भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३१
भामती
स्मृतिरिवेद्वारास्पद्योपकारहेतुभावमनुमापयितुमर्हति, रजतत्वस्य हेतोरपक्षधर्मत्वात् । एकदेशदर्शनं खल्वनुमापकं न त्वनेकदेशदर्शनम् । यथाहूः—"ज्ञातसम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादिति" । समारोपे त्वेकदेशदर्शनमस्ति । तत्सिद्धमेतद्विवादाध्यासितं रजतादिज्ञानं पुरोवर्तितस्तुविषयं रजतार्थिनस्तत्र नियमेन प्रवर्त्तकत्वात् । यद्यदर्थिनं यत्र नियमेन प्रवर्त्तयति तज्ज्ञानं तद्विषयं, यथोभयसिद्धसमीचीनरजतज्ञानं, तथा चेदं, तस्मात्तथेति ।
यच्चोक्तमनवभासमानतया न शुक्तिरालम्बनमिति, तत्र भवान् पृष्टो व्याचष्टां, किं शुक्तिकात्वस्येवं रजतमिति ज्ञानं प्रत्यगालम्बनत्वमाहोस्विद् द्रव्यमात्रस्य पुरःस्थितस्य सितभास्वरस्य ? यदि शुक्तिकात्वस्यानालम्बनत्वम्, अद्धा । उत्तरस्यानालम्बनत्वं ब्रुवाणस्य तथैवानुभवविरोधः । तथाहि—रजतमिदमित्यनुभवन्ननुभविता पुरोवर्त्ति वस्त्वङ्गुल्यादिना निर्दिशति । दृष्टं च दुष्टानां कारणानामोत्सर्गिककार्य्यप्रतिबन्धेन कार्य्यान्तरोपजननसामर्थ्यम् , यथा दावाग्निदग्धानां वेत्रबीजानां कदलीकाण्डजनकत्वम्, भस्मकदुष्टस्य चौदर्य्यस्य तेजसो बह्वन्नपचनमिति । प्रत्यक्षबाधापहृतविषयं च विभ्रमाणां यथार्थत्वानुमान-
भामती-व्याख्या
मदिष्टसाधनम्, रजतत्वात्'—इस अनुमान का रजतत्त्व हेतु इदंकारास्पदंरूप पक्ष में न रह कर स्मर्यमाण तटस्थ रजत में रहता है, [ अतः प्रकृत अनुमान स्वरूपासिद्धि दोष से दूषित होने के कारण अपने साध्य की सिद्धि नहीं करा सकता ] । एकदेश ( पक्षवृत्तिहेतु ) का दर्शन ही अनुमिति का जनक माना जाता है, पक्ष से भिन्न देश में रहनेवाले हेतु का दर्शन नहीं, जैसा कि श्री शबरस्वामी कहते हैं—"अनुमानं ज्ञातसम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादेकदेशान्तरेऽसन्निकृष्टेऽर्थे बुद्धिः" ( शा, भा. पृ. ३६ ) [ पर्वत में अग्नि और धूम—दोनों एकदेशवृत्ति या ( समानाधिकरण या पक्षवृत्ति ) पदार्थ हैं ! उनमें धूमरूप एकदेशीय ( पक्षवृत्ति ) पदार्थ के द्वारा अग्निरूप दूसरे एकदेशीय ( पक्षवृत्ति ) पदार्थ का जो ज्ञान होता है, वही अनुमान हैं ] । जब पुरोवर्ती द्रव्य में रजतत्व का समारोप हो जाता हैं, तब 'रजतत्व' हेतु पक्षवृत्ति हो जाता है । अतः यह अनुमान फलित होता है कि ( १ ) 'एतद्विवादास्पदाध्यस्तरजतादिज्ञानं, पुरोवर्तितस्तुविषयम्, ( २ ) रजतार्थिनस्तत्र नियमेन प्रवर्त्तकत्वाद्, ( ३ ) यज्ज्ञानं यदर्थिनं यत्र नियमेन प्रवर्त्तयति, तज्ज्ञानं तद्विषयं यथोभयसिद्धसमीचीनरजतज्ञानम्, ( ४ ) तथा चेदम्, (५) तस्मात्तथा' [ नैयायिकगण परार्थानुमान के पाँच अवयव मानते हैं—"प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः" ( न्या. सू. १।१।३२ ) । उन्हीं पाँच अवयवों का प्रयोग यहाँ किया है ] ।
अख्यातिवादियों का यह जो कहना है कि 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति अवभासित नहीं हो रही है, अतः इस ज्ञान का शुक्ति को विषय नहीं माना जा सकता । वहाँ जिज्ञासा होती है कि शुक्तित्व को उक्त ज्ञान का विषय नहीं माना जा सकता ? अथवा पुरोवर्ती भास्वर ( चमकीले ) द्रव्य मात्र को ? शुक्तित्व को तो उस ज्ञान का विषय हम भी नहीं मानते किन्तु सित भास्वर द्रव्यमात्र को उक्त ज्ञान का अविषय मानना अनुभव-विरुद्ध है, क्योंकि 'रजतमिदम्'—इस प्रकार अनुभव करनेवाला व्यक्ति पुरोवर्ती द्रव्य को ही उँगली से दिखाता है कि यह रजत है । दोषपूर्ण नेत्र के द्वारा शुक्ति में रजत का दर्शन असम्भव नहीं । यह जो कहा गया कि दोष सदैव नियत शक्ति का विघातक ही होता है, कार्यान्तर-जनन शक्ति का जनक नहीं होता । वह कहना भी अनुचित है, क्योंकि दोषों में कार्यान्तरोपजनन शक्ति की जनकता भी देखी जाती है, जैसे—दावाग्नि ( वन में बाँसादि की रगड़ से पैदा हुई आग ) में जले हुए बेत के बीजों से केले का अङ्कुर उत्पन्न होता है, इसी प्रकार पेट में भस्मक रोग से ग्रस्त जठराग्नि में अधिक अन्न-पचन की शक्ति देखी जाती है ।