भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७
मुपलभ्य तं प्रत्यभिमुखीभवन्ति; एवं पुरुषा अपि व्युत्पन्नचित्ताः क्रूरदृष्टीनाक्रोशतः खड्गोद्यतकरांर्बलवत उपलभ्य ततो निवर्तन्ते, तद्विपरीतान्प्रति प्रवर्तन्ते, अतः समानः पश्वादिभिः पुरुषाणां प्रमाणप्रमेयव्यवहारः। पश्वादीनां च प्रसिद्धोऽविवेकपुरःसरः प्रत्यक्षादिव्यवहारः। तत्सामान्यदर्शनाद् व्युत्पत्तिमत्तामपि पुरुषाणां प्रत्यक्षादिव्यवहारस्तत्कालः समान इति निश्चीयते।
शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वात्मनः परलोकसंबं-
भामती
प्रत्यक्षादीन्यविद्यावद्विषयाणि। शास्त्रं तु ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेतेत्यादि न देहात्माध्यासेन प्रवर्तितुमर्हति। अत्र खल्वामुष्मिकफलोपभोगयोग्योऽधिकारी प्रतीयते। तथा च पारमर्षं सूत्रम् - “शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात्स्वयं प्रयोगे स्यादिति”। न च देहादि भस्मीभूतं पारलौकिकाय फलाय कल्पत इति देहाद्यतिरिक्तं कञ्चिदधिकारिणमाक्षिपति शास्त्रं, तदवगमश्च विद्येति कथमविद्यावद्विषयं शास्त्रमित्याशङ्कयाह ॐ शास्त्रीये तु इति ॐ। तुशब्दः प्रत्यक्षादिव्यवहाराद्विनक्ति शास्त्रीयम्। अधिकारशास्त्रं हि स्वर्गकामस्य पुंसः परलोकसम्बन्धं विना न निर्वहतीति तावन्मात्रमाक्षिपेत्, न स्वस्यासंसारित्वमपि तस्याधिकारेऽनुपयोगात्। प्रत्युतोपनिषदस्य पुरुषस्याकर्तुरभोक्तुरधिकारविरोधात्। प्रयोक्ता हि कर्मणः कर्मजनितफलभोगभागी कर्मण्यधिकारी स्वामी भवति। तत्र कथमकर्ता प्रयोक्ता कथं वाऽभोक्ता कर्मजनितफलभोगभागी? तस्मादनाद्यविद्यालब्धकर्तृत्वभोक्तृत्वब्राह्मणत्वाद्यभिमानिनं नरमधिकृत्य विधि-निषेधशास्त्रं प्रवर्तते। एवं वेदान्ता अप्यविद्यावत्पुरुषविषया एव, नहि प्रमात्रादिविभागादृते तदर्थाधि-
भामती-व्याख्या
उसकी ओर दौड़ता आ रहा है, तब वह वहाँ से भाग खड़ी होती है और जब अपने मालिक को हरा-हरा घास लिये अपनी ओर पुचकार करते आता देखती है, तब गौ अपने मालिक के पास आ जाती है। इसी प्रकार हिताहित की बात सोच-समझ कर प्राणिमात्र का व्यवहार प्रवृत्त होता है]।
यहाँ यह शङ्का अवश्य उठ जाती है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रवृत्ति अध्यासमूलक मानी जा सकती है, किन्तु “ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत”—इत्यादि शास्त्र देहात्माध्यासमूलक नहीं हो सकते, क्योंकि ज्योतिष्टोमादि कर्मों का अधिकारी वही हो सकता है, जो पारलौकिक स्वर्गादि फलों का उपभोग करने योग्य हो, जैसे कि महर्षि जैमिनि कहते हैं— “शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात् स्वयं प्रयोगे स्यात्” (जै. सू. ३।७।१८) अर्थात् वेद-प्रतिपादित स्वर्गादिरूप फल कर्म के प्रयोक्ता (अनुष्ठान करनेवाले कर्त्ता) को ही प्राप्त होता हैं, क्योंकि विधिवाक्य-घटक ‘स्वर्गकाम,’ इत्यादि शब्द उसी कर्त्ता का फलभोक्तृत्वरूप लक्षण प्रस्तुत करते हैं। यजमान को अपने स्वयं किए हुए कर्मों का ही फल मिलता है। जन्मान्तर में प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलों का भोग यजमान का यह शरीर नहीं कर सकता, क्योंकि प्राण निकल जाने पर इस शरीर को यहाँ ही भस्म कर दिया जाता है, अतः उक्त शास्त्र देहादि से भिन्न किसी अधिकारी का आक्षेप करता है, देहादि से अतिरिक्त आत्मरूप अधिकारी का ज्ञान ही विद्या कहलाता है, अतः शास्त्र को अविद्यावत्पुरुषविषयक क्योंकर कहा जा सकेगा? इस आशङ्का का उचित समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वा परलोकसम्बन्धमधिक्रियते।” ‘तु’ पद के द्वारा शास्त्रीय व्यवहार में प्रत्यक्षादि-व्यवहारों से विशेषता ध्वनित की है। अधिकार (फल-भोक्तृत्व-प्रतिपादक) शास्त्र का निर्वाह तब तक नहीं होता, जब तक स्वर्गकामनावान् पुरुष का परलोक के साथ सम्बन्ध उपपन्न नहीं हो जाता, अतः अधिकार-शास्त्र केवल इतना