भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

निबन्धनो भ्रम इति । अन्ये तु-यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते इति । सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति । तथा च लोकेऽ-

भामती

माभासो हुतवहानुष्णत्वानुमानवत् । यच्चोक्तं मिथ्याप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वप्रमाणेष्वनाश्वास इति । तद्बोधकत्वेन स्वतः प्रामाण्यं नाव्‍यभिचारेणेति व्युत्पाद्योद्दूरमस्माभिः परिहृतं न्यायकणिकायामिति नेह प्रतन्यते । दिङ्मात्रं चास्य स्मृतिप्रमोषभङ्गस्योक्तम् । विस्तरस्तु ब्रह्मतत्त्वसमीक्षायामवगन्तव्य इति तदिदमुक्तम् ॐ अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते इति ॐ । यत्र शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यासस्तस्यैव शुक्तिकादेर्विपरीतधर्मकल्पनं रजतत्वधर्मकल्पनमिति योजना । ननु सन्तु नाम परीक्षकाणां विप्रतिपत्तयः प्रकृते तु किमायातमित्यत आह ॐ सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभि-

भामती-व्याख्या

सभी भ्रम ज्ञानों में जो यथार्थत्व का अनुमान किया जाता है—'विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वात्' । वह अनुमान अग्नि में अनुष्णत्व-साधक अनुमान के समान ही प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है, क्योंकि इदं रजतमित्यादि ज्ञानों में तदभाववति तत्प्रकारकत्वरूप अयथार्थत्व प्रत्यक्षतः सिद्ध है । यह जो कहा गया कि यदि किसी ज्ञान को विषय-व्यभिचारी माना गया तो सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा । वह संगत नहीं, क्योंकि ज्ञानगत प्रामाण्य स्वतः होता है, अव्यभिचार-प्रयुक्त नहीं । जब कि ज्ञान स्वभावतः विषय-प्रकाशक है, तब अबोधकत्व-रूप अप्रामाण्य उसमें रह ही कैसे सकता है—यह सब कुछ न्यायकणिका में कहा गया है । यहाँ तो उसका दिग्दर्शनमात्र कराया गया है, विस्तार ब्रह्मसिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में किया गया है । [न्यायकणिका में अनाश्वासापत्ति का प्रतीकार करते हुए कहा गया है— "यत्तूक्तमनाश्वासादिति तदन्यत्र ( ब्र. सि. पृ. १४४ ) आचार्येण—

बोधादेव प्रमाणत्वमिति मीमांसकस्थितिम् ।
विदन्नव्यभिचारेण तां व्युदस्यत्यपण्डितः ॥

इत्यादिना प्रबन्धेन दूषितमिति नेह दूषितम् । तथापि दूषणकणिकेह सूच्यते—किमव्यभिचारित्वैव प्रामाण्यम् ? अथ तत्कारणम् ? तद्व्यापिका वा ? येन क्वचिद् व्यभिचारदर्शनात् तदभावे सति ज्ञानमात्रेऽनाश्वासः स्यात् । न तावदव्यभिचारितैव प्रामाण्यम्, अव्यभिचारिणामपि वह्न्यादौ धूमादीनां कुतश्चिन्निमित्तादनुपजनितकृशानुप्रत्ययानामप्रामाण्यं स्यात् । व्यभिचारिणामपि चक्षुरादीनां नीलादिभेदे तद्विषयज्ञानहेतूनां प्रामाण्यमिति साम्प्रतम्, प्रमितिक्रिया प्रति साधकतमत्वाभावसम्भवात्, अन्यथा काष्ठादीनामपि पाकादावपि असाधनत्वप्रसङ्गात्" ( न्या. क. पृ. १६२ ) इसी प्रकार अन्य पक्षों का भी खण्डन किया गया है । ब्रह्मसिद्धि में मण्डन मिश्र ने इस वाद का विस्तारपूर्वक निरास किया है, अतः उसकी व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में अवश्य पूर्ण विस्तार किया गया होगा, किन्तु इस समय तक वह कहीं उपलब्ध नहीं हुई है ] ।

भाष्यकार ने अन्यथाख्याति का स्वरूप बताया है—"अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते" । जिस (शुक्त्यादि) में जिस (रजतादि) का अध्यास लोक-प्रसिद्ध है, वह शुक्त्यादि में विपरीत (स्वावृत्ति) रजतत्व धर्म की कल्पना है [न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका में श्री वाचस्पति मिश्र ने कहा है—"कस्मात् पुनरयं शुक्तौ रजतार्थी प्रवर्तते न पुनः रजताभावे ? कस्माच्चेदं पुरोवर्तिद्रव्यमङ्गुल्या निर्दिश्य रजतत्वं निषेधति—नेदं रजतमिति, यदि तत्र न प्रसञ्जितं रजतत्वं पूर्वविज्ञानेन" (ता. टी. १।२।१) ]

परीक्षक विद्वानों के विवाद का पर्यवसित अर्थ बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—