भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

न्धमधिक्रियते, तथापि न वेदान्तवेद्यम्, अशनायाद्यतीतम्, अपेतब्रह्मक्षत्रादिभेदम्, असंसार्यात्मतत्त्वमधिकारेऽपेक्ष्यते, अनुपयोगादधिकारविरोधाच्च । प्राक् च तथाभूतात्मविज्ञानात्प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते । तथा

भामती

गमः । ते त्वविद्यावन्तमनुशासन्तो निर्मृष्टनिखिलाविद्यमनुशिष्टं स्वरूपे व्यवस्थापयन्तीत्येतावानेषां विशेषः । तस्मादविद्यावत्पुरुषविषयाण्येव शास्त्राणीति सिद्धम् ॥

स्यादेतद् — यद्यपि विरोधानुपयोगाभ्यामौपनिषदः पुरुषोऽधिकारे नापेक्ष्यते, तथाप्युपनिषद्गूढोऽवगम्यमानः शक्नोत्यधिकारं निरोद्धुम् । तथा च परस्परापहतार्थत्वेन कृत्स्न एव वेदः प्रामाण्यमपजह्यादित्यत आह ॐ प्राक् च तथाभूतात्म इति ॐ । सत्यमौपनिषदपुरुषाधिगमोऽधिकारविरोधी, तस्मात्तु पुरस्तात् कर्मविधयः स्वोचितं व्यवहारं निर्वर्त्तयन्तो नानुपजातेन ब्रह्मज्ञानेन शक्या निरोद्धुम् । न च परस्परापह्नतिः, विद्याविद्यावत्पुरुषभेदेन व्यवस्थोपपत्तेः । यथा “न हिंस्यात् सर्वा भूतानीति” साध्यांश-निषेधेऽपि “श्येनेनाभिचरन् यजेतेति” शास्त्रं प्रवर्त्तमानं न हिंस्यादित्यनेन न विरुध्यते, तत् कस्य हेतोः ?

भामती-व्याख्या

ही आक्षेप कर सकता है कि हमारे फल का भोक्ता परलोकसम्बन्ध के योग्य है । उससे अधिक भोक्ता में असंसारित्वादि का आक्षेप नहीं कर सकता, क्योंकि असंसारित्वादि का प्रतिपादन अधिकार में उपयोगी नहीं, प्रत्युत उपनिषद्-गम्य असंसारित्व ( अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व ) फल-भोक्तृत्वरूप अधिकार के विरुद्ध है, क्योंकि प्रयोक्ता ( कर्म का प्रयोग करनेवाला कर्त्ता ) ही कर्म-जनित फल का भोक्ता बन कर कर्म का अधिकारी ( स्वामी ) माना जाता है । वहाँ अकर्त्ता पुरुष कर्म का अनुष्ठाता एवं अभोक्ता पुरुष कर्म-जनित फल के भोग का भागी कैसे बनेगा ? फलतः अनादि अविद्या से प्रयुक्त कर्तृत्व-भोक्तृत्व के अधिकारी पुरुष को उद्देश्य करके ही विधि-निषेध शास्त्र प्रवृत्त होते हैं। इसी प्रकार वेदान्त शास्त्र भी अविद्यावत्पुरुष को ही विषय करके प्रवृत्त होता है, क्योंकि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयादि-विभाग के बिना वेदान्त शास्त्र के अर्थ का ज्ञान ही नहीं हो सकता । वेदान्त वाक्य तो अविद्यावान् पुरुष को अपने पावन उपदेशों के द्वारा सकल आध्यासिक परिच्छेदों से निकाल कर अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप में व्यवस्थापित कर देते हैं— इतना वेदान्त-शास्त्र का विधि-निषेधात्मक धर्म-शास्त्र से अन्तर अवश्य है । इस प्रकार यह एकान्ततः सिद्ध हो जाता है कि सभी शास्त्र अविद्यावान् पुरुष को विषय करते हैं ।

यद्यपि कथित अनुपयोग और विरोध होने के कारण औपनिषद ( अकर्त्ता-अभोक्ता ) पुरुष कर्माधिकार में अपेक्षित नहीं, तथापि उपनिषत् प्रमाण से अवगम्यमान पुरुष कर्माधिकार का निरोध या बाध तो कर सकता है । इस प्रकार परस्पर-बाधित अर्थ का प्रतिपादक वेद अपनी प्रमाणता खो बैठेगा । इस आक्षेप का परिहार किया गया—"प्राक् तथाभूतात्म-विज्ञानात् प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते” । यह सत्य है कि औपनिषद पुरुष का ज्ञान कर्माधिकार का विरोधी है, किन्तु उस ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व कर्म-विधायक वाक्य अपने अनुकूल व्यवहार का सम्पादन करते हुए अनुत्पन्न ब्रह्म-ज्ञान के द्वारा बाधितार्थक नहीं हो सकते ? कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड का परस्पर कोई विरोध भी नहीं, क्योंकि कर्म-काण्ड का अधिकारी अज्ञानवान् और ज्ञान-काण्ड का अधिकारी ज्ञानवान् पुरुष होता है—इस प्रकार अधिकारी के भेद से उक्त काण्डों की व्यवस्था हो जाती है। जैसे कि “न हिंस्यात् सर्वाभूतानि” ( कूर्मपु० अ. १६ ) । यह शास्त्र साध्यरूप हिंसा का निषेध करता है और "श्येनेनाभिचरन् यजेत” ( षड्विं. ब्रा. १।८ ) यह शास्त्र हिंसा ( शत्रु-वध ) का विधान करता है,