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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
४४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १ ]

पपत्तेः । न हीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः संभवति । न चाधिष्ठानमन्तरेणे-
न्द्रियाणां व्यवहारः संभवति । न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद्व्याप्रियते । न


भामती

प्रमाणं प्रयोजनीयम् । न च स्वव्यापारमन्तरेण करणं प्रयोक्तुमर्हति । न च कूटस्थनित्यश्चिदात्माऽपरिणामी
स्वतो व्यापारवान् । तस्माद् व्यापारवद्बुद्ध्यादितादात्म्याध्यासाद् व्यापारवत्तया प्रमाणमधिष्ठातुमर्हतीति
भवत्यविद्यावत्पुरुषविषयत्वमविद्यावत्पुरुषाध्यस्त्वं प्रमाणानामिति । अथ मा प्रवर्त्तिषत प्रमाणानि किं
नश्छिन्नमित्यत आह ॐ नहीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः सम्भवति ॐ । व्यवह्रियतेऽनेनेति
व्यवहारः फलं, प्रत्यक्षादीनां प्रमाणानां फलमित्यर्थः । इन्द्रियाणीति, इन्द्रियलिङ्गादीनीति द्रष्टव्यं, दण्डिनो
गच्छन्तीतिवत् । एवं हि प्रत्यक्षादीत्युपपद्यते । व्यवहारक्रियया च व्यवहार्याक्षेपात्समानकर्तृकता ।
अनुपादाय यो व्यवहार इति योजना । किमिवि पुनः प्रमातोपादत्ते प्रमाणानि ? अथ स्वयमेव कस्मान्न
प्रवर्त्तन्ते प्रमाणानि इत्यत आह । ॐ न चाधिष्ठानमन्तरेणेन्द्रियाणां व्यापारः ॐ । प्रमाणानां व्यापारः
सम्भवति ॐ न जातु करणान्यनधिष्ठितानि कर्त्रा स्वकार्ये व्याप्रीयन्ते । मा भूत् कुविन्दरहितेभ्यो


भामती-व्याख्या

प्रवर्त्तयिता भवति”। उद्योतकार ने कहा है— “अनेन कारकप्रयोक्तृत्वं कर्तुः स्वातन्त्र्य-
मित्युक्तम्”]
। फलतः प्रमा के कर्त्ता को भी प्रमा के करण का प्रयोजक या प्रवर्त्तयिता होना
चाहिए। कर्त्ता पुरुष में जब तक अपना व्यापार (क्रिया) नहीं होता, तब तक वह करण
का प्रवर्त्तक नहीं हो सकता। कूटस्थ नित्य चिदात्मा अपरिणामी और अमूर्त द्रव्य है, उसमें
स्वतः क्रिया नहीं हो सकती, परिशेषतः व्यापार-युक्त सूक्ष्म और स्थूल शरीर रूप उपाधियों
के तादात्म्याध्यास से चिदात्मा स्वयं व्यापारवान् होकर प्रमा के करणीभूत इन्द्रियादि का
अधिष्ठाता (प्रवर्त्तक) हो सकता है। यही प्रमाणों (प्रमा के करणों) की अविद्यावत्पुरुषों
में विषयता (आश्रयता या प्रेर्यता) है। प्रमा के करणीभूत इन्द्रियादि पदार्थों में यदि कोई
व्यापार या क्रिया नहीं होती, तब क्या क्षति ? इस प्रश्न का उत्तर है— 'नहीन्द्रियाण्यनु-
पादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः सम्भवति।'
यहाँ 'व्यवह्रियतेऽनेन'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर
'व्यवहार' शब्द प्रमाणजनित ज्ञानरूप फल का उपस्थापक है। 'इन्द्रिय' पद अजहत्स्वार्थ
लक्षणा के द्वारा इन्द्रिय और लिङ्गादि करणों का वैसे ही बोधक है, जैसे कि 'दण्डिनो
गच्छन्ति'
—यहाँ पर दण्डी पद दण्डी और अदण्डी के समुदाय का गमक होता है। 'इन्द्रिय'
पद की इन्द्रियादि में लक्षणा करने पर ही 'प्रत्यक्षादि'—ऐसे प्रयोग का औचित्य स्थिर
होता है। भाष्य में जो कहा गया है— 'इन्द्रियाण्यनुपादाय व्यवहारः।' वहाँ पर व्यवहाररूप
क्रिया के द्वारा व्यवहार क्रिया के कर्त्ता (व्यवहारी पुरुष) का आक्षेप करके 'अनुपादाय
व्यवहरति'
—ऐसे प्रयोग का लाभ किया जाता है। इस प्रकार अनुपादान और व्यवहार—इन
दो क्रियाओं में समानकर्तृत्व का भान हो जाता है, जिसकी चर्चा विगत पृ० १५ पर की
जा चुकी है। 'अनुपादाय व्यवहारो न सम्भवति'—यहाँ प्रतीयमान 'अनुपादान' और
'सम्भव'—इन दो क्रियाओं का कर्त्ता एक नहीं, क्योंकि 'अनुपादान' क्रिया का कर्त्ता प्रमाता
और सम्भव क्रिया का कर्त्ता व्यवहार है, तब 'अनुपादाय'—इस पद में 'क्त्वा' प्रत्यय और
उसको 'ल्यप्' का आदेश नहीं हो सकता, अतः वहाँ 'अनुपादाय यो व्यवहारः, स न
सम्भवति'
—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए। प्रमाता प्रमाणों को प्रवृत्त क्यों करता है?
प्रमाण स्वयं ज्ञानोत्पादनार्थ क्यों प्रवृत्त नहीं हो जाते? इस प्रश्न का उत्तर है— “न चाधिष्ठान-
मन्तरेण इन्द्रियाणां व्यापारः”
। किसी चेतन अधिष्ठाता की प्रेरणा के बिना इन्द्रिय स्वयं
प्रवृत्त नहीं हो सकते, क्योंकि कुविन्द (तन्तुवाय या जुलाहा) की प्रेरणा के बिना केवल तुरी

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४५

चैतस्मिन्सर्वस्मिन्नसति असङ्गस्यात्मनः प्रमातृत्वमुपपद्यते । न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति । तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि च ।

भामती

वेमादिभ्यः पटोत्पत्तिरिति । अथ देह एवाधिष्ठाता कस्मान्न भवति, कृतमत्रात्माध्यासेनेत्यत आह ॐ न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद्व्याप्रियते ॐ । सुषुप्तेऽपि व्यापारप्रसङ्गादिति भावः । स्यादेतत्--यथाऽनध्यस्तात्मभावं वेमादिकं कुविन्दो व्यापारयन् पटस्य कर्त्ता, एवमनध्यस्तात्मभावं देहेन्द्रियादि व्यापारयन् भविष्यति तदभिज्ञः प्रमातेत्यत आह ॐ न चैतस्मिन् सर्वस्मिन् ॐ । इतरेतराध्यासे इतरेतरधर्माध्यासे चासति आत्मनोऽसङ्गस्य सर्वथा सर्वदा सर्वधर्मधर्मिवियुक्तस्य प्रमातृत्वमुपपद्यते । व्यापारवन्तो हि कुविन्दादयो वेमादीनधिष्ठाय व्यापारयन्ति । अनध्यस्तात्मभावस्य तु देहादिष्वात्मनो न व्यापारयोगोऽसङ्गत्वादित्यर्थः । अतश्चाध्यासाश्रयाणि प्रमाणानीत्याह ॐ न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति ॐ । प्रमायां खलु फले स्वतन्त्रः प्रमाता भवति । अन्तःकरणपरिणामभेदश्च प्रमेयप्रवणः कर्तृस्थश्चित्स्वभावः प्रमा कथं च जडस्यान्तःकरणस्य परिणामश्चिद्रूपो भवेत् । यदि चिदात्मा तत्र नाध्यस्येत ? कथं चिदात्मकत्तृको भवेत् । यद्यन्तःकरणं व्यापारवच्चिदात्मनि नाध्यस्येत् ? तस्मादितरेतराध्यासाच्चिदात्मकत्तृस्थं प्रमाफलं सिध्यति । तत्सिद्धौ च प्रमातृत्वं, तामेव च प्रमामुररीकृत्य प्रमाणस्य प्रवृत्तिः । प्रमातृत्वेन च प्रमोपलक्ष्यते । प्रमायाः फलस्याभावे प्रमाणं न प्रवर्त्तेत । तथा च प्रमाणमप्रमाणं

भामती-व्याख्या

और वेमादि साधनों से पट की उत्पत्ति कहीं भी नहीं देखी जाती। तुरी-वेमादि कारण-कलाप का अधिष्ठाता केवल शरीर क्यों नहीं हो जाता, इसमें आत्मा के तादात्म्याध्यास की क्या आवश्यकता ? इस शङ्का का समाधान है—"न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद् व्याप्रीयते।" जिस देह में आत्मा का अध्यास न हो, उस देह के द्वारा कुछ भी संचालित नहीं होता, अन्यथा सुषुप्ति अवस्था में भी शरीर के द्वारा करण-ग्राम का सञ्चालन होना चाहिए। 'जिन तुरी-वेमादि साधनों में आत्मा का तादात्म्याध्यास नहीं होता, उन साधनों को भी कुविन्द सञ्चालित कर पटादि कार्यों का जैसे कर्त्ता बन जाता है, वैसे ही जिन देहादि पदार्थों में आत्माध्यास नहीं होता, उनको सञ्चालित करके उनका अभिज्ञ व्यक्ति प्रमाता क्यों नहीं बन जाता ?' इस शङ्का का समाधान है—"न चैतस्मिन् सर्वस्मिन् असति"। अर्थात् इस आत्मा के तादात्म्याध्यास के बिना सर्वथा असङ्ग एवं समस्त धर्मधर्मिभाव से रहित आत्मा में प्रमातृत्व नहीं बन सकता, क्योंकि कुविन्दादि स्वयं सक्रिय होकर ही तुरी वेमादि का सञ्चालन कर सकते हैं। जिस आत्मा में देहादि का तादात्म्याध्यास नहीं, उसमें किसी प्रकार की भी क्रिया सम्भव नहीं, क्योंकि आत्मा असङ्ग है। प्रमाणों के अध्यासापेक्षी होने में यह भी एक कारण है कि "न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति।" आशय है कि प्रमारूप फल के उत्पादन में स्वतन्त्र कर्त्ता को प्रमाता कहा गया है। अन्तःकरण के उस परिणाम-विशेष को प्रमा कहा जाता है, जो प्रमेय-विषयक और कर्त्ता में रहनेवाला चित्स्वभाव है। जड़ाभूत अन्तःकरण का चित्स्वरूप परिणाम तभी सम्भव होगा, जब कि अन्तःकरण में चिदात्मा का तादात्म्याध्यास होगा। उक्त प्रमा का कर्त्ता आत्मा तभी होगा, जबकि कर्तृत्ववादि धर्म-युक्त अन्तःकरण का आत्मा में तादात्म्याध्यास होगा, फलतः आत्मा और अन्तःकरणादि का अन्योऽन्याध्यास होने पर ही प्रमारूपफल चिदात्मरूप कर्त्ता के आश्रित सिद्ध हो सकेगा, उसकी सिद्धि हो जाने पर कर्त्ता में प्रमातृत्व बन सकेगा और उसी प्रमा को उद्देश्य करके प्रमाणों की प्रवृत्ति होती है। भाष्यकार ने जो कहा है—"न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिः"। वहाँ पर 'प्रमातृत्व' पद की लक्षणा 'प्रमा' में की जाती है, क्योंकि प्रमारूप फल के न होने पर प्रमाण

४६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

पश्वादिभिश्चाविशेषात् । यथा हि पश्वादयः शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां संबन्धे सति शब्दादिविज्ञाने प्रतिकूले जाते ततो निवर्तन्ते, अनुकूले च प्रवर्तन्ते; यथा दण्डोद्यतकरं पुरुषमभिमुखमुपलभ्य मां हन्तुमयमिच्छतीति पलायितुमारभन्ते, हरिततृणपूर्णपाणि-

भामती

स्यादित्यर्थः । उपसंहरति— ॐ तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ॐ ।

स्यादेतत् — भवतु पृथग्जनानामेवम् , आगमोपपत्तिप्रतिपन्नप्रत्यगात्मतत्त्वानां व्युत्पन्नानामपि पुंसां प्रमाणप्रमेयव्यवहारा दृश्यन्त इति कथमविद्यावद्विषयाण्येव प्रमाणानीत्यत आह । ॐ पश्वादिभिश्चाविशेषादिति ॐ । विदन्तु नामागमोपपत्तिभ्यां देहेन्द्रियादिभ्यो भिन्नं प्रत्यगात्मानं, प्रमाणप्रमेयव्यवहारे तु प्राणभृन्मात्रधर्मान्नातिवर्तन्ते । यादृशो हि पशुशकुन्तादीनामविप्रतिपन्नमुग्धभावानां व्यवहारस्तादृशो व्युत्पन्नानामपि पुंसां दृश्यते । तेन तत्सामान्यात्तेषामपि व्यवहारसमयेऽविद्यावत्त्वमनुमेयम् । चशब्दः समुच्चये, उक्तशङ्कानिवर्तनसहितपूर्वोक्तोपपत्तिरविद्यावत्पुरुषविषयत्वं प्रमाणानां साधयतीत्यर्थः । एतदेव विभजते ॐ यथा हि पश्वादयः इति ॐ । अत्र च ॐ शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां सम्बन्धे सति ॐ इति प्रत्यक्षं प्रमाणं दर्शितम् । ॐ शब्दादिविज्ञाने ॐ इति तत्फलमुक्तम् । ॐ प्रतिकूले ॐ इति चानुमानफलम् । तथाहि — शब्दादिस्वरूपमुपलभ्य तज्जातीयस्य प्रतिकूलतामनुस्मृत्य तज्जातीयतयोपलभ्यमानस्य प्रतिकूलतामनुमिमीत इति । उदाहरति— ॐ यथा दण्डेति ॐ । शेषमतिरोहितार्थम् । स्यादेतत् — भवन्तु

भामती-व्याख्या

की प्रवृत्ति क्योंकर होगी ? तब प्रमाण अप्रमाण होकर रह जायगा । अविद्यावद्विषयकत्व का उपसंहार किया जाता है— "तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ।"

साधारण पठित या अपठित व्यक्तियों के प्रत्यक्षादि प्रमाण तो अवश्य ही अविद्यावान् पुरुषों में सीमित माने जा सकते हैं, किन्तु जिन मनीषियों ने आगम प्रमाण और आगमानुकूल युक्तियों के बल पर आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया है, ऐसे व्युत्पन्न विद्वानों के प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों में अविद्यावद्विषयकत्व क्योंकर सम्भव होगा ? इस शङ्का का अपनयन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'पश्वादिभिश्चाविशेषात्' । भले ही तत्त्ववेत्ता पुरुष उपनिषदादि प्रमाणों और उनकी अनुगुण उपपत्तियों की सहायता से देहेन्द्रियादि-भिन्न प्रत्यगात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लें, किन्तु प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों में साधारण प्राणियों की मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया करते, क्योंकि पशु-पक्षी आदि अव्युत्पन्न प्राणियों के व्यवहार जैसे देखे जाते हैं, वैसे ही व्युत्पन्न विद्वानों के भी व्यवहार देखे जाते हैं । इस प्रकार व्यवहारों की समानता के द्वारा व्युत्पन्न विद्वानों के प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी अविद्यावत्पुरुषविषयकत्व का अनुमान किया जा सकता है—'विदुषामपि प्रत्यक्षादिव्यवहारः, अध्यासनिबन्धनः, व्यवहारत्वात्, पश्वादिव्यवहारवत्' । भाष्य में प्रयुक्त 'च' शब्द समुच्चयार्थक है, उसके प्रयोग से अध्यासनिबन्धनत्व की सिद्धि में उक्त आशङ्का की निवृत्ति और कथित युक्तियों का समुच्चय किया जाता है । भाष्यकार अपने दृष्टान्त का स्पष्टीकरण स्वयं कर रहे हैं—"यथा पश्वादयः" इत्यादि । 'शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां सम्बन्धे सति'—इस वाक्य के द्वारा प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाया है । 'शब्दादि विज्ञाने'—इस वाक्य से प्रत्यक्ष का फल सूचित किया है । 'प्रतिकूले'—ऐसा कह कर अनुमान का फल प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि शब्दादि को श्रोत्र से सुन एवं उसी प्रकार के शब्द की प्रतिकूलता का स्मरण कर 'तज्जातीयत्व' हेतु के द्वारा उपलभ्यमान शब्द में प्रतिकूलता ( अनिष्ट-साधनता ) का अनुमान किया जाता है—'अयं शब्दः, मदनिष्ट-साधनम्, शब्दविशेषत्वात्, पूर्वोपलब्धशब्दवत्' । उदाहरण दिया गया—"यथा दण्ड"—इत्यादि से ।

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७

मुपलभ्य तं प्रत्यभिमुखीभवन्ति; एवं पुरुषा अपि व्युत्पन्नचित्ताः क्रूरदृष्टीनाक्रोशतः खड्गोद्यतकरांर्बलवत उपलभ्य ततो निवर्तन्ते, तद्विपरीतान्प्रति प्रवर्तन्ते, अतः समानः पश्वादिभिः पुरुषाणां प्रमाणप्रमेयव्यवहारः। पश्वादीनां च प्रसिद्धोऽविवेकपुरःसरः प्रत्यक्षादिव्यवहारः। तत्सामान्यदर्शनाद् व्युत्पत्तिमत्तामपि पुरुषाणां प्रत्यक्षादिव्यवहारस्तत्कालः समान इति निश्चीयते।

शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वात्मनः परलोकसंबं-

भामती

प्रत्यक्षादीन्यविद्यावद्विषयाणि। शास्त्रं तु ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेतेत्यादि न देहात्माध्यासेन प्रवर्तितुमर्हति। अत्र खल्वामुष्मिकफलोपभोगयोग्योऽधिकारी प्रतीयते। तथा च पारमर्षं सूत्रम् - “शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात्स्वयं प्रयोगे स्यादिति”। न च देहादि भस्मीभूतं पारलौकिकाय फलाय कल्पत इति देहाद्यतिरिक्तं कञ्चिदधिकारिणमाक्षिपति शास्त्रं, तदवगमश्च विद्येति कथमविद्यावद्विषयं शास्त्रमित्याशङ्कयाह ॐ शास्त्रीये तु इति ॐ। तुशब्दः प्रत्यक्षादिव्यवहाराद्विनक्ति शास्त्रीयम्। अधिकारशास्त्रं हि स्वर्गकामस्य पुंसः परलोकसम्बन्धं विना न निर्वहतीति तावन्मात्रमाक्षिपेत्, न स्वस्यासंसारित्वमपि तस्याधिकारेऽनुपयोगात्। प्रत्युतोपनिषदस्य पुरुषस्याकर्तुरभोक्तुरधिकारविरोधात्। प्रयोक्ता हि कर्मणः कर्मजनितफलभोगभागी कर्मण्यधिकारी स्वामी भवति। तत्र कथमकर्ता प्रयोक्ता कथं वाऽभोक्ता कर्मजनितफलभोगभागी? तस्मादनाद्यविद्यालब्धकर्तृत्वभोक्तृत्वब्राह्मणत्वाद्यभिमानिनं नरमधिकृत्य विधि-निषेधशास्त्रं प्रवर्तते। एवं वेदान्ता अप्यविद्यावत्पुरुषविषया एव, नहि प्रमात्रादिविभागादृते तदर्थाधि-

भामती-व्याख्या

उसकी ओर दौड़ता आ रहा है, तब वह वहाँ से भाग खड़ी होती है और जब अपने मालिक को हरा-हरा घास लिये अपनी ओर पुचकार करते आता देखती है, तब गौ अपने मालिक के पास आ जाती है। इसी प्रकार हिताहित की बात सोच-समझ कर प्राणिमात्र का व्यवहार प्रवृत्त होता है]।

यहाँ यह शङ्का अवश्य उठ जाती है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रवृत्ति अध्यासमूलक मानी जा सकती है, किन्तु “ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत”—इत्यादि शास्त्र देहात्माध्यासमूलक नहीं हो सकते, क्योंकि ज्योतिष्टोमादि कर्मों का अधिकारी वही हो सकता है, जो पारलौकिक स्वर्गादि फलों का उपभोग करने योग्य हो, जैसे कि महर्षि जैमिनि कहते हैं— “शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात् स्वयं प्रयोगे स्यात्” (जै. सू. ३।७।१८) अर्थात् वेद-प्रतिपादित स्वर्गादिरूप फल कर्म के प्रयोक्ता (अनुष्ठान करनेवाले कर्त्ता) को ही प्राप्त होता हैं, क्योंकि विधिवाक्य-घटक ‘स्वर्गकाम,’ इत्यादि शब्द उसी कर्त्ता का फलभोक्तृत्वरूप लक्षण प्रस्तुत करते हैं। यजमान को अपने स्वयं किए हुए कर्मों का ही फल मिलता है। जन्मान्तर में प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलों का भोग यजमान का यह शरीर नहीं कर सकता, क्योंकि प्राण निकल जाने पर इस शरीर को यहाँ ही भस्म कर दिया जाता है, अतः उक्त शास्त्र देहादि से भिन्न किसी अधिकारी का आक्षेप करता है, देहादि से अतिरिक्त आत्मरूप अधिकारी का ज्ञान ही विद्या कहलाता है, अतः शास्त्र को अविद्यावत्पुरुषविषयक क्योंकर कहा जा सकेगा? इस आशङ्का का उचित समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वा परलोकसम्बन्धमधिक्रियते।” ‘तु’ पद के द्वारा शास्त्रीय व्यवहार में प्रत्यक्षादि-व्यवहारों से विशेषता ध्वनित की है। अधिकार (फल-भोक्तृत्व-प्रतिपादक) शास्त्र का निर्वाह तब तक नहीं होता, जब तक स्वर्गकामनावान् पुरुष का परलोक के साथ सम्बन्ध उपपन्न नहीं हो जाता, अतः अधिकार-शास्त्र केवल इतना

४८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

न्धमधिक्रियते, तथापि न वेदान्तवेद्यम्, अशनायाद्यतीतम्, अपेतब्रह्मक्षत्रादिभेदम्, असंसार्यात्मतत्त्वमधिकारेऽपेक्ष्यते, अनुपयोगादधिकारविरोधाच्च । प्राक् च तथाभूतात्मविज्ञानात्प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते । तथा

भामती

गमः । ते त्वविद्यावन्तमनुशासन्तो निर्मृष्टनिखिलाविद्यमनुशिष्टं स्वरूपे व्यवस्थापयन्तीत्येतावानेषां विशेषः । तस्मादविद्यावत्पुरुषविषयाण्येव शास्त्राणीति सिद्धम् ॥

स्यादेतद् — यद्यपि विरोधानुपयोगाभ्यामौपनिषदः पुरुषोऽधिकारे नापेक्ष्यते, तथाप्युपनिषद्गूढोऽवगम्यमानः शक्नोत्यधिकारं निरोद्धुम् । तथा च परस्परापहतार्थत्वेन कृत्स्न एव वेदः प्रामाण्यमपजह्यादित्यत आह ॐ प्राक् च तथाभूतात्म इति ॐ । सत्यमौपनिषदपुरुषाधिगमोऽधिकारविरोधी, तस्मात्तु पुरस्तात् कर्मविधयः स्वोचितं व्यवहारं निर्वर्त्तयन्तो नानुपजातेन ब्रह्मज्ञानेन शक्या निरोद्धुम् । न च परस्परापह्नतिः, विद्याविद्यावत्पुरुषभेदेन व्यवस्थोपपत्तेः । यथा “न हिंस्यात् सर्वा भूतानीति” साध्यांश-निषेधेऽपि “श्येनेनाभिचरन् यजेतेति” शास्त्रं प्रवर्त्तमानं न हिंस्यादित्यनेन न विरुध्यते, तत् कस्य हेतोः ?

भामती-व्याख्या

ही आक्षेप कर सकता है कि हमारे फल का भोक्ता परलोकसम्बन्ध के योग्य है । उससे अधिक भोक्ता में असंसारित्वादि का आक्षेप नहीं कर सकता, क्योंकि असंसारित्वादि का प्रतिपादन अधिकार में उपयोगी नहीं, प्रत्युत उपनिषद्-गम्य असंसारित्व ( अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व ) फल-भोक्तृत्वरूप अधिकार के विरुद्ध है, क्योंकि प्रयोक्ता ( कर्म का प्रयोग करनेवाला कर्त्ता ) ही कर्म-जनित फल का भोक्ता बन कर कर्म का अधिकारी ( स्वामी ) माना जाता है । वहाँ अकर्त्ता पुरुष कर्म का अनुष्ठाता एवं अभोक्ता पुरुष कर्म-जनित फल के भोग का भागी कैसे बनेगा ? फलतः अनादि अविद्या से प्रयुक्त कर्तृत्व-भोक्तृत्व के अधिकारी पुरुष को उद्देश्य करके ही विधि-निषेध शास्त्र प्रवृत्त होते हैं। इसी प्रकार वेदान्त शास्त्र भी अविद्यावत्पुरुष को ही विषय करके प्रवृत्त होता है, क्योंकि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयादि-विभाग के बिना वेदान्त शास्त्र के अर्थ का ज्ञान ही नहीं हो सकता । वेदान्त वाक्य तो अविद्यावान् पुरुष को अपने पावन उपदेशों के द्वारा सकल आध्यासिक परिच्छेदों से निकाल कर अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप में व्यवस्थापित कर देते हैं— इतना वेदान्त-शास्त्र का विधि-निषेधात्मक धर्म-शास्त्र से अन्तर अवश्य है । इस प्रकार यह एकान्ततः सिद्ध हो जाता है कि सभी शास्त्र अविद्यावान् पुरुष को विषय करते हैं ।

यद्यपि कथित अनुपयोग और विरोध होने के कारण औपनिषद ( अकर्त्ता-अभोक्ता ) पुरुष कर्माधिकार में अपेक्षित नहीं, तथापि उपनिषत् प्रमाण से अवगम्यमान पुरुष कर्माधिकार का निरोध या बाध तो कर सकता है । इस प्रकार परस्पर-बाधित अर्थ का प्रतिपादक वेद अपनी प्रमाणता खो बैठेगा । इस आक्षेप का परिहार किया गया—"प्राक् तथाभूतात्म-विज्ञानात् प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते” । यह सत्य है कि औपनिषद पुरुष का ज्ञान कर्माधिकार का विरोधी है, किन्तु उस ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व कर्म-विधायक वाक्य अपने अनुकूल व्यवहार का सम्पादन करते हुए अनुत्पन्न ब्रह्म-ज्ञान के द्वारा बाधितार्थक नहीं हो सकते ? कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड का परस्पर कोई विरोध भी नहीं, क्योंकि कर्म-काण्ड का अधिकारी अज्ञानवान् और ज्ञान-काण्ड का अधिकारी ज्ञानवान् पुरुष होता है—इस प्रकार अधिकारी के भेद से उक्त काण्डों की व्यवस्था हो जाती है। जैसे कि “न हिंस्यात् सर्वाभूतानि” ( कूर्मपु० अ. १६ ) । यह शास्त्र साध्यरूप हिंसा का निषेध करता है और "श्येनेनाभिचरन् यजेत” ( षड्विं. ब्रा. १।८ ) यह शास्त्र हिंसा ( शत्रु-वध ) का विधान करता है,

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४९

हि—'ब्राह्मणो यजेत' इत्यादीनि शास्त्राण्यात्मनि वर्णाश्रमवयोऽवस्थादिविशेषाध्यास-

भामती

पुरुषभेदादिति । अवजितक्रोधारातयः पुरुषा निषेधेऽधिक्रियन्ते, क्रोधारातिवशीकृतास्तु श्येनादिशास्त्र इति । अविद्यावत्पुरुषविषयत्वं नातिवर्त्तत इति यदुक्तं तदेव स्फोरयति ॐ तथाहि इति ॐ । वर्णाध्यासः—"राजा राजसूयेन यजेतेत्यादिः” । आश्रमाध्यासः—"गृहस्थः सदृशीं भार्यां विन्देदित्यादिः” । वयोऽध्यासः—"कृष्णकेशोऽग्नीनादधीतेत्यादिः” । अवस्थाध्यासः—अप्रतिसमाधेयव्याधीनां जलादिप्रवेशेन प्राणत्याग इति । आदिग्रहणं महापातकोपपातकसङ्करीकरणापात्रीकरणमलिनीकरणाद्यध्यासोपसंग्र-

भामती-व्याख्या

फिर भी इन दोनों शास्त्रों का कोई विरोध नहीं, क्योंकि अधिकारी पुरुष के भेद से उनकी व्यवस्था बन जाती है। अर्थात् क्रोधरूप शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेनेवाले पुरुष "न हिंस्यात्”—इस निषेध शास्त्र के अधिकारी एवं क्रोधरूप शत्रु के वशवर्ती पुरुष 'श्येनेनाभिचरन्’—इत्यादि विधि शास्त्रों के अधिकारी माने जाते हैं। यह जो कहा गया कि "शास्त्रमविद्यावत्पुरुषविषयत्वं नातिवर्तते”। उसी का विशदीकरण किया जाता है—"तथा हि” इत्यादि से। वर्णाध्यास का उदाहरण है—"राजा राजसूयेन स्वाराज्यकामो यजेत” (आप. श्रौ. सू. १८।८।१४) । यहाँ राजा का अर्थ क्षत्रिय है, अतः क्षत्रिय वर्ण का अभिमानी पुरुष राजसूय कर्म का अधिकारी है। आश्रमाध्यास भी कहीं अपेक्षित है, जैसे—"गृहस्थः सदृशीं भार्या विन्देत्” (गौतम स्मृ. ४) । यहाँ गृहस्थ आश्रम का अध्यास होना चाहिए। "जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत”—इत्यादि शास्त्रों के द्वारा विहित अग्न्याधान कर्म में लगभग तीस वर्ष की अवस्था का अभिमान अनिवार्य है। "अप्रतिसमाधेयव्याधीनां जलादिप्रवेशेन प्राणत्यागः”—इत्यादि वाक्यों में असाध्य रोग से पीड़ित अवस्था की अपेक्षा है। आदि पद के द्वारा (१) महापातक, (२) उपपातक, (३) संकरीकरण, (४) अपात्रीकरण, (५) मलिनीकरणादि का अध्यास गृहीत होता है [ (१) ब्रह्महत्यादि को महापातक कहा गया है—

"ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥” (मनु. ११।४)

उपपातक इस प्रकार गिनाए गए हैं—

गोवधोऽयाज्यसंयाज्यपारदार्यात्मविक्रयाः ।
गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥
परिवित्तिताऽनुजेऽनूढे परिवेदनमेव च ।
तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥
कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् ।
तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥
व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च ।
भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥
सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥
बन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् ।
आत्मार्थे च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥
अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामपक्रिया ।
असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥


५०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

माश्रित्य प्रवर्तन्ते । अध्यास्रो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम । तद्यथा-पुत्रभार्या-दिषु विकलेषु सकलेषु वा अहमेव विकलः सकलो वेति बाह्यधर्मानात्मन्यध्यस्यति;

भामती

हार्यम् ।

तदेवमात्मानात्मनोः परस्पराध्यासमाक्षेपसमाधानाभ्यामुपपाद्य प्रमाणप्रमेयव्यवहारप्रवर्त्तनेन च दृढीकृत्य तस्यानर्थहेतुतामुदाहरणप्रपञ्चेन प्रतिपादयितुं तत्स्वरूपमुक्तं स्मारयति ॐ अध्यास्रो नामातस्मिं-स्तद्बुद्धिरित्यवोचाम ॐ । 'स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः' इत्यस्य संक्षेपाभिधानमेतत् । तत्राहमिति धर्मितादात्म्याध्यासमात्रं ममेत्यनुत्पादितधर्माध्यासं नानर्थहेतुरिति धर्माध्यासमेव ममकारं साक्षादशेषा-नर्थसंसारकारणमुदाहरणप्रपञ्चेनाह ॐ तद्यथा, पुत्रभार्यादिषु इति ॐ । देहतादात्म्यमात्मन्यध्यस्य देहधर्मं पुत्रकलत्रादिस्वाम्यं च कृशत्वादिवदारोप्याहाहमेव विकलः सकल इति । स्वस्य खलु साकल्येन स्वाम्य-साकल्यात् स्वामीश्वरः सकलः सम्पूर्णो भवति । तथा स्वस्य वैकल्येन स्वाम्यवैकल्यात् स्वामीश्वरो विकलोऽसम्पूर्णो भवतीति । बाह्यधर्मा ये वैकल्यादयः स्वाम्यप्रणालिकया सञ्चारिताः शरीरे तानात्मन्यध्य-

भामती-व्याख्या

धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।
स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ ( मनु. ११।५९-६६ )

गर्दभ-वधादि को सङ्कलीकरण कहा गया है—

खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा ।
संकीरीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ ( मनु. ११।६८ )

अपात्र से दानादि-ग्रहण अपात्रीकरण कहा गया है—

निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ।
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ ( मनु० ११।६९ )

मनुस्मृति में मलिनीकरण पातक भी गिनाए हैं—

कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् ।
फलैधःकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ ( मनु० ११।७० ) ] ।

इस प्रकार आत्मानात्मपदार्थों के अन्योऽन्याध्यास का आक्षेपसमाधानपूर्वक उपपादन किया गया, प्रमाण-प्रमेय-व्यवहार की उसमें प्रवर्तकता दिखाकर अध्यास का दृढीकरण दिखाया गया, अब विविध उदाहरणों के माध्यम से अध्यास की कथित अनर्थ-हेतुता का चित्रण करने के लिए अध्यास के पूर्वोक्त स्वरूप का स्मरण दिलाया जाता है—“अध्यासो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम”। यह “स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः”—इस विशद लक्षण का संक्षिप्ताभिधान मात्र है। अध्यास के दो अंश दिखाए गए—( १ ) अहङ्काराध्यास और ( २ ) ममकाराध्यास। इन्हीं को क्रमशः धर्म्यध्यास और धर्माध्यास भी कहा जाता है। इनमें धर्माध्यास साक्षात् अनर्थ का हेतु है—यह अनेक उदाहरणों के द्वारा सिद्ध किया जाता है—“पुत्रभार्यादिषु”। आत्मा में देह का तादात्म्याध्यास करके देह के धर्मभूत पुत्रभार्यादि के स्वामित्व एवं कृशत्वादि का आरोप करके मनुष्य कहता है—“अहमेव विकलः सकलः”—इत्यादि। अर्थात् पुत्रादिरूप स्वकीय जनों की सकलता ( सम्पन्नता ) से उसका स्वामित्व सकल हो जाने के कारण स्वामी अपने को सकल ( सम्पन्न ) मानता है। उसी प्रकार पुत्रादि स्वकीय परिजनों की विकलता ( विपन्नता ) से अपने को विकल मानता है—इस प्रकार पुत्रादि बाह्य पदार्थों के धर्म स्वामित्व-परम्परा से आत्मा में सञ्चारित और अध्यस्त होते दिखाए गए। ये वैकल्य और साकल्यादि धर्म देह के अपने नहीं, अपितु पुत्रादि उपाधियों के

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१

तथा देहधर्मान्-स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, गौरोऽहं तिष्ठामि, गच्छामि, लङ्घयामि चेति। तथेन्द्रियधर्मान्-मूकः, काणः, क्लीबः, बधिरः, अन्धोऽहमिति। तथाऽन्तःकरणधर्मान्-कामसंकल्पविचिकित्साध्यवसायादीन् । एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचारसाक्षिणि प्रत्यगात्मन्यध्यस्य, तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेणान्तःकरणादि-

भामती

स्यतीत्यर्थः। यदा च परोपाध्यपेक्षे देहधर्मे स्वाम्ये इयं गतिस्तदा कैव कथाऽनौपाधिकेषु देहधर्मेषु कृशत्वादिवित्यभिप्रायवानाह ꣤ तथा देहधर्मान् इति ꣥। देहादप्यन्तरङ्गाणामिन्द्रियाणामध्यस्तात्मभावानां धर्मान्मूकत्वादींस्ततोऽप्यन्तरङ्गस्यान्तःकरणस्याध्यस्तात्मभावस्य धर्मान् कामसङ्कल्पादीन् आत्मन्यध्यस्यतीति योजना।

तदनेन प्रपञ्चेन धर्माध्यासमुक्त्वा तस्य मूलं धर्म्यध्यासमाह ꣤ एवमहम्प्रत्ययिनम् ꣥। अहम्प्रत्ययो वृत्तिर्यस्मिन्नन्तःकरणादौ सोऽयमहम्प्रत्ययी तं ꣤ स्वप्रचारसाक्षिणि ꣥ अन्तःकरणप्रचारसाक्षिणि, चैतन्योदासीनताभ्यां, ꣤ प्रत्यगात्मन्यध्यस्य ꣥ तदनेन कर्तृत्वभोक्तृत्वे उपपादिते। चैतन्यमुपपादयति ꣤ तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेण ꣥ अन्तःकरणादिविपर्ययेण, अन्तःकरणाद्यचेतनं तस्य विपर्ययः चैतन्यं तेन, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया। ꣤ अन्तःकरणादिष्वध्यस्यति ꣥। तदनेनान्तःकरणाद्यवच्छिन्नः प्रत्यगात्मा इदमनिदंरूपश्चेतनः कर्त्ता भोक्ता कार्य्यकारणाविद्याद्वयाधारोऽहङ्कारास्पदं

भामती-व्याख्या

द्वारा सञ्चारित औपाधिक धर्म हैं, उनकी जब ऐसी गति है, तब देहगत अनौपाधिक कृशत्वादि का आरोप आत्मा में क्यों न होगा? इसी भाव की अभिव्यक्ति करने के लिए कहा है— "तथा देहधर्मान्"। देह की अपेक्षा इन्द्रियाँ अन्तरङ्ग हैं, जिन वागादि इन्द्रियों में आत्मरूपता अध्यस्त है, उनके मूकत्वादि धर्मों एवं उनसे भी अन्तरङ्ग अन्तःकरण के सङ्कल्पादि धर्मों का आत्मा में अध्यास हो जाता है—इस प्रकार भाष्यार्थ की योजना कर लेनी चाहिए।

विस्तारपूर्वक धर्माध्यास की चर्चा करने के पश्चात् धर्माध्यास के मूल कारण धर्म्यध्यास का भाष्यकार वर्णन कर रहे हैं— "एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचारसाक्षिणि प्रत्यगात्मानमध्यस्य"। 'अहम्', 'अहम्'--इस प्रकार का प्रत्यय (वृत्ति) जिसमें होता है, उस अन्तःकरण को 'अहंप्रत्ययी' कहते हैं। उस (अन्तःकरण) का तादात्म्याध्यास उस प्रत्यगात्मा में किया जाता है, जो अन्तःकरण की वृत्तियों का स्वगत चैतन्य (ज्ञान) और तटस्थता के कारण साक्षी है [लोक में भी साक्षी वही पुरुष कहा जाता है, जो किसी वाद का ज्ञान तो रखता है, किन्तु उस वाद में सक्रिय भाग नहीं लेता, तटस्थ रहता है]। इस प्रकार 'अन्तःकरण से तादात्म्यापन्न होकर प्रत्यगात्मा अपने को कर्त्ता-भोक्ता मानने लगता है'--यह दिखाया गया। अन्तःकरण में चैतन्यारोप दिखाया जाता है— "तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणम्"। "तद्विपर्ययेण" का अर्थ है—अन्तःकरणगत अचैतन्य (जाड्य) के विपरीत जो चैतन्य है, उस चैतन्य से उपलक्षित आत्मा का अन्तःकरण में अध्यास होता है। 'तद्विपर्ययेण'—यहाँ तृतीया विभक्ति "इत्थंभूतलक्षणे" (पा. सू. २।३।२१) इस सूत्र के द्वारा विहित हुई है [जो कि ज्ञापकार्थक होती है, जैसे किसी व्यक्ति के शिर पर जटाएँ देख कर समझ लिया जाता है कि यह तपस्वी है। वहाँ 'जटाभिः तापसः' ऐसा प्रयोग होता है, वैसे ही 'तद्विपर्ययेण प्रत्यगात्मा अध्यस्तो भवति'-यहाँ पर 'जाड्यविपरीतेन चैतन्यरूपेण'-ऐसा अर्थ फलित होता है]। "अन्तःकरणादिषु अध्यस्यति" ऐसा कह कर भाष्यकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अन्तःकरणादि से अवच्छिन्न प्रत्यगात्मा 'इदम्' और 'अनिदम्'-इस प्रकार विरुद्धरूपापन्न (चिदचिद्रूप) होकर चेतन, कर्त्ता-भोक्ता, 'कार्याविद्या और कारणाविद्या'--इन दो प्रकार की 'अविद्याओं का आधारभूत,

५२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १


ऽध्यस्यति । एवमयमनादिरनन्तो नैसर्गिकोध्यासो मिथ्याप्रत्ययरूपः कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रवर्तकः सर्वलोकप्रत्यक्षः । अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय, आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये

भामती

संसारी सर्वानर्थसम्भारभाजनं जीवात्मा इतरेतराध्यासोपादानस्तदुपादानश्चाध्यास इत्यनादित्वाद्वीजाङ्कुरवन्नेतरेतराश्रयत्वमित्युक्तं भवति । प्रमाणप्रमेयव्यवहारदृढीकृतमपि शिष्यहिताय स्वरूपाभिधानपूर्वकं सर्वलोकप्रत्यक्षतयाऽध्यासं सुदृढीकरोति । ॐ एवमयमनादिरनन्तः ॐ तत्त्वज्ञानमन्तरेणाशक्यसमुच्छेदः । अनाद्यनन्तत्वे हेतुरुक्तः ॐ नैसर्गिकः ॐ इति । ॐ मिथ्याप्रत्ययरूपः ॐ मिथ्याप्रत्ययानां रूपमनिर्वचनीयत्वं तद्यस्य स तथोक्तः, अनिर्वचनीय इत्यर्थः । प्रकृतमुपसंहरति ॐ अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय ॐ । विरोधिप्रत्ययं विना कुतोऽस्य प्रहाणमित्यत उक्तम् ॐ आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये ॐ । प्रतिपत्तिः प्राप्तिः तस्यै न तु जपमात्राय, नापि कर्मसु प्रवृत्तये, आत्मैकत्वं विगलितनिखिलप्रपञ्चत्वमानन्दरूपस्य सतस्तत्प्रतिपत्तिं निर्विचिकित्सां भावयन्तो वेदान्ताः समूलघातमध्यासमुपघ्नन्ति । एतदुक्तं भवति—अस्मत्प्रत्ययस्यात्मविषयस्य समीचीनत्वे सति ब्रह्मणो ज्ञातत्वान्निष्प्रयोजनत्वाच्च न जिज्ञासा स्यात् । तदभावे च न ब्रह्मज्ञानाय वेदान्ताः पठेरन् । अपि त्वविवक्षितार्था जपमात्रे उपयुज्येरन् । नहि तदौपनिषदामप्रत्ययः प्रमाणतामश्नुते । न चासावप्रमाणमभ्यस्तोऽपि वास्तवं कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यात्मनोऽपनेतुमर्हति । आरोपितं


भामती-व्याख्या

अहङ्कारास्पद, संसारी समस्त अनर्थ-प्रपञ्च का पात्र, जीवात्मा अन्योन्याध्यास पर आधृत और उत्तरोत्तर अध्यास का प्रयोजक होता है [ अर्थात् अध्यास-प्रयुक्त अहंविषयता और अहंविषयतापन्न चिदात्मा में प्रपञ्चाध्यास होता है ] । फलतः पूर्वोक्त अध्यासों की अन्योऽन्याश्रयता प्रत्याख्यात हो जाती है। यद्यपि प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों के द्वारा अध्यास की दृढता का चित्रण किया जा चुका है, तथापि अबोध शिष्यों को भली प्रकार समझाने के लिए अध्यास का स्वरूप दिखा कर उसे दृढ़ता प्रदान की जा रही है— "एवमनादिरनन्तो नैसर्गिकोध्यासो" । यहाँ अनन्त का अर्थ है कि तत्त्व-ज्ञान के बिना उस (अध्यास) का अन्त (उच्छेद) नहीं किया जा सकता। अध्यास की अनादिता और अनन्तता का कारण बताया जाता है—'नैसर्गिकः"। "मिथ्याप्रत्ययरूपः"––का तात्पर्य है कि मिथ्या ज्ञानों के रूप (अनिर्वचनीयत्व) से युक्त अध्यास अनिर्वचनीय है। प्रकृत प्रसङ्ग का उपसंहार किया जाता है—"अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय"।

विरोधी ज्ञान के बिना इस (मिथ्या प्रत्यय) का प्रहाण नहीं हो सकता, अतः विरोधी ज्ञान और उसके साधनों का प्रदर्शन किया जाता है—"आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते"। प्रतिपत्ति का अर्थ प्राप्ति है, उसके लिए ही वेदान्त शास्त्र प्रवृत्त हुआ है, केवल जप या कर्म-प्रपञ्च में प्रवृत्ति के लिए नहीं, "आत्मैकत्व' से आत्मगत निखिल-प्रपञ्चाभावरूपता विवक्षित है, आत्मा स्वतः आनन्दरूप है, किन्तु पूर्वोक्त अध्यास के कारण उसकी आनन्दरूपता जो अप्राप्त-जैसी हो गई है, उसकी प्राप्ति (असन्दिग्ध निश्चय) कराते हुए वेदान्त-वाक्य अध्यास का समूल घात कर डालते हैं। सारांश यह है कि यदि आत्मविषयक अहं प्रत्यय समीचीन (प्रमारूप) होता, तब अहङ्कारास्पदत्वेन ब्रह्म ज्ञात ही है, अतः निष्प्रयोजन होने के कारण ब्रह्म की जिज्ञासा नहीं हो सकती थी, जिज्ञासा के अभाव में ब्रह्म का ज्ञान कराने के लिए वेदान्त वाक्यों की प्रवृत्ति ही नहीं होती या वे अविवक्षितार्थक होकर जपमात्र के उपयोगी रह जाते, क्योंकि पहले ही ब्रह्म का निश्चय रहने पर औपनिषद ब्रह्म का ज्ञान ज्ञातार्थ-ज्ञापक होने के कारण अप्रमाण ही हो जाता। अप्रमाणभूत ज्ञान का कितना भी अभ्यास किया जाय, वह आत्मा के वास्तविक कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि धर्मों का अपनयन नहीं कर

विषयादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५३

सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते । यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः ।


भामती

हि रूपं तत्त्वज्ञानेनापोद्यते, न तु वास्तवमतत्त्वज्ञानेन । नहि रज्ज्वा रज्जुत्वं सहस्रमपि सर्पधाराप्रत्यया अपवदितुं समुत्सहन्ते । मिथ्याज्ञानप्रसञ्जितं च स्वरूपं शक्यं तत्त्वज्ञानेनापवदितुम् । मिथ्याज्ञानसंस्कारश्च सुदृढोऽपि तत्त्वज्ञानसंस्कारेणादरनैरन्तर्यदीर्घकालतत्त्वज्ञानाभ्यासजन्मनेति ।

स्यादेतत्—प्राणाद्युपासना अपि वेदान्तेषु बहुलमुपलभ्यन्ते, तत्कथं सर्वेषां वेदान्तानामात्मैकत्वप्रतिपादनमर्थ इत्यत आह ॐ यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः ॐ । शरीरमेव शरीरकं तत्र निवासी शारीरको जीवात्मा तस्य त्वंपदाभिधेयस्य तत्पदाभिधेयपरमात्मरूपतामीमांसा या सा तथोक्ता ।


भामती-व्याख्या

सकता। यह नैसर्गिक नियम है कि अध्यस्त पदार्थ का ही तत्त्व-ज्ञान से बाध होता है, वास्तविक पदार्थ की मिथ्या ज्ञान के द्वारा कभी भी निवृत्ति नहीं होती, जैसे कि रज्जुगत वास्तविक रज्जुत्व धर्म को 'अयं सर्पः', 'इयं जलधारा'—इत्यादि सहस्रों प्रकार के मिथ्या ज्ञान कभी भी निवृत्त नहीं कर सकते। मिथ्या ज्ञान के द्वारा आरोपित रूप का ही बाध तत्त्व-ज्ञान कर सकता है। मिथ्या ज्ञान से जनित सुदृढ़ संस्कार भी उस तत्त्व-ज्ञान के द्वारा जनित संस्कारों से विनष्ट हो जाते हैं, जिस तत्त्व का दीर्घकाल तक निरन्तर श्रद्धापूर्वक अभ्यास किया गया है। [ विजातीय वृत्तियों या संस्कारों के झंझावात को शान्त करने का एकमात्र उपाय है—सुदृढ़ निरोधाभ्यास, अभ्यास सुदृढ़ कैसे होता है? इसका मार्ग योग-सूत्र ने दिखाया है—"स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि" (यो. सू. १।१४)। श्रद्धापूर्वक निरन्तर दीर्घ समय तक आसेवित अभ्यास सुदृढ़ होकर पूर्णतया अर्थक्रियाकारी माना जाता है ]। भाष्यकार ने जो कहा है—"आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते"। वहाँ यह शङ्का होती है कि वेदान्त या उपनिषद् ग्रन्थों में "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च" (छां० उ० ५।१।१) इत्यादि प्रसङ्गों में प्राणादि उपासनाओं का भी प्रतिपादन किया गया है, तब सभी वेदान्त-वाक्यों में केवल आत्मैकत्वप्रतिपादकत्व क्योंकर घटेगा? इस शङ्का के समाधानार्थ कहा है—"यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः"। 'शारीरक' शब्द की शरीरमेव शरीरकम्, तत्र भवः शारीरकम्—ऐसी व्युत्पत्ति के आधार 'शारीरक' शब्द का अर्थ है—शरीराभिमानी चेतन जीव। यह जीव "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इस महावाक्य के घटकीभूत 'त्वम्' पद का वाच्यार्थ है। उसमें तत्पदाभिधेय परमात्मरूपता की मीमांसा (विचारशास्त्र) [ यहाँ यह विचारणीय हो जाता है कि इस वेदान्त-दर्शन को जीव-मीमांसा कहा जाय? या ब्रह्म-मीमांसा? जीव-मीमांसारूप मानने पर "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्र. सू. १।१।१) इस सूत्र में 'ब्रह्म' शब्द का जीवभावापन्न ब्रह्म अर्थ करना होगा और जिज्ञासा का आकार रखना होगा—कोऽयं जीवः? उसके अनुसार द्वितीय सूत्र में जिज्ञास्यभूत जीव का लक्षण करना चाहिए था, ब्रह्म का नहीं। कर्त्ता-भोक्ता जीव में संशयादि न होने के कारण जिज्ञास्यता भी नहीं बनती, अतः इस शास्त्र को ब्रह्ममीमांसा ही कहना चाहिए, हाँ, वस्तुस्थिति को ध्यान में रखकर 'जीव-मीमांसा' शब्द के द्वारा इस शास्त्र का अभिधान किया जा सकता है, अतः 'शारीरक' शब्द का अर्थ कुछ विद्वानों ने शरीरे भवः शारीरो जीवः, तं शारीरं कायति ब्रह्मरूपं गायति'—इस व्युत्पत्ति के माध्यम से 'अहं ब्रह्मास्मि'—इत्यादि

५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

एतावानत्रार्थसंक्षेपः—यद्यपि च स्वाध्यायाध्ययनविधिना स्वाध्यायपदवाच्यस्य वेदराशेः फलवदर्थावबोधपरतामापादयता कर्मविधिनिषेधानाभिव वेदान्तानामपि स्वाध्यायशब्दवाच्यानां फलवदर्थावबोधपरत्वमापादितम् । यद्यपि चाविशिष्टस्तु वाक्यार्थ इति न्यायान्मन्त्राणामिव वेदान्तानामर्थपरत्वमौत्सर्गिकं, यद्यपि च वेदान्तेभ्यश्चैतन्यान्नन्दघनः कर्तृत्वभोक्तृत्वरहितो निष्प्रपञ्च एकः प्रत्यगात्माऽवगम्यते, तथापि कर्तृत्वभोक्तृत्वदुःखशोकमोहमयमात्मानमवगाहमानेनाहम्प्रत्ययेन सन्देहबाधविरहिणा विरुध्यमाना वेदान्ताः स्वार्थात्प्रच्युता उपचरितार्था वा जपमात्रोपयोगिनो वेत्यविवक्षितस्वार्थाः । तथा च तदर्थविचारात्मिका चतुर्लक्षणी शारीरकमीमांसा नारब्धव्या । न च सर्वजनीनाहमनुभवसिद्ध आत्मा सन्दिग्धो वा सप्रयोजनो वा येन जिज्ञास्यः सन् विचारं प्रयुञ्जीतेति पूर्वः पक्षः ।

सिद्धान्तस्तु भवेदेतदेवं यद्यहम्प्रत्ययः प्रमाणं, तस्य तूक्तेन क्रमेण श्रुत्यादिबाधकत्वानुपपत्तेः । श्रुत्यादिभिश्च समस्ततीर्थंकरैश्च प्रमाणानभ्युपगमादध्यासत्वम् । एवं वेदान्ता नाविवक्षितार्थाः, नाप्युप-

भामती-व्याख्या

वेदान्त वाक्यों को शारीरक और इस वेदान्त-दर्शन को शारीरक-मीमांसा या वेदान्त-विचार कहा है। इन्हीं सब समस्याओं को ध्यान में रखकर श्री वाचस्पति मिश्र इस अधिकरण-ग्रन्थ में प्रथम अधिकरण की रचना करते हुए सभी प्रकार के सन्देहों का परिमार्जन करते हैं। प्रत्येक अधिकरण के पाँच अवयव होते हैं—

विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरः ।
प्रयोजनं संगतिश्च शास्त्रेऽधिकरणं विदुः ॥ १ ॥

इसके अनुसार यहाँ अङ्ग हैं—
( १ ) विषय—अज्ञात ब्रह्म
( २ ) संशय—वेदान्तमीमांसा शास्त्र आरम्भणीय है ? अथवा नहीं ?
( ३ ) पूर्वपक्ष—यद्यपि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' (शत. ब्रा. १५।५।७।२) इस स्वाध्याय-अध्ययन-विधि के द्वारा 'स्वाध्याय' (स्वकीय शाखारूप वेद) का सप्रयोजन अर्थ के प्रतिपादन में तात्पर्य स्थिर किया गया है, अतः शाखागत कर्मविषयक विधि-निषेध वाक्यों के समान वेदान्त वाक्यों में भी फलवदर्थ-बोधकता निश्चित है । एवं “अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः” (जै. सू. १।२।३२) इस सूत्र के भाष्य में कहा है—“अविशिष्टस्तु लोके प्रयुज्यमानानां वेदे च पदानामर्थः । स यथैव लोके विवक्षितः तथैव वेदे भवितुमर्हति ।” अतः संहिता भाग के समान ही वेदान्त-वाक्यों में विवक्षितार्थत्व स्वाभाविक है । वेदान्त-वाक्यों के द्वारा सच्चिदानन्दरूप-कर्तृत्व-भोक्तृत्व से रहित, निष्प्रपञ्च, एक प्रत्यगात्मतत्व अवगत होता है ।
तथापि कर्तृत्व, भोक्तृत्व, दुःख, शोकादि से युक्त आत्मा को विषय करने वाले संदेह और बाध से रहित अहमनुभव के द्वारा विरुद्ध पड़ जाने के कारण वेदान्त-वाक्य अपने वाच्यार्थ से हट कर गौणार्थक या जपमात्र में उपयोगी माने जाते हैं । फलतः वेदान्तार्थ-विचारात्मक चार अध्यायों वाला यह शारीरक-मीमांसा शास्त्र आरम्भणीय नहीं है । सर्वजन-प्रसिद्ध अनुभव के द्वारा प्रमाणित कर्त्ता भोक्ता आत्मा न सन्दिग्ध है और न उसके ज्ञान का कोई विशेष प्रयोजन, अतः वह न तो जिज्ञास्य है और न किसी प्रकार के विचार का प्रवर्तक ।
( ४ ) उत्तर पक्ष—यह सब कुछ कहना तभी सत्य हो सकता था, जबकि अहमनुभव प्रमाणभूत होता । जब कि पूर्वोक्त रीति से उक्त अनुभव में श्रुत्यादि की बाधकता सम्भव नहीं । अहमनुभव की प्रामाणिकता न तो श्रुत्यादि वाक्यों से संवादित है और न किसी तार्किक (दार्शनिक) के द्वारा अनुमोदित, पारिशेष्यात् उसे अध्यासत्मक ही मानना पड़ता

विषयादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५

( १ जिज्ञासाधिकरणम् । सू० १ )

वेदान्तमीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्येदमादिमं सूत्रम्—

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥

भामती

चरितार्थाः, किन्तूक्तलक्षणाः । प्रत्यगात्मैव तेषां मुख्योऽर्थः । तस्य च वक्ष्यमाणेन क्रमेण सन्दिग्धत्वात्प्रयो- जनवत्त्वाच्च युक्ता जिज्ञासा, इत्याशयवान् सूत्रकारः तज्जिज्ञासामसूत्रयत् -- ❖ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा इति ❖ । जिज्ञासया सन्देहप्रयोजने सूचयति । तत्र साक्षादिच्छा- व्याप्यत्वाद् ब्रह्मज्ञानं कण्ठोक्तं प्रयोजनम् । न च कर्मज्ञानात् पराचीनमनुष्ठानमिव ब्रह्मज्ञानात् पराचीनं किञ्चिदस्ति येनैतदवान्तरप्रयोजनं भवेत् । किन्तु ब्रह्ममीमांसाख्यतर्केतिकर्तव्यतानुज्ञातविषयैर्वेदान्तैराहितं निर्विकित्सं ब्रह्मज्ञानमेव समस्तदुःखोपशमरूपमानन्दैकरसं परमं प्रयोजनम् । तमर्थमधिकृत्य हि प्रेक्षावन्तः प्रवर्तन्तेतराम् । तच्च प्राप्तमप्यनाद्यविद्यावशादप्राप्तमिवेति प्रेप्सितं भवति । यथा स्वग्रीवागत- मपि ग्रैवेयकं कुतश्चिद् भ्रमान्नास्तीति मन्यमानः परेण प्रतिपादितमप्राप्तमिव प्राप्नोति । जिज्ञासा तु संशयस्य कार्यमिति स्वकारणं संशयं सूचयति । संशयश्च मीमांसारम्भं प्रयोजयति । तथा च शास्त्रे प्रेक्षावत्प्रवृत्तिहेतुसंशयप्रयोजनसूचनाद् युक्तमस्य सूत्रस्य शास्त्रादित्वमित्याह भगवान् भाष्यकारः ❖ वेदान्त- मीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्य अस्माभिः इदमादिमं सूत्रम् ❖ । पूजितविचारवचनो मीमांसाशब्दः ।

भामती-व्याख्या

है । वेदान्त-वाक्यों का जब कोई विरोधी नहीं, तब वे न तो अविवक्षितार्थक हो सकते हैं और न गौणाद्यर्थक, किन्तु शुद्ध, बुद्ध मुक्तरूप आत्मतत्त्व के प्रतिपादक हैं । प्रत्यगात्मा ही उनका मुख्य अर्थ है, वह वक्ष्यमाण क्रम से सन्दिग्ध भी है और सप्रयोजन भी, अतः उसकी जिज्ञासा समुचित है—इस आशय से सूत्रकार ने उक्त जिज्ञासा को सूत्रित किया है— "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" । जिज्ञासा के माध्यम से अधिकरण के सन्देह और प्रयोजनरूप दो अवयव सूचित किए गए हैं।

( ५ ) प्रयोजन—ब्रह्म-जिज्ञासा का अर्थ ब्रह्म-ज्ञान की इच्छा है, इच्छा का साक्षात् विषय होने के कारण ब्रह्म-ज्ञान मुख्य प्रयोजन है । कर्मपरक वाक्यों से कर्म का ज्ञान और ज्ञान से कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, तब स्वर्गादिरूप मुख्य प्रयोजन सिद्ध होता है, अतः वहाँ कर्म-ज्ञान जैसे अवान्तर प्रयोजन माना जाता है, वैसे यहाँ ब्रह्म-ज्ञान को मुख्य प्रयोजन न मानकर अवान्तर प्रयोजन नहीं माना जा सकता, क्योंकि कर्म-ज्ञान के पश्चात् जैसे कर्म का अनुष्ठान अपेक्षित होता है, वैसे यहाँ ब्रह्म-ज्ञान के पश्चात् कुछ कर्त्तव्य शेष नहीं रहता, क्योंकि ब्रह्म-विचारात्मक तर्करूप इतिकर्त्तव्यता ( सहायक व्यापार ) के द्वारा जिनके अर्थों का परिपोषण किया गया, ऐसे वेदान्त-वाक्यों से समुत्पादित असन्दिग्ध ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखों का उपशामक और परमानन्दैकरसात्मक परम प्रयोजन माना जाता है । उसकी लालसा से ही विवेकिगण वेदान्त-विचार में प्रवृत्त होते हैं। यद्यपि वह तत्त्व-ज्ञान ब्रह्मरूप होने के कारण सदैव प्राप्त है, तथापि अनादि अविद्या के कारण वह अप्राप्त-जैसा होकर वैसे ही प्रेप्सित ( प्राप्त करने की इच्छा का विषय ) हो जाता है, जैसे कि अपने गले में विद्यमान हार किसी भ्रम के कारण विस्मृत एवं खो गया-सा हो जाता है और किसी व्यक्ति के द्वारा स्मरण दिलाने पर प्राप्त-सा हो जाता है । जिज्ञासा संशय से जनित होती है, अतः वह अपने कारणीभूत संशय को सूचित करती है और संशय मीमांसा के आरम्भ का प्रयोजक हो जाता है । इस प्रकार विचारशील व्यक्ति की शास्त्र में प्रवृत्ति के हेतुभूत संशय और प्रयोजन को सूचित करके के कारण "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'—इस वाक्य को भगवान्

५६ | सूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]


तत्र अथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते, नाधिकारार्थः, ब्रह्मजिज्ञासाया अनधि-

भामती

परमपुरुषार्थहेतुभूतसूक्ष्मतमार्थनिर्णयफलता विचारस्य पूजितता। तस्या मीमांसायाः शास्त्रम्, सा ज्ञानेन शिष्यते शिष्येभ्यः यथावत्प्रतिपाद्यत इति। सूत्रं च बह्वर्थसूचनाद् भवति। यथाहुः—

“लघूनि सूचितार्थानि स्वल्पाक्षरपदानि च।
सर्वतः सारभूतानि सूत्राण्याहुर्मनीषिणः।।” इति।

तदेवं सूत्रतात्पर्यं व्याख्याय तस्य प्रथमपदमयेति व्याचष्टे ॐ तत्राथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते ॐ। तेषु सूत्रपदेषु मध्ये योऽयमथशब्दः स आनन्तर्यार्थ इति योजना। नन्वधिकारार्थोऽप्यथ-शब्दो दृश्यते, यथा—‘अथैष ज्योतिः’ इति वेदे, यथा वा लोके ‘अथ शब्दानुशासनम्, ‘अथ योगानुशासनम्’ इति, तत्किमत्राधिकारार्थो न गृह्यत इत्यत आह ॐ नाधिकारार्थः ॐ। कुतः? ॐ ब्रह्मजिज्ञासाया अनधिकार्यत्वात् ॐ। जिज्ञासा तावदिह सूत्रे ब्रह्मणश्च तत्ज्ञानाच्च शब्दतः प्रधानं प्रतीयते। न च यथा दण्डी प्रैषानन्वाहेत्यत्राप्रधानमपि दण्डशब्दार्थो विवक्ष्यते, एवमिहापि ब्रह्मतज्ज्ञाने इति युक्तम्,

भामती-व्याख्या

भाष्यकार शास्त्र का आदिम (प्रथम) सूत्र कहते हैं—"वेदान्तमीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्य इदमादिमं सूत्रम्"।

यहाँ 'मीमांसा' शब्द पूजित विचार का वाचक है। प्रकृत विचार में जो मोक्षरूप परम पुरुषार्थ के हेतुभूत सूक्ष्मतम अर्थ की निर्णायकता है, वही विचारगत पूजितता है। उस मीमांसात्मक तर्क की इस (वेदान्त दर्शन) शास्त्र के द्वारा अधिकारी शिष्यों को शिक्षा दी जाती है। सूत्रवाक्य अपने विषय की पुष्कलरूप में संक्षिप्त सूचनामात्र देते हैं, इसी में उनका गौरव माना जाता है, क्योंकि सूत्र का लक्षण किया गया है—

लघूनि सूचितार्थानि स्वल्पाक्षरपदानि च।
सर्वतः सारभूतानि सूत्राण्याहुर्मनीषिणः॥ (पराशरोप. अ. १८)

[स्वल्पकाय उस पदावलि को मनीषीगणों ने सूत्र कहा हैं, जिसमें सारभूत प्रतिपाद्य वस्तु के सम्यक् प्रतिपादन की पूर्ण क्षमता हो]।

इस प्रकार प्रथम सूत्र का तात्पर्य बताकर सूत्र-घटक प्रथम 'अथ' पद की व्याख्या करते हैं—"तत्राथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते"। तत्र (इस सूत्र के सभी पदों के मध्य में) जो यह 'अथ' शब्द प्रयुक्त हुआ है, वह आनन्तर्यार्थक है। शङ्का होती है कि 'अथ' शब्द अधिकार (आरम्भ) अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, जैसे वेद में “अथैष ज्योतिः” (ता. ब्रा. १६।८।१) अथवा लोक में जैसे—'अथ शब्दानुशासनम्” (म. भाष्य पृ. ५) “अथ योगानुशासनम्” (यो. सू. १।१)। अतः यहाँ भी उस (आरम्भ) अर्थ में 'अथ' शब्द का प्रयोग क्यों न मान लिया जाय? इस शङ्का का निराकरण करते हैं—"नाधिकारार्थः”, क्योंकि 'ब्रह्म-जिज्ञासा'—यहाँ शब्दतः इच्छा 'ब्रह्म और उसके ज्ञान' इन दोनों से प्रधान है, उसका विषय ज्ञान है और ज्ञान का विषय है—ब्रह्म। ['इच्छा का आरम्भ करना चाहिए'-ऐसी आज्ञा कर देने मात्र से इच्छा की उत्पत्ति नहीं होती, अपितु विषयगत इष्टसाधनता या सौन्दर्य का ज्ञान ही इच्छा का जनक माना जाता है, उसके बिना] इच्छा अधिकार्य या समुत्पाद्य नहीं होती। यदि कहा जाय कि इच्छा यदि आरम्भणीय नहीं, तब उसके विषयीभूत ज्ञान और ब्रह्म को 'ब्रह्मजिज्ञासा' पद का अर्थ वैसे ही माना जा सकता है, जैसे “दण्डी प्रैषान् अन्वाह” [दण्ड के सहारे खड़ा होकर आज्ञा वचनों का उच्चारण करे] यहाँ पर अप्रधानभूत 'दण्ड' शब्दार्थ की विवक्षा होती है, अतः प्रकृत में ब्रह्म या ब्रह्म-ज्ञानरूप अमुख्यार्थ में अधिकारार्थ

अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७

भामती

ब्रह्ममीमांसाशास्त्रप्रवृत्त्यङ्गसंशयप्रयोजनसूचनार्थत्वेन जिज्ञासाया एव विवक्षितत्वात् । तदविवक्षायां तु तदसूचनेन काकदन्तपरीक्षायामिव ब्रह्ममीमांसायां न प्रेक्षावन्तः प्रवर्तेरन् । न हि तदानीं ब्रह्म वा तज्ज्ञानं वाऽभिधेयप्रयोजने भवितुमर्हतः । अनध्यस्ताहंप्रत्ययविरोधेन वेदान्तानामेवंविधेऽर्थे प्रामाण्यानुपपत्तेः । कर्मप्रवृत्त्युपयोगितयोपचरितार्थानां वा जपोपयोगिनां वा हुमित्येवमादीनामविवक्षितार्थानामपि स्वाध्यायाध्ययनविध्यधीनग्रहणत्वस्य सम्भवात् । तस्मात्सन्देहप्रयोजनसूचनी जिज्ञासा इह पदतो वाक्यतश्च प्रधानं विवक्षितव्या । न च तस्या अधिकार्यत्वम्, अप्रस्तूयमानत्वात्, येन तत्समभिव्याहृतोऽथशब्दोऽधिकारार्थः स्यात् । जिज्ञासाविशेषणं तु ब्रह्मज्ञानमधिकार्यं भवेत् । न च तदप्यथशब्देन सम्बध्यते, प्राधान्याभावात् । न च जिज्ञासा मीमांसा येन योगानुशासनवदधिक्रियेत । नान्तत्त्वं निपात्य माङ् मान इत्यस्माद्वा मान पूजायामित्यस्माद्वा धातोर्मान्बधेत्यादिनाऽनिच्छार्थे सनि व्युत्पादितस्य मीमांसाशब्दस्य पूजितविचार-

भामती-व्याख्या

का अन्वय क्यों न कर दिया जाय ? तो ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ब्रह्मविचारात्मक शास्त्र में प्रवृत्ति के अङ्गभूत संशय और प्रयोजन के सूचनार्थ जिज्ञासा ही विवक्षित है, उसकी विवक्षा न करने पर संशय और प्रयोजन का लाभ न होगा और उसके न होने के कारण जैसे निरर्थक और निष्प्रयोजन काक-दन्त-परीक्षा शास्त्र में कोई विचारशील प्रवृत्त नहीं होता, वैसे ही इस ब्रह्म-मीमांसा में भी कोई प्रवृत्त न होगा, क्योंकि जिज्ञासा के बिना ब्रह्म में सन्दिग्धत्व और ब्रह्म-ज्ञान में सप्रयोजनरूपता का लाभ नहीं होता । ब्रह्म और ज्ञान स्वरूप सत् प्रवर्तक नहीं होते, अपितु सन्दिग्ध और सप्रयोजन के रूप में ही प्रवर्तक होते हैं । संशय का विषयीभूत सद्वितीय ब्रह्म ही है, उसमें वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य माना नहीं जा सकता, क्योंकि 'अहमद्वितीयः', 'अहं ब्रह्मास्मि'—इत्यादि अनध्यस्त अहमाकार ( अखण्डाकार ) वृत्ति उसकी विरोधिनी है । वेदान्त-वाक्य यदि अविवक्षितार्थक या जपमात्र के उपयोगी मान लिए जाते हैं, तब “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः”—इस स्वाध्याय विधि के द्वारा उनके सविधि अध्ययन का विधान क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि कर्म की प्रवृत्ति में अनुपयोगी अविवक्षितार्थक, या जपमात्र में उपयोगी 'हुम्'—इत्यादि शब्दों का भी स्वाध्यायाध्ययन-विधि के द्वारा ग्रहण माना जाता है । फलतः प्रकृत में संशय और प्रयोजन की सूचिका जिज्ञासा ही पद और वाक्य की मर्यादा के अनुसार विवक्षित है । [ 'शमदमादिसाधनसम्पत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा भवति'—इस प्रकार के विवक्षित वाक्य में जैसे 'जिज्ञासा' प्रधान है, वैसे ही 'ब्रह्म-जिज्ञासा'—इस पद में भी ब्रह्म की अपेक्षा जिज्ञासा प्रधान है ] । यह जिज्ञासा अधिकार्य ( आरम्भणीय ) नहीं, क्योंकि इस वेदान्त-दर्शन के द्वितीयादि सूत्रों में कहीं भी इसका प्रतिपादन नहीं किया गया है । यदि किसी भी सूत्र में जिज्ञासा का आरम्भ या प्रतिपादन किया गया होता, तब 'जिज्ञासा' पद के समीप में पठित 'अथ' शब्द को आरम्भार्थक माना जा सकता था । जिज्ञासा का विशेषणीभूत ब्रह्म-ज्ञान अवश्य आरम्भणीय है, किन्तु 'अथ' शब्द के साथ उसका अन्वय नहीं हो सकता, क्योंकि पद के प्रधानभूत अर्थों का ही परस्पर अन्वय होता है, 'ब्रह्म-ज्ञान' प्रधान नहीं, अपितु जिज्ञासा का विशेषण है । जिज्ञासा का यहाँ मीमांसा अर्थ भी नहीं कर सकते कि “अथ योगानुशासनं” के समान उसका आरम्भ सम्भव हो जाता, क्योंकि 'जिज्ञासा' पद में 'सन्' प्रत्यय इच्छार्थक है, किन्तु 'मीमांसा' पद में 'सन्' प्रत्यय इच्छार्थक नहीं, अपितु स्वार्थमात्र का समर्पक है—'माङ् माने' अथवा 'मान पूजायां'—इस धातु से “मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य” ( पा. सू. ३।१।६ ) इस सूत्र के द्वारा 'माङ्' धातु में 'ङ्' के स्थान पर 'न्' का निपातनतः आदेश और अभ्यास के विकारभूत इकार को दीर्घ करके

५८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

कार्यत्वात् । मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभावात् । अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः

भामती

वचनत्वात् । ज्ञानेच्छावाचकत्वाज्जिज्ञासापदस्य, प्रवर्त्तिका हि मीमांसायां जिज्ञासा स्यात् । न च प्रवर्त्य-प्रवर्त्तकयोरेक्यम् , एकत्वे तद्भावानुपपत्तेः । न च स्वार्थपरत्वस्योपपत्तौ सत्यामन्यार्थपरत्वकल्पना युक्ताऽ-तिप्रसङ्गात् । तस्मात् सुष्टूक्तं जिज्ञासाया अनधिकार्थत्वादिति ।

अथ मङ्गलार्थोऽथशब्दः कस्मान्न भवति ? तथा च मङ्गलहेतुत्वात् प्रत्यहं ब्रह्मजिज्ञासा कर्त्तव्येति सूत्रार्थः सम्पद्यत इत्याह ॐ मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभावात् ॐ । पदार्थ एव हि वाक्यार्थे समन्वी-यते, स च वाच्यो वा लक्ष्यो वा । न चेह मङ्गलमथशब्दस्य वाच्यं वा लक्ष्यं वा, किन्तु मृदङ्गशङ्खध्वनि-वदथशब्दश्रवणमात्रकार्यम् । न च कार्यज्ञाप्ययोर्वाक्यार्थे समन्वयः शब्दव्यवहारे दृष्ट इत्यर्थः ॥ तत्किमिदानीं मङ्गलार्थोऽथशब्दस्तेषु तेषु न प्रयोक्तव्यः । तथा च—

“ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा।
कण्ठं भित्त्वा विनिर्य्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥”

इति स्मृतिव्याकोप इत्यत आह ॐ अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति ॐ । अर्थान्तरेषु आनन्तर्यादिषु प्रयुक्तोऽथशब्दः श्रुत्या श्रवणमात्रेण वेणुवीणाध्वनिवद् मङ्गलं कुर्वन् मङ्गलप्रयो-

भामती-व्याख्या

‘मीमांसा’ शब्द बनाया गया है, जिसका रूढ़ अर्थ ‘पूजित विचार’ है। ‘मान्बध’—इस सूत्र के द्वारा ‘सन्’ प्रत्यय इच्छा में नहीं किया गया, क्योंकि इस सूत्र के उत्तरवर्ती "धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा” (पा. सू. ३।१।७) इस सूत्र के द्वारा इच्छा में ‘सन्’ का विधान करना यह सिद्ध करता है कि इस सूत्र के पूर्ववर्ती ‘मान्बध’—इस सूत्र से विहित सन् इच्छार्थक नहीं और ‘जिज्ञासा’ में सन् इच्छार्थक है—‘ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा’। इस प्रकार जिज्ञासा प्रवर्तक और मीमांसा (विचार) प्रवर्त्य है। प्रवर्तक और प्रवर्त्य—दोनों अभिन्न नहीं हो सकते, अन्यथा उनमें प्रवर्त्य-प्रवर्तकभाव ही नहीं बन सकेगा। ‘मीमांसा’ शब्द में जब स्वार्थपरक ‘सन्’ प्रत्यय की उपपत्ति हो सकती है, तब अन्य अर्थ में ‘सन्’ का तात्पर्य मानना युक्ति-युक्त नहीं, अन्यथा स्वार्थपरक प्रत्यय का विधान ही व्यर्थ हो जायगा। अतः भाष्यकार ने जो कहा है—‘जिज्ञासाया अनधिकार्यत्वात्’ वह बहुत सोच-समझ कर कहा है।

सूत्रोपात्त ‘अथ’ शब्द का मंगल अर्थ क्यों न मान लिया जाय ? ‘मंगल की साधिका होने के कारण ब्रह्म-जिज्ञासा प्रतिदिन करनी चाहिए’—ऐसा सूत्र का अर्थ किया जा सकता है। इस शङ्का का समाधान करते हुए कहा गया है—“मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभा-वात्।” वाक्य-घटक पद के अर्थ का ही वाक्यार्थ में अन्वय हुआ करता है, वह अर्थ ‘पद’ का वाच्य होता है या लक्ष्य। मंगळरूप अर्थ न तो ‘अथ’ पद का वाच्य है और न लक्ष्य, किन्तु जैसे मृदङ्ग और शङ्खादि की ध्वनि श्रवणमात्र से मंगलार्थक मानी जाती है, वैसे ही ‘अथ’ शब्द के श्रवणमात्र का कार्य मंगल होता है। पद के वाच्य या लक्ष्यभूत अर्थ का ही वाक्यार्थ में अन्वय होता है, पद के कार्य या ज्ञाप्य अर्थ का नहीं यह शाब्दिक मर्यादा है। यदि कहा जाय कि इस प्रकार तो कहीं भी मङ्गल के लिए ‘अथ’ शब्द का प्रयोग ही न हो सकेगा, किन्तु स्मृतिकारों ने ‘अथ’ शब्द का मङ्गलार्थक प्रयोग माना है—

“ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा।
कण्ठं भित्त्वा विनिर्य्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥

इस स्मृति वाक्य के विरोध का परिहार किया जाता है—“अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति” अर्थात् आनन्तर्यादि अर्थों का बोध कराने के लिए भी प्रयुक्त

अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५९

श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति। पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलत आनन्तर्याव्यतिरेकात्।

भामती जनो भवति, अन्यार्थमानीयमानोदकुम्भदर्शनवत्। तेन न स्मृतिव्याकोपः। न चेहानन्तर्यार्थस्य सतो न श्रवणमात्रेण मङ्गलार्थतेत्यर्थः। स्यादेतत्—पूर्वप्रकृतापेक्षोऽथशब्दो भविष्यति विनैवानन्तर्यार्थत्वम्। तद्यथेममेवाथशब्दं प्रकृत्य विमृश्यते, किमयमथशब्द आनन्तर्येऽथाधिकारे इति? अत्र विमर्शवाक्येऽथशब्दः पूर्वप्रकृतमथशब्दमपेक्ष्य प्रथमपक्षोपन्यासपूर्वकं पक्षान्तरोपन्यासे। न चास्यानन्तर्यमर्थः, पूर्वप्रकृतस्य प्रथमपक्षोपन्यासेन व्यवधानात्। न च पूर्वप्रकृतानपेक्षा, तदनपेक्षस्य तद्विषयत्वाभावेनासमानविषयतया विकल्पानुपपत्तेः, न हि जातु भवति किं नित्य आत्मा, अथानित्या बुद्धिरिति? तस्मादानन्तर्यं विना पूर्वप्रकृतापेक्ष इहाथशब्दः कस्मान्न भवतीत्यत आह पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलत आनन्तर्याव्यतिरेकात्। अस्यायमर्थः—न वयमानन्तर्यार्थतां व्यसनितया रोचयामहे, किन्तु ब्रह्मजिज्ञासाहेतुभूतपूर्वप्रकृतसिद्धये। सा च पूर्वप्रकृतार्थापेक्षत्वेऽप्यथशब्दस्य सिध्यतीति व्यर्थं आनन्तर्यार्थत्वावधारणाग्रहोऽस्माकमिति। तदिदमुक्तं,

भामती-व्याख्या 'अथ' शब्द श्रवणमात्र से वीणादि की ध्वनि के समान ही मङ्गल्यरूप प्रयोजन का वैसे ही साधक हो जाता है, जैसे कि कोई कन्या अपने माता-पिता की प्यास बुझाने के लिए जल से भरा घट ला रही है, यद्यपि वह घट मङ्गल्यरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिए नहीं लाया गया, तथापि उसके दर्शन मात्र से द्रष्टा पुरुष का मंगल सिद्ध हो जाता है, अतः 'अथ' शब्द का आनन्तर्य अर्थ मानने पर भी किसी प्रकार का उक्त स्मृति-वाक्य से विरोध नहीं होता, क्योंकि आनन्तर्य अर्थ में प्रयुक्त 'अथ' शब्द के श्रवणमात्र से मङ्गल नहीं होता—ऐसा नहीं, अपितु मङ्गल होता ही है।

शङ्का होती है कि आनन्तर्य और मङ्गल—इन दो अर्थों को छोड़ कर पूर्व प्रकृत पदार्थ के परामर्श (उपस्थापकत्व) में भी 'अथ' शब्द का प्रयोग देखा जाता है, जैसे कि इसी 'अथ' शब्द को लेकर यह सन्देह होता है कि 'किमयमथशब्द आनन्तर्ये, अथ अधिकारे?' इस सन्देह-वाक्य में 'अथ' शब्द के लिए एक कोटि का उपन्यास करने के पश्चात् कोटयन्तर की उपस्थिति कराने के लिए पूर्व प्रकृत 'अथ' शब्द का उपस्थापन 'अथ' पद के प्रयोग से किया गया है। यह 'अथ' पद आनन्तर्यार्थक नहीं, क्योंकि पूर्व प्रकृत 'अथ' शब्द और इस 'अथ' पद का आनन्तर्य (अव्यवहितोच्चारण) नहीं, अपितु 'आनन्तर्ये'—इस प्रकार प्रथम कोटि का उपन्यास कर देने से पूर्व प्रकृत 'अथ' शब्द अनन्तर (अव्यवहित) न रह कर व्यवहित हो जाता है। फलतः पूर्वप्रकृतापेक्षी 'अथ' शब्द को आनन्तर्यार्थक नहीं माना जा सकता। यह 'अथ' पद पूर्वप्रकृतापेक्षी भी नहीं—ऐसा कहना सम्भव नहीं, अन्यथा उक्त वाक्य से संशय का लाभ न हो सकेगा, क्योंकि एक ही धर्मी में विरुद्ध दो कोटियों के आरोपण का नाम संशय होता है। यदि उक्त 'अथ' पद पूर्वप्रकृत का उपस्थापक न होकर अर्थान्तर का बोधक है, तब उक्त वाक्य का 'किमथशब्द आनन्तर्ये, अथवा अन्यशब्दः अधिकारे'? यह वाक्य संशय का वैसे ही बोधक नहीं माना जाता, जैसे कि 'कि नित्य आत्मा, अथ अनित्या बुद्धिः'। फलतः सूत्र में भी 'अथ' शब्द का प्रयोग आनन्तर्यार्थ में न मान कर पूर्व प्रकृत-परामर्शी क्यों न मान लिया जाय? इस शङ्का का समाधान है—"पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलतः आनन्तर्याव्यतिरेकात्।" इस भाष्य का तात्पर्य यह है कि हम यहाँ 'अथ' शब्द का प्रयोग जिस-किसी भी पदार्थ के आनन्तर्य अर्थ में नहीं करते, अपितु पूर्वप्रकृत की अपेक्षा से ही ब्रह्म-जिज्ञासा के लिए नियमतः पूर्व अपेक्षित कारण पदार्थ की सिद्धि करने के लिए 'अथ' शब्द का प्रयोग मानते हैं। यह प्रयोजन तो 'अथ' पद के पूर्वप्रकृतापेक्षी मानने पर

६०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

सति चानन्तर्यार्थत्वे यथा धर्मजिज्ञासा पूर्ववृत्तं वेदाध्ययनं नियमेनापेक्षते, एवं ब्रह्मजिज्ञासापि यत्पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते, तद्वक्तव्यम् । स्वाध्यायानन्तर्यं तु समानम् ।

भामती

फलत इति । परमार्थतस्तु कल्पान्तरोपन्यासे पूर्वप्रकृतापेक्षा, न चेह कल्पान्तरोपन्यास इति पारिशेष्यादानन्तर्यार्थ एवेति युक्तम् । भवत्वानन्तर्यार्थः किमेवं सतीत्यत आह ॐ सति चानन्तर्यार्थत्वे इति ॐ । न तावद्यस्य कस्यचिदानन्तर्यमिति वक्तव्यं, तस्याभिधानमन्तरेणापि प्राप्तत्वाद्, अवश्यं हि पुरुषः किञ्चित् कृत्वा किञ्चित् करोति । न चानन्तर्यमात्रस्य दृष्टमदृष्टं वा प्रयोजनं पश्यामः । तस्मात्तस्यात्रानन्तर्यं वक्तव्यं यद्विना ब्रह्मजिज्ञासा न भवति, यस्मिन् सति तु भवन्ती भवत्येव । तदिदमुक्तम् ॐ यत्पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते इति ॐ ।

स्यादेतद्—धर्मजिज्ञासाया इव ब्रह्मजिज्ञासाया अपि योग्यत्वात् स्वाध्यायानन्तर्यं, धर्मवद् ब्रह्मणोऽप्याम्नायैकप्रमाणगम्यत्वात् । तस्य चागृहीतस्य स्वविषये जिज्ञासाजननत्वात्, ग्रहणस्य च स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्यध्ययनेनैव नियतत्त्वात् । तस्माद् वेदाध्ययनानन्तर्यमेव ब्रह्मजिज्ञासाया अप्यथशब्दार्थ इत्यत आह ॐ स्वाध्यायानन्तर्यं तु समानं धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः ॐ । अत्र च स्वाध्यायेन विषयेण तद्विषय-

भामती-व्याख्या

भी सिद्ध हो जाता है, अतः आनन्तर्यार्थकत्व का आग्रह हमारा नहीं, क्योंकि फलतः इन दोनों पक्षों में कोई अन्तर नहीं, विशेषता यहाँ इतनी अवश्य है कि पूर्वप्रकृतापेक्षी 'अथ' शब्द का प्रयोग पक्षान्तर ( कोट्यन्तर ) के उपन्यास में होता है, यहाँ पर तो कोई कोट्यन्तर का उपस्थापन नहीं किया जा रहा, अतः पारिशेष्यात् आनन्तर्यार्थ में 'अथ' शब्द का प्रयोग मानना चाहिए। 'अथ' शब्द का आनन्तर्य में प्रयोग मानने पर क्या लाभ ? इस प्रश्न का उत्तर है—"सति चानन्तर्यार्थत्वे"। आशय यह है कि जैसे "अथातो धर्मजिज्ञासा"—यहाँ 'अथ' शब्द पूर्वप्रकृतापेक्षा-सहगत आनन्तर्यार्थक माना गया है, जैसा कि भाष्यकार शबरस्वामी कहते हैं—"तत्र लोकेऽयमथशब्दो वृत्तादनन्तरस्य प्रक्रियार्थे दृष्टः, तत्तु वेदाध्ययनम्, तस्मिन् हि सति साऽवकल्पते" ( जै. सू. १।१।१ ) । अर्थात् 'धर्म-जिज्ञासा' सूत्र का घटकीभूत 'अथ' शब्द आनन्तर्यार्थक होने पर भी जिस-किसी क्रिया के आनन्तर्य को स्वीकार नहीं करता, अपितु पूर्व-प्रकृत वेदाध्ययन के आनन्तर्य का अभिधान करता है, वैसे ही "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"—यहाँ पर भी 'अथ' शब्द के द्वारा उसी पदार्थ के आनन्तर्य की विवक्षा होती है, जिस पदार्थ के बिना ब्रह्म-जिज्ञासा सम्भव न होकर उस पदार्थ के अनुष्ठानान्तर ही उक्त जिज्ञासा पनप सके—इस आशय का स्पष्टीकरण किया जाता है—"यत् पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते"

शङ्का होती है कि स्वाध्याय ( वेद-शाखा ) का अध्ययन कर लेने पर अध्येता पुरुष में जैसे यह योग्यता आ जाती है कि वह धर्म-जिज्ञासा ( धर्म-विचार ) कर सके, वैसे ही ब्रह्म-जिज्ञासा ( ब्रह्म-विचार ) की क्षमता भी उसमें आ जाती है, क्योंकि धर्म और ब्रह्म के प्रतिपादक वे ही वैदिक वाक्य होते हैं, जिनका वह अध्ययन ( ग्रहण ) "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस विधि के बल पर ही कर चुका है, अतः "अथातो धर्मजिज्ञासा" ( जै. सू. १।१।१ ) इस सूत्र में 'अथ' शब्द का स्वाध्यायानन्तर्य अर्थ होता है, वैसे ही "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्र. सू. १।१।१ ) इस सूत्र में भी 'अथ' शब्द का स्वाध्यायानन्तर्य ही अर्थ क्यों न मान लिया जाय ? इस शङ्का का समाधान किया गया है—"स्वाध्यायानन्तर्यं समानम्"। इस भाष्य में 'स्वाध्याय' पद स्वाध्यायविषयक अध्ययन का लक्षक है, क्योंकि स्वाध्याय ( वेद ) विषय और अध्ययन विषयी है, विषय-वाचक पद की विषयी में लक्षणा

अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६१

नन्विह कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः । न, धर्मजिज्ञासायाः प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्म-


भामती

मध्ययनं लक्षयति । तथा चाथातो धर्मजिज्ञासेत्यनेनैव गतमिति नेदं सूत्रमारब्धव्यम् । धर्मशब्दस्य वेदार्थमात्रोपलक्षणतया धर्मवद् ब्रह्मणोऽपि वेदार्थत्वाविशेषेण वेदाध्ययनानन्तर्योपदेशसाम्यादित्यर्थः ।

चोदयति ॐ नन्विह कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषो धर्मजिज्ञासातो ब्रह्मजिज्ञासायाः ॐ । अस्यार्थः—‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादीनामङ्गत्वेन ब्रह्मज्ञाने विनियोगात् , ज्ञानस्यैव कर्मतयेच्छां प्रति प्राधान्यात्, प्रधानसम्बन्धाच्चाप्रधानानां पदार्थानाम् । तत्रापि च न वाक्यार्थज्ञानोत्पत्तावङ्गभावो यज्ञादीनां, वाक्यार्थज्ञानस्य वाक्यादेवोत्पत्तेः । न च वाक्यं सहकारितया कर्माण्यपेक्षत इति युक्तम् , अकृतकर्मणामपि विदितपदपदार्थसङ्गतोनां समधिगतशाब्दन्यायतत्त्वानां गुणप्रधानभूतपूर्वापरपदार्थार्काङ्क्षासन्निधियोग्यतानुसन्धानवतामप्रत्यूहं वाक्यार्थप्रत्ययोत्पत्तेः । अनुत्पत्तौ वा विधिनिषेधवाक्यार्थप्रत्ययाभावेन तदर्थानुष्ठानपरिवर्जनाभावप्रसङ्गः । तद्द्बोधतस्तु तदर्थानुष्ठानपरिवर्जने परस्पराश्रयः—तस्मिन् सति


भामती-व्याख्या

प्रायः हुआ ही करती है, जैसे ‘धूमेन वह्निरनुमीयते’ का अर्थ होता है—‘धूमविषयकज्ञानेन वह्निरनुमीयते’। फलतः ब्रह्म-जिज्ञासा में स्वाध्यायाध्ययन का आनन्तर्य तो “अथातो धर्मजिज्ञासा” (जै. सू. १।१।१) इस सूत्र से ही अवगत हो जाता है, उसके लिए “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” (ब्र. सू. १।१।१) इस सूत्र की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । “अथातो धर्म-जिज्ञासा”—इस सूत्र में ‘धर्म’ शब्द समस्त वेदार्थ का बोधक है, जैसा कि शालिकनाथमिश्र कहते हैं—“धर्मशब्दश्च वेदार्थमात्रपरः” (बृहतीपञ्चिका पृ. २०)। ‘धर्म’ और ‘ब्रह्म’—दोनों समानरूप से वेदार्थ हैं, अतः इन दोनों में वेदाध्ययनानन्तर्य ‘अथातो धर्मजिज्ञासा’—इसी से प्राप्त है ।

पूर्वपक्ष—यद्यपि वेदाध्ययन का आनन्तर्य धर्म और ब्रह्म—इन दोनों में समान है, तथापि धर्मजिज्ञासा की अपेक्षा ब्रह्म-जिज्ञासा में अपेक्षित कर्म-ज्ञान का आनन्तर्य अधिक है । आशय यह है कि “विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन” (बृह. उ. ४।४।२२) इस वेद-वाक्य के ‘यज्ञेन’ इत्यादि पदों में प्रयुक्त तृतीया विभक्तिरूप श्रुति ब्रह्मज्ञान में ही यज्ञादि कर्मों का अङ्गत्वेन विनियोग करती है, इच्छा में नहीं, क्योंकि यद्यपि विविदिषा पद वेदन (ज्ञान) और ज्ञानकर्मक इच्छा—इन दोनों का बोधक है, तथापि साध्यार्थ (कर्मार्थ) अभीप्सित होने के कारण इच्छा की अपेक्षा भी प्रधान ही माना जाता है, प्रधान पदार्थ के साथ ही करणादि रूप अङ्गपदार्थों का अन्वय होता है। ज्ञान भी परोक्ष और अपरोक्ष—दो प्रकार का होता है, यज्ञादि अङ्गों का विनियोग वाक्यार्थविषयक परोक्ष ज्ञान में नहीं होता, क्योंकि वह ज्ञान तो यज्ञादि कर्मों की अपेक्षा नहीं करता, केवल वाक्य के श्रवणमात्र से उत्पन्न हो जाता है । ‘वाक्य अपनी सहायता के लिए कर्म की अपेक्षा करता है’—ऐसा कहना भी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि जिन व्यक्तियों ने किसी प्रकार के यज्ञादि कर्म का अनुष्ठान नहीं किया, जिन्हें केवल पदों और पदार्थों की संगति का ज्ञान है, शाब्दबोधोपयोगी युक्तियों का तात्त्विक ज्ञान है, गुणप्रधानभूत पूर्वापर-प्रयुक्त पदों में आकांक्षा, योग्यता और सन्निधिरूप शाब्द सामग्री का भली-भाँति स्मरण है, ऐसे व्यक्तियों को वाक्यार्थ का बोध उत्पन्न हो जाता है। कर्मानुष्ठान के बिना यदि वाक्य-श्रवण से वाक्यार्थ-बोध नहीं होता, तब विहित कर्मों के प्रवर्तक और निषिद्ध कर्मों के निवर्तक वाक्यों से बोध न होने के कारण विहित कर्मों का अनुष्ठान और निषिद्ध कर्मों का परित्याग कैसे होगा ? यदि कर्मानुष्ठान से वाक्यार्थ-बोध और वाक्यार्थ-बोध से कर्मानुष्ठान माना जाता है, तब विस्पष्ट

६२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १ ]

भामती

तदर्थानुष्ठानपरिवर्जनं ततश्च तद्बोध इति । न च वेदान्तवाक्यानामेव स्वार्थप्रत्यायने कर्मापेक्षा, न वाक्यान्तराणामिति साम्प्रतम्, विशेषहेतोरभावात् । ननु तत्त्वमसीतिवाक्यात् त्वंपदार्थस्य कर्तृभोक्तृरूपस्य जीवात्मनो नित्यशुद्धबुद्धोदासीनस्वभावेन तत्पदार्थेन परमात्मनैक्यमशक्यं द्रागित्येव प्रतिपत्तुम्, आपाततोऽशुद्धसत्त्वैर्योग्यताविरहनिश्चयात् । यज्ञतपोदानतनूकृतान्तर्मलास्तु विशुद्धसत्त्वाः श्रद्धाना योग्यतावगमपुरःसरं तादात्म्यमवगमिष्यन्तीति चेत्, तत्किमिदानीं प्रमाणकारणं योग्यतावधारणमप्रमाणात्कर्मणो वक्तुमध्यवसितोऽसि ? प्रत्यक्षाद्यतिरिक्तं वा कर्मापि प्रमाणम् ? वेदान्ताविरुद्धतन्मूलन्यायबलेन तु योग्यतावधारणे कृतं कर्मभिः ? तस्मात् तत्त्वमसीत्यादेः श्रुतमयेन ज्ञानेन जीवात्मनः परमात्मभावं गृहीत्वा तन्मूलया चोपपत्त्या व्यवस्थाप्य तदुपासनायां भावनापराभिधानायां दीर्घकालनैरन्तर्यवत्यां ब्रह्मसाक्षात्कारफलायां यज्ञादीनामुपयोगः । यथाहुः—'‘स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः’’


भामती-व्याख्या

रूप में अन्योऽन्याश्रयता दोष प्रसक्त होता है। 'केवल वेदान्त-वाक्यों को ही कर्मानुष्ठान की अपेक्षा है, अन्य ( कर्मादिपरक ) वाक्यों को नहीं'—ऐसा कहना भी उचित नहीं, क्योंकि जब सभी वैदिक वाक्यों में स्वार्थ-समर्पण की प्रणाली में कोई अन्तर नहीं, तब कतिपय वाक्यों को ही कर्मानुष्ठान की अपेक्षा क्यों ?

इसका उत्तर यह है कि "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इत्यादि वाक्यों के द्वारा त्वं-पदार्थ-रूप कर्तृत्वभोक्तृत्वादि धर्मों से युक्त जीवात्मा का नित्य, शुद्ध, बुद्ध, उदासीनस्वरूप तत्पदार्थ-भूत परमात्मा के साथ अभेद-बोध सहसा किसी भी श्रोता पुरुष को नहीं होता, क्योंकि 'जीव में परमात्मरूपता की योग्यता ही नहीं'—इस प्रकार के योग्यताभाव का निश्चय सहजतः सभी पुरुषों को होता है। किन्तु यज्ञ, तप और दानादि शुभ कर्मों के अनुष्ठान से जिनके अन्तःकरण का मल-विक्षेपादि दोष क्षीण हो जाता है, ऐसे विशुद्ध अन्तःकरणवाले श्रद्धालु पुरुषों को जीव में ब्रह्मभाव की योग्यता का निश्चय एवं उसके अनन्तर अभेद-बोध हो जाता है, इस प्रकार वेदान्त-वाक्यों को अपने अर्थ का बोध कराने में यज्ञादि कर्मों की अपेक्षा स्पष्ट हो जाती है। [ श्री मण्डन मिश्र भी कहते हैं—‘‘एवं च रागादिनिबन्धननैसर्गिकप्रवृत्तिभेदविलयद्वारेण दृष्टेनैव कर्मविधय आत्मज्ञानाधिकारोपयोगिनः। तथा हि शान्तस्य दान्तस्य समाहितस्य चात्मनि दर्शनमुद्दिश्यते शक्यं च’’, ( ब्र. सि. पृ. २७ ) ] ।

सिद्धान्त— जीव और ब्रह्म के अभेद में योग्यतावधारण की कारणता जो यज्ञादि में बताई गई, वहाँ जिज्ञासा होती है कि कर्मों को अप्रमाणभूत मानकर कारण माना गया है ? अथवा प्रमाणरूप मानकर ? प्रथम कल्प संगत नहीं, क्योंकि उक्त योग्यता का अवधारण (निश्चय या प्रमा ज्ञान) किसी प्रमा के करणीभूत प्रमाण का काम है, अप्रमाणभूत कर्मों का नहीं। "प्रमाणकारणं योग्यतावधारणम्" का अर्थ है—प्रमाणकारणं (प्रमाणं कारणं यस्य, तत्) योग्यतावधारणम्। द्वितीय कल्प भी उचित नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षादि परिगणित प्रमाणों में यज्ञादि कर्म की गणना किसी ने नहीं की, अतः कर्म को एक पृथक् प्रमाण मानना होगा। यदि वेदान्त के अविरुद्ध (उपक्रमादि) युक्तियों के बल पर उक्त योग्यता का अवधारण किया जाता है, तब कर्मों की क्या आवश्यकता ? अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि शब्दों को सुनकर प्राप्त श्रुतमय ( शाब्दबोधात्मक परोक्ष ) ज्ञान के द्वारा जीव में ब्रह्मभाव की परोक्ष प्रतीति होती है। वेदान्तानुकूल उपक्रमादि युक्तियों के द्वारा उक्त अभेद व्यवस्थापित होता है। इस प्रकार श्रवण और मनन के पश्चात् अभेदविषयिणी निदिध्यासनरूप भावना की लोकोत्तर लता में ब्रह्म साक्षात्कारात्मक फल की निष्पत्ति करने के लिए यज्ञादि कर्मानुष्ठान के माध्यम से

अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६३


भामती

इति। ब्रह्मचर्यतपःश्रद्धायज्ञादयश्च सत्कारः। अत एव श्रुतिः “तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” इति। विज्ञाय तर्कोपकरणेन शब्देन प्रज्ञां भावनां कुर्वीतेत्यर्थः। अत्र च यज्ञादीनां श्रेयः-परिपन्थिकल्मषनिबर्हणद्वारेणोपयोग इति केचित्। पुरुषसंस्कारद्वारेणान्ये। यज्ञादिसंस्कृतो हि पुरुष आदरनैरन्तर्यदीर्घकालैरासेवमानो ब्रह्मभावनामनाद्यविद्यावासनां समूलकाषं कषति। ततोऽस्य प्रत्यगात्मा सुप्रसन्नः केवलो विशदीभवति। अत एव स्मृतिः—‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’। ‘यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः’ इति च॥

अपरे तु ऋणत्रयापाकरणेन ब्रह्मज्ञानोपयोगं कर्मणामाहुः। अस्ति हि स्मृतिः ‘ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्’ इति।

अन्ये तु ‘तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन’ इत्यादिश्रुतिभ्यस्तत्तत्फलाय चोदि-


भामती-व्याख्या

दीर्घकालीन अभ्यास अपेक्षित है, जैसा कि महर्षि पतञ्जलि कहते हैं—“स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः” (यो० सू० १।१४)। ब्रह्मचर्य, तप, श्रद्धा और यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना ही अभेद-भावना का सत्कार है। इस बोधक्रम की व्यवस्था स्वयं श्रुति कर रही है—“तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” (बृह० उ० ४।४।२१)। अर्थात् युक्ति-सहकृत श्रुतिरूप शब्द के द्वारा विज्ञाय [उक्त अभेद का (परोक्ष) ज्ञान प्राप्त कर] भावनारूप प्रज्ञा में संलग्न हो जाय। इस भावना में यज्ञादि का उपयोग कुछ लोग कल्याण के विरोधी कल्मष (अन्तःकरणगत कालुष्य) के निबर्हण (नाश) में मानते हैं [श्री मण्डनमिश्र ने भी कहा है—“अन्ये तु मन्यन्ते अनवाप्तकामः कामोपहृतमना न परमाद्वैतदर्शनयोग्यः। कर्मभिस्तु कृतकर्मनिबर्हणः सहस्रसंवत्सरपर्यन्तः प्राजापत्यात् पदात् परमाद्वैतमात्मानं प्रतिपद्यते” (ब्र० सि० पृ० २७)]।

कुछ लोग यज्ञादि कर्मों का उपयोग अधिकारी पुरुष को संस्कृत करने में मानते हैं, क्योंकि यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से संस्कृत होकर अधिकारी व्यक्ति ब्रह्मभावना का श्रद्धापूर्वक निरन्तर दीर्घ समय तक अभ्यास करके अनादि अविद्या के भेदविषयक सुदृढ़ संस्कारों को समूल नष्ट कर डालता है, उसके अनन्तर ही उसका प्रत्यगात्मा सुप्रसन्न केवलीभूत ज्योति के रूप में जगमगा उठता है [श्री मण्डनमिश्र ने (ब्र० सि० पृ० २८ में) कहा है—“अन्ये तु पुरुषसंस्कारतयात्मज्ञानाधिकारसंसर्शी कर्मणां वर्णयन्ति—‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’ (मनु० २।२८), ‘यस्यैते चत्वारिंशत् संस्कारा अष्टावात्मगुणाः’ (गौ० ध० सू० ८।२२)]।

अन्य आचार्य (देव-ऋण, पितृऋण और ऋषि-ऋण—इन) तीन ऋणों के उद्धार में कर्मानुष्ठान का उपयोग मानते हैं, जैसा कि स्मृतिकारों ने कहा है—

ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः॥ (मनु० ६।३५)

[“जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिऋणवा जायते ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः” (तै० सं० ६।३।१०।५) यह श्रुति कहती है कि ब्राह्मण जन्म ही से तीन ऋणों का भाजन होता है, उनमें यज्ञादि ब्रह्मचर्य से ऋषि-ऋण, यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से देव-ऋण तथा सन्तानोत्पत्ति से पितृऋण का उद्धार होता है। अतः उक्त तीन ऋणों को चुका कर ही ब्राह्मण को मोक्ष-मार्ग पर आरूढ होना चाहिए। [श्री मण्डनमिश्र कहते हैं कि “अन्येषां दर्शनम्—पृथक्कार्या एव सन्तः कर्मविधय आत्मज्ञानाधिकारमवतारयन्ति पुरुषम्, अनपाकृतर्णत्रयस्य तत्रानधिकाराद्—“ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेदिति”]।