भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

गात्मप्रसिद्धेः। न चायमस्ति नियमः—पुरोऽवस्थित एव विषये विषयान्तरमध्य- सितव्यमिति; अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति । एवमविरुद्धः


भामती

प्रथा तस्य। अपरोक्षत्वात् । यद्यपि प्रत्यगात्मनि नान्या प्रथास्ति, तथापि भेदोपचारः, यथा पुरुषस्य चैतन्यमिति । एतदुक्तं भवति — अवश्यं चिदात्माऽपरोक्षोऽभ्युपेयस्त्वदप्रथायां सर्वस्याप्रथनेन जगदान्ध्यप्रसङ्गादित्युक्तं, श्रुतिश्चात्र भवति 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"इति । तदेवं परमार्थपरिहारमुक्त्वाऽभ्युपेत्यापि चिदात्मनः परोक्षतां प्रौढवादितया परिहारान्तरमाह । ॐ न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थित एव ॐ अपरोक्ष एव ॐ । विषये विषयान्तरमध्यसितव्यम ॐ । कस्मादयं न नियम इत्यत आह ॐ अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति ॐ । हियंस्मादर्थे । नभो हि द्रव्यं सद् रूपस्पर्शविरहान्न बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षम् । नापि मानसं, मनसोऽसहायस्य बाह्येऽप्रवृत्तेः । तस्मादप्रत्यक्षम् । अथ च तत्र बाला अविवेकिनः परदर्शितदर्शनाः कदाचित्पार्थिवच्छायां श्यामतामारोप्य, कदाचित्तेजसं शुक्लत्वमारोप्य नीलोत्पलपलाशश्याममिति वा राजहंसमालावधवलमिति वा निर्वर्णयन्ति तत्रापि पूर्वदृष्टस्य तैजसस्य वा तामसस्य वा रूपस्य परत्र नभसि स्मृतिरूपोऽवभास इति । एवं तदेव तलमध्यस्यन्ति अवाङ्मुखीभूतमहेन्द्रनीलमणिमयमहाकटाहकल्पमित्यर्थः । उपसंहरति ॐ एवम् ॐ । उक्तेन प्रकारेण सर्वक्षेपपरिहारात् ॐ अविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यप्यनात्मनां ॐ । बुद्ध्यादीनाम् ॐ अध्यासः ॐ ।

भामती-व्याख्या

प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः" । प्रत्यगात्मा की प्रथा या प्रसिद्धि अवश्य माननी होगी, क्योंकि वह अपरोक्ष है। यद्यपि प्रत्यगात्मा की प्रथा प्रत्यगात्मा से भिन्न नहीं, अतः 'प्रत्यगात्मनः प्रथा' — ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं। तथापि उसी प्रकार यहाँ भेद का उपचार हो जाता है, जैसे 'आत्मनः चैतन्यम्' — इत्यादि व्यवहारों में होता है। आशय यह है कि आत्मा को अवश्य ही अपरोक्षरूप मानना होगा, क्योंकि उसका प्रकाश न होने पर जगदान्ध्य-प्रसङ्ग पहले दिखाया जा चुका है। उसके प्रकाश से ही विश्व प्रकाशित है, श्रुति स्पष्ट उद्घोष कर रही है कि "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" ( कौ. २।५।१५ ) । इस प्रकार पारमार्थिक दृष्टि से आक्षेप का परिहार करके चिदात्मा की परोक्षता को स्वीकार करते हुए भी प्रौढीवाद का सहारा लेकर उक्त आक्षेप का समाधान किया जाता है — "न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थिते एव विषये विषयान्तरमध्यसितव्यम्" । अर्थात् ऐसा कोई नियम नहीं कि अपरोक्ष विषय में ही अध्यास होता हो, क्योंकि "अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालाः तलमलिनतादि अध्यस्यन्ति" । अर्थात् यद्यपि आकाश द्रव्य रूप और स्पर्श गुण से रहित होने के कारण, चक्षु और त्वग्रूप बाह्य इन्द्रिय के द्वारा प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता । मानस प्रत्यक्ष का भी वह विषय नहीं, क्योंकि बाह्य विषय के ग्रहण में मन स्वतन्त्र नहीं, अपितु बाह्य इन्द्रिय की सहायता से ही प्रवृत्त होता है, जैसा कि कहा गया है — परतन्त्रं बहिर्मनः' ( विधिवि. पृ. ११४ ) । अतः आकाश प्रत्यक्ष नहीं, फिर भी बालक ( अल्पज्ञ मनुष्य ) आकाश में कदाचित् पार्थिव छायारूप श्यामता का आरोप करके कहते हैं — यह आकाश नीलोत्पल के पत्तों जैसा श्यामल है। एवं कदाचित् तैजस शुक्ल रूप का अध्यास करके व्यवहार करते हैं — यह आकाश राजहंसों के समूह के समान धवल ( श्वेत ) है। वहाँ भी पूर्वदृष्ट तामस श्याम और तैजस शुक्ल रूप का आकाशरूप पर द्रव्य में स्मृतिरूप अवभास बन जाता है। इसी प्रकार सुदूर ऊपर गगन में तल का आरोप करके लोग कहा करते हैं कि यह गगन नीलमणि से निर्मित औंधा कड़ाह है। अध्यास-लक्षण का उपसंहार करते हुए कहा है — “एवमविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यपि अनात्माध्यासः"। 'एवम्' का अर्थ है—