भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ] |
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पपत्तेः । न हीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः संभवति । न चाधिष्ठानमन्तरेणे-
न्द्रियाणां व्यवहारः संभवति । न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद्व्याप्रियते । न
भामती
प्रमाणं प्रयोजनीयम् । न च स्वव्यापारमन्तरेण करणं प्रयोक्तुमर्हति । न च कूटस्थनित्यश्चिदात्माऽपरिणामी
स्वतो व्यापारवान् । तस्माद् व्यापारवद्बुद्ध्यादितादात्म्याध्यासाद् व्यापारवत्तया प्रमाणमधिष्ठातुमर्हतीति
भवत्यविद्यावत्पुरुषविषयत्वमविद्यावत्पुरुषाध्यस्त्वं प्रमाणानामिति । अथ मा प्रवर्त्तिषत प्रमाणानि किं
नश्छिन्नमित्यत आह ॐ नहीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः सम्भवति ॐ । व्यवह्रियतेऽनेनेति
व्यवहारः फलं, प्रत्यक्षादीनां प्रमाणानां फलमित्यर्थः । इन्द्रियाणीति, इन्द्रियलिङ्गादीनीति द्रष्टव्यं, दण्डिनो
गच्छन्तीतिवत् । एवं हि प्रत्यक्षादीत्युपपद्यते । व्यवहारक्रियया च व्यवहार्याक्षेपात्समानकर्तृकता ।
अनुपादाय यो व्यवहार इति योजना । किमिवि पुनः प्रमातोपादत्ते प्रमाणानि ? अथ स्वयमेव कस्मान्न
प्रवर्त्तन्ते प्रमाणानि इत्यत आह । ॐ न चाधिष्ठानमन्तरेणेन्द्रियाणां व्यापारः ॐ । प्रमाणानां व्यापारः
ॐ सम्भवति ॐ न जातु करणान्यनधिष्ठितानि कर्त्रा स्वकार्ये व्याप्रीयन्ते । मा भूत् कुविन्दरहितेभ्यो
भामती-व्याख्या
प्रवर्त्तयिता भवति”। उद्योतकार ने कहा है— “अनेन कारकप्रयोक्तृत्वं कर्तुः स्वातन्त्र्य-
मित्युक्तम्”]। फलतः प्रमा के कर्त्ता को भी प्रमा के करण का प्रयोजक या प्रवर्त्तयिता होना
चाहिए। कर्त्ता पुरुष में जब तक अपना व्यापार (क्रिया) नहीं होता, तब तक वह करण
का प्रवर्त्तक नहीं हो सकता। कूटस्थ नित्य चिदात्मा अपरिणामी और अमूर्त द्रव्य है, उसमें
स्वतः क्रिया नहीं हो सकती, परिशेषतः व्यापार-युक्त सूक्ष्म और स्थूल शरीर रूप उपाधियों
के तादात्म्याध्यास से चिदात्मा स्वयं व्यापारवान् होकर प्रमा के करणीभूत इन्द्रियादि का
अधिष्ठाता (प्रवर्त्तक) हो सकता है। यही प्रमाणों (प्रमा के करणों) की अविद्यावत्पुरुषों
में विषयता (आश्रयता या प्रेर्यता) है। प्रमा के करणीभूत इन्द्रियादि पदार्थों में यदि कोई
व्यापार या क्रिया नहीं होती, तब क्या क्षति ? इस प्रश्न का उत्तर है— 'नहीन्द्रियाण्यनु-
पादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः सम्भवति।' यहाँ 'व्यवह्रियतेऽनेन'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर
'व्यवहार' शब्द प्रमाणजनित ज्ञानरूप फल का उपस्थापक है। 'इन्द्रिय' पद अजहत्स्वार्थ
लक्षणा के द्वारा इन्द्रिय और लिङ्गादि करणों का वैसे ही बोधक है, जैसे कि 'दण्डिनो
गच्छन्ति'—यहाँ पर दण्डी पद दण्डी और अदण्डी के समुदाय का गमक होता है। 'इन्द्रिय'
पद की इन्द्रियादि में लक्षणा करने पर ही 'प्रत्यक्षादि'—ऐसे प्रयोग का औचित्य स्थिर
होता है। भाष्य में जो कहा गया है— 'इन्द्रियाण्यनुपादाय व्यवहारः।' वहाँ पर व्यवहाररूप
क्रिया के द्वारा व्यवहार क्रिया के कर्त्ता (व्यवहारी पुरुष) का आक्षेप करके 'अनुपादाय
व्यवहरति'—ऐसे प्रयोग का लाभ किया जाता है। इस प्रकार अनुपादान और व्यवहार—इन
दो क्रियाओं में समानकर्तृत्व का भान हो जाता है, जिसकी चर्चा विगत पृ० १५ पर की
जा चुकी है। 'अनुपादाय व्यवहारो न सम्भवति'—यहाँ प्रतीयमान 'अनुपादान' और
'सम्भव'—इन दो क्रियाओं का कर्त्ता एक नहीं, क्योंकि 'अनुपादान' क्रिया का कर्त्ता प्रमाता
और सम्भव क्रिया का कर्त्ता व्यवहार है, तब 'अनुपादाय'—इस पद में 'क्त्वा' प्रत्यय और
उसको 'ल्यप्' का आदेश नहीं हो सकता, अतः वहाँ 'अनुपादाय यो व्यवहारः, स न
सम्भवति'—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए। प्रमाता प्रमाणों को प्रवृत्त क्यों करता है?
प्रमाण स्वयं ज्ञानोत्पादनार्थ क्यों प्रवृत्त नहीं हो जाते? इस प्रश्न का उत्तर है— “न चाधिष्ठान-
मन्तरेण इन्द्रियाणां व्यापारः”। किसी चेतन अधिष्ठाता की प्रेरणा के बिना इन्द्रिय स्वयं
प्रवृत्त नहीं हो सकते, क्योंकि कुविन्द (तन्तुवाय या जुलाहा) की प्रेरणा के बिना केवल तुरी