भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७
विषये विषयान्तरमध्यस्यति, युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि ?
भामती
प्रत्यगात्मा, स चापराधीनप्रकाशत्पादनंशत्वाच्चाविषयस्तस्मिन्नध्यासो विषयधर्माणां, देहेन्द्रियादिधर्माणाम् । कथं, किमाक्षेपे । अयुक्तोऽयमध्यास इत्याक्षेपः । कस्मादयमयुक्त इत्यत आह ॐ सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति ॐ । एतदुक्तं भवति -- यत्पराधीनप्रकाशमंशवच्च तत्सामान्यांशग्रहे कारणदोषवशाच्च विशेषाग्रहेऽन्यथा प्रकाशते । प्रत्यगात्मा त्वपराधीनप्रकाशतया न स्वज्ञाने कारणान्यपेक्षते । येन तदाश्रयैर्दोषैर्दूष्येत । न चांशवान्, येन कश्चिदस्यांशो गृह्येत कश्चिन्न गृह्येत, नहि तदेव तदानीमेव तेनैव गृहीतमगृहीतं च सम्भवतीति न स्वयम्प्रकाशपक्षेऽध्यासः । सदात्मनेऽप्यप्रकाशे पुरोऽवस्थितत्वस्यांपरोक्षत्वस्याभावान्नाध्यासः । नहि शुक्तावपुरःस्थितायां रजतमध्यस्यतीदं रजतमिति । तस्मादत्यन्तग्रहेऽत्यन्ताग्रहे च नाध्यास इति सिद्धम् । स्यादेतत् — अविषयत्वे हि चिदात्मनो नाध्यासो, विषय एव तु चिदात्मा अस्मत्प्रत्ययस्य, तत्कथं नाध्यास इत्यत आह ॐ युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि ॐ । विषयत्वे हि चिदात्मनोऽन्यो विषयी भवेत् । तथा च यो विषयी स एव चिदात्मा,
भामती-व्याख्या
अनिर्वचनीय प्रपञ्च से प्रतीप ( विपरीत ) अपने को निर्वचनीय जानता है [ 'प्रत्यगात्मा' इस शब्द के 'प्रत्यग्' और 'आत्मा' दो भाग हैं । उनमें 'प्रत्यग्' प्रतिपूर्वक 'अञ्चु गतिपूजनयोः' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ होता है—प्रतीपम् ( विपरीतम् ) आत्मानमञ्चति जानाति । अर्थात् जो अनात्म प्रपञ्च से अपने को विपरीत अनुभव करता है। वही आत्मतत्त्व है, अतः चित्तत्त्व प्रत्यगात्मा कहलाता है ]। वह आत्मा पर-प्रकाश ( अन्य प्रकाश से प्रकाशित होनेवाला ) नहीं एवं निरंश है, अतः किसी अन्य ज्ञान का विषय नहीं। उस आत्मा में शरीरादि विषय और उनके कर्तृत्वादि धर्मों का अध्यास क्योंकर होगा ? भाष्य में प्रयुक्त 'कथम्' शब्द का घटकीभूत 'किम्' पद आक्षेपार्थक है, अतः 'कथमध्यासः' —इस वाक्य का अर्थ है— 'अयुक्तोऽयमध्यासः' । अध्यास अयुक्त क्यों है ? इस प्रश्न का उत्तर है— "सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति ।" आशय यह है कि जो शुक्त्यादि पदार्थ परप्रकाश और सांश होता है, उसके चमकीले अंश ( अवयव ) का ग्रहण एवं नीलपृष्ठादि भाग का अभान होने के कारण वह शुक्त्यादि द्रव्य अन्यथा ( रजतरूपेण ) प्रतीत होता है, किन्तु प्रत्यगात्मा स्वयंप्रकाश है, अपने ज्ञान में कारण-कलाप की अपेक्षा ही नहीं करता कि उन कारणों के दोषों से दूषित हो जाता । सावयव भी नहीं कि सामान्य अवयवों का ग्रहण और विशेष अवयवों का अग्रहण हो जाता । एक अखण्ड वस्तु एक ही समय एक ही पुरुष के द्वारा गृहीत भी हो और अगृहीत भी—ऐसा सम्भव नहीं हो सकता । फलतः स्वयंप्रकाशत्व पक्ष में अध्यास उपपन्न नहीं होता । यदि आत्मा का कभी भी प्रकाश नहीं माना जाता, तब भी पुरोऽवस्थितत्व और अपरोक्षत्व का अभाव होने के कारण अध्यास नहीं बनता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो शुक्ति पुरःस्थित नहीं, उसमें 'इदं रजतम्' —इस प्रकार रजत का अध्यास नहीं कर सकता । फलतः अत्यन्त गृहीत या अत्यन्त अगृहीत पदार्थ में कभी अध्यास नहीं होता—यह सिद्ध हो जाता है ।
यह सत्य है कि यदि चिदात्मा किसी ज्ञान का विषय न होता, तब उसमें किसी पदार्थ का अध्यास नहीं हो सकता था, किन्तु जब चिदात्मा 'अहम्' —इस प्रतीति का विषय हो जाता है, तब उसमें अध्यास क्यों नहीं होगा ? भाष्यकार कहते हैं— "युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि" । चिदात्मा यदि किसी ज्ञान का विषय है, तब वह ज्ञानरूप विषयी चिदात्मा से भिन्न ही होगा, अतः वहाँ जो विषयी है, वही चिदात्मा माना जायगा