भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४५
चैतस्मिन्सर्वस्मिन्नसति असङ्गस्यात्मनः प्रमातृत्वमुपपद्यते । न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति । तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि च ।
भामती
वेमादिभ्यः पटोत्पत्तिरिति । अथ देह एवाधिष्ठाता कस्मान्न भवति, कृतमत्रात्माध्यासेनेत्यत आह ॐ न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद्व्याप्रियते ॐ । सुषुप्तेऽपि व्यापारप्रसङ्गादिति भावः । स्यादेतत्--यथाऽनध्यस्तात्मभावं वेमादिकं कुविन्दो व्यापारयन् पटस्य कर्त्ता, एवमनध्यस्तात्मभावं देहेन्द्रियादि व्यापारयन् भविष्यति तदभिज्ञः प्रमातेत्यत आह ॐ न चैतस्मिन् सर्वस्मिन् ॐ । इतरेतराध्यासे इतरेतरधर्माध्यासे चासति आत्मनोऽसङ्गस्य सर्वथा सर्वदा सर्वधर्मधर्मिवियुक्तस्य प्रमातृत्वमुपपद्यते । व्यापारवन्तो हि कुविन्दादयो वेमादीनधिष्ठाय व्यापारयन्ति । अनध्यस्तात्मभावस्य तु देहादिष्वात्मनो न व्यापारयोगोऽसङ्गत्वादित्यर्थः । अतश्चाध्यासाश्रयाणि प्रमाणानीत्याह ॐ न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति ॐ । प्रमायां खलु फले स्वतन्त्रः प्रमाता भवति । अन्तःकरणपरिणामभेदश्च प्रमेयप्रवणः कर्तृस्थश्चित्स्वभावः प्रमा कथं च जडस्यान्तःकरणस्य परिणामश्चिद्रूपो भवेत् । यदि चिदात्मा तत्र नाध्यस्येत ? कथं चिदात्मकत्तृको भवेत् । यद्यन्तःकरणं व्यापारवच्चिदात्मनि नाध्यस्येत् ? तस्मादितरेतराध्यासाच्चिदात्मकत्तृस्थं प्रमाफलं सिध्यति । तत्सिद्धौ च प्रमातृत्वं, तामेव च प्रमामुररीकृत्य प्रमाणस्य प्रवृत्तिः । प्रमातृत्वेन च प्रमोपलक्ष्यते । प्रमायाः फलस्याभावे प्रमाणं न प्रवर्त्तेत । तथा च प्रमाणमप्रमाणं
भामती-व्याख्या
और वेमादि साधनों से पट की उत्पत्ति कहीं भी नहीं देखी जाती। तुरी-वेमादि कारण-कलाप का अधिष्ठाता केवल शरीर क्यों नहीं हो जाता, इसमें आत्मा के तादात्म्याध्यास की क्या आवश्यकता ? इस शङ्का का समाधान है—"न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद् व्याप्रीयते।" जिस देह में आत्मा का अध्यास न हो, उस देह के द्वारा कुछ भी संचालित नहीं होता, अन्यथा सुषुप्ति अवस्था में भी शरीर के द्वारा करण-ग्राम का सञ्चालन होना चाहिए। 'जिन तुरी-वेमादि साधनों में आत्मा का तादात्म्याध्यास नहीं होता, उन साधनों को भी कुविन्द सञ्चालित कर पटादि कार्यों का जैसे कर्त्ता बन जाता है, वैसे ही जिन देहादि पदार्थों में आत्माध्यास नहीं होता, उनको सञ्चालित करके उनका अभिज्ञ व्यक्ति प्रमाता क्यों नहीं बन जाता ?' इस शङ्का का समाधान है—"न चैतस्मिन् सर्वस्मिन् असति"। अर्थात् इस आत्मा के तादात्म्याध्यास के बिना सर्वथा असङ्ग एवं समस्त धर्मधर्मिभाव से रहित आत्मा में प्रमातृत्व नहीं बन सकता, क्योंकि कुविन्दादि स्वयं सक्रिय होकर ही तुरी वेमादि का सञ्चालन कर सकते हैं। जिस आत्मा में देहादि का तादात्म्याध्यास नहीं, उसमें किसी प्रकार की भी क्रिया सम्भव नहीं, क्योंकि आत्मा असङ्ग है। प्रमाणों के अध्यासापेक्षी होने में यह भी एक कारण है कि "न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति।" आशय है कि प्रमारूप फल के उत्पादन में स्वतन्त्र कर्त्ता को प्रमाता कहा गया है। अन्तःकरण के उस परिणाम-विशेष को प्रमा कहा जाता है, जो प्रमेय-विषयक और कर्त्ता में रहनेवाला चित्स्वभाव है। जड़ाभूत अन्तःकरण का चित्स्वरूप परिणाम तभी सम्भव होगा, जब कि अन्तःकरण में चिदात्मा का तादात्म्याध्यास होगा। उक्त प्रमा का कर्त्ता आत्मा तभी होगा, जबकि कर्तृत्ववादि धर्म-युक्त अन्तःकरण का आत्मा में तादात्म्याध्यास होगा, फलतः आत्मा और अन्तःकरणादि का अन्योऽन्याध्यास होने पर ही प्रमारूपफल चिदात्मरूप कर्त्ता के आश्रित सिद्ध हो सकेगा, उसकी सिद्धि हो जाने पर कर्त्ता में प्रमातृत्व बन सकेगा और उसी प्रमा को उद्देश्य करके प्रमाणों की प्रवृत्ति होती है। भाष्यकार ने जो कहा है—"न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिः"। वहाँ पर 'प्रमातृत्व' पद की लक्षणा 'प्रमा' में की जाती है, क्योंकि प्रमारूप फल के न होने पर प्रमाण