भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
| २४ | शारीरकशङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
नापि सदसद्, परस्परविरोधादिति अनिर्वाच्यमेवारोपणीयं मरीचिषु तोयमास्थेयं तदनेन क्रमेणाध्यस्तं तोयं परमार्थतोयमिव । अत एव पूर्वदृष्टमिव । तत्त्वतस्तु न तोयं न च पूर्वदृष्टं किं त्वनृतमनिर्वाच्यम् । एवं च देहेन्द्रियादिप्रपञ्चोऽप्यनिर्वाच्योऽपूर्वोऽपि पूर्वमिथ्याप्रत्ययोपदर्शित इव परत्र चिदात्मन्यध्यस्यत इति उपपन्नमध्यासलक्षणयोगाद् देहेन्द्रियादिप्रपञ्चबाधनं चोपपादयिष्यते । चिदात्मा तु श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणगोचरस्तन्मूलतदविरुद्धन्यायनिर्णीतशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सत्त्वेनैव निर्वाच्यः । अबाधिता स्वयम्प्रकाशतैवास्य सत्ता सा च स्वरूपमेव चिदात्मनो न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा इति सर्वमवदातम् ।
स चायमेवंलक्षणकोऽध्यासोऽनिर्वचनीयः सर्वेषामेव सम्मतः परीक्षकाणां तद्भेदे परं विप्रतिपत्तिरित्त्यनिर्वचनीयतां द्रढयितुमाह ॐ तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति ॐ । अन्यधर्मस्य, ज्ञानधर्मस्य
भामती-व्याख्या
खपुष्प के समान अत्यन्त अलीक कहना युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि अत्यन्त अलीक पदार्थ कभी अनुभव का विषय नहीं हो सकता । परिशेषतः अध्यस्यमान जलादि पदार्थों को सत्, असत् और सदसदुभयरूप न मानकर अनिर्वाच्य ही मानना होगा, अतः अध्यस्त जल व्यावहारिक जल के समान अत एव पूर्व-दृष्ट जैसा है । वस्तुतः न तो वह जल है और न पूर्वदृष्ट किन्तु अनृत और अनिर्वाच्यमात्र है । इस प्रकार देह इन्द्रियादि प्रपञ्च भी अनिर्वाच्य है, अपूर्व ( पूर्व सत् न ) होने पर भी मिथ्या ज्ञान के द्वारा पूर्व उपदर्शित एवं चिदात्मरूप अधिष्ठान में अध्यस्त है—यह उपपन्न हो गया, क्योंकि अध्यास का लक्षण उनमें घट जाता है ।
देह और इन्द्रियादि प्रपञ्च बाधित होने के कारण अनृत या मिथ्या है, इसके बाध का उपपादन आगे किया जायगा किन्तु चिदात्मा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में परमार्थ वस्तुत्वेन निर्णीत एवं श्रुतिमूलक उपक्रमादि न्यायों से अवधारित है, अतः शुद्ध, बुद्ध मुक्त स्वभाव के आत्मा का सत्त्वेन निर्वचन करना होगा । चिदात्मा की जो अबाधित स्वयं प्रकाशता है, वही उसका सत्त्व है, उससे अतिरिक्त सत्तारूप महासामान्य ( जाति ) का समवाय या अर्थक्रियाकारित्व को सत्त्व नहीं माना जाता [ सत् पदार्थों की सत्ता का निर्वचन दार्शनिकों ने विभिन्न प्रकार से किया है—वैशेषिकाचार्यों ने सत्ता नाम की एक जाति मानी है, जो द्रव्य, गुण और कर्म—इन पदार्थों में रहती है—"सामान्यं द्विविधम् परमपरं चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं सत्ता महाविषयत्वात्" ( प्र. भा. पृ. २६ ) । इसी के आधार पर सत्ता-समवायवान् पदार्थ को सत् और 'सत्तासमवाय' ( व्योम. पृ. १२६ ) को सत्त्व कहा गया है । बौद्धों ने सत्ता का लक्षण किया है—"सत्ता अर्थक्रियास्थितिः" ( प्र. वा. १११ ) किन्तु वेदान्त में 'सतो भावः सत्ता'—ऐसा भावार्थक 'तल्' प्रत्यय न कर 'देवता' शब्द के समान स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय मानकर सद्रूप ही सत्ता मानी है । वार्तिककार कहते हैं—
प्रकृत्यर्थातिरेकेण प्रत्ययार्थो न विद्यते ।
सत्तैत्यत्र ततः स्वार्थस्तद्धितोऽत्र भवन् भवेत् ॥ ( बृह. वा. पृ. १६७८ )
वैशेषिक-सम्मत सत्ता का निरास बौद्धों ने भी किया है—सच्छब्दनिमित्तं हि सतो भावः सत्ता, द्रव्यं प्रकृत्यर्थः, द्रव्यात्मसंग्रहः प्रत्ययार्थः । सक्रिया वोपचारसत्तारूपा । वैशेषिकसत्ता नोभयम्, अर्थान्तरत्वात्" ( अभिधर्मप्र. पृ. ६ ) ] ।
उक्त अनिर्वचनीय अध्यास प्रायः सभी दार्शनिकों को सम्मत है, केवल उसके स्वरूप विशेष में विप्रतिपत्ति ( मतभेद ) है, उसे दिखाने के लिए कहा गया है—"तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति" ।
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५
केचित्—अन्यत्रान्यधर्माध्यास-इति वदन्ति । केचित्तु - यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रह-
भामती रजतस्य, ज्ञानाकारस्येति यावत्, अध्यासोऽन्यत्र बाह्ये । सौत्रान्तिकनये तावद् बाह्यमस्ति वस्तुसत्तन्न ज्ञानाकारस्यारोपः । विज्ञानवादिनामपि यद्यपि न बाह्यं वस्तुसत्तथाप्यनाद्यविद्यावासनाटोपितमलीकं बाह्यं, तत्र ज्ञानाकारस्यारोपः । उपपत्तिश्च यद्यादृशमनुभवसिद्धं रूपं तत्तादृशमेवाभ्युपेयमित्युत्सर्गोऽन्यथात्वं पुनरस्य बलवद्बाधकप्रत्ययवशान्नेदं रजतमिति च बाधस्येदन्तामात्रवाधेनोपपत्तौ न रजतगोचरतोचिता । रजतस्य धर्मिणो बाधे हि रजतं च तस्य च धर्मं इदन्ता बाधिते भवेताम्, तद्वरमिदन्तैवास्य धर्मो बाध्यतां न पुना रजतमपि धर्मि, तथा च रजतं बहिर्बाधितमर्यादान्तरे ज्ञाने व्यवतिष्ठत इति ज्ञानाकारस्य बहिरध्यासः सिध्यति ।
केचित्तु ज्ञानाकारख्यातावपरितुष्यन्तो वदन्ति ꣸ यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रम इति ꣸ । अपरितोषकारणं चाहुः—विज्ञानाकारता रजतादेरनुभवाद्व्यवस्थाप्येतानुमानाद्वा ? तत्रानुमानमुपरिष्टान्निराकरिष्यते । अनुभवोऽपि रतजप्रत्ययो वा स्याद्, बाधकप्रत्ययो वा ? न तावद्रजतानुभवः । स हीदङ्कारास्पदं रजतमावेदयति न त्वान्तरम्, अह्मिति हि तदा स्यात् प्रतिपत्तुः प्रत्ययादव्यतिरेकात् ।
भामती-व्याख्या
( १ ) आत्मख्याति—बौद्धों का योगाचार निकाय अन्य पदार्थ ( ज्ञान ) के रजतादि धर्मों ( आकारों ) का आरोप अन्य पदार्थ ( बाह्य वस्तु ) में किया करता है । सौत्रान्तिक मत में बाह्य वस्तु अनुमित है, उसमें ज्ञान के आकार का समारोप हो सकता है । योगाचार के मत में यद्यपि बाह्य वस्तु सत् नहीं, तथापि अनादि अविद्या-वासना के द्वारा आरोपित अलीक बाह्य पदार्थ माना जाता है, उसी में ज्ञान के रजतादि आकारों का अध्यास हो जाता है । इस पक्ष में उपपत्ति का प्रदर्शन इस प्रकार किया जाता है कि जो वस्तु जैसी अनुभव में आती है, उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए—ऐसा नैसर्गिक नियम है । उसका अन्यथाकरण तो किसी प्रबल बाधक प्रत्यय के बल पर ही सम्भव हो सकता है । ‘नेदं रजतम्’—इस बाध की चरितार्थता जब रजतगत केवल इदन्ता धर्म का बाध कर देने मात्र से हो जाती है, तब रजतरूप धर्मी का वह बाध नहीं कर सकता, क्योंकि रजतरूप धर्मी का भी बाध करने पर रजत और उसके धर्मभूत इदन्ता—इन दोनों का बाध करना होगा, उससे लाघव तो इसी में है कि रजत के केवल ‘इदन्ता’ धर्म का ही बाध किया जाय, रजतरूप धर्मी का नहीं । रजत बाहर बाधित होकर आन्तरिक ज्ञान में अवस्थित हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान के आकार का बाहर आरोप उपपन्न हो जाता है ।
( २ ) अख्याति—कतिपय विद्वान् विज्ञानाकार ख्याति से सन्तुष्ट न होकर कहते हैं कि “यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रमः” अर्थात् शुक्त्यादि में जो रजतादि का अध्यास कहा जाता है, वह वस्तुतः शुक्ति और रजत का भेद-ग्रह न रहने के कारण ‘इदं रजतम्’—ऐसे ज्ञान में भ्रमरूपता का व्यवहार होने लग जाता है । ये लोग आत्मख्याति में अपनी अरुचि का कारण यह बताते हैं कि बाह्य पदार्थ में रजताकारता का जो आरोप माना जाता है, वह अनुभव के आधार पर वैसा माना जाता है ? अथवा अनुमान के बल पर ? अनुमान का निराकरण आगे तर्कपाद में किया जायगा । अनुभव वहाँ दो होते हैं—(१) इदं रजतम् और (२) नेदं रजतम् । ‘इदं रजतम्’—यह अनुभव रजत की ज्ञानाकारता में प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि वह रजत को इदन्त्वेन बाहर सिद्ध करता है आन्तरिक ज्ञानाकारता का व्यवस्थापक नहीं हो सकता । रजत को ज्ञान का आकार मानने पर ‘इदं रजतम्’— ऐसा अनुभव न होकर ‘अहं रजतम्’—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, क्योंकि विज्ञानवाद में विज्ञान
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भामती
भ्रान्तं विज्ञानं स्वाकारमेव बाह्यतयाऽध्यवस्यति। तथा च नाहङ्कारास्पदत्वमस्य गोचरो ज्ञानाकारता पुनरस्य बाधकप्रत्ययप्रवेदनीयेति चेत्, हन्त बाधकप्रत्ययमप्यालोचयत्वायुष्मान्। किं पुरोवर्तिद्रव्यं रजताद्विवेचय- त्याहो ज्ञानाकारतामध्यस्य दर्शयति। तत्र ज्ञानाकारतोपदर्शनव्यापारं बाधकप्रत्ययस्य ब्रुवाणः श्लाघनीय- प्रज्ञो देवानां प्रियः। पुरोवर्तित्वप्रतिषेधार्थदस्य ज्ञानाकारतेति चेत्, न; असन्निधानाग्रहणनिषेधाद् असन्निहितो भवति प्रतिपत्तुरत्यन्तसन्निधानं त्वस्य प्रतिपत्त्रात्मकं कुतस्त्यम्?
न चैष रजतस्य निषेधो न चेदन्तायाः, किन्तु विवेकाग्रहप्रसञ्जितस्य रजतमिदमिति रजतव्यवहारस्य। न च रजतमेव शुक्तिकायां प्रसञ्जितं रजतज्ञानेन, नहि रजतनिर्भासस्य शुक्तिकालम्बनं युक्तमनुभवविरोधात्। न खलु सत्तामात्रेणालम्बनम्, अतिप्रसङ्गात्। सर्वेषामर्थानां सत्त्वाविशेषादालम्बनत्वप्रसङ्गात्। नापि कारण- त्वेन, इन्द्रियादीनामपि कारणत्वात्। तथा च भासमानतैवालम्बनार्थः। न च रजतज्ञाने शुक्तिका भासत इति कथमालम्बनं भासमानताभ्युपगमे वा कथं नानुभावविरोधः? अपि चेन्द्रियादीनां समीचीनज्ञानोप-
भामती-व्याख्या
को ही अहंपदार्थ माना जाता है। यदि कहा जाय कि रजत है तो विज्ञान का अपना ही आकार किन्तु भ्रान्त विज्ञान अपने आकार को ही बाह्य पदार्थ पर आरोपित कर देता है, इसलिए 'अहं रजतम्'—ऐसी प्रतीति नहीं होती। यदि रजत की विज्ञानाकारता 'नेदं रजतम्'—इस बाधक ज्ञान के द्वारा सिद्ध होती है, तब बाधक ज्ञान की परीक्षा कर ली जाय। बाधक ज्ञान क्या पुरोवर्ती (शुक्ति) द्रव्य को रजत से केवल भिन्न बताता है? अथवा रजत में ज्ञानाकारता की भी सिद्धि करता है? 'नेदं रजतम्'—इस निषेध ज्ञान को रजत की ज्ञानाकारता का साधक मानना तो निरी मूर्खता है। यदि कहा जाय कि रजत में पुरोवर्तित्व का निषेध कर देने से अर्थात् अन्तरवर्ती ज्ञानाकारता पर्यवसित होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्ति और रजत का वस्तुतः असन्निधान है, किन्तु उसका ग्रहण न होने के कारण रजत को इदं रूप से सन्निहित समझ लिया गया था, अब उस असन्निधानाग्रह का 'नेदं रजतम्'—इस प्रकार निषेध कर देने से वास्तविक असन्निधान (ज्ञाता पुरुष से दूर आपण में अवस्थान) सिद्ध होना चाहिए, अत्यन्त सन्निधान (विज्ञानरूप ज्ञाता पुरुष का आकार) क्योंकर स्थिर होगा? वस्तु-स्थिति यह है कि 'नेदं रजतम्'—यह निषेध न तो रजत का निषेधक है और न रजतगत इदन्ता का, किन्तु शुक्ति और रजत के भेदाग्रह के द्वारा आपादित 'रजतमिदम्'—इस प्रकार के व्यवहारमात्र का निषेधक होता है।
'इदं रजतम्'—इस ज्ञान के द्वारा रजत ही शुक्ति में अध्यस्त होता है'—यह कहना संगत नहीं, क्योंकि रजत-भासक ज्ञान का शुक्ति को आलम्बन (विषय) मानना अनुभव से विरुद्ध है। सदैव अनुभव यही बताता है कि जो ज्ञान जिस पदार्थ का भासक होता है, उस ज्ञान का वही आलम्बन होता है। शुक्ति उस देश में विद्यमान होने मात्र से रजत-ज्ञान का आलम्बन हो जायगी—ऐसा मानने पर यह अतिप्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है कि वहाँ विद्यमान सभी पदार्थ सभी ज्ञानों के विषय हो जायेंगे। 'रजत-ज्ञान का कारण होने से शुक्ति उसका आलम्बन है'—ऐसा मानने पर इन्द्रियादि भी रजत-ज्ञान के आलम्बन हो जायेंगे, क्योंकि वे भी उस ज्ञान के कारण हैं। अतः 'भासमानत्वमेवालम्बनत्वम्'—ऐसा ही आलम्बन का लक्षण करना चाहिए, जब 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति भासित नहीं हो रही, तब वह उसका आलम्बन क्योंकर होगी? अतः 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान की भासमानता शुक्ति में मानना अनुभव-विरुद्ध है।
दूसरी बात यह भी हैं कि ज्ञानोत्पादक इन्द्रियादि पदार्थों में समीचीन (प्रमा) ज्ञान
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७
भामती
जनने सामर्थ्यमुपलब्धमिति कथमेभ्यो मिथ्याज्ञानसम्भवः ? दोषसहितानां तेषां मिथ्याप्रत्ययेऽपि सामर्थ्य- मिति चेत्, न, दोषाणां कार्योपजननसामर्थ्यविघातमात्रे हेतुत्वात् । अन्यथा दुष्टादपि कुटजबीजाद् वटा- ङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । अपि च स्वगोचरव्यभिचारे विज्ञानानां सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गः । तस्मात् सर्वं ज्ञानं समीचीनमास्थेयम् । तथा च रजतमदमिति च द्वे विज्ञाने स्मृत्यनुभवरूपे तत्रेदमिति पुरोवर्त्तिद्रव्यमात्र- ग्रहणं दोषवशात् तद्गतशुक्तित्वसामान्यविशेषस्याग्रहणात् तन्मात्रं च गृहीतं सदृशतया संस्कारोद्बोधक्रमेण रजते स्मृतिं जनयति । सा च गृहीतग्रहणस्वभावापि दोषवशाद् गृहीतत्वांशप्रमोषाद् ग्रहणमात्रमवतिष्ठते । तथा च रजतस्मृतेः पुरोवर्त्तिद्रव्यमात्रग्रहणस्य च मिथः स्वरूपतो विषयतश्च भेदाग्रहात् सन्निहितरजत- गोचरज्ञानसारूप्येणेदं रजतमिति भिन्ने अपि स्मरणग्रहणे अभेदव्यवहारं च सामानाधिकरण्यव्यपदेशं च
भामती-व्याख्या
के उत्पादन का ही सामर्थ्य और स्वभाव पाया जाता है, उनसे मिथ्या ज्ञान की उत्पत्ति क्योंकर होगी ? यदि कहा जाय कि किसी दोष से युक्त हो जाने पर उन्हीं कारणों में मिथ्या ज्ञान के उत्पादन का सामर्थ्य आ जाता है । तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि दोष सदैव नैसर्गिक सामर्थ्य के घातक होते हैं, कार्यान्तर के जनक नहीं होते, अन्यथा कुटज (कुटवेर) के दुष्ट बीज से वट अङ्कुरित हो जाना चाहिए ।
'सभी ज्ञान नियमतः अपने विषय के ही भासक होते हैं'—इस नियम का यदि कहीं भी व्यभिचार माना जाता है, तब सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा, अतः सभी ज्ञानों को प्रमात्मक ही मानना चाहिए [ श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
“यथार्थं सर्वमेवेह विज्ञानमिति सिद्धये ।
प्रभाकरगुरोर्भावः समीचीनः प्रकाश्यते ॥
अत्र ब्रूमो य एवार्थो यस्यां संविदि भासते ।
वेद्यः स एव नान्यद्धि विद्याद्वेद्यस्य लक्षणम् ॥
इदं रजतमित्यत्र रजतं चावभासते ।
तदेव तेन वेद्यं स्यान्न तु शुक्तिरवेदनात् ॥
तेनान्यस्यान्यथाभानं प्रतीत्यैव पराहतम् ।
परस्मिन् भासमाने हि परं भासते यतः ॥ ( प्र. पं. पृ. ४८ )
अहो बत महानेष प्रमादो धीमतामपि ।
ज्ञानस्य व्यभिचारे हि विश्वासः किंनिबन्धनः ॥ ( प्र. पं. पृ. ५९ ) ] ।
अख्यातिवाद के अनुसार 'इदं रजतम्'—यहाँ पर 'रजतम्'—यह ज्ञान स्मृति और 'इदम्'—यह ज्ञान अनुभवरूप है । 'इदम्'—इस ज्ञान के द्वारा पुरोवर्ती शुक्ति का केवल द्रव्यत्वेन सामान्य-ज्ञान मात्र होता है, नेत्रगत दोष के कारण शुक्तिकात्वरूप विशेष जाति का ग्रहण नहीं हो पाता । चमकीले द्रव्यमात्र के ग्रहण से वैसे ही चमकीले रजत द्रव्य के संस्कार उद्बुद्ध होकर रजत का स्मरण करा देते हैं । यद्यपि स्मृति ज्ञान गृहीतमात्र का ग्राहक होता है, अतः वहाँ भी 'रजतं स्मरामि' या 'तद् रजतम्'—ऐसा स्मरण होना चाहिए, तथापि दोष-वश गृहीतत्त्वादि अंशों का प्रमोष (विस्मरण) होकर वह स्मृतिज्ञान केवल ज्ञान के रूप में अवस्थित होता है । इस प्रकार 'रजत का स्मरण' और 'पुरोवर्ती द्रव्यमात्र का प्रत्यक्ष'—इन दोनों ज्ञानों के न तो स्वरूपों का भेद-भान होता है और न उनके विषयों का । वहाँ 'इदम्' और 'रजतम्'—ये दोनों ज्ञान वैसे ही अभेद-व्यवहार और सामानाधिकरण्य-बोधक 'इदं रजतम्'—इस प्रकार शब्द-प्रयोग के प्रवर्तक हो जाते हैं, जैसे, 'इदं रजतम्'—इस
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भामती
प्रवर्त्तयतः ।
क्वचित् पुनर्गहण एव मिथोऽगृहीतभेदे, यथा पीतः शङ्ख इति । अत्र हि विनिर्गच्छन्नयनरश्मिवच्छिन्नः पित्तद्रव्यस्य काचस्येवातिस्वच्छस्य पीतत्वं गृह्यते पित्तं तु न गृह्यते, शङ्खोऽपि दोषवशात् शुक्लगुणरहितः स्वरूपमात्रेण गृह्यते । तदनयोर्गुणगुणिनोरसंसर्गाग्रहसारूप्यात् पीततपनीयपिण्डप्रत्ययाविशेषेणाभेदव्यवहारः सामानाधिकरण्यव्यपदेशश्च, भेदाग्रहप्रसञ्जिताभेदव्यवहारबाधनाच्च नेदमिति विवेकप्रत्ययस्य बाधकत्वमप्युपपद्यते, तदुपपत्तौ च प्राक्तनस्य प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वमपि लोकसिद्धं सिद्धं भवति । तस्माद्यथार्थाः सर्वे विप्रतिपन्नाः सन्देहविभ्रमाः प्रत्ययत्वात् घटादिप्रत्ययवत् । तदिदमुक्तं ॐ यदध्यास इति ॐ । यस्मिन् शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यास इति लोकप्रसिद्धिः नासावन्यथाख्यातिनिबन्धना, किन्तु गृहीतस्य रजतादेस्तत्स्मरणस्य च गृहीततांशप्रमोषेण गृहीतमात्रस्य य इदमिति पुरोऽवस्थिताद् द्रव्यमात्रात्तत्प्रज्ञानाच्च विवेकस्तदग्रहणनिबन्धनो भ्रमः । भ्रान्तत्वं च ग्रहणस्मरणयोरितरेतरसामानाधिकरण्यव्यपदेशो रजतादिव्यवहारश्चेति ।
भामती-व्याख्या
प्रकार का समीचीन ज्ञान, क्योंकि दोनों में असंसर्ग का अग्रह समान है।
कहीं-कहीं दो प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अगृहीतभेदक होकर वैसे ही व्यवहार के जनक हो जाते हैं, जैसे 'पीतः शङ्खः'—यहाँ पर गोलक से बाहर निकलती हुई अति स्वच्छ नेत्र-रश्मियाँ अपने साथ चिपके काँच के समान पारदर्शी पित्त द्रव्य का ग्रहण न करके उसके केवल पीत वर्ण का ग्रहण करती हैं। शङ्ख का शुक्ल वर्ण भी उसी दोष के कारण गृहीत न होकर केवल शङ्ख द्रव्य ही गृहीत होता है। पीत गुण और शङ्खरूप गुणी (द्रव्य) में वैसे ही अभेद-व्यवहार और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश प्रवृत्त हो जाता है, जैसे, 'पीतं स्वर्णपिण्डम्', 'पीतं बिल्वम्'—इत्यादि प्रमा ज्ञानों के द्वारा प्रवृत्त होता है, क्योंकि उन दोनों ज्ञानों में समीचीन ज्ञान का असंसर्गाग्रह रूप सादृश्य है। भेदाग्रह के द्वारा प्रापित उक्त अभेद-व्यवहार का बाध कर देने मात्र से 'नेदम्'—इस प्रकार के भेद-ज्ञान में बाधकत्व का भी निर्वाह हो जाता है। उसका निर्वाह हो जाने के कारण उससे पूर्ववर्ती 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में लोक-प्रसिद्ध भ्रमरूपता भी उपपन्न हो जाती है। फलतः सभी ज्ञानों में यथार्थत्व की सिद्धि पर्यवसित हो जाती है—'सर्वे विप्रतिपन्ना विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वाद्, घटादिप्रत्ययवत्' । इस अख्याति का लक्षण भाष्य में किया गया है—"यदध्यासः"। जिन शुक्त्यादि आधारों में जिन रजतादि का अध्यास लोक में प्रसिद्ध है, वह अन्यथा-ख्याति-प्रयुक्त नहीं, अपितु पूर्व-गृहीत और पश्चात् स्मर्यमाण रजतादि पदार्थों के गृहीतत्व धर्म का विस्मरण हो जाता है, अतः केवल रजतरूप धर्मी का जो पुरोवर्ती इदं पदार्थ से एवं स्मरणरूप रजत-ज्ञान का जो प्रत्यक्षात्मक इदमाकार ज्ञान से भेद है, उसका ग्रहण न होने के कारण भ्रम-व्यवहार हो जाता है। उसकी भ्रम-रूपता यही है, जो कि इदमाकार प्रत्यक्षज्ञान और रजताकार स्मरण ज्ञान की एकात्मता का भान और शुक्ति में रजत पद का प्रयोग होता है [श्रीशालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
"नन्वेवं रजताभासः कथमेष घटिष्यति ।
उच्यते शुक्तिशकलं गृहीतं भेदवर्जितम् ॥
शुक्तिकाया विशेषा ये रजताद्भेदहेतवः ।
ते न ज्ञाता अभिभवाद् ज्ञाता सामान्यरूपतः ॥
अनन्तरं च रजते स्मृतिर्जाता तथापि च ।
मनोदोषात् तदित्यंशपरामर्शविवर्जितम् ॥
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९
भामती
अन्ये त्वत्राप्यपरितुष्यन्तो यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते। अत्रेवमाकूतम्—अस्ति तावद्रजतार्थिनो रजतमिदमिति प्रत्ययात् पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये प्रवृत्तिः सामानाधिकरण्यव्यपदेशश्चेति सर्वजनीनम्। तदेतन्न तावद् ग्रहणस्मरणयोस्तद्गोचरयोश्च मिथो भेदाग्रहमात्राद्भवितुमर्हति। ग्रहणनिबन्धनो हि चेतनस्य व्यवहारव्यपदेशौ कथमग्रहणमात्राद्भवेताम् ? ननूक्तं नाग्रहणमात्रात् किन्तु ग्रहणस्मरणे एव मिथः स्वरूपतो विषयतश्चागृहीतभेदे समीचीनपुरःस्थितरजतविज्ञानसादृश्येन अभेदव्यवहारं सामानाधिकरण्यव्यपदेशं च प्रवर्त्तयतः। अथ समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोर्गृह्यमाणं वा व्यवहारप्रवृत्तिहेतुरगृह्यमाणं वा सत्तामात्रेण ? गृह्यमाणत्वेऽपि समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोरिदमिति रजतमिति च ज्ञानयोरिति ग्रहणमथवा तयोरेव स्वरूपतो विषयतश्च मिथो भेदाग्रह इति ग्रहणम् ? तत्र न तावत्समीचीनज्ञानसदृशो इति ज्ञानं समीचीनज्ञानवद्व्यवहारप्रवर्त्तकम्। नहि गोसदृशो गवय इति ज्ञानं गवार्थिनं गवये प्रवर्त्तयति। अनयोरेव भेदाग्रह इति
भामती-व्याख्या
रजतं विषयीकृत्य नैव शुक्तेर्विवेचितम् ।
स्मृत्याऽतो रजताभास उपपन्नो भविष्यति ॥
ग्रहणस्मरणे चेमे विवेकानवभासिनी ।
सन्निहितरजतशकले रजतमतिर्भवति यादृशी सत्या ।
भेदानध्यवसायादियमपि तादृक् परिस्फुरति ॥
बाधकप्रत्ययस्यापि बाधकत्वमता मतम् ।
प्रसज्यमानरजतव्यवहारनिवारणात् ॥ (प्र० पं० पृ० ४९) ]।
( ३ ) अन्यथाख्याति—अन्य आचार्य कहते हैं कि जिस शुक्त्यादि पदार्थ में रजतादि का जो अध्यास होता है, वह शुक्ति में रजतत्वरूप विपरीत धर्म का आरोप है। इन आचार्यों का आशय यह है कि रजतार्थी पुरुष की 'रजतमिदम्'—इस प्रतीति के आधार पर पुरोवर्ती शुक्तिरूप द्रव्य में प्रवृत्ति होती है, केवल प्रवृत्ति ही नहीं, 'रजतमिदम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश भी होता है—यह सर्व-सम्मत तथ्य है। यह सब कुछ प्रत्यक्ष और स्मरण ज्ञानों और उनके विषयीभूत शुक्ति और रजतादि विषयों के पारस्परिक भेद के अग्रहण मात्र से सम्पादित नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन पुरुष की प्रत्येक क्रिया और शब्द-व्यवहार तभी सम्भव होते हैं, जब कि विषय वस्तु का ग्रहण (ज्ञान) हो जाय, अतः अग्रहण मात्र के बल पर पुरोदेश में प्रवृत्ति और 'इदं रजतम्'—ऐसा शब्द-प्रयोग क्योंकर होगा ? यह जो कहा जाता है कि केवल अग्रहण को ही प्रवृत्त्यादि का कारण नहीं माना जाता, अपितु रजत का स्मरण और इदं पदार्थ का ग्रहण (प्रत्यक्ष ज्ञान) ये दोनों ज्ञान ऐसे हैं कि जिन के न तो स्वरूपों का भेद-ग्रह होता है और न उनके विषयों का। इन दोनों ज्ञानों में 'रजत-मिदम्'—इस प्रकार के समीचीन ज्ञान का सारूप्य (असंसर्गाग्रह) भी है, अत एव ये दोनों ज्ञान शुक्ति और रजत के अभेद-व्यवहार एवं सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के प्रवर्तक माने जाते हैं। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि ('इदम्' और 'रजतम्') इन दोनों ज्ञानों में समीचीन ज्ञान का सादृश्य गृह्यमाण होकर उक्त व्यवहार का हेतु है? अथवा अगृह्यमाण होकर सत्तामात्र से ? गृह्यमाणत्व-पक्ष में भी 'समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोर्ज्ञानयोः'—इस प्रकार सादृश्य का ग्रहण माना जाता है ? या 'अनयोः ज्ञानयोः स्वरूपतो विषयतश्च भेदाग्रहः'—इस रीति से ग्रहण होता है ? प्रथम कल्प युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि किसी वस्तु में उसका सादृश्य-ज्ञान मात्र प्रवर्तक नहीं होता, अन्यथा गवय में 'गोसदृशोऽयम्'—इस प्रकार गौ का सादृश्य-बोध रहने के कारण गवय की ओर उस व्यक्ति की प्रवृत्ति होनी चाहिए, जो गौ चाहता है ! द्वितीय कल्प में जो
| ३० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
तु ज्ञानं पराहतं, नहि भेदाग्रहेऽनयोरिति भवति, अनयोरिति ग्रहे भेदाग्रहणमिति च भवति । तस्मात्सत्तामात्रेण भेदाग्रहोऽगृहीत एव व्यवहारहेतुरिति वक्तव्यम् । तत्र किमयमारोपोत्पादक्रमेण व्यवहारहेतुराहो अनुत्पादितारोप एव स्वत इति ? वयं तु पश्यामः—चेतनव्यवहारस्याज्ञानपूर्वकत्वानुपपत्तेरारोपज्ञानोत्पादक्रमेणैवेति । ननु सत्यं चेतनव्यवहारो नाज्ञानपूर्वकः किन्त्वविविक्तविवेकग्रहणस्मरणपूर्वक इति । मैवम्, नहि रजतप्रातिपदिकार्थमात्रस्मरणं प्रवृत्तावुपयुज्यते । इदङ्कारास्पदाभिमुखी खलु रजतार्थिनां प्रवृत्तिरित्यविवादम् । कथं चायमिदाङ्कारास्पदे प्रवर्त्तेत, यदि तु न तदिच्छेत् ? अन्यदिच्छत्यन्यत्करोतीति व्याहतम् । न चेदिदङ्कारास्पदं रजतमिति जानीयात् कथं रजतार्थी तदिच्छेत् ? यद्यतथात्वेनाग्रहणादिति ब्रूयात च प्रतिवक्तव्योऽथ तथात्वेनाग्रहणात् कस्मान्नोपेक्षेतेति ? सोऽयमुपादानोपेक्षाभ्यामभित आकृष्यमाणश्चेतनोऽव्यवस्थित इदङ्कारास्पदे रजतसमारोपेणोपादान एव व्यवस्थाप्यत इति भेदाग्रहः समारोपोत्पादक्रमेण चेतनप्रवृत्तिहेतुः । तथाहि—भेदाग्रहाद्विदङ्कारास्पदे रजतत्वं समारोप्य तज्जातीयस्योपकारहेतुभावमनुचिन्त्य तज्जातीयतयेदङ्कारास्पदे रजते तमनुमाय तदर्थी प्रवर्त्तते इत्यानुपूर्व्यं सिद्धम् । न च तटस्थरजत-
भामती-व्याख्या
कहा गया—'अनयोः भेदाग्रहः' । वह अत्यन्त विरुद्ध है, क्योंकि जिन पदार्थों में भेद-ग्रह नहीं, होता, उनके लिए 'अनयोः'—इस प्रकार द्विवचन का प्रयोग कैसे होगा ? यदि उनमें द्वित्व का निश्चय है, तब अनयोः का प्रयोग सम्भव हो जाने पर भी 'भेदाग्रह'—यह कहना विरुद्ध पड़ जाता है । फलतः भेदाग्रह स्वयं अगृहीत होकर सत्ता मात्र से व्यवहार का जनक है—ऐसा मानना होगा । तब जिज्ञासा होती है कि वह अज्ञात भेदाग्रह रजतादि का आरोप कराकर व्यवहार का हेतु होता है ? या रजतादि का आरोप कराए बिना ही अकेला रजार्थी का प्रवर्त्तक होता है ? वहाँ हमारा तो कहना यह है कि चेतन मनुष्य का व्यवहार केवल अग्रहण ( अज्ञान ) के आधार पर नहीं देखा जाता, अतः रजतादि का अवभास कराकर ही वह रजतार्थी का प्रवर्त्तक होगा ।
यह जो कहा जाता है कि यद्यपि चेतन पुरुष का कोई भी व्यवहार केवल अज्ञान से नहीं होता, तथापि कथित अगृहीतभेदक इदमाकार प्रत्यक्ष और रजताकार स्मरण—ये दोनों ज्ञान व्यवहार के निर्वाहक हो जाते हैं। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि प्रकृत में केवल 'रजत' पद के अर्थ का स्वतन्त्र ज्ञान प्रवृत्ति का साधक नहीं हो सकता, क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि रजतार्थी पुरुष की प्रवृत्ति इदंकारास्पद पदार्थ की ओर हो रही है । इदंकारास्पद पदार्थ की ओर उसकी प्रवृत्ति तभी बनेगी, जब कि उसे उसकी इच्छा होगी, क्योंकि अन्य वस्तु की इच्छा से अन्य वस्तु में प्रवृत्ति सम्भव नहीं । यदि इदंकारास्पद वस्तु को रजत न समझे, तब उसकी इच्छा ही क्यों होगा ? यदि अरजतरूपेण अग्रहण को प्रवर्त्तक माना जाता है, तब रजतरूपेण अग्रहण को रजतार्थी का निवर्तक मानना होगा । फलतः प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप विरोधी पदार्थों के आकर्षण में पड़ कर जब चेतन पुरुष किंकर्त्तव्य-विमूढ़ हो जाता है, तब रजतारोपपूर्वक ही भेदाग्रह उस पुरुष की प्रवृत्ति का व्यवस्थापक हो सकेगा ।
उसका क्रम इस प्रकार है कि भेदाग्रह से इदंकारास्पद पदार्थ में रजतत्वरूप धर्म का आरोप होता है, रजतजातीय पदार्थ की इष्ट-साधनता का स्मरण होता है, उसके पश्चात् इदंकारास्पदीभूत रजत में तज्जातीयत्वरूप हेतु के द्वारा इष्ट-साधनता का अनुमान होता है—'इदं मम ( रजतार्थिनः ) इष्टसाधनम्, रजतजातीयत्वाद्, आपणस्थरजतवत्' । तब रजतार्थी व्यक्ति पुरःस्थित द्रव्य की ओर प्रवृत्त होता है । इदंकारास्पद पदार्थ से भिन्न तटस्थ रजत की स्मृति इदंकारास्पद पदार्थ में इष्ट-साधनत्व का अनुमान नहीं करा सकती, क्योंकि 'इदं
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३१
भामती
स्मृतिरिवेद्वारास्पद्योपकारहेतुभावमनुमापयितुमर्हति, रजतत्वस्य हेतोरपक्षधर्मत्वात् । एकदेशदर्शनं खल्वनुमापकं न त्वनेकदेशदर्शनम् । यथाहूः—"ज्ञातसम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादिति" । समारोपे त्वेकदेशदर्शनमस्ति । तत्सिद्धमेतद्विवादाध्यासितं रजतादिज्ञानं पुरोवर्तितस्तुविषयं रजतार्थिनस्तत्र नियमेन प्रवर्त्तकत्वात् । यद्यदर्थिनं यत्र नियमेन प्रवर्त्तयति तज्ज्ञानं तद्विषयं, यथोभयसिद्धसमीचीनरजतज्ञानं, तथा चेदं, तस्मात्तथेति ।
यच्चोक्तमनवभासमानतया न शुक्तिरालम्बनमिति, तत्र भवान् पृष्टो व्याचष्टां, किं शुक्तिकात्वस्येवं रजतमिति ज्ञानं प्रत्यगालम्बनत्वमाहोस्विद् द्रव्यमात्रस्य पुरःस्थितस्य सितभास्वरस्य ? यदि शुक्तिकात्वस्यानालम्बनत्वम्, अद्धा । उत्तरस्यानालम्बनत्वं ब्रुवाणस्य तथैवानुभवविरोधः । तथाहि—रजतमिदमित्यनुभवन्ननुभविता पुरोवर्त्ति वस्त्वङ्गुल्यादिना निर्दिशति । दृष्टं च दुष्टानां कारणानामोत्सर्गिककार्य्यप्रतिबन्धेन कार्य्यान्तरोपजननसामर्थ्यम् , यथा दावाग्निदग्धानां वेत्रबीजानां कदलीकाण्डजनकत्वम्, भस्मकदुष्टस्य चौदर्य्यस्य तेजसो बह्वन्नपचनमिति । प्रत्यक्षबाधापहृतविषयं च विभ्रमाणां यथार्थत्वानुमान-
भामती-व्याख्या
मदिष्टसाधनम्, रजतत्वात्'—इस अनुमान का रजतत्त्व हेतु इदंकारास्पदंरूप पक्ष में न रह कर स्मर्यमाण तटस्थ रजत में रहता है, [ अतः प्रकृत अनुमान स्वरूपासिद्धि दोष से दूषित होने के कारण अपने साध्य की सिद्धि नहीं करा सकता ] । एकदेश ( पक्षवृत्तिहेतु ) का दर्शन ही अनुमिति का जनक माना जाता है, पक्ष से भिन्न देश में रहनेवाले हेतु का दर्शन नहीं, जैसा कि श्री शबरस्वामी कहते हैं—"अनुमानं ज्ञातसम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादेकदेशान्तरेऽसन्निकृष्टेऽर्थे बुद्धिः" ( शा, भा. पृ. ३६ ) [ पर्वत में अग्नि और धूम—दोनों एकदेशवृत्ति या ( समानाधिकरण या पक्षवृत्ति ) पदार्थ हैं ! उनमें धूमरूप एकदेशीय ( पक्षवृत्ति ) पदार्थ के द्वारा अग्निरूप दूसरे एकदेशीय ( पक्षवृत्ति ) पदार्थ का जो ज्ञान होता है, वही अनुमान हैं ] । जब पुरोवर्ती द्रव्य में रजतत्व का समारोप हो जाता हैं, तब 'रजतत्व' हेतु पक्षवृत्ति हो जाता है । अतः यह अनुमान फलित होता है कि ( १ ) 'एतद्विवादास्पदाध्यस्तरजतादिज्ञानं, पुरोवर्तितस्तुविषयम्, ( २ ) रजतार्थिनस्तत्र नियमेन प्रवर्त्तकत्वाद्, ( ३ ) यज्ज्ञानं यदर्थिनं यत्र नियमेन प्रवर्त्तयति, तज्ज्ञानं तद्विषयं यथोभयसिद्धसमीचीनरजतज्ञानम्, ( ४ ) तथा चेदम्, (५) तस्मात्तथा' [ नैयायिकगण परार्थानुमान के पाँच अवयव मानते हैं—"प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः" ( न्या. सू. १।१।३२ ) । उन्हीं पाँच अवयवों का प्रयोग यहाँ किया है ] ।
अख्यातिवादियों का यह जो कहना है कि 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति अवभासित नहीं हो रही है, अतः इस ज्ञान का शुक्ति को विषय नहीं माना जा सकता । वहाँ जिज्ञासा होती है कि शुक्तित्व को उक्त ज्ञान का विषय नहीं माना जा सकता ? अथवा पुरोवर्ती भास्वर ( चमकीले ) द्रव्य मात्र को ? शुक्तित्व को तो उस ज्ञान का विषय हम भी नहीं मानते किन्तु सित भास्वर द्रव्यमात्र को उक्त ज्ञान का अविषय मानना अनुभव-विरुद्ध है, क्योंकि 'रजतमिदम्'—इस प्रकार अनुभव करनेवाला व्यक्ति पुरोवर्ती द्रव्य को ही उँगली से दिखाता है कि यह रजत है । दोषपूर्ण नेत्र के द्वारा शुक्ति में रजत का दर्शन असम्भव नहीं । यह जो कहा गया कि दोष सदैव नियत शक्ति का विघातक ही होता है, कार्यान्तर-जनन शक्ति का जनक नहीं होता । वह कहना भी अनुचित है, क्योंकि दोषों में कार्यान्तरोपजनन शक्ति की जनकता भी देखी जाती है, जैसे—दावाग्नि ( वन में बाँसादि की रगड़ से पैदा हुई आग ) में जले हुए बेत के बीजों से केले का अङ्कुर उत्पन्न होता है, इसी प्रकार पेट में भस्मक रोग से ग्रस्त जठराग्नि में अधिक अन्न-पचन की शक्ति देखी जाती है ।
| ३२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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निबन्धनो भ्रम इति । अन्ये तु-यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते इति । सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति । तथा च लोकेऽ-
भामती
माभासो हुतवहानुष्णत्वानुमानवत् । यच्चोक्तं मिथ्याप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वप्रमाणेष्वनाश्वास इति । तद्बोधकत्वेन स्वतः प्रामाण्यं नाव्यभिचारेणेति व्युत्पाद्योद्दूरमस्माभिः परिहृतं न्यायकणिकायामिति नेह प्रतन्यते । दिङ्मात्रं चास्य स्मृतिप्रमोषभङ्गस्योक्तम् । विस्तरस्तु ब्रह्मतत्त्वसमीक्षायामवगन्तव्य इति तदिदमुक्तम् ॐ अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते इति ॐ । यत्र शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यासस्तस्यैव शुक्तिकादेर्विपरीतधर्मकल्पनं रजतत्वधर्मकल्पनमिति योजना । ननु सन्तु नाम परीक्षकाणां विप्रतिपत्तयः प्रकृते तु किमायातमित्यत आह ॐ सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभि-
भामती-व्याख्या
सभी भ्रम ज्ञानों में जो यथार्थत्व का अनुमान किया जाता है—'विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वात्' । वह अनुमान अग्नि में अनुष्णत्व-साधक अनुमान के समान ही प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है, क्योंकि इदं रजतमित्यादि ज्ञानों में तदभाववति तत्प्रकारकत्वरूप अयथार्थत्व प्रत्यक्षतः सिद्ध है । यह जो कहा गया कि यदि किसी ज्ञान को विषय-व्यभिचारी माना गया तो सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा । वह संगत नहीं, क्योंकि ज्ञानगत प्रामाण्य स्वतः होता है, अव्यभिचार-प्रयुक्त नहीं । जब कि ज्ञान स्वभावतः विषय-प्रकाशक है, तब अबोधकत्व-रूप अप्रामाण्य उसमें रह ही कैसे सकता है—यह सब कुछ न्यायकणिका में कहा गया है । यहाँ तो उसका दिग्दर्शनमात्र कराया गया है, विस्तार ब्रह्मसिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में किया गया है । [न्यायकणिका में अनाश्वासापत्ति का प्रतीकार करते हुए कहा गया है— "यत्तूक्तमनाश्वासादिति तदन्यत्र ( ब्र. सि. पृ. १४४ ) आचार्येण—
बोधादेव प्रमाणत्वमिति मीमांसकस्थितिम् ।
विदन्नव्यभिचारेण तां व्युदस्यत्यपण्डितः ॥
इत्यादिना प्रबन्धेन दूषितमिति नेह दूषितम् । तथापि दूषणकणिकेह सूच्यते—किमव्यभिचारित्वैव प्रामाण्यम् ? अथ तत्कारणम् ? तद्व्यापिका वा ? येन क्वचिद् व्यभिचारदर्शनात् तदभावे सति ज्ञानमात्रेऽनाश्वासः स्यात् । न तावदव्यभिचारितैव प्रामाण्यम्, अव्यभिचारिणामपि वह्न्यादौ धूमादीनां कुतश्चिन्निमित्तादनुपजनितकृशानुप्रत्ययानामप्रामाण्यं स्यात् । व्यभिचारिणामपि चक्षुरादीनां नीलादिभेदे तद्विषयज्ञानहेतूनां प्रामाण्यमिति साम्प्रतम्, प्रमितिक्रिया प्रति साधकतमत्वाभावसम्भवात्, अन्यथा काष्ठादीनामपि पाकादावपि असाधनत्वप्रसङ्गात्" ( न्या. क. पृ. १६२ ) इसी प्रकार अन्य पक्षों का भी खण्डन किया गया है । ब्रह्मसिद्धि में मण्डन मिश्र ने इस वाद का विस्तारपूर्वक निरास किया है, अतः उसकी व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में अवश्य पूर्ण विस्तार किया गया होगा, किन्तु इस समय तक वह कहीं उपलब्ध नहीं हुई है ] ।
भाष्यकार ने अन्यथाख्याति का स्वरूप बताया है—"अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते" । जिस (शुक्त्यादि) में जिस (रजतादि) का अध्यास लोक-प्रसिद्ध है, वह शुक्त्यादि में विपरीत (स्वावृत्ति) रजतत्व धर्म की कल्पना है [न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका में श्री वाचस्पति मिश्र ने कहा है—"कस्मात् पुनरयं शुक्तौ रजतार्थी प्रवर्तते न पुनः रजताभावे ? कस्माच्चेदं पुरोवर्तिद्रव्यमङ्गुल्या निर्दिश्य रजतत्वं निषेधति—नेदं रजतमिति, यदि तत्र न प्रसञ्जितं रजतत्वं पूर्वविज्ञानेन" (ता. टी. १।२।१) ]
परीक्षक विद्वानों के विवाद का पर्यवसित अर्थ बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३३
नुभवः–शुक्तिका हि रजतवदवभासते, एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति । कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ? सर्वो हि पुरोऽवस्थिते
भामती
चरति ॐ । अन्यस्यान्यधर्मकल्पनानृतता, सा चानिर्वचनीयतेत्यधस्तादुपपादितम् । तेन सर्वेषामेव परीक्षकाणां मतेऽन्यस्यान्यधर्मकल्पनानिर्वचनीयताऽवश्यम्भाविनीत्यनिर्वचनीयता सर्वतन्त्राविरुद्धोऽर्थ इत्यर्थः । अख्यातिवादिभिरकामैरपि सामानाधिकरण्यव्यपदेशप्रवृत्तिनियमस्नेहादिदमभ्युपेयमिति भावः । न केवलमियमनृतता परीक्षकाणां सिद्धाऽपितु लौकिकानामपीत्याह । ॐ तथा च लोकेऽनुभवः । शुक्तिका हि रजतवदवभासत इति ॐ । न पुना रजतमिदमिति शेषः । स्यादेतत्–अन्यस्यान्यात्मताविभ्रमो लोकसिद्धः, एकस्य त्वभिन्नस्य भेदभ्रमो न दृष्ट इति कुतश्चिदात्मनोऽभिन्नानां जीवानां भेदविभ्रम इत्यत आह ॐ एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति ॐ ।
पुनरपि चिदात्मन्यध्यासमाक्षिपति ॐ कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ॐ । अयमर्थः–चिदात्मा प्रकाशते न वा ? न चेत् प्रकाशते, कथमस्मिन्नध्यासो विषयतद्धर्माणाम् । न खल्वप्रतिभासमाने पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये रजतस्य वा तद्धर्माणां वा समारोपः सम्भवतीति । प्रतिभासे वा न तावदयमात्माऽजड़ो घटादिवत् पराधीनप्रकाश इति युक्तम् । न खलु स एव कर्ता च कर्म च भवति, विरोधात्, परसमवेतक्रियाफलशालि हि कर्म, न च ज्ञानक्रिया परसमवायिनीति कथमस्यां कर्म ? न च तदेव
भामती–व्याख्या
“सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति”। अन्य वस्तु में अन्यरूपता की कल्पना ही अनृतता है, अनृतता का अर्थ अनिर्वचनीयता है—यह पहले कहा जा चुका है। सभी दार्शनिकों के मत में अन्यत्रान्यधर्मकल्पना या अनिर्वचनीयता अवश्यंभाविनी है, अतः अनिर्वचनीयता एक सर्वतन्त्र-सिद्धान्त है [ जिसका लक्षण करते हुए न्यायसूत्रकार कहते हैं—“सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः” (न्या. सू. १।१।२८) सभी दर्शनों से अविरुद्ध सिद्धान्त सर्वतन्त्रसिद्धान्त कहा जाती है ]। अख्यातिवादी प्राभाकरगणों को विवश होकर पुरोवर्ती द्रव्य में प्रवृत्ति और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के आधार पर यह भ्रमरूपता माननी होगी । पूर्व-निरूपित अनृतता केवल परीक्षक विद्वानों तक ही सीमित नहीं, अपितु लोक-प्रसिद्ध भी है—“तथा च लोकेऽनुभवः 'शुक्तिका हि रजतवदवभासते इति”। 'रजतमिदम्'—ऐसा लोक में अनुभव नहीं होता, अपितु 'शुक्तिका रजतवदवभासते'—ऐसा ही अनुभव होता है ।
यह जो शङ्का होती है कि लोक में अन्य वस्तु में अन्यरूपतात्मक विभ्रम तो प्रसिद्ध है, किन्तु एक अभिन्न तत्त्व में भेद-भ्रम नहीं देखा जाता, अतः एक चित्तत्त्व में अभिन्न जीवों का भेद-भ्रम क्योंकर होगा ? उस शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—“एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति”। जैसे एक चन्द्र में द्वित्वादि का भ्रम हो जाता है, वैसे ही एक ब्रह्म में अनेक जीवरूपता का भ्रम हो जाता है ।
अध्यास पर पुनः आक्षेप—चिदात्मा के अध्यास पर पुनः आक्षेप किया जाता है— “कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ?” आक्षेपवादी का अभिप्राय यह है कि चिदात्मा प्रकाशित होता है ? या नहीं ? यदि वह प्रकाशित नहीं होता, तब उसमें विषय और उसके धर्मों का अध्यास कैसे होगा ? क्योंकि जो शुक्ति प्रतीयमान नहीं, उसमें कभी भी रजत और उसके धर्मों का आरोप नहीं होता । यदि आत्मा प्रकाशित होता है, तब जिज्ञासा होती है कि उसका प्रकाशक कौन ? यदि कहा जाय कि आत्मा अजड़ चैतन्यरूप है, अतः घटादि के समान उसका प्रकाश अन्य किसी के द्वारा सम्भव नहीं, अतः आत्मा स्वयं अपना प्रकाशक है । तब वही प्रकाशक ( प्रकाश का कर्त्ता ) और वही प्रकाश्य ( प्रकाश का
५
३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]
भामती
स्वं च परं च, विरोधात् । आत्मान्तरसमवायाभ्युपगमे तु ज्ञेयस्यात्मनोऽनात्मत्वप्रसङ्गः । एवं तस्य तस्ये- त्यनवस्थाप्रसङ्गः ।
स्यादेतत् । आत्मा जडोऽपि सर्वार्थज्ञानेषु भासमानोऽपि कतैव न कर्म, परसमवेतक्रियाफल- शालित्वाभावात्, चैत्रवत् । यथा हि चैत्रसमवेतक्रियया चैत्रनगरप्राप्तावुभयसमवेतायामपि क्रियमाणायां नगरस्यैव कर्मता परसमवेतक्रियाफलशालित्वात् । न तु चैत्रस्य क्रियाफलशालिनोऽपि, चैत्रसमवायाद्ग- मनक्रियाया इति । तन्न, श्रुतिविरोधात् । श्रूयते हि “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति । उपपद्यते च । तथाहि—योऽयमर्थप्रकाशः फलं यस्मिन्नर्थश्च आत्मा च प्रथेते स किं जडः, स्वयम्प्रकाशो वा ? जडश्चे- द्विषयात्मानावपि जडाविति कस्मिन् किं प्रकाशेताविशेषात्, इति प्राप्तमान्ध्यमशेषस्य जगतः । तथा चाभाणकः—'अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे' । न च निलीनमेव विज्ञानमर्थात्मानौ ज्ञापयति
भामती-व्याख्या
कर्म ) हो—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि कर्मकारक सदैव कर्त्ता से भिन्न होता है, 'देवदत्तः ग्रामं गच्छति'—यहाँ पर ग्रामरूप कर्मकारक से भिन्न देवदत्त की गमन क्रिया से जो देवदत्त और ग्राम का संयोगरूप फल होता है, उस संयोग का आश्रय होने के कारण ग्राम को कर्म कहा जाता है, किन्तु 'आत्मा आत्मानं प्रकाशयति'—यहाँ पर प्रकाश क्रिया कर्मरूप आत्मा से भिन्न पदार्थ में नहीं रहती, फलतः कर्तृत्व और कर्मत्व का एक आधार में रहना सर्वथा विरुद्ध है, वही आत्मा स्व भी हो और पर भी—यह क्योंकर सम्भव होगा ? यदि आत्मा का प्रकाश अन्य किसी आत्मा से माना जाता है, तब प्रकाश्य भूत ( ज्ञेय या वेद्य ) आत्मा जड़ और अनात्मरूप हो जायगा एवं अन्यान्य प्रकाशक-परम्परा की कल्पना में अनवस्था भी होती है ।
यह जो कहा जाता है कि यद्यपि आत्मा अजड़ और सभी पदार्थों के ज्ञानों में भासमान है, तथापि वह कर्त्ता ही माना जाता है, कर्म नहीं, क्योंकि वह पर-समवेत क्रिया से जनित फल का आश्रय नहीं, जैसे—चैत्र । 'चैत्रो नगरं गच्छति'—यहाँ चैत्र-समवेत गमनरूप क्रिया से जनित जो फल है—चैत्र और नगर का संयोग, उस संयोग के यद्यपि चैत्र और नगर— दोनों आश्रय हैं, तथापि कर्मता नगर में ही घटती है, चैत्र में नहीं, क्योंकि वह गमन क्रिया जिस चैत्र में समवेत ( समवायसम्बन्धेन वृत्ति ) है, वह नगर से भिन्न है, अपने से नहीं, अतः पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय होने से नगर ही कर्म बनता है, चैत्र नहीं, क्योंकि वह स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय नहीं । इसी प्रकार आत्मा भी स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, अतः वह चैत्र के समान कर्त्ता ही होता है, कर्म नहीं ।
वह कहना उचित नहीं, क्योंकि श्रुति कहती है कि वह किसी भी प्रकाश से प्रकाशित [ प्रकाश क्रिया-जन्य फल का आश्रय ] नहीं—'अगृह्यो न हि गृह्यते' ( बृ. उ. ३।६।२६ ), “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” ( तै. उ. २।१।१ ) । युक्ति-युक्त भी यही है, क्योंकि जो यह अर्थ- प्रकाशरूप फल है, जिसके होने पर अर्थ ( विषय ) और आत्मा—दोनों भासित होते हैं, वह क्या जड़ है ? अथवा स्वयंप्रकाश ? यदि जड़ है, तब विषय और आत्मा तो पहले ही जड़ हैं, फिर किससे कौन प्रकाशित होगा ? विषय भी अन्य प्रकाश से प्रकाशनीय होने के कारण जड़ और आत्मा भी वैसा ही, दोनों में कोई विशेषता नहीं कि एक से दूसरे का प्रकाश हो जाता । परिशेषतः जगत् सर्वथा प्रकाश-शून्य अन्धकारमय बन कर रह जायगा, जैसी कि कहावत प्रसिद्ध है—“अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे ।” अन्धे बैल की पूँछ पकड़ कर अन्धे व्यक्ति चल पड़े, स्थान-स्थान पर गर्त-पात होना ही था । अर्थ और आत्मा का
अध्यासविचारः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ३५
भामती
चक्षुरादिवदिति वाच्यम्, ज्ञापनं हि ज्ञानजननं, जनितं च ज्ञानं जडं सन्नोक्तदूषणमतिवर्त्ततेति। एवमुत्तरोत्तराण्यपि ज्ञानानि जडानीत्यनवस्था। तस्मादपराधीनप्रकाशा संविदुपेत्तव्या। तथापि किमायातं विषयात्मनोः स्वभावजडयोः ? एतदायातं यत्तयोः संविज्जड़ेति। तत्किं पुत्रः पण्डित इति पितापि पण्डितोऽस्तु ? स्वभाव एष संविदः स्वयम्प्रकाशाया यदर्थात्मसम्बन्धितेति चेत्, हन्त पुत्रस्यापि पण्डितस्य स्वभाव एष यत् पितृसम्बन्धितेति समानम्। सहार्थात्मप्रकाशेन संवित्प्रकाशो न स्वार्थात्मप्रकाशं विनेति तस्याः स्वभाव इति चेत्, तत्किं संविदो भिन्नौ संविदर्थात्मप्रकाशौ। तथा च न स्वयम्प्रकाशा संविन्न च संविदर्थात्मप्रकाश इति। अथ संविदर्थात्मप्रकाशौ न संविदो भिद्येते, संविदेव तौ। एवं चेत्, यावदुक्तं भवति संविदात्माथौ सहेति तावदुक्तं भवति संविदर्थात्मप्रकाशौ सहेति, तथा च न विवक्षितार्थसिद्धिः। न चातीतानागतार्थगोचरायाः संविदोऽर्थसहभावोऽपि। तद्विषयहानोपादानोपेक्षाबुद्धि-
भामती-व्याख्या
प्रकाश स्वयं अप्रकाशित रह कर ही चक्षुरादि के समान यदि अर्थ और आत्मा का प्रकाशक माना जाता है, तब भो कथित जगदान्ध्यरूप दोष से पीछा नहीं छूटता, क्योंकि विषय के प्रकाशक या ज्ञापन का अर्थ होता है—विषय के ज्ञान को जन्म देना, उक्त प्रकाश से जनित ज्ञान भी जड़ ही है, अतः वह भी स्वयं दूसरे का प्रकाश क्योंकर कर सकेगा ? इसी प्रकार कल्प्यमान उत्तरोत्तर ज्ञान व्यक्तियाँ भी जड़ ही मानी जाएँगी, इस प्रकार परप्रकाशवाद में अनवस्था दोष प्रसक्त होता है, अतः स्वयंप्रकाश ज्ञान तत्त्व को ही मानना चाहिए।
विषय और आत्मा के ज्ञान को स्वयंप्रकाश मान लेने से स्वभावतः जड़भूत विषय और आत्मा पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि स्वयंप्रकाश ज्ञान में प्रकाशमानता स्वतः सिद्ध है, ज्ञानगत प्रकाशमानता के बल पर ज्ञान के विषयीभूत विषय और आत्मा में भी प्रकाशमानता सिद्ध हो जाती है। यदि कहा जाय कि ज्ञान की प्रकाशमानता से ज्ञान के जनकीभूत विषय और आत्मा में प्रकाशमानता तभी सिद्ध हो सकती है, जबकि पुत्रगत पाण्डित्य के द्वारा उसके जनकीभूत माता-पिता में पाडित्य सिद्ध होता हो, किन्तु ऐसा नियम नहीं, क्योंकि पुत्र में पाण्डित्य होने पर भी उसके माता-पिता में पांडित्य की अवश्यंभाविता नहीं देखी जाती। यदि कहा जाय कि ज्ञान विषय और आत्मा का नियत सम्बन्धी है, अतः ज्ञान की प्रकाशमानता से विषय और आत्मा में प्रकाशमानता आ जाती है। तब भी वह आपत्ति बनीं ही रहती है, क्योंकि पुत्र भी माता-पिता का नियत सम्बन्धी है, अतः पुत्र के पण्डित होने पर माता-पिता को भी अवश्य पण्डित होना चाहिए।
यदि पुत्र की अपेक्षा ज्ञान का एक यह वैशिष्ट्य माना जाता है कि विषय और आत्मा की प्रकाशमानता के बिना ज्ञान में प्रकाशमानता नहीं होती, अपितु अर्थात्म-प्रकाश के साथ ही ज्ञान का प्रकाश होता है। तब जिज्ञासा होती है कि ज्ञान से [ ज्ञान का प्रकाश और अर्थात्मा का प्रकाश—ये ] दोनों प्रकाश क्या भिन्न हैं ? अथवा अभिन्न ? यदि ज्ञान से ज्ञान का प्रकाश भिन्न है, तब ज्ञान को स्वयंप्रकाश नहीं कहा जा सकता, किन्तु घटादि के समान भिन्न प्रकाश से प्रकाशित होने के कारण ज्ञान को जड़ ही मानना होगा। अर्थ और आत्मा के प्रकाश को ज्ञान से भिन्न मानने पर विषय और आत्मा में ज्ञान की विषयता सिद्ध न होकर ज्ञान-जन्य प्रकाश की विषयता ( ज्ञान-ज्ञाप्यता ) माननी होगी, जिसमें अनवस्था दोष दिखाया जा चुका है। यदि 'ज्ञान का प्रकाश और अर्थात्मा का प्रकाश'—ये दोनों प्रकाश ज्ञान से भिन्न नहीं, ज्ञानरूप ही हैं, तब जो कहा गया कि 'संविदर्थात्मप्रकाशौ सह' उसका अर्थ होता है—'संविदात्मार्थौ सह'। तब आत्मगत ज्ञानाश्रयत्वरूप विवक्षित अर्थ की सिद्धि
३६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
भामती जननादर्थसहभाव इति चेन्न, अर्थसंविद इव हानादिबुद्धीनामपि तद्विषयत्वानुपपत्तेः। हानादिजननाद्धानादिबुद्धीनामर्थविषयत्वम्, अर्थविषयहानादिबुद्धिजननच्चार्थसंविदस्तद्विषयत्वमिति चेत्, तत् किं देहस्य प्रयत्नवदात्मसंयोगो देहप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुरर्थे इत्यर्थप्रकाशोऽस्तु ? जाड्याद्वेहात्मसंयोगो नार्थप्रकाश इति चेत्, नन्वयं स्वयंप्रकाशोऽपि स्वात्मन्येव खद्योतवत्प्रकाशः, अर्थे तु जड इत्युपपादितम्। न च प्रकाशस्यात्मानो विषयाः। ते हि विच्छिन्नदीर्घस्थूलतयाऽनुभूयन्ते। प्रकाशश्चायमान्तरोऽस्थूलोऽणुरह्रस्वोऽदीर्घश्चेति प्रकाशते। तस्माच्चन्द्रेऽनुभूयमान इव द्वितीयश्चन्द्रमाः स्वप्रकाशादन्योऽर्थोऽनिर्वचनीय एवेति युक्तमुत्पश्यामः। न चास्य प्रकाशस्यान्तः स्वलक्षणभेदोऽनुभूयते। न चानिर्वाच्यार्थभेदः प्रकाशं निर्वाच्यं भेत्तुमर्हति, अतिप्रसङ्गात्। न चार्थनामपि परस्परं भेदः समीचीनज्ञानपद्धतिमध्यास्ते इत्युपरिष्टादुपपादयिष्यते। तदयं प्रकाश एव स्वयम्प्रकाश एकः कूटस्थो नित्यो निरंशः प्रत्यगात्मा अशक्यनिर्वचनीयेभ्यो देहेन्द्रियादिभ्य आत्मानं प्रतीपं निर्वचनीयमञ्चति जानातीति प्रत्यङ् स चात्मेति
भामती-व्याख्या नहीं होती। अतीत और अनागत घटादि रूप अर्थ के वर्तमानकालीन ज्ञान का अर्थ-सहभाव सम्भव भी नहीं। यदि कहा जाय कि जो ज्ञान जिस विषय की हान-बुद्धि, उपादान-बुद्धि या उपेक्षा-बुद्धि को जन्म देता है, उस ज्ञान में उस विषय का सहभाव माना जाता है। वर्तमान ज्ञान अतीतघटादिविषयक हानादि-बुद्धि का जनक होता है, यही उस ज्ञान में अर्थ-सहभाव अनुमित हो जाता है—'अतीतघटविषयकं ज्ञानम्, अतीतघटसहभूतम्, अतीतघटविषयकहानादि-बुद्धिजनकत्वात्। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि अतीतघटादि के ज्ञान में जैसे अतीतघटविषयकत्व सिद्ध है, वैसा हानादि-बुद्धि में अतीतघटविषयकत्व सिद्ध नहीं, अतः अतीतघटविषयक-हानादिबुद्धिजनकत्वरूप हेतु स्वरूपासिद्धिदोष से युक्त है, उसके द्वारा अर्थ सहभाव का ज्ञान में अनुमान नहीं किया जा सकत। 'घटादिविषयक हानादिरूप प्रवृत्ति की जनक होने के कारण हानादि-बुद्धि में घटविषयकत्व और घटादिविषयक हानादि-बुद्धि की जनकता होने के कारण घटादि के ज्ञान में घटादिविषयकत्व सिद्ध होता है'—ऐसा कहने पर देहगत प्रयत्नवदात्मा के संयोग में अर्थ-प्रकाशत्वापत्ति होती है, क्योंकि वह संयोग भी देहरूप अर्थ में प्रवृत्त्यादि का जनक होता है। यदि कहा जाय कि जड़ होने के कारण देहात्म-संयोग को अर्थविषयक प्रकाश नहीं कह सकते। तब स्वयंप्रकाaction/ज्ञान में भी अर्थप्रकाशता न बनेगी, क्योंकि उसकी प्रकाश्य कोटि में स्वयं ज्ञान ही आता है, विषय नहीं, अतः वह खद्योत (जुगनू) के समान केवल अपने अंश में प्रकाशरूप होने पर भी विषयांश में जड़ ही है—ऐसा पहले कहा जा चुका है। घटादि विषय ज्ञान के आत्मा (स्वरूप) ही है—ऐसा कहना अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि घटादि विषय विच्छिन्न (शरीर के बाहर), दीर्घ, स्थूल, अणु और ह्रस्व के रूप में देखे जाते हैं और उनका ज्ञान शरीर के अन्दर अदीर्घ, अस्थूल, अनणु और अह्रस्व के रूप में अवभासित होता है। फलतः एक चन्द्र में प्रतीयमान द्वितीय चन्द्रमा के समान स्वयंप्रकाश चित्त्तत्त्व से भिन्न घटादि प्रपञ्च को अनिर्वचनीय मानना ही उचित है।
इस स्वयंप्रकाश चित्त्तत्त्व का स्वाभाविक स्वलक्षण (अवान्तरव्यक्ति-भेद) अनुभूत नहीं होता और घटादि अनिर्वचनीय प्रपञ्च आत्मा के वास्तविक भेद का जनक नहीं हो सकता, अन्यथा घटादि उपाधियों के द्वारा गगन का भी वास्तविक भेद हो जायगा। घटादि पदार्थों का परस्पर भेद भी समीचीन ज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता—यह आगे चल कर कहा जायगा। परिशेषतः यह घटादि का प्रकाश ही स्वयंप्रकाश, एक कूटस्थ, नित्य और निरंश प्रत्यगात्मा है। उसे प्रत्यगात्मा इस लिए कहा जाता है कि वह देह, इन्द्रियादि
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७
विषये विषयान्तरमध्यस्यति, युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि ?
भामती
प्रत्यगात्मा, स चापराधीनप्रकाशत्पादनंशत्वाच्चाविषयस्तस्मिन्नध्यासो विषयधर्माणां, देहेन्द्रियादिधर्माणाम् । कथं, किमाक्षेपे । अयुक्तोऽयमध्यास इत्याक्षेपः । कस्मादयमयुक्त इत्यत आह ॐ सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति ॐ । एतदुक्तं भवति -- यत्पराधीनप्रकाशमंशवच्च तत्सामान्यांशग्रहे कारणदोषवशाच्च विशेषाग्रहेऽन्यथा प्रकाशते । प्रत्यगात्मा त्वपराधीनप्रकाशतया न स्वज्ञाने कारणान्यपेक्षते । येन तदाश्रयैर्दोषैर्दूष्येत । न चांशवान्, येन कश्चिदस्यांशो गृह्येत कश्चिन्न गृह्येत, नहि तदेव तदानीमेव तेनैव गृहीतमगृहीतं च सम्भवतीति न स्वयम्प्रकाशपक्षेऽध्यासः । सदात्मनेऽप्यप्रकाशे पुरोऽवस्थितत्वस्यांपरोक्षत्वस्याभावान्नाध्यासः । नहि शुक्तावपुरःस्थितायां रजतमध्यस्यतीदं रजतमिति । तस्मादत्यन्तग्रहेऽत्यन्ताग्रहे च नाध्यास इति सिद्धम् । स्यादेतत् — अविषयत्वे हि चिदात्मनो नाध्यासो, विषय एव तु चिदात्मा अस्मत्प्रत्ययस्य, तत्कथं नाध्यास इत्यत आह ॐ युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि ॐ । विषयत्वे हि चिदात्मनोऽन्यो विषयी भवेत् । तथा च यो विषयी स एव चिदात्मा,
भामती-व्याख्या
अनिर्वचनीय प्रपञ्च से प्रतीप ( विपरीत ) अपने को निर्वचनीय जानता है [ 'प्रत्यगात्मा' इस शब्द के 'प्रत्यग्' और 'आत्मा' दो भाग हैं । उनमें 'प्रत्यग्' प्रतिपूर्वक 'अञ्चु गतिपूजनयोः' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ होता है—प्रतीपम् ( विपरीतम् ) आत्मानमञ्चति जानाति । अर्थात् जो अनात्म प्रपञ्च से अपने को विपरीत अनुभव करता है। वही आत्मतत्त्व है, अतः चित्तत्त्व प्रत्यगात्मा कहलाता है ]। वह आत्मा पर-प्रकाश ( अन्य प्रकाश से प्रकाशित होनेवाला ) नहीं एवं निरंश है, अतः किसी अन्य ज्ञान का विषय नहीं। उस आत्मा में शरीरादि विषय और उनके कर्तृत्वादि धर्मों का अध्यास क्योंकर होगा ? भाष्य में प्रयुक्त 'कथम्' शब्द का घटकीभूत 'किम्' पद आक्षेपार्थक है, अतः 'कथमध्यासः' —इस वाक्य का अर्थ है— 'अयुक्तोऽयमध्यासः' । अध्यास अयुक्त क्यों है ? इस प्रश्न का उत्तर है— "सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति ।" आशय यह है कि जो शुक्त्यादि पदार्थ परप्रकाश और सांश होता है, उसके चमकीले अंश ( अवयव ) का ग्रहण एवं नीलपृष्ठादि भाग का अभान होने के कारण वह शुक्त्यादि द्रव्य अन्यथा ( रजतरूपेण ) प्रतीत होता है, किन्तु प्रत्यगात्मा स्वयंप्रकाश है, अपने ज्ञान में कारण-कलाप की अपेक्षा ही नहीं करता कि उन कारणों के दोषों से दूषित हो जाता । सावयव भी नहीं कि सामान्य अवयवों का ग्रहण और विशेष अवयवों का अग्रहण हो जाता । एक अखण्ड वस्तु एक ही समय एक ही पुरुष के द्वारा गृहीत भी हो और अगृहीत भी—ऐसा सम्भव नहीं हो सकता । फलतः स्वयंप्रकाशत्व पक्ष में अध्यास उपपन्न नहीं होता । यदि आत्मा का कभी भी प्रकाश नहीं माना जाता, तब भी पुरोऽवस्थितत्व और अपरोक्षत्व का अभाव होने के कारण अध्यास नहीं बनता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो शुक्ति पुरःस्थित नहीं, उसमें 'इदं रजतम्' —इस प्रकार रजत का अध्यास नहीं कर सकता । फलतः अत्यन्त गृहीत या अत्यन्त अगृहीत पदार्थ में कभी अध्यास नहीं होता—यह सिद्ध हो जाता है ।
यह सत्य है कि यदि चिदात्मा किसी ज्ञान का विषय न होता, तब उसमें किसी पदार्थ का अध्यास नहीं हो सकता था, किन्तु जब चिदात्मा 'अहम्' —इस प्रतीति का विषय हो जाता है, तब उसमें अध्यास क्यों नहीं होगा ? भाष्यकार कहते हैं— "युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि" । चिदात्मा यदि किसी ज्ञान का विषय है, तब वह ज्ञानरूप विषयी चिदात्मा से भिन्न ही होगा, अतः वहाँ जो विषयी है, वही चिदात्मा माना जायगा
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उच्यते—न तावदयमेकान्तेनाविषयः, अस्मत्प्रत्ययविषयत्वात्, अपरोक्षत्वाच्च प्रत्य-
भामती
विषयस्तु ततोऽन्यो युष्मत्प्रत्ययगोचरोऽभ्युपेयः । तस्मादनात्मत्वप्रसङ्गादनवस्थापरिहाराय युष्मत्प्रत्यया- पेतत्वम्, अत एवाविषयत्वमात्मनो वक्तव्यं। तथा च नाध्यास इत्यर्थः ।
परिहरति ॐ उच्यते—न तावदयमेकान्तेनाविषयः ॐ । कुतः ? । ॐ अस्मत्प्रत्ययविषयत्वात् ॐ । अयमर्थः । सत्यं प्रत्यगात्मा स्वयम्प्रकाशत्वादविषयोऽनंशश्च, तथाप्यनिर्वचनीयानाद्यविद्यापरिकल्पितबुद्धि- मनः सूक्ष्मस्थूलशरीरेन्द्रियावच्छेदेनानवच्छिन्नोऽपि वस्तुतोऽवच्छिन्न इवाभिन्नोऽपि भिन्न इवाकर्त्तापि कर्त्तेवाभोक्तापि भोक्तेवाविषयोऽप्यस्मत्प्रत्ययविषय इव जीवभावमापन्नोऽवभासते । नभ इव घटमणि- कमल्लिकाद्यवच्छेदभेदेन भिन्नमिवानेकविधधर्मकमिवेति । नहि चिदेकरसस्यात्मनश्चिदंशे गृहीतेऽगृहीतं कि- ञ्चिदस्ति । खल्वानन्द नित्यत्वविभुत्वादयोऽस्य चिद्रूपादवस्तुतो भिद्यन्ते, येन तद्ग्रहे न। गृह्येरन् । गृहीता एव तु कल्पितेन भेदेन न विवेचिता इत्यगृहीता इवाभान्ति । न चात्मनो बुद्ध्यादिभ्यो भेदस्तात्त्विकः, येन चिदात्मनि गृह्यमाणे सोऽपि गृहीतो भवेत् । बुद्ध्यादीनामनिर्वाच्यत्वेन तद्भेदस्याप्यनिर्वचनीय- त्वात् । तस्माच्चिदात्मनः स्वयंप्रकाशस्यैवानवच्छिन्नस्यावच्छिन्नेभ्यो बुद्ध्यादिभ्यो भेदाग्रहात् तदध्यासेन जीवभाव इति । तस्य चानिदमिदमात्मनोऽस्मत्प्रत्ययविषयत्वमुपपद्यते । तथाहि— कर्त्ता भोक्ता चिदात्माऽ-
भामती-व्याख्या
और विषय को उससे भिन्न 'त्वम्' या 'इदम्'—इस प्रतीति का विषय कहना होगा, तब आत्मा में अनात्मत्व प्रसक्त होगा, अतः ग्राहक-परम्परा की अनवस्था का भी परिहार करने के लिए आत्मा को 'त्वम्'—इस प्रतीति का अविषय मानना आवश्यक है, फलतः आत्मा में अविषयता कहनी होगी, अविषयीभूत पदार्थ में अध्यास नहीं हो सकता—यहाँ तक आक्षेपवादी ने कहा ।
समाधान—उक्त आक्षेप का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"उच्यते, न तावदयमेकान्तेनाविषयः", नियमतः आत्मा अविषय नहीं, क्योंकि वह अस्मत्प्रत्यय ('अहम्'—इस प्रतीति) का विषय हो जाता है। आशय यह है कि यद्यपि प्रत्यगात्मा स्वयं प्रकाश होने के कारण अविषय और निरवयव है, तथापि अनिर्वचनीय और अनादि अविद्या के द्वारा परिकल्पित बुद्धि और मन आदि से घटित सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीररूप उपाधियों के द्वारा अवच्छिन्न होकर वस्तुतः अपरिच्छिन्न, अकर्ता, अभोक्ता और अविषयीभूत आत्मा परिच्छिन्न, कर्त्ता, भोक्ता और अस्मत्प्रत्यय ('अहम्'—इस प्रतीति) का विषय मान लिया जाता है। ऐसा चिदात्मा जीवभाव को प्राप्त होकर विभिन्न रूपों में वैसे ही अवभासित होता है, जैसे घट, मणिक (मटका) और मल्लिकादि (हाँडी आदि रूप) उपाधियों से अवच्छिन्न होकर एक ही आकाश विभिन्न रूप और धर्मवाला प्रतीत होता है। यद्यपि चिदेकरस आत्मा का चिदंश गृहीत होने पर कुछ अगृहीत नहीं रहता। आनन्दत्व, नित्यत्व, विभुत्वादि धर्म भी चिद्रूप आत्मा से वस्तुतः भिन्न नहीं होते कि चिदात्मा का ग्रहण होने पर भी वे अगृहीत रह जाते। बुद्ध्यादि उपाधियों से आत्मा का तात्त्विक भेद नहीं कि चिदात्मा का ग्रहण हो जाने पर वह भेद भी गृहीत हो जाता। बुद्ध्यादिरूप अनिर्वचनीय प्रतियोगियों से निरूपित होने के कारण वह आत्मगत भेद भी अनिर्वचनीय ही है, तात्त्विक नहीं हो सकता। यद्यपि आत्मा अपरिच्छिन्न और स्वयंप्रकाश है, तथापि बुद्ध्यादि परिच्छिन्न पदार्थों से भेदाग्रह होने के कारण बुद्ध्यादि का तादात्म्याध्यास हो जाता है, बुद्ध्यादि से तादात्म्यापन्न आत्मा जीवरूप होकर 'अहम्'—इस प्रतीति का विषय बन जाता है, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार कर्त्ता-भोक्ता के रूप में आत्मा अहंकाराकार प्रतीति का विषय होता है। आत्मा वस्तुतः
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ३९
भामती
हम्प्रत्यये प्रत्यवभासते। न चोदासीनस्य तस्य क्रियाशक्तिर्भोगशक्तिर्वा सम्भवति। यस्य च बुद्ध्यादेः कार्य्यकरणसङ्घातस्य क्रियाभोगशक्ती न तस्य चैतन्यम्। तस्माच्चिदात्मैव कार्य्यकरणसङ्घातेन ग्रथितो लब्धक्रियाभोगशक्तिः स्वयम्प्रकाशोऽपि बुद्ध्यादिविषयविच्छुरणात् कथञ्चिदस्मत्प्रत्ययविषयोऽहङ्कारास्पदं जीव इति च जन्तुरिति च क्षेत्रज्ञ इति चाख्यायते। न खलु जीवश्चिदात्मनो भिद्यते। तथा च श्रुतिः “अनेन जीवेनात्मना” इति। तस्माच्चिदात्मनोऽव्यतिरेकाज्जीवः स्वयम्प्रकाशोऽप्यहम्प्रत्ययेन कर्तृभोक्तृतया व्यवहारयोग्यः क्रियत इत्यहम्प्रत्ययालम्बनमुच्यते। न चाध्यासे सति विषयत्वं विषयत्वे चाध्यास इत्यन्योन्याश्रयत्वमिति साम्प्रतम्। बीजाङ्कुरवदनादित्वात् पूर्व्वपूर्व्वाध्यासतद्वासनाविषयीकृतस्योत्तरोत्तराध्यासविषयत्वाविरोधादित्युकं ॐ नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः ॐ इति भाष्यग्रन्थेन। तस्मात् सुष्ठूक्तं ‘न तावदयमेकान्तेनाविषयः’ इति। जीवो हि चिदात्मतया स्वयम्प्रकाशतयाऽविषयोऽप्यौपाधिकेन रूपेण विषय इति भावः। स्यादेतत् – न वयमपराधीनप्रकाशतयाऽविषयत्वेनाध्यासमपाकुर्मः, किन्तु प्रत्यगात्मा न स्वतो नापि परतः प्रथत इत्यविषय इति ब्रूमः। तथा च सर्व्वथाऽप्रथमाने प्रत्यगात्मनि कुतोऽध्यास इत्यत आह ॐ अपरोक्षत्वाच्च प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः ॐ । प्रतीच आत्मनः प्रसिद्धिः
भामती-व्याख्या
अकर्त्ता-अभोक्ता, असङ्ग और उदासीन है, उसमें वास्तविक क्रिया शक्ति और भोग शक्ति सम्भव नहीं। जिस बुद्ध्यादिरूप सूक्ष्मशरीर और कार्य-कारण-संघातात्मक स्थूल शरीर में क्रिया शक्ति और भोगशक्ति वस्तुतः होती है, उसमें चैतन्य नहीं होता, अतः कार्य-कारण-संघातरूप शरीर से तादात्म्यापन्न आत्मा में ही क्रिया और भोग शक्ति मानी जाती है। यद्यपि आत्मा स्वभावतः स्वयंप्रकाश (अन्य ज्ञान का अविषय) है, तथापि विषयीभूत बुद्ध्यादि से तादात्म्यापन्न होकर कथंचित् ‘अहम्’—इस प्रतीति का विषय होकर अहङ्कारास्पद जीव, जन्तु, क्षेत्रज्ञ—इत्यादि नामों से प्रख्यात होता है। जीव चिदात्मा से वस्तुतः भिन्न नहीं होता, जैसा कि श्रुति कहती है— “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि” (छां० ६।३।२) [चिदात्मा ने संकल्प किया कि मैं जीव बन कर इस मानव शरीर में प्रविष्ट होकर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ, अतः जीव चिदात्मरूप ही है]। चिदात्मा से अभिन्न होने के कारण जीव स्वयंप्रकाश होने पर भी अहमाकार प्रतीति के द्वारा कर्त्ता-भोक्ता के रूप में व्यवहार-योग्य बना दिया जाता है, अतः वह अहङ्काराकार प्रतीति का आलम्बन माना जाता है। ‘अध्यास होने पर विषयत्व और विषयत्व होने पर अध्यास होगा—इस प्रकार अन्योऽन्याश्रयता है’—ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि बीज और अंकुर के समान दोनों अनादि हैं, पूर्व-पूर्व अध्यास के द्वारा विषयीकृत आत्मा का उत्तरोत्तर अध्यास होता जाता है—इस भाव को प्रकट करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—‘‘नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः’’। इस लिए भाष्यकार ने बहुत ठीक कहा है कि “न तावदयमेकान्तेनाविषयः”। अर्थात् जीव के दो रूप परिलक्षित होते हैं—(१) स्वाभाविक और (२) औपाधिक। स्वाभाविक स्वयंप्रकाश या अविषय होने पर भी औपाधिक रूप से विषय हो जाता है [आत्मा अविषय ही है या विषय ही है—ऐसा एकान्तिकरूप से नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह विषय भी है और अविषय भी, स्वाभाविकरूपेण अविषय और आध्यासिकरूपेण विषय होता है]।
यहाँ आक्षेपवादी कहता है कि आत्मा स्वयंप्रकाश होने से अविषय है, अतः उसमें अध्यास नहीं हो सकता—ऐसा हम नहीं कहते, अपितु हमारी शङ्का यह है कि आत्मा न तो स्वतः और न परतः प्रकाशित होता है, अतः सर्वथा अप्रसिद्ध और अप्रथमान आत्मा में अध्यास क्योंकर होगा ? इस आक्षेप के समाधान में भाष्यकार ने कहा है—‘‘अपरोक्षत्वाच्च
| ४० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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गात्मप्रसिद्धेः। न चायमस्ति नियमः—पुरोऽवस्थित एव विषये विषयान्तरमध्य- सितव्यमिति; अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति । एवमविरुद्धः
भामती
प्रथा तस्य। अपरोक्षत्वात् । यद्यपि प्रत्यगात्मनि नान्या प्रथास्ति, तथापि भेदोपचारः, यथा पुरुषस्य चैतन्यमिति । एतदुक्तं भवति — अवश्यं चिदात्माऽपरोक्षोऽभ्युपेयस्त्वदप्रथायां सर्वस्याप्रथनेन जगदान्ध्यप्रसङ्गादित्युक्तं, श्रुतिश्चात्र भवति 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"इति । तदेवं परमार्थपरिहारमुक्त्वाऽभ्युपेत्यापि चिदात्मनः परोक्षतां प्रौढवादितया परिहारान्तरमाह । ॐ न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थित एव ॐ अपरोक्ष एव ॐ । विषये विषयान्तरमध्यसितव्यम ॐ । कस्मादयं न नियम इत्यत आह ॐ अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति ॐ । हियंस्मादर्थे । नभो हि द्रव्यं सद् रूपस्पर्शविरहान्न बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षम् । नापि मानसं, मनसोऽसहायस्य बाह्येऽप्रवृत्तेः । तस्मादप्रत्यक्षम् । अथ च तत्र बाला अविवेकिनः परदर्शितदर्शनाः कदाचित्पार्थिवच्छायां श्यामतामारोप्य, कदाचित्तेजसं शुक्लत्वमारोप्य नीलोत्पलपलाशश्याममिति वा राजहंसमालावधवलमिति वा निर्वर्णयन्ति तत्रापि पूर्वदृष्टस्य तैजसस्य वा तामसस्य वा रूपस्य परत्र नभसि स्मृतिरूपोऽवभास इति । एवं तदेव तलमध्यस्यन्ति अवाङ्मुखीभूतमहेन्द्रनीलमणिमयमहाकटाहकल्पमित्यर्थः । उपसंहरति ॐ एवम् ॐ । उक्तेन प्रकारेण सर्वक्षेपपरिहारात् ॐ अविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यप्यनात्मनां ॐ । बुद्ध्यादीनाम् ॐ अध्यासः ॐ ।
भामती-व्याख्या
प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः" । प्रत्यगात्मा की प्रथा या प्रसिद्धि अवश्य माननी होगी, क्योंकि वह अपरोक्ष है। यद्यपि प्रत्यगात्मा की प्रथा प्रत्यगात्मा से भिन्न नहीं, अतः 'प्रत्यगात्मनः प्रथा' — ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं। तथापि उसी प्रकार यहाँ भेद का उपचार हो जाता है, जैसे 'आत्मनः चैतन्यम्' — इत्यादि व्यवहारों में होता है। आशय यह है कि आत्मा को अवश्य ही अपरोक्षरूप मानना होगा, क्योंकि उसका प्रकाश न होने पर जगदान्ध्य-प्रसङ्ग पहले दिखाया जा चुका है। उसके प्रकाश से ही विश्व प्रकाशित है, श्रुति स्पष्ट उद्घोष कर रही है कि "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" ( कौ. २।५।१५ ) । इस प्रकार पारमार्थिक दृष्टि से आक्षेप का परिहार करके चिदात्मा की परोक्षता को स्वीकार करते हुए भी प्रौढीवाद का सहारा लेकर उक्त आक्षेप का समाधान किया जाता है — "न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थिते एव विषये विषयान्तरमध्यसितव्यम्" । अर्थात् ऐसा कोई नियम नहीं कि अपरोक्ष विषय में ही अध्यास होता हो, क्योंकि "अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालाः तलमलिनतादि अध्यस्यन्ति" । अर्थात् यद्यपि आकाश द्रव्य रूप और स्पर्श गुण से रहित होने के कारण, चक्षु और त्वग्रूप बाह्य इन्द्रिय के द्वारा प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता । मानस प्रत्यक्ष का भी वह विषय नहीं, क्योंकि बाह्य विषय के ग्रहण में मन स्वतन्त्र नहीं, अपितु बाह्य इन्द्रिय की सहायता से ही प्रवृत्त होता है, जैसा कि कहा गया है — परतन्त्रं बहिर्मनः' ( विधिवि. पृ. ११४ ) । अतः आकाश प्रत्यक्ष नहीं, फिर भी बालक ( अल्पज्ञ मनुष्य ) आकाश में कदाचित् पार्थिव छायारूप श्यामता का आरोप करके कहते हैं — यह आकाश नीलोत्पल के पत्तों जैसा श्यामल है। एवं कदाचित् तैजस शुक्ल रूप का अध्यास करके व्यवहार करते हैं — यह आकाश राजहंसों के समूह के समान धवल ( श्वेत ) है। वहाँ भी पूर्वदृष्ट तामस श्याम और तैजस शुक्ल रूप का आकाशरूप पर द्रव्य में स्मृतिरूप अवभास बन जाता है। इसी प्रकार सुदूर ऊपर गगन में तल का आरोप करके लोग कहा करते हैं कि यह गगन नीलमणि से निर्मित औंधा कड़ाह है। अध्यास-लक्षण का उपसंहार करते हुए कहा है — “एवमविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यपि अनात्माध्यासः"। 'एवम्' का अर्थ है—
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ४१
प्रत्यगात्मन्यप्यनात्माध्यासः ।
तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते; तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपा-
भामती
ननु सन्ति च सहस्रमध्यासास्तत्किमर्थमयमेवाध्यास आक्षेपसमाधानाभ्यां व्युत्पादितः, नाध्यासमात्रमित्यत आह ॐ तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते ॐ । अविद्या हि सर्वानर्थबीजमिति श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिषु प्रसिद्धम् , तदुच्छेदाय वेदान्ताः प्रवृत्ता इति वक्ष्यति । प्रत्यगात्मन्यनात्माध्यास एव सर्वानर्थहेतुर्न पुन रजतादिविभ्रमा इति स एवाविद्या, तत्स्वरूपं चाविज्ञातं न शक्यमुच्छेत्तुमिति तदेव व्युत्पाद्यं नाध्यासमात्रम् । अत्र च एवंलक्षणमित्येवंरूपतयाऽनर्थहेतुतोक्ता । यस्मात्प्रत्यगात्मन्यशनायादिरहितेऽशनायाद्युपेतान्तःकरणाद्यहितारोपेण प्रत्यगात्मानमदुःखं दुःखाकरोति, तस्मादनर्थहेतुः । न चैवं पृथग्जना अपि मन्यन्तेऽध्यासं, येन न व्युत्पाद्येतेत्यत उक्तं ॐ पण्डिता मन्यन्ते ॐ ।
नन्वियमनादिरतिनिरूढनिबिडवासनानुविद्धाऽविद्या न शक्या निरोद्धुम्, उपायाभावादिति यो मन्यते तं प्रति तन्निरोधोपायमाह ॐ तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं ॐ । निर्विचिकित्सं ज्ञानं ॐ विद्यामाहुः ॐ । पण्डिताः प्रत्यगात्मनि खल्वत्यन्तविविक्ते बुद्ध्यादिभ्यो बुद्ध्यादिभेदाग्रहणनिमित्तो बुद्ध्याद्यात्मत्वतद्धर्माध्यासः । तत्र श्रवणमननादिभिर्यद्विवेकविज्ञानं तेन विवेकाग्रहे निवर्त्तितेऽध्यासापबाधात्मकं वस्तुस्वरूपावधारणं विद्या चिदात्मरूपं स्वरूपे व्यवतिष्ठत इत्यर्थः ।
भामती-व्याख्या
सभी आक्षेपों का परिहार हो जाने पर प्रत्यगात्मा में बुद्ध्यादि का अध्यास बन जाता है ।
शङ्का होती है कि सहस्रों अध्यास-प्रकार दिखाए जा सकते थे, तब यह आत्मानात्माध्यास का ही निरूपण क्यों किया ? इस शङ्का को दूर करने के लिए कहा जाता है—"तमेतमेवंलक्षणकमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते" । अविद्या सभी अनर्थों का मूल कारण हैं—ऐसा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में प्रसिद्ध है । उस अविद्या का उच्छेद करने के लिए ही वेदान्त ग्रन्थ प्रवृत्त हुए हैं—ऐसा कहा जायगा । प्रत्यगात्मा में अनात्माध्यास ही सर्वानर्थ का हेतु है, शुक्ति-रजतादि-भ्रम नहीं, अतः आत्मानात्माध्यास ही मुख्य अविद्या है । उसके स्वरूप का जब तक ज्ञान न हो, तब तक उसका उच्छेद नहीं किया जा सकता, अतः वही विशेषतः व्युत्पादनीय है, सभी अध्यास नहीं । भाष्यकार ने 'एवंलक्षणम्'— ऐसा कहकर उसकी अनर्थ-हेतुता प्रकट की है । क्षुधा-पिपासादि से रहित आत्मा में क्षुधा-पिपासादि से युक्त अन्तःकरणादि अहितकर पदार्थों का अध्यास वस्तुतः दुःख-रहित आत्मा को भी दुःखी बना देता है, अतः वह अनर्थ का हेतु है । ऐसे अध्यास का ज्ञान सर्वजन-साधारण नहीं कि उसका निरूपण अनावश्यक हो जाता—यह दिखाने के लिए कहा गया है—"पण्डिता मन्यन्ते" ।
'यह अविद्या अनादि, अतिनिरूढ़ ( सुदृढ ), निविड़ ( घनीभूत ) वासनाओं से युक्त होने के कारण कभी समुच्छेदनीय ही नहीं, क्योंकि उसके उच्छेद का कोई उपाय ही दिखाई नहीं देता'—ऐसी धारणावाले व्यक्तियों के लिए अविद्या के निरोध का उपाय दिखाते हैं—"तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं विद्यामाहुः" । पण्डितगण असन्दिग्ध ज्ञान को विद्या कहा करते हैं । प्रत्यगात्मा बुद्ध्यादि से वस्तुतः अत्यन्त विविक्त ( निर्लिप्त ) है किन्तु बुद्ध्यादि का विवेक-ग्रह ( भेद-ज्ञान ) न होने के कारण बुद्ध्यादि के तादात्म्य एवं धर्मों का अध्यास आत्मा में हो जाता है । वेदान्त-वेद्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप आत्मा के श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि के द्वारा जो विवेक-विज्ञान उत्पन्न होता है, उसके द्वारा विवेकाग्रह की निवृत्ति हो जाने पर अध्यास का बाधरूप वस्तु-स्वरूपात्मक अवधारण प्रकट होता है, वही विद्या है, वह चिदात्मस्वरूप होकर आत्मस्वरूप में व्यवस्थित होती है ।
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| ४२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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वधारणं विद्यामाहुः। तत्रैवं सति यत्र यदध्यासः, तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न संबध्यते, तमेतमविद्याख्यमात्मानात्मनोरितरेतराध्यासं पुरस्कृत्य सर्वे
भामती
स्यादेतद् – अतिनिरूढनिबिडवासनानुविद्धाऽविद्या विद्ययाऽपबाधिताऽपि स्ववासनावशात्पुनरुद्भविष्यति, प्रवर्त्तयिष्यति च वासनादिकार्यं स्वोचितमित्यत आह ॐ तत्रैवं सति ॐ एवम्भूतवस्तुतत्त्वावधारणे सति । ॐ यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न सम्बध्यते ॐ । अन्तःकरणादिदोषेणाशनायादिना चिदात्मा चिदात्मनो गुणेन चैतन्यान्दादिनाऽन्तःकरणादि न सम्बध्यते । एतदुक्तं भवति—तत्त्वावधारणाभ्यासस्य हि स्वभाव एव स तादृशो यदनादिमपि निरूढनिबिडवासनमपि मिथ्याप्रत्ययमपनयति । तत्त्वपक्षपातो हि स्वभावो धियाम् । यथाऽऽहुर्बाह्या अपि—
निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः ।
न बाधोऽयत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपातः ॥ इति ।
विशेषतस्तु चिदात्मस्वभावस्य तत्त्वज्ञानस्यात्यन्तान्तरङ्गस्य कुतोऽनिर्वच्ययाऽविद्यया बाध इति । यदुक्तम्—'सत्यानृते मिथुनीकृत्य विवेकाग्रहादध्यस्याहमिदं ममेदमिति लोकव्यवहारः' इति, तत्र व्यपदेश-
भामती-व्याख्या
यह जो भय होता है कि अविद्या ऐसी निरूढ और निबिड़ वासनाओं से युक्त है कि एक बार विद्या के द्वारा अपबाधित होकर भी अपनी सुदृढ़ वासनाओं के बल पर पुनः प्रकट होकर अपने संस्कारों को अपने अनुरूप मूर्तरूप दे डालेगी । उस भय को दूर करने के लिए कहा है–"तत्रैवं सति" । 'एवं' शब्द का अर्थ है—पूर्वोक्त रीति से वस्तु-तत्त्व का अवधारण (निश्चय) कर लेने पर । "यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वा अणुमात्रेणापि स न सम्बध्यते" । आत्मा में तादात्म्येन अध्यस्त अन्तःकरण के क्षुधा-पिपासादि दोषों से चिदात्मा और चिदात्मा के चैतन्य, आनन्दादि गुणों से अन्तःकरण का अणुमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता । आशय यह है कि कथित तत्त्वावधारण का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अनादि, निरूढ और सघन वासना से युक्त मिथ्या ज्ञान को नष्ट कर देता है, जैसा कि वेद-बाह्य बौद्ध विद्वान् धर्मकीर्ति ने भी कहा है—
निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः ।
न बाधोऽयत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपातः ॥ (प्र. वा. पृ. १४४)
[वस्तु-स्वभाव की रक्षा के लिए कुछ भी यत्न न करने पर भी विपर्ययों (मिथ्या ज्ञानों) के द्वारा तत्त्व ज्ञान का बाध कभी नहीं होता, क्योंकि भूतार्थ-स्वभाव (वस्तुतत्त्व का स्वभाव) सदैव उपद्रवों (सभी प्रकार की बाधाओं) से रहित होता है । प्राणियों की बुद्धि सदैव तत्त्व-पक्षपातिनी होती है । उक्त वार्तिक की व्याख्या में भाष्यकार कहते हैं—
ततः स्वभावो भूतात्मा निरुपद्रव एव च ।
कथमस्य परित्यागः कर्तुं शक्यः सचेतसा ॥
पक्षपातश्च चित्तस्य न दोषेषु प्रवर्त्तते ।
ततः तस्य न दोषाय यत्नः कश्चित्प्रवर्त्तते ॥ (प्रज्ञाकर, पृ. १४४)] ।
उसमें भी विशेषता यह है कि हमारा तत्त्वज्ञान चिदात्मस्वरूप होने से अत्यन्त अन्तरङ्ग है, उसका अनिर्वचनीय एवं निस्तत्त्वभूत अविद्या के द्वारा बाध हो भी कैसे सकता है ?
भाष्यकार ने कहा है—"सत्यानृते मिथुनीकृत्य विवेकाग्रहादध्यस्य 'अहमिदम्', 'ममेदम्'–इति लोकव्यवहारः"। वहाँ व्यवहार चार प्रकार का कहा गया है—"अभिज्ञाभिवदनमुपादानमर्थक्रिया इति चतुर्विधः" (पं. वि. पृ. ६२) । उसमें शब्दात्मक व्यवहार तो
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३
प्रमाणप्रमेयव्यवहारा लौकिका वैदिकाश्च प्रवृत्ताः, सर्वाणि च शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि।
कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि चेति ? उच्यते—देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानरहितस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्त्यनु-
भामती
लक्षणो व्यवहारः कण्ठोक्तः, इतिशब्दसूचितं लोकव्यवहारमादर्शयति ॐ तमेतमविद्याख्यं ॐ इति । निगदव्याख्यातम् ।
आक्षिपति – ॐ कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ॐ । तत्त्वपरिच्छेदो हि प्रमा विद्या, तत्साधनानि प्रमाणानि कथमविद्यावद्विषयाणि ? नाविद्यावन्तं प्रमाणान्याश्रयन्ति, तत्कार्यस्य विद्याया अविद्याविरोधित्वादिति भावः । सन्तु वा प्रत्यक्षादीनि संवृत्यापि यथा तथा, शास्त्राणि तु पुरुषहितानुशासनपराण्यविद्याप्रतिपक्षतया नाविद्यावद्विषयाणि भवितुमर्हन्तीत्याह ॐ शास्त्राणि चेति ॐ ।
समाधत्ते ॐ उच्यते—देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य ॐ । तादात्म्यतद्धर्माध्यासहीनस्य । ॐ प्रमातृत्वानुपपत्तौ सत्यां प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः ॐ । अयमर्थः—प्रमातृत्वं हि प्रमां प्रति कर्तृत्वं तच्च स्वातन्त्र्यं, स्वातन्त्र्यं च प्रमातुरितरकारकाप्रयोज्यस्य समस्तकारकप्रयोक्तृत्वम् । तदनेन प्रमाकरणं
भामती-व्याख्या
भाष्यकार ने 'अहमिदं ममेदम्'—इस वाक्य से ही प्रदर्शित कर दिया है, शेष व्यवहारों की सूचना के लिए कहा है—‘‘इति लोकव्यवहाराः’ अर्थात् 'इत्येवंविधा व्यवहाराः' । वहाँ 'इति' पद के द्वारा अभिसूचित लोकव्यवहारों का स्पष्टीकरण करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"तमेतमविद्याख्यम्"—यहाँ से लेकर "सर्वाणि शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि"—यहाँ तक। भाष्य की पदावली अत्यन्त सरल और स्पष्टार्थक है।
उक्त स्थापना पर आक्षेप किया गया—‘‘कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि’’। उसका भाव यह है कि तत्त्व-परिच्छेदरूप प्रमा विद्यारूप है, उस प्रमा के साधनीभूत प्रत्यक्षादि प्रमाणों में अविद्यावद्विषयकत्व सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाण अविद्यावान् (अज्ञानी) पुरुष की अधिकार-कक्षा में नहीं आते, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों का कार्य जो प्रमा या विद्या है, वह अविद्या की विरोधिनी होती है। प्रत्यक्षादि प्रमाणों को यदि किसी प्रकार सांवृतिक (आविद्यक) व्यवहार का साधन मान भी लिया जाय, तब भी शास्त्रीय व्यवहार में कभी भी आविद्यकत्व की सम्भावना नहीं कर सकते, क्योंकि शास्त्र सदैव पुरुष को उसके हित की ही शिक्षा देते हैं, वे अविद्या के सर्वथा प्रबल प्रतिपक्षी होते हैं, अविद्यावान् पुरुष उनका अधिकारी क्योंकर होगा ? ऐसी आशङ्का की गई है—‘‘शास्त्राणि च’’। उक्त आशङ्का का परिहार किया जाता है—‘‘उच्यते’’। ‘‘देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य’’—इस वाक्य का अर्थ है—तादात्म्यतद्धर्माध्यासहीनस्य। प्रमातृत्वानुपपत्तौ सत्यां प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः'—ऐसा अन्वय कर लेना चाहिए। आशय यह है कि प्रमातृत्व का अर्थ है—प्रमा का कर्तृत्व, कर्तृत्व का अर्थ है—स्वातन्त्र्य । प्रमाता में जो इतर (कर्मादि) कारकों से अप्रयोज्यत्व और कर्मादि समस्त कारकों का प्रयोक्तृत्व है, वही प्रमाता पुरुष में स्वातन्त्र्य है [ ‘‘स्वतन्त्रः कर्त्ता’’ (पा. सू. १।४।५४) में भाष्यकार ने 'तन्त्र' शब्द प्रधानार्थक मान कर कहा है—‘‘अस्ति प्राधान्ये वर्तते । तद्यथा स्वतन्त्रोऽयं ब्राह्मण इत्युच्यमाने स्वप्रधान इति गम्यते । तद्यः प्राधान्ये वर्तते तन्त्रशब्दः तस्येदं ग्रहणम्’’। कारक सूत्र में भी कहा है—‘‘किं पुनः प्रधानम् ? कर्त्ता । कथं पुनर्ज्ञायते कर्त्ता प्रधानमिति ? यत्सर्वेषु साधनेषु सन्निहितेषु कर्त्ता