भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]
भामती
स्वं च परं च, विरोधात् । आत्मान्तरसमवायाभ्युपगमे तु ज्ञेयस्यात्मनोऽनात्मत्वप्रसङ्गः । एवं तस्य तस्ये- त्यनवस्थाप्रसङ्गः ।
स्यादेतत् । आत्मा जडोऽपि सर्वार्थज्ञानेषु भासमानोऽपि कतैव न कर्म, परसमवेतक्रियाफल- शालित्वाभावात्, चैत्रवत् । यथा हि चैत्रसमवेतक्रियया चैत्रनगरप्राप्तावुभयसमवेतायामपि क्रियमाणायां नगरस्यैव कर्मता परसमवेतक्रियाफलशालित्वात् । न तु चैत्रस्य क्रियाफलशालिनोऽपि, चैत्रसमवायाद्ग- मनक्रियाया इति । तन्न, श्रुतिविरोधात् । श्रूयते हि “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति । उपपद्यते च । तथाहि—योऽयमर्थप्रकाशः फलं यस्मिन्नर्थश्च आत्मा च प्रथेते स किं जडः, स्वयम्प्रकाशो वा ? जडश्चे- द्विषयात्मानावपि जडाविति कस्मिन् किं प्रकाशेताविशेषात्, इति प्राप्तमान्ध्यमशेषस्य जगतः । तथा चाभाणकः—'अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे' । न च निलीनमेव विज्ञानमर्थात्मानौ ज्ञापयति
भामती-व्याख्या
कर्म ) हो—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि कर्मकारक सदैव कर्त्ता से भिन्न होता है, 'देवदत्तः ग्रामं गच्छति'—यहाँ पर ग्रामरूप कर्मकारक से भिन्न देवदत्त की गमन क्रिया से जो देवदत्त और ग्राम का संयोगरूप फल होता है, उस संयोग का आश्रय होने के कारण ग्राम को कर्म कहा जाता है, किन्तु 'आत्मा आत्मानं प्रकाशयति'—यहाँ पर प्रकाश क्रिया कर्मरूप आत्मा से भिन्न पदार्थ में नहीं रहती, फलतः कर्तृत्व और कर्मत्व का एक आधार में रहना सर्वथा विरुद्ध है, वही आत्मा स्व भी हो और पर भी—यह क्योंकर सम्भव होगा ? यदि आत्मा का प्रकाश अन्य किसी आत्मा से माना जाता है, तब प्रकाश्य भूत ( ज्ञेय या वेद्य ) आत्मा जड़ और अनात्मरूप हो जायगा एवं अन्यान्य प्रकाशक-परम्परा की कल्पना में अनवस्था भी होती है ।
यह जो कहा जाता है कि यद्यपि आत्मा अजड़ और सभी पदार्थों के ज्ञानों में भासमान है, तथापि वह कर्त्ता ही माना जाता है, कर्म नहीं, क्योंकि वह पर-समवेत क्रिया से जनित फल का आश्रय नहीं, जैसे—चैत्र । 'चैत्रो नगरं गच्छति'—यहाँ चैत्र-समवेत गमनरूप क्रिया से जनित जो फल है—चैत्र और नगर का संयोग, उस संयोग के यद्यपि चैत्र और नगर— दोनों आश्रय हैं, तथापि कर्मता नगर में ही घटती है, चैत्र में नहीं, क्योंकि वह गमन क्रिया जिस चैत्र में समवेत ( समवायसम्बन्धेन वृत्ति ) है, वह नगर से भिन्न है, अपने से नहीं, अतः पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय होने से नगर ही कर्म बनता है, चैत्र नहीं, क्योंकि वह स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय नहीं । इसी प्रकार आत्मा भी स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, अतः वह चैत्र के समान कर्त्ता ही होता है, कर्म नहीं ।
वह कहना उचित नहीं, क्योंकि श्रुति कहती है कि वह किसी भी प्रकाश से प्रकाशित [ प्रकाश क्रिया-जन्य फल का आश्रय ] नहीं—'अगृह्यो न हि गृह्यते' ( बृ. उ. ३।६।२६ ), “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” ( तै. उ. २।१।१ ) । युक्ति-युक्त भी यही है, क्योंकि जो यह अर्थ- प्रकाशरूप फल है, जिसके होने पर अर्थ ( विषय ) और आत्मा—दोनों भासित होते हैं, वह क्या जड़ है ? अथवा स्वयंप्रकाश ? यदि जड़ है, तब विषय और आत्मा तो पहले ही जड़ हैं, फिर किससे कौन प्रकाशित होगा ? विषय भी अन्य प्रकाश से प्रकाशनीय होने के कारण जड़ और आत्मा भी वैसा ही, दोनों में कोई विशेषता नहीं कि एक से दूसरे का प्रकाश हो जाता । परिशेषतः जगत् सर्वथा प्रकाश-शून्य अन्धकारमय बन कर रह जायगा, जैसी कि कहावत प्रसिद्ध है—“अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे ।” अन्धे बैल की पूँछ पकड़ कर अन्धे व्यक्ति चल पड़े, स्थान-स्थान पर गर्त-पात होना ही था । अर्थ और आत्मा का