चिदात्मनोऽभिन्नानां जीवानां भेदविभ्रम इत्यत आह ॐ एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति ॐ ।

पुनरपि चिदात्मन्यध्यासमाक्षिपति ॐ कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ॐ । अयमर्थः–चिदात्मा प्रकाशते न वा ? न चेत् प्रकाशते, कथमस्मिन्नध्यासो विषयतद्धर्माणाम् । न खल्वप्रतिभासमाने पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये रजतस्य वा तद्धर्माणां वा समारोपः सम्भवतीति । प्रतिभासे वा न तावदयमात्माऽजड़ो घटादिवत् पराधीनप्रकाश इति युक्तम् । न खलु स एव कर्ता च कर्म च भवति, विरोधात्, परसमवेतक्रियाफलशालि हि कर्म, न च ज्ञानक्रिया परसमवायिनीति कथमस्यां कर्म ? न च तदेव

भामती–व्याख्या

“सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति”। अन्य वस्तु में अन्यरूपता की कल्पना ही अनृतता है, अनृतता का अर्थ अनिर्वचनीयता है—यह पहले कहा जा चुका है। सभी दार्शनिकों के मत में अन्यत्रान्यधर्मकल्पना या अनिर्वचनीयता अवश्यंभाविनी है, अतः अनिर्वचनीयता एक सर्वतन्त्र-सिद्धान्त है [ जिसका लक्षण करते हुए न्यायसूत्रकार कहते हैं—“सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः” (न्या. सू. १।१।२८) सभी दर्शनों से अविरुद्ध सिद्धान्त सर्वतन्त्रसिद्धान्त कहा जाती है ]। अख्यातिवादी प्राभाकरगणों को विवश होकर पुरोवर्ती द्रव्य में प्रवृत्ति और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के आधार पर यह भ्रमरूपता माननी होगी । पूर्व-निरूपित अनृतता केवल परीक्षक विद्वानों तक ही सीमित नहीं, अपितु लोक-प्रसिद्ध भी है—“तथा च लोकेऽनुभवः 'शुक्तिका हि रजतवदवभासते इति”। 'रजतमिदम्'—ऐसा लोक में अनुभव नहीं होता, अपितु 'शुक्तिका रजतवदवभासते'—ऐसा ही अनुभव होता है ।

यह जो शङ्का होती है कि लोक में अन्य वस्तु में अन्यरूपतात्मक विभ्रम तो प्रसिद्ध है, किन्तु एक अभिन्न तत्त्व में भेद-भ्रम नहीं देखा जाता, अतः एक चित्तत्त्व में अभिन्न जीवों का भेद-भ्रम क्योंकर होगा ? उस शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—“एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति”। जैसे एक चन्द्र में द्वित्वादि का भ्रम हो जाता है, वैसे ही एक ब्रह्म में अनेक जीवरूपता का भ्रम हो जाता है ।

अध्यास पर पुनः आक्षेप—चिदात्मा के अध्यास पर पुनः आक्षेप किया जाता है— “कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ?” आक्षेपवादी का अभिप्राय यह है कि चिदात्मा प्रकाशित होता है ? या नहीं ? यदि वह प्रकाशित नहीं होता, तब उसमें विषय और उसके धर्मों का अध्यास कैसे होगा ? क्योंकि जो शुक्ति प्रतीयमान नहीं, उसमें कभी भी रजत और उसके धर्मों का आरोप नहीं होता । यदि आत्मा प्रकाशित होता है, तब जिज्ञासा होती है कि उसका प्रकाशक कौन ? यदि कहा जाय कि आत्मा अजड़ चैतन्यरूप है, अतः घटादि के समान उसका प्रकाश अन्य किसी के द्वारा सम्भव नहीं, अतः आत्मा स्वयं अपना प्रकाशक है । तब वही प्रकाशक ( प्रकाश का कर्त्ता ) और वही प्रकाश्य ( प्रकाश का

३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]


भामती

स्वं च परं च, विरोधात् । आत्मान्तरसमवायाभ्युपगमे तु ज्ञेयस्यात्मनोऽनात्मत्वप्रसङ्गः । एवं तस्य तस्ये- त्यनवस्थाप्रसङ्गः ।

स्यादेतत् । आत्मा जडोऽपि सर्वार्थज्ञानेषु भासमानोऽपि कतैव न कर्म, परसमवेतक्रियाफल- शालित्वाभावात्, चैत्रवत् । यथा हि चैत्रसमवेतक्रियया चैत्रनगरप्राप्तावुभयसमवेतायामपि क्रियमाणायां नगरस्यैव कर्मता परसमवेतक्रियाफलशालित्वात् । न तु चैत्रस्य क्रियाफलशालिनोऽपि, चैत्रसमवायाद्ग- मनक्रियाया इति । तन्न, श्रुतिविरोधात् । श्रूयते हि “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति । उपपद्यते च । तथाहि—योऽयमर्थप्रकाशः फलं यस्मिन्नर्थश्च आत्मा च प्रथेते स किं जडः, स्वयम्प्रकाशो वा ? जडश्चे- द्विषयात्मानावपि जडाविति कस्मिन् किं प्रकाशेताविशेषात्, इति प्राप्तमान्ध्यमशेषस्य जगतः । तथा चाभाणकः—'अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे' । न च निलीनमेव विज्ञानमर्थात्मानौ ज्ञापयति

भामती-व्याख्या

कर्म ) हो—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि कर्मकारक सदैव कर्त्ता से भिन्न होता है, 'देवदत्तः ग्रामं गच्छति'—यहाँ पर ग्रामरूप कर्मकारक से भिन्न देवदत्त की गमन क्रिया से जो देवदत्त और ग्राम का संयोगरूप फल होता है, उस संयोग का आश्रय होने के कारण ग्राम को कर्म कहा जाता है, किन्तु 'आत्मा आत्मानं प्रकाशयति'—यहाँ पर प्रकाश क्रिया कर्मरूप आत्मा से भिन्न पदार्थ में नहीं रहती, फलतः कर्तृत्व और कर्मत्व का एक आधार में रहना सर्वथा विरुद्ध है, वही आत्मा स्व भी हो और पर भी—यह क्योंकर सम्भव होगा ? यदि आत्मा का प्रकाश अन्य किसी आत्मा से माना जाता है, तब प्रकाश्य भूत ( ज्ञेय या वेद्य ) आत्मा जड़ और अनात्मरूप हो जायगा एवं अन्यान्य प्रकाशक-परम्परा की कल्पना में अनवस्था भी होती है ।

यह जो कहा जाता है कि यद्यपि आत्मा अजड़ और सभी पदार्थों के ज्ञानों में भासमान है, तथापि वह कर्त्ता ही माना जाता है, कर्म नहीं, क्योंकि वह पर-समवेत क्रिया से जनित फल का आश्रय नहीं, जैसे—चैत्र । 'चैत्रो नगरं गच्छति'—यहाँ चैत्र-समवेत गमनरूप क्रिया से जनित जो फल है—चैत्र और नगर का संयोग, उस संयोग के यद्यपि चैत्र और नगर— दोनों आश्रय हैं, तथापि कर्मता नगर में ही घटती है, चैत्र में नहीं, क्योंकि वह गमन क्रिया जिस चैत्र में समवेत ( समवायसम्बन्धेन वृत्ति ) है, वह नगर से भिन्न है, अपने से नहीं, अतः पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय होने से नगर ही कर्म बनता है, चैत्र नहीं, क्योंकि वह स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय नहीं । इसी प्रकार आत्मा भी स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, अतः वह चैत्र के समान कर्त्ता ही होता है, कर्म नहीं ।

वह कहना उचित नहीं, क्योंकि श्रुति कहती है कि वह किसी भी प्रकाश से प्रकाशित [ प्रकाश क्रिया-जन्य फल का आश्रय ] नहीं—'अगृह्यो न हि गृह्यते' ( बृ. उ. ३।६।२६ ), “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” ( तै. उ. २।१।१ ) । युक्ति-युक्त भी यही है, क्योंकि जो यह अर्थ- प्रकाशरूप फल है, जिसके होने पर अर्थ ( विषय ) और आत्मा—दोनों भासित होते हैं, वह क्या जड़ है ? अथवा स्वयंप्रकाश ? यदि जड़ है, तब विषय और आत्मा तो पहले ही जड़ हैं, फिर किससे कौन प्रकाशित होगा ? विषय भी अन्य प्रकाश से प्रकाशनीय होने के कारण जड़ और आत्मा भी वैसा ही, दोनों में कोई विशेषता नहीं कि एक से दूसरे का प्रकाश हो जाता । परिशेषतः जगत् सर्वथा प्रकाश-शून्य अन्धकारमय बन कर रह जायगा, जैसी कि कहावत प्रसिद्ध है—“अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे ।” अन्धे बैल की पूँछ पकड़ कर अन्धे व्यक्ति चल पड़े, स्थान-स्थान पर गर्त-पात होना ही था । अर्थ और आत्मा का