भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३
प्रमाणप्रमेयव्यवहारा लौकिका वैदिकाश्च प्रवृत्ताः, सर्वाणि च शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि।
कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि चेति ? उच्यते—देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानरहितस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्त्यनु-
भामती
लक्षणो व्यवहारः कण्ठोक्तः, इतिशब्दसूचितं लोकव्यवहारमादर्शयति ॐ तमेतमविद्याख्यं ॐ इति । निगदव्याख्यातम् ।
आक्षिपति – ॐ कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ॐ । तत्त्वपरिच्छेदो हि प्रमा विद्या, तत्साधनानि प्रमाणानि कथमविद्यावद्विषयाणि ? नाविद्यावन्तं प्रमाणान्याश्रयन्ति, तत्कार्यस्य विद्याया अविद्याविरोधित्वादिति भावः । सन्तु वा प्रत्यक्षादीनि संवृत्यापि यथा तथा, शास्त्राणि तु पुरुषहितानुशासनपराण्यविद्याप्रतिपक्षतया नाविद्यावद्विषयाणि भवितुमर्हन्तीत्याह ॐ शास्त्राणि चेति ॐ ।
समाधत्ते ॐ उच्यते—देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य ॐ । तादात्म्यतद्धर्माध्यासहीनस्य । ॐ प्रमातृत्वानुपपत्तौ सत्यां प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः ॐ । अयमर्थः—प्रमातृत्वं हि प्रमां प्रति कर्तृत्वं तच्च स्वातन्त्र्यं, स्वातन्त्र्यं च प्रमातुरितरकारकाप्रयोज्यस्य समस्तकारकप्रयोक्तृत्वम् । तदनेन प्रमाकरणं
भामती-व्याख्या
भाष्यकार ने 'अहमिदं ममेदम्'—इस वाक्य से ही प्रदर्शित कर दिया है, शेष व्यवहारों की सूचना के लिए कहा है—‘‘इति लोकव्यवहाराः’ अर्थात् 'इत्येवंविधा व्यवहाराः' । वहाँ 'इति' पद के द्वारा अभिसूचित लोकव्यवहारों का स्पष्टीकरण करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"तमेतमविद्याख्यम्"—यहाँ से लेकर "सर्वाणि शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि"—यहाँ तक। भाष्य की पदावली अत्यन्त सरल और स्पष्टार्थक है।
उक्त स्थापना पर आक्षेप किया गया—‘‘कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि’’। उसका भाव यह है कि तत्त्व-परिच्छेदरूप प्रमा विद्यारूप है, उस प्रमा के साधनीभूत प्रत्यक्षादि प्रमाणों में अविद्यावद्विषयकत्व सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाण अविद्यावान् (अज्ञानी) पुरुष की अधिकार-कक्षा में नहीं आते, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों का कार्य जो प्रमा या विद्या है, वह अविद्या की विरोधिनी होती है। प्रत्यक्षादि प्रमाणों को यदि किसी प्रकार सांवृतिक (आविद्यक) व्यवहार का साधन मान भी लिया जाय, तब भी शास्त्रीय व्यवहार में कभी भी आविद्यकत्व की सम्भावना नहीं कर सकते, क्योंकि शास्त्र सदैव पुरुष को उसके हित की ही शिक्षा देते हैं, वे अविद्या के सर्वथा प्रबल प्रतिपक्षी होते हैं, अविद्यावान् पुरुष उनका अधिकारी क्योंकर होगा ? ऐसी आशङ्का की गई है—‘‘शास्त्राणि च’’। उक्त आशङ्का का परिहार किया जाता है—‘‘उच्यते’’। ‘‘देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य’’—इस वाक्य का अर्थ है—तादात्म्यतद्धर्माध्यासहीनस्य। प्रमातृत्वानुपपत्तौ सत्यां प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः'—ऐसा अन्वय कर लेना चाहिए। आशय यह है कि प्रमातृत्व का अर्थ है—प्रमा का कर्तृत्व, कर्तृत्व का अर्थ है—स्वातन्त्र्य । प्रमाता में जो इतर (कर्मादि) कारकों से अप्रयोज्यत्व और कर्मादि समस्त कारकों का प्रयोक्तृत्व है, वही प्रमाता पुरुष में स्वातन्त्र्य है [ ‘‘स्वतन्त्रः कर्त्ता’’ (पा. सू. १।४।५४) में भाष्यकार ने 'तन्त्र' शब्द प्रधानार्थक मान कर कहा है—‘‘अस्ति प्राधान्ये वर्तते । तद्यथा स्वतन्त्रोऽयं ब्राह्मण इत्युच्यमाने स्वप्रधान इति गम्यते । तद्यः प्राधान्ये वर्तते तन्त्रशब्दः तस्येदं ग्रहणम्’’। कारक सूत्र में भी कहा है—‘‘किं पुनः प्रधानम् ? कर्त्ता । कथं पुनर्ज्ञायते कर्त्ता प्रधानमिति ? यत्सर्वेषु साधनेषु सन्निहितेषु कर्त्ता