भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ३५
भामती
चक्षुरादिवदिति वाच्यम्, ज्ञापनं हि ज्ञानजननं, जनितं च ज्ञानं जडं सन्नोक्तदूषणमतिवर्त्ततेति। एवमुत्तरोत्तराण्यपि ज्ञानानि जडानीत्यनवस्था। तस्मादपराधीनप्रकाशा संविदुपेत्तव्या। तथापि किमायातं विषयात्मनोः स्वभावजडयोः ? एतदायातं यत्तयोः संविज्जड़ेति। तत्किं पुत्रः पण्डित इति पितापि पण्डितोऽस्तु ? स्वभाव एष संविदः स्वयम्प्रकाशाया यदर्थात्मसम्बन्धितेति चेत्, हन्त पुत्रस्यापि पण्डितस्य स्वभाव एष यत् पितृसम्बन्धितेति समानम्। सहार्थात्मप्रकाशेन संवित्प्रकाशो न स्वार्थात्मप्रकाशं विनेति तस्याः स्वभाव इति चेत्, तत्किं संविदो भिन्नौ संविदर्थात्मप्रकाशौ। तथा च न स्वयम्प्रकाशा संविन्न च संविदर्थात्मप्रकाश इति। अथ संविदर्थात्मप्रकाशौ न संविदो भिद्येते, संविदेव तौ। एवं चेत्, यावदुक्तं भवति संविदात्माथौ सहेति तावदुक्तं भवति संविदर्थात्मप्रकाशौ सहेति, तथा च न विवक्षितार्थसिद्धिः। न चातीतानागतार्थगोचरायाः संविदोऽर्थसहभावोऽपि। तद्विषयहानोपादानोपेक्षाबुद्धि-
भामती-व्याख्या
प्रकाश स्वयं अप्रकाशित रह कर ही चक्षुरादि के समान यदि अर्थ और आत्मा का प्रकाशक माना जाता है, तब भो कथित जगदान्ध्यरूप दोष से पीछा नहीं छूटता, क्योंकि विषय के प्रकाशक या ज्ञापन का अर्थ होता है—विषय के ज्ञान को जन्म देना, उक्त प्रकाश से जनित ज्ञान भी जड़ ही है, अतः वह भी स्वयं दूसरे का प्रकाश क्योंकर कर सकेगा ? इसी प्रकार कल्प्यमान उत्तरोत्तर ज्ञान व्यक्तियाँ भी जड़ ही मानी जाएँगी, इस प्रकार परप्रकाशवाद में अनवस्था दोष प्रसक्त होता है, अतः स्वयंप्रकाश ज्ञान तत्त्व को ही मानना चाहिए।
विषय और आत्मा के ज्ञान को स्वयंप्रकाश मान लेने से स्वभावतः जड़भूत विषय और आत्मा पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि स्वयंप्रकाश ज्ञान में प्रकाशमानता स्वतः सिद्ध है, ज्ञानगत प्रकाशमानता के बल पर ज्ञान के विषयीभूत विषय और आत्मा में भी प्रकाशमानता सिद्ध हो जाती है। यदि कहा जाय कि ज्ञान की प्रकाशमानता से ज्ञान के जनकीभूत विषय और आत्मा में प्रकाशमानता तभी सिद्ध हो सकती है, जबकि पुत्रगत पाण्डित्य के द्वारा उसके जनकीभूत माता-पिता में पाडित्य सिद्ध होता हो, किन्तु ऐसा नियम नहीं, क्योंकि पुत्र में पाण्डित्य होने पर भी उसके माता-पिता में पांडित्य की अवश्यंभाविता नहीं देखी जाती। यदि कहा जाय कि ज्ञान विषय और आत्मा का नियत सम्बन्धी है, अतः ज्ञान की प्रकाशमानता से विषय और आत्मा में प्रकाशमानता आ जाती है। तब भी वह आपत्ति बनीं ही रहती है, क्योंकि पुत्र भी माता-पिता का नियत सम्बन्धी है, अतः पुत्र के पण्डित होने पर माता-पिता को भी अवश्य पण्डित होना चाहिए।
यदि पुत्र की अपेक्षा ज्ञान का एक यह वैशिष्ट्य माना जाता है कि विषय और आत्मा की प्रकाशमानता के बिना ज्ञान में प्रकाशमानता नहीं होती, अपितु अर्थात्म-प्रकाश के साथ ही ज्ञान का प्रकाश होता है। तब जिज्ञासा होती है कि ज्ञान से [ ज्ञान का प्रकाश और अर्थात्मा का प्रकाश—ये ] दोनों प्रकाश क्या भिन्न हैं ? अथवा अभिन्न ? यदि ज्ञान से ज्ञान का प्रकाश भिन्न है, तब ज्ञान को स्वयंप्रकाश नहीं कहा जा सकता, किन्तु घटादि के समान भिन्न प्रकाश से प्रकाशित होने के कारण ज्ञान को जड़ ही मानना होगा। अर्थ और आत्मा के प्रकाश को ज्ञान से भिन्न मानने पर विषय और आत्मा में ज्ञान की विषयता सिद्ध न होकर ज्ञान-जन्य प्रकाश की विषयता ( ज्ञान-ज्ञाप्यता ) माननी होगी, जिसमें अनवस्था दोष दिखाया जा चुका है। यदि 'ज्ञान का प्रकाश और अर्थात्मा का प्रकाश'—ये दोनों प्रकाश ज्ञान से भिन्न नहीं, ज्ञानरूप ही हैं, तब जो कहा गया कि 'संविदर्थात्मप्रकाशौ सह' उसका अर्थ होता है—'संविदात्मार्थौ सह'। तब आत्मगत ज्ञानाश्रयत्वरूप विवक्षित अर्थ की सिद्धि