भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ३९


भामती

हम्प्रत्यये प्रत्यवभासते। न चोदासीनस्य तस्य क्रियाशक्तिर्भोगशक्तिर्वा सम्भवति। यस्य च बुद्ध्यादेः कार्य्यकरणसङ्घातस्य क्रियाभोगशक्ती न तस्य चैतन्यम्। तस्माच्चिदात्मैव कार्य्यकरणसङ्घातेन ग्रथितो लब्धक्रियाभोगशक्तिः स्वयम्प्रकाशोऽपि बुद्ध्यादिविषयविच्छुरणात् कथञ्चिदस्मत्प्रत्ययविषयोऽहङ्कारास्पदं जीव इति च जन्तुरिति च क्षेत्रज्ञ इति चाख्यायते। न खलु जीवश्चिदात्मनो भिद्यते। तथा च श्रुतिः “अनेन जीवेनात्मना” इति। तस्माच्चिदात्मनोऽव्यतिरेकाज्जीवः स्वयम्प्रकाशोऽप्यहम्प्रत्ययेन कर्तृभोक्तृतया व्यवहारयोग्यः क्रियत इत्यहम्प्रत्ययालम्बनमुच्यते। न चाध्यासे सति विषयत्वं विषयत्वे चाध्यास इत्यन्योन्याश्रयत्वमिति साम्प्रतम्। बीजाङ्कुरवदनादित्वात् पूर्व्वपूर्व्वाध्यासतद्वासनाविषयीकृतस्योत्तरोत्तराध्यासविषयत्वाविरोधादित्युकं ॐ नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः ॐ इति भाष्यग्रन्थेन। तस्मात् सुष्ठूक्तं ‘न तावदयमेकान्तेनाविषयः’ इति। जीवो हि चिदात्मतया स्वयम्प्रकाशतयाऽविषयोऽप्यौपाधिकेन रूपेण विषय इति भावः। स्यादेतत् – न वयमपराधीनप्रकाशतयाऽविषयत्वेनाध्यासमपाकुर्मः, किन्तु प्रत्यगात्मा न स्वतो नापि परतः प्रथत इत्यविषय इति ब्रूमः। तथा च सर्व्वथाऽप्रथमाने प्रत्यगात्मनि कुतोऽध्यास इत्यत आह ॐ अपरोक्षत्वाच्च प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः ॐ । प्रतीच आत्मनः प्रसिद्धिः


भामती-व्याख्या

अकर्त्ता-अभोक्ता, असङ्ग और उदासीन है, उसमें वास्तविक क्रिया शक्ति और भोग शक्ति सम्भव नहीं। जिस बुद्ध्यादिरूप सूक्ष्मशरीर और कार्य-कारण-संघातात्मक स्थूल शरीर में क्रिया शक्ति और भोगशक्ति वस्तुतः होती है, उसमें चैतन्य नहीं होता, अतः कार्य-कारण-संघातरूप शरीर से तादात्म्यापन्न आत्मा में ही क्रिया और भोग शक्ति मानी जाती है। यद्यपि आत्मा स्वभावतः स्वयंप्रकाश (अन्य ज्ञान का अविषय) है, तथापि विषयीभूत बुद्ध्यादि से तादात्म्यापन्न होकर कथंचित् ‘अहम्’—इस प्रतीति का विषय होकर अहङ्कारास्पद जीव, जन्तु, क्षेत्रज्ञ—इत्यादि नामों से प्रख्यात होता है। जीव चिदात्मा से वस्तुतः भिन्न नहीं होता, जैसा कि श्रुति कहती है— “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि” (छां० ६।३।२) [चिदात्मा ने संकल्प किया कि मैं जीव बन कर इस मानव शरीर में प्रविष्ट होकर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ, अतः जीव चिदात्मरूप ही है]। चिदात्मा से अभिन्न होने के कारण जीव स्वयंप्रकाश होने पर भी अहमाकार प्रतीति के द्वारा कर्त्ता-भोक्ता के रूप में व्यवहार-योग्य बना दिया जाता है, अतः वह अहङ्काराकार प्रतीति का आलम्बन माना जाता है। ‘अध्यास होने पर विषयत्व और विषयत्व होने पर अध्यास होगा—इस प्रकार अन्योऽन्याश्रयता है’—ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि बीज और अंकुर के समान दोनों अनादि हैं, पूर्व-पूर्व अध्यास के द्वारा विषयीकृत आत्मा का उत्तरोत्तर अध्यास होता जाता है—इस भाव को प्रकट करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—‘‘नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः’’। इस लिए भाष्यकार ने बहुत ठीक कहा है कि “न तावदयमेकान्तेनाविषयः”। अर्थात् जीव के दो रूप परिलक्षित होते हैं—(१) स्वाभाविक और (२) औपाधिक। स्वाभाविक स्वयंप्रकाश या अविषय होने पर भी औपाधिक रूप से विषय हो जाता है [आत्मा अविषय ही है या विषय ही है—ऐसा एकान्तिकरूप से नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह विषय भी है और अविषय भी, स्वाभाविकरूपेण अविषय और आध्यासिकरूपेण विषय होता है]।

यहाँ आक्षेपवादी कहता है कि आत्मा स्वयंप्रकाश होने से अविषय है, अतः उसमें अध्यास नहीं हो सकता—ऐसा हम नहीं कहते, अपितु हमारी शङ्का यह है कि आत्मा न तो स्वतः और न परतः प्रकाशित होता है, अतः सर्वथा अप्रसिद्ध और अप्रथमान आत्मा में अध्यास क्योंकर होगा ? इस आक्षेप के समाधान में भाष्यकार ने कहा है—‘‘अपरोक्षत्वाच्च