भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

वधारणं विद्यामाहुः। तत्रैवं सति यत्र यदध्यासः, तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न संबध्यते, तमेतमविद्याख्यमात्मानात्मनोरितरेतराध्यासं पुरस्कृत्य सर्वे

भामती

स्यादेतद् – अतिनिरूढनिबिडवासनानुविद्धाऽविद्या विद्ययाऽपबाधिताऽपि स्ववासनावशात्पुनरुद्भविष्यति, प्रवर्त्तयिष्यति च वासनादिकार्यं स्वोचितमित्यत आह ॐ तत्रैवं सति ॐ एवम्भूतवस्तुतत्त्वावधारणे सति । ॐ यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न सम्बध्यते ॐ । अन्तःकरणादिदोषेणाशनायादिना चिदात्मा चिदात्मनो गुणेन चैतन्यान्दादिनाऽन्तःकरणादि न सम्बध्यते । एतदुक्तं भवति—तत्त्वावधारणाभ्यासस्य हि स्वभाव एव स तादृशो यदनादिमपि निरूढनिबिडवासनमपि मिथ्याप्रत्ययमपनयति । तत्त्वपक्षपातो हि स्वभावो धियाम् । यथाऽऽहुर्बाह्या अपि—

निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः ।
न बाधोऽयत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपातः ॥ इति ।

विशेषतस्तु चिदात्मस्वभावस्य तत्त्वज्ञानस्यात्यन्तान्तरङ्गस्य कुतोऽनिर्वच्ययाऽविद्यया बाध इति । यदुक्तम्—'सत्यानृते मिथुनीकृत्य विवेकाग्रहादध्यस्याहमिदं ममेदमिति लोकव्यवहारः' इति, तत्र व्यपदेश-


भामती-व्याख्या

यह जो भय होता है कि अविद्या ऐसी निरूढ और निबिड़ वासनाओं से युक्त है कि एक बार विद्या के द्वारा अपबाधित होकर भी अपनी सुदृढ़ वासनाओं के बल पर पुनः प्रकट होकर अपने संस्कारों को अपने अनुरूप मूर्तरूप दे डालेगी । उस भय को दूर करने के लिए कहा है–"तत्रैवं सति" । 'एवं' शब्द का अर्थ है—पूर्वोक्त रीति से वस्तु-तत्त्व का अवधारण (निश्चय) कर लेने पर । "यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वा अणुमात्रेणापि स न सम्बध्यते" । आत्मा में तादात्म्येन अध्यस्त अन्तःकरण के क्षुधा-पिपासादि दोषों से चिदात्मा और चिदात्मा के चैतन्य, आनन्दादि गुणों से अन्तःकरण का अणुमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता । आशय यह है कि कथित तत्त्वावधारण का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अनादि, निरूढ और सघन वासना से युक्त मिथ्या ज्ञान को नष्ट कर देता है, जैसा कि वेद-बाह्य बौद्ध विद्वान् धर्मकीर्ति ने भी कहा है—

निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः ।
न बाधोऽयत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपातः ॥ (प्र. वा. पृ. १४४)

[वस्तु-स्वभाव की रक्षा के लिए कुछ भी यत्न न करने पर भी विपर्ययों (मिथ्या ज्ञानों) के द्वारा तत्त्व ज्ञान का बाध कभी नहीं होता, क्योंकि भूतार्थ-स्वभाव (वस्तुतत्त्व का स्वभाव) सदैव उपद्रवों (सभी प्रकार की बाधाओं) से रहित होता है । प्राणियों की बुद्धि सदैव तत्त्व-पक्षपातिनी होती है । उक्त वार्तिक की व्याख्या में भाष्यकार कहते हैं—

ततः स्वभावो भूतात्मा निरुपद्रव एव च ।
कथमस्य परित्यागः कर्तुं शक्यः सचेतसा ॥
पक्षपातश्च चित्तस्य न दोषेषु प्रवर्त्तते ।
ततः तस्य न दोषाय यत्नः कश्चित्प्रवर्त्तते ॥ (प्रज्ञाकर, पृ. १४४)] ।

उसमें भी विशेषता यह है कि हमारा तत्त्वज्ञान चिदात्मस्वरूप होने से अत्यन्त अन्तरङ्ग है, उसका अनिर्वचनीय एवं निस्तत्त्वभूत अविद्या के द्वारा बाध हो भी कैसे सकता है ?

भाष्यकार ने कहा है—"सत्यानृते मिथुनीकृत्य विवेकाग्रहादध्यस्य 'अहमिदम्', 'ममेदम्'–इति लोकव्यवहारः"। वहाँ व्यवहार चार प्रकार का कहा गया है—"अभिज्ञाभिवदनमुपादानमर्थक्रिया इति चतुर्विधः" (पं. वि. पृ. ६२) । उसमें शब्दात्मक व्यवहार तो