भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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उच्यते—न तावदयमेकान्तेनाविषयः, अस्मत्प्रत्ययविषयत्वात्, अपरोक्षत्वाच्च प्रत्य-
भामती
विषयस्तु ततोऽन्यो युष्मत्प्रत्ययगोचरोऽभ्युपेयः । तस्मादनात्मत्वप्रसङ्गादनवस्थापरिहाराय युष्मत्प्रत्यया- पेतत्वम्, अत एवाविषयत्वमात्मनो वक्तव्यं। तथा च नाध्यास इत्यर्थः ।
परिहरति ॐ उच्यते—न तावदयमेकान्तेनाविषयः ॐ । कुतः ? । ॐ अस्मत्प्रत्ययविषयत्वात् ॐ । अयमर्थः । सत्यं प्रत्यगात्मा स्वयम्प्रकाशत्वादविषयोऽनंशश्च, तथाप्यनिर्वचनीयानाद्यविद्यापरिकल्पितबुद्धि- मनः सूक्ष्मस्थूलशरीरेन्द्रियावच्छेदेनानवच्छिन्नोऽपि वस्तुतोऽवच्छिन्न इवाभिन्नोऽपि भिन्न इवाकर्त्तापि कर्त्तेवाभोक्तापि भोक्तेवाविषयोऽप्यस्मत्प्रत्ययविषय इव जीवभावमापन्नोऽवभासते । नभ इव घटमणि- कमल्लिकाद्यवच्छेदभेदेन भिन्नमिवानेकविधधर्मकमिवेति । नहि चिदेकरसस्यात्मनश्चिदंशे गृहीतेऽगृहीतं कि- ञ्चिदस्ति । खल्वानन्द नित्यत्वविभुत्वादयोऽस्य चिद्रूपादवस्तुतो भिद्यन्ते, येन तद्ग्रहे न। गृह्येरन् । गृहीता एव तु कल्पितेन भेदेन न विवेचिता इत्यगृहीता इवाभान्ति । न चात्मनो बुद्ध्यादिभ्यो भेदस्तात्त्विकः, येन चिदात्मनि गृह्यमाणे सोऽपि गृहीतो भवेत् । बुद्ध्यादीनामनिर्वाच्यत्वेन तद्भेदस्याप्यनिर्वचनीय- त्वात् । तस्माच्चिदात्मनः स्वयंप्रकाशस्यैवानवच्छिन्नस्यावच्छिन्नेभ्यो बुद्ध्यादिभ्यो भेदाग्रहात् तदध्यासेन जीवभाव इति । तस्य चानिदमिदमात्मनोऽस्मत्प्रत्ययविषयत्वमुपपद्यते । तथाहि— कर्त्ता भोक्ता चिदात्माऽ-
भामती-व्याख्या
और विषय को उससे भिन्न 'त्वम्' या 'इदम्'—इस प्रतीति का विषय कहना होगा, तब आत्मा में अनात्मत्व प्रसक्त होगा, अतः ग्राहक-परम्परा की अनवस्था का भी परिहार करने के लिए आत्मा को 'त्वम्'—इस प्रतीति का अविषय मानना आवश्यक है, फलतः आत्मा में अविषयता कहनी होगी, अविषयीभूत पदार्थ में अध्यास नहीं हो सकता—यहाँ तक आक्षेपवादी ने कहा ।
समाधान—उक्त आक्षेप का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"उच्यते, न तावदयमेकान्तेनाविषयः", नियमतः आत्मा अविषय नहीं, क्योंकि वह अस्मत्प्रत्यय ('अहम्'—इस प्रतीति) का विषय हो जाता है। आशय यह है कि यद्यपि प्रत्यगात्मा स्वयं प्रकाश होने के कारण अविषय और निरवयव है, तथापि अनिर्वचनीय और अनादि अविद्या के द्वारा परिकल्पित बुद्धि और मन आदि से घटित सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीररूप उपाधियों के द्वारा अवच्छिन्न होकर वस्तुतः अपरिच्छिन्न, अकर्ता, अभोक्ता और अविषयीभूत आत्मा परिच्छिन्न, कर्त्ता, भोक्ता और अस्मत्प्रत्यय ('अहम्'—इस प्रतीति) का विषय मान लिया जाता है। ऐसा चिदात्मा जीवभाव को प्राप्त होकर विभिन्न रूपों में वैसे ही अवभासित होता है, जैसे घट, मणिक (मटका) और मल्लिकादि (हाँडी आदि रूप) उपाधियों से अवच्छिन्न होकर एक ही आकाश विभिन्न रूप और धर्मवाला प्रतीत होता है। यद्यपि चिदेकरस आत्मा का चिदंश गृहीत होने पर कुछ अगृहीत नहीं रहता। आनन्दत्व, नित्यत्व, विभुत्वादि धर्म भी चिद्रूप आत्मा से वस्तुतः भिन्न नहीं होते कि चिदात्मा का ग्रहण होने पर भी वे अगृहीत रह जाते। बुद्ध्यादि उपाधियों से आत्मा का तात्त्विक भेद नहीं कि चिदात्मा का ग्रहण हो जाने पर वह भेद भी गृहीत हो जाता। बुद्ध्यादिरूप अनिर्वचनीय प्रतियोगियों से निरूपित होने के कारण वह आत्मगत भेद भी अनिर्वचनीय ही है, तात्त्विक नहीं हो सकता। यद्यपि आत्मा अपरिच्छिन्न और स्वयंप्रकाश है, तथापि बुद्ध्यादि परिच्छिन्न पदार्थों से भेदाग्रह होने के कारण बुद्ध्यादि का तादात्म्याध्यास हो जाता है, बुद्ध्यादि से तादात्म्यापन्न आत्मा जीवरूप होकर 'अहम्'—इस प्रतीति का विषय बन जाता है, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार कर्त्ता-भोक्ता के रूप में आत्मा अहंकाराकार प्रतीति का विषय होता है। आत्मा वस्तुतः