भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३३

नुभवः–शुक्तिका हि रजतवदवभासते, एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति । कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ? सर्वो हि पुरोऽवस्थिते

भामती

चरति ॐ । अन्यस्यान्यधर्मकल्पनानृतता, सा चानिर्वचनीयतेत्यधस्तादुपपादितम् । तेन सर्वेषामेव परीक्षकाणां मतेऽन्यस्यान्यधर्मकल्पनानिर्वचनीयताऽवश्यम्भाविनीत्यनिर्वचनीयता सर्वतन्त्राविरुद्धोऽर्थ इत्यर्थः । अख्यातिवादिभिरकामैरपि सामानाधिकरण्यव्यपदेशप्रवृत्तिनियमस्नेहादिदमभ्युपेयमिति भावः । न केवलमियमनृतता परीक्षकाणां सिद्धाऽपितु लौकिकानामपीत्याह । ॐ तथा च लोकेऽनुभवः । शुक्तिका हि रजतवदवभासत इति ॐ । न पुना रजतमिदमिति शेषः । स्यादेतत्–अन्यस्यान्यात्मताविभ्रमो लोकसिद्धः, एकस्य त्वभिन्नस्य भेदभ्रमो न दृष्ट इति कुतश्चिदात्मनोऽभिन्नानां जीवानां भेदविभ्रम इत्यत आह ॐ एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति ॐ ।

पुनरपि चिदात्मन्यध्यासमाक्षिपति ॐ कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ॐ । अयमर्थः–चिदात्मा प्रकाशते न वा ? न चेत् प्रकाशते, कथमस्मिन्नध्यासो विषयतद्धर्माणाम् । न खल्वप्रतिभासमाने पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये रजतस्य वा तद्धर्माणां वा समारोपः सम्भवतीति । प्रतिभासे वा न तावदयमात्माऽजड़ो घटादिवत् पराधीनप्रकाश इति युक्तम् । न खलु स एव कर्ता च कर्म च भवति, विरोधात्, परसमवेतक्रियाफलशालि हि कर्म, न च ज्ञानक्रिया परसमवायिनीति कथमस्यां कर्म ? न च तदेव

भामती–व्याख्या

“सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति”। अन्य वस्तु में अन्यरूपता की कल्पना ही अनृतता है, अनृतता का अर्थ अनिर्वचनीयता है—यह पहले कहा जा चुका है। सभी दार्शनिकों के मत में अन्यत्रान्यधर्मकल्पना या अनिर्वचनीयता अवश्यंभाविनी है, अतः अनिर्वचनीयता एक सर्वतन्त्र-सिद्धान्त है [ जिसका लक्षण करते हुए न्यायसूत्रकार कहते हैं—“सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः” (न्या. सू. १।१।२८) सभी दर्शनों से अविरुद्ध सिद्धान्त सर्वतन्त्रसिद्धान्त कहा जाती है ]। अख्यातिवादी प्राभाकरगणों को विवश होकर पुरोवर्ती द्रव्य में प्रवृत्ति और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के आधार पर यह भ्रमरूपता माननी होगी । पूर्व-निरूपित अनृतता केवल परीक्षक विद्वानों तक ही सीमित नहीं, अपितु लोक-प्रसिद्ध भी है—“तथा च लोकेऽनुभवः 'शुक्तिका हि रजतवदवभासते इति”। 'रजतमिदम्'—ऐसा लोक में अनुभव नहीं होता, अपितु 'शुक्तिका रजतवदवभासते'—ऐसा ही अनुभव होता है ।

यह जो शङ्का होती है कि लोक में अन्य वस्तु में अन्यरूपतात्मक विभ्रम तो प्रसिद्ध है, किन्तु एक अभिन्न तत्त्व में भेद-भ्रम नहीं देखा जाता, अतः एक चित्तत्त्व में अभिन्न जीवों का भेद-भ्रम क्योंकर होगा ? उस शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—“एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति”। जैसे एक चन्द्र में द्वित्वादि का भ्रम हो जाता है, वैसे ही एक ब्रह्म में अनेक जीवरूपता का भ्रम हो जाता है ।

अध्यास पर पुनः आक्षेप—चिदात्मा के अध्यास पर पुनः आक्षेप किया जाता है— “कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ?” आक्षेपवादी का अभिप्राय यह है कि चिदात्मा प्रकाशित होता है ? या नहीं ? यदि वह प्रकाशित नहीं होता, तब उसमें विषय और उसके धर्मों का अध्यास कैसे होगा ? क्योंकि जो शुक्ति प्रतीयमान नहीं, उसमें कभी भी रजत और उसके धर्मों का आरोप नहीं होता । यदि आत्मा प्रकाशित होता है, तब जिज्ञासा होती है कि उसका प्रकाशक कौन ? यदि कहा जाय कि आत्मा अजड़ चैतन्यरूप है, अतः घटादि के समान उसका प्रकाश अन्य किसी के द्वारा सम्भव नहीं, अतः आत्मा स्वयं अपना प्रकाशक है । तब वही प्रकाशक ( प्रकाश का कर्त्ता ) और वही प्रकाश्य ( प्रकाश का