भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
भामती जननादर्थसहभाव इति चेन्न, अर्थसंविद इव हानादिबुद्धीनामपि तद्विषयत्वानुपपत्तेः। हानादिजननाद्धानादिबुद्धीनामर्थविषयत्वम्, अर्थविषयहानादिबुद्धिजननच्चार्थसंविदस्तद्विषयत्वमिति चेत्, तत् किं देहस्य प्रयत्नवदात्मसंयोगो देहप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुरर्थे इत्यर्थप्रकाशोऽस्तु ? जाड्याद्वेहात्मसंयोगो नार्थप्रकाश इति चेत्, नन्वयं स्वयंप्रकाशोऽपि स्वात्मन्येव खद्योतवत्प्रकाशः, अर्थे तु जड इत्युपपादितम्। न च प्रकाशस्यात्मानो विषयाः। ते हि विच्छिन्नदीर्घस्थूलतयाऽनुभूयन्ते। प्रकाशश्चायमान्तरोऽस्थूलोऽणुरह्रस्वोऽदीर्घश्चेति प्रकाशते। तस्माच्चन्द्रेऽनुभूयमान इव द्वितीयश्चन्द्रमाः स्वप्रकाशादन्योऽर्थोऽनिर्वचनीय एवेति युक्तमुत्पश्यामः। न चास्य प्रकाशस्यान्तः स्वलक्षणभेदोऽनुभूयते। न चानिर्वाच्यार्थभेदः प्रकाशं निर्वाच्यं भेत्तुमर्हति, अतिप्रसङ्गात्। न चार्थनामपि परस्परं भेदः समीचीनज्ञानपद्धतिमध्यास्ते इत्युपरिष्टादुपपादयिष्यते। तदयं प्रकाश एव स्वयम्प्रकाश एकः कूटस्थो नित्यो निरंशः प्रत्यगात्मा अशक्यनिर्वचनीयेभ्यो देहेन्द्रियादिभ्य आत्मानं प्रतीपं निर्वचनीयमञ्चति जानातीति प्रत्यङ् स चात्मेति
भामती-व्याख्या नहीं होती। अतीत और अनागत घटादि रूप अर्थ के वर्तमानकालीन ज्ञान का अर्थ-सहभाव सम्भव भी नहीं। यदि कहा जाय कि जो ज्ञान जिस विषय की हान-बुद्धि, उपादान-बुद्धि या उपेक्षा-बुद्धि को जन्म देता है, उस ज्ञान में उस विषय का सहभाव माना जाता है। वर्तमान ज्ञान अतीतघटादिविषयक हानादि-बुद्धि का जनक होता है, यही उस ज्ञान में अर्थ-सहभाव अनुमित हो जाता है—'अतीतघटविषयकं ज्ञानम्, अतीतघटसहभूतम्, अतीतघटविषयकहानादि-बुद्धिजनकत्वात्। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि अतीतघटादि के ज्ञान में जैसे अतीतघटविषयकत्व सिद्ध है, वैसा हानादि-बुद्धि में अतीतघटविषयकत्व सिद्ध नहीं, अतः अतीतघटविषयक-हानादिबुद्धिजनकत्वरूप हेतु स्वरूपासिद्धिदोष से युक्त है, उसके द्वारा अर्थ सहभाव का ज्ञान में अनुमान नहीं किया जा सकत। 'घटादिविषयक हानादिरूप प्रवृत्ति की जनक होने के कारण हानादि-बुद्धि में घटविषयकत्व और घटादिविषयक हानादि-बुद्धि की जनकता होने के कारण घटादि के ज्ञान में घटादिविषयकत्व सिद्ध होता है'—ऐसा कहने पर देहगत प्रयत्नवदात्मा के संयोग में अर्थ-प्रकाशत्वापत्ति होती है, क्योंकि वह संयोग भी देहरूप अर्थ में प्रवृत्त्यादि का जनक होता है। यदि कहा जाय कि जड़ होने के कारण देहात्म-संयोग को अर्थविषयक प्रकाश नहीं कह सकते। तब स्वयंप्रकाaction/ज्ञान में भी अर्थप्रकाशता न बनेगी, क्योंकि उसकी प्रकाश्य कोटि में स्वयं ज्ञान ही आता है, विषय नहीं, अतः वह खद्योत (जुगनू) के समान केवल अपने अंश में प्रकाशरूप होने पर भी विषयांश में जड़ ही है—ऐसा पहले कहा जा चुका है। घटादि विषय ज्ञान के आत्मा (स्वरूप) ही है—ऐसा कहना अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि घटादि विषय विच्छिन्न (शरीर के बाहर), दीर्घ, स्थूल, अणु और ह्रस्व के रूप में देखे जाते हैं और उनका ज्ञान शरीर के अन्दर अदीर्घ, अस्थूल, अनणु और अह्रस्व के रूप में अवभासित होता है। फलतः एक चन्द्र में प्रतीयमान द्वितीय चन्द्रमा के समान स्वयंप्रकाश चित्त्तत्त्व से भिन्न घटादि प्रपञ्च को अनिर्वचनीय मानना ही उचित है।
इस स्वयंप्रकाश चित्त्तत्त्व का स्वाभाविक स्वलक्षण (अवान्तरव्यक्ति-भेद) अनुभूत नहीं होता और घटादि अनिर्वचनीय प्रपञ्च आत्मा के वास्तविक भेद का जनक नहीं हो सकता, अन्यथा घटादि उपाधियों के द्वारा गगन का भी वास्तविक भेद हो जायगा। घटादि पदार्थों का परस्पर भेद भी समीचीन ज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता—यह आगे चल कर कहा जायगा। परिशेषतः यह घटादि का प्रकाश ही स्वयंप्रकाश, एक कूटस्थ, नित्य और निरंश प्रत्यगात्मा है। उसे प्रत्यगात्मा इस लिए कहा जाता है कि वह देह, इन्द्रियादि