भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ४१

प्रत्यगात्मन्यप्यनात्माध्यासः ।
तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते; तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपा-

भामती

ननु सन्ति च सहस्रमध्यासास्तत्किमर्थमयमेवाध्यास आक्षेपसमाधानाभ्यां व्युत्पादितः, नाध्यासमात्रमित्यत आह ॐ तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते ॐ । अविद्या हि सर्वानर्थबीजमिति श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिषु प्रसिद्धम् , तदुच्छेदाय वेदान्ताः प्रवृत्ता इति वक्ष्यति । प्रत्यगात्मन्यनात्माध्यास एव सर्वानर्थहेतुर्न पुन रजतादिविभ्रमा इति स एवाविद्या, तत्स्वरूपं चाविज्ञातं न शक्यमुच्छेत्तुमिति तदेव व्युत्पाद्यं नाध्यासमात्रम् । अत्र च एवंलक्षणमित्येवंरूपतयाऽनर्थहेतुतोक्ता । यस्मात्प्रत्यगात्मन्यशनायादिरहितेऽशनायाद्युपेतान्तःकरणाद्यहितारोपेण प्रत्यगात्मानमदुःखं दुःखाकरोति, तस्मादनर्थहेतुः । न चैवं पृथग्जना अपि मन्यन्तेऽध्यासं, येन न व्युत्पाद्येतेत्यत उक्तं ॐ पण्डिता मन्यन्ते ॐ ।

नन्वियमनादिरतिनिरूढनिबिडवासनानुविद्धाऽविद्या न शक्या निरोद्धुम्, उपायाभावादिति यो मन्यते तं प्रति तन्निरोधोपायमाह ॐ तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं ॐ । निर्विचिकित्सं ज्ञानं ॐ विद्यामाहुः ॐ । पण्डिताः प्रत्यगात्मनि खल्वत्यन्तविविक्ते बुद्ध्यादिभ्यो बुद्ध्यादिभेदाग्रहणनिमित्तो बुद्ध्याद्यात्मत्वतद्धर्माध्यासः । तत्र श्रवणमननादिभिर्यद्विवेकविज्ञानं तेन विवेकाग्रहे निवर्त्तितेऽध्यासापबाधात्मकं वस्तुस्वरूपावधारणं विद्या चिदात्मरूपं स्वरूपे व्यवतिष्ठत इत्यर्थः ।

भामती-व्याख्या

सभी आक्षेपों का परिहार हो जाने पर प्रत्यगात्मा में बुद्ध्यादि का अध्यास बन जाता है ।

शङ्का होती है कि सहस्रों अध्यास-प्रकार दिखाए जा सकते थे, तब यह आत्मानात्माध्यास का ही निरूपण क्यों किया ? इस शङ्का को दूर करने के लिए कहा जाता है—"तमेतमेवंलक्षणकमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते" । अविद्या सभी अनर्थों का मूल कारण हैं—ऐसा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में प्रसिद्ध है । उस अविद्या का उच्छेद करने के लिए ही वेदान्त ग्रन्थ प्रवृत्त हुए हैं—ऐसा कहा जायगा । प्रत्यगात्मा में अनात्माध्यास ही सर्वानर्थ का हेतु है, शुक्ति-रजतादि-भ्रम नहीं, अतः आत्मानात्माध्यास ही मुख्य अविद्या है । उसके स्वरूप का जब तक ज्ञान न हो, तब तक उसका उच्छेद नहीं किया जा सकता, अतः वही विशेषतः व्युत्पादनीय है, सभी अध्यास नहीं । भाष्यकार ने 'एवंलक्षणम्'— ऐसा कहकर उसकी अनर्थ-हेतुता प्रकट की है । क्षुधा-पिपासादि से रहित आत्मा में क्षुधा-पिपासादि से युक्त अन्तःकरणादि अहितकर पदार्थों का अध्यास वस्तुतः दुःख-रहित आत्मा को भी दुःखी बना देता है, अतः वह अनर्थ का हेतु है । ऐसे अध्यास का ज्ञान सर्वजन-साधारण नहीं कि उसका निरूपण अनावश्यक हो जाता—यह दिखाने के लिए कहा गया है—"पण्डिता मन्यन्ते" ।

'यह अविद्या अनादि, अतिनिरूढ़ ( सुदृढ ), निविड़ ( घनीभूत ) वासनाओं से युक्त होने के कारण कभी समुच्छेदनीय ही नहीं, क्योंकि उसके उच्छेद का कोई उपाय ही दिखाई नहीं देता'—ऐसी धारणावाले व्यक्तियों के लिए अविद्या के निरोध का उपाय दिखाते हैं—"तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं विद्यामाहुः" । पण्डितगण असन्दिग्ध ज्ञान को विद्या कहा करते हैं । प्रत्यगात्मा बुद्ध्यादि से वस्तुतः अत्यन्त विविक्त ( निर्लिप्त ) है किन्तु बुद्ध्यादि का विवेक-ग्रह ( भेद-ज्ञान ) न होने के कारण बुद्ध्यादि के तादात्म्य एवं धर्मों का अध्यास आत्मा में हो जाता है । वेदान्त-वेद्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप आत्मा के श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि के द्वारा जो विवेक-विज्ञान उत्पन्न होता है, उसके द्वारा विवेकाग्रह की निवृत्ति हो जाने पर अध्यास का बाधरूप वस्तु-स्वरूपात्मक अवधारण प्रकट होता है, वही विद्या है, वह चिदात्मस्वरूप होकर आत्मस्वरूप में व्यवस्थित होती है ।