भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
|---|
पश्वादिभिश्चाविशेषात् । यथा हि पश्वादयः शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां संबन्धे सति शब्दादिविज्ञाने प्रतिकूले जाते ततो निवर्तन्ते, अनुकूले च प्रवर्तन्ते; यथा दण्डोद्यतकरं पुरुषमभिमुखमुपलभ्य मां हन्तुमयमिच्छतीति पलायितुमारभन्ते, हरिततृणपूर्णपाणि-
भामती
स्यादित्यर्थः । उपसंहरति— ॐ तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ॐ ।
स्यादेतत् — भवतु पृथग्जनानामेवम् , आगमोपपत्तिप्रतिपन्नप्रत्यगात्मतत्त्वानां व्युत्पन्नानामपि पुंसां प्रमाणप्रमेयव्यवहारा दृश्यन्त इति कथमविद्यावद्विषयाण्येव प्रमाणानीत्यत आह । ॐ पश्वादिभिश्चाविशेषादिति ॐ । विदन्तु नामागमोपपत्तिभ्यां देहेन्द्रियादिभ्यो भिन्नं प्रत्यगात्मानं, प्रमाणप्रमेयव्यवहारे तु प्राणभृन्मात्रधर्मान्नातिवर्तन्ते । यादृशो हि पशुशकुन्तादीनामविप्रतिपन्नमुग्धभावानां व्यवहारस्तादृशो व्युत्पन्नानामपि पुंसां दृश्यते । तेन तत्सामान्यात्तेषामपि व्यवहारसमयेऽविद्यावत्त्वमनुमेयम् । चशब्दः समुच्चये, उक्तशङ्कानिवर्तनसहितपूर्वोक्तोपपत्तिरविद्यावत्पुरुषविषयत्वं प्रमाणानां साधयतीत्यर्थः । एतदेव विभजते ॐ यथा हि पश्वादयः इति ॐ । अत्र च ॐ शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां सम्बन्धे सति ॐ इति प्रत्यक्षं प्रमाणं दर्शितम् । ॐ शब्दादिविज्ञाने ॐ इति तत्फलमुक्तम् । ॐ प्रतिकूले ॐ इति चानुमानफलम् । तथाहि — शब्दादिस्वरूपमुपलभ्य तज्जातीयस्य प्रतिकूलतामनुस्मृत्य तज्जातीयतयोपलभ्यमानस्य प्रतिकूलतामनुमिमीत इति । उदाहरति— ॐ यथा दण्डेति ॐ । शेषमतिरोहितार्थम् । स्यादेतत् — भवन्तु
भामती-व्याख्या
की प्रवृत्ति क्योंकर होगी ? तब प्रमाण अप्रमाण होकर रह जायगा । अविद्यावद्विषयकत्व का उपसंहार किया जाता है— "तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ।"
साधारण पठित या अपठित व्यक्तियों के प्रत्यक्षादि प्रमाण तो अवश्य ही अविद्यावान् पुरुषों में सीमित माने जा सकते हैं, किन्तु जिन मनीषियों ने आगम प्रमाण और आगमानुकूल युक्तियों के बल पर आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया है, ऐसे व्युत्पन्न विद्वानों के प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों में अविद्यावद्विषयकत्व क्योंकर सम्भव होगा ? इस शङ्का का अपनयन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'पश्वादिभिश्चाविशेषात्' । भले ही तत्त्ववेत्ता पुरुष उपनिषदादि प्रमाणों और उनकी अनुगुण उपपत्तियों की सहायता से देहेन्द्रियादि-भिन्न प्रत्यगात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लें, किन्तु प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों में साधारण प्राणियों की मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया करते, क्योंकि पशु-पक्षी आदि अव्युत्पन्न प्राणियों के व्यवहार जैसे देखे जाते हैं, वैसे ही व्युत्पन्न विद्वानों के भी व्यवहार देखे जाते हैं । इस प्रकार व्यवहारों की समानता के द्वारा व्युत्पन्न विद्वानों के प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी अविद्यावत्पुरुषविषयकत्व का अनुमान किया जा सकता है—'विदुषामपि प्रत्यक्षादिव्यवहारः, अध्यासनिबन्धनः, व्यवहारत्वात्, पश्वादिव्यवहारवत्' । भाष्य में प्रयुक्त 'च' शब्द समुच्चयार्थक है, उसके प्रयोग से अध्यासनिबन्धनत्व की सिद्धि में उक्त आशङ्का की निवृत्ति और कथित युक्तियों का समुच्चय किया जाता है । भाष्यकार अपने दृष्टान्त का स्पष्टीकरण स्वयं कर रहे हैं—"यथा पश्वादयः" इत्यादि । 'शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां सम्बन्धे सति'—इस वाक्य के द्वारा प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाया है । 'शब्दादि विज्ञाने'—इस वाक्य से प्रत्यक्ष का फल सूचित किया है । 'प्रतिकूले'—ऐसा कह कर अनुमान का फल प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि शब्दादि को श्रोत्र से सुन एवं उसी प्रकार के शब्द की प्रतिकूलता का स्मरण कर 'तज्जातीयत्व' हेतु के द्वारा उपलभ्यमान शब्द में प्रतिकूलता ( अनिष्ट-साधनता ) का अनुमान किया जाता है—'अयं शब्दः, मदनिष्ट-साधनम्, शब्दविशेषत्वात्, पूर्वोपलब्धशब्दवत्' । उदाहरण दिया गया—"यथा दण्ड"—इत्यादि से ।