भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 48
३०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

तु ज्ञानं पराहतं, नहि भेदाग्रहेऽनयोरिति भवति, अनयोरिति ग्रहे भेदाग्रहणमिति च भवति । तस्मात्सत्तामात्रेण भेदाग्रहोऽगृहीत एव व्यवहारहेतुरिति वक्तव्यम् । तत्र किमयमारोपोत्पादक्रमेण व्यवहारहेतुराहो अनुत्पादितारोप एव स्वत इति ? वयं तु पश्यामः—चेतनव्यवहारस्याज्ञानपूर्वकत्वानुपपत्तेरारोपज्ञानोत्पादक्रमेणैवेति । ननु सत्यं चेतनव्यवहारो नाज्ञानपूर्वकः किन्त्वविविक्तविवेकग्रहणस्मरणपूर्वक इति । मैवम्, नहि रजतप्रातिपदिकार्थमात्रस्मरणं प्रवृत्तावुपयुज्यते । इदङ्कारास्पदाभिमुखी खलु रजतार्थिनां प्रवृत्तिरित्यविवादम् । कथं चायमिदाङ्कारास्पदे प्रवर्त्तेत, यदि तु न तदिच्छेत् ? अन्यदिच्छत्यन्यत्करोतीति व्याहतम् । न चेदिदङ्कारास्पदं रजतमिति जानीयात् कथं रजतार्थी तदिच्छेत् ? यद्यतथात्वेनाग्रहणादिति ब्रूयात च प्रतिवक्तव्योऽथ तथात्वेनाग्रहणात् कस्मान्नोपेक्षेतेति ? सोऽयमुपादानोपेक्षाभ्यामभित आकृष्यमाणश्चेतनोऽव्यवस्थित इदङ्कारास्पदे रजतसमारोपेणोपादान एव व्यवस्थाप्यत इति भेदाग्रहः समारोपोत्पादक्रमेण चेतनप्रवृत्तिहेतुः । तथाहि—भेदाग्रहाद्विदङ्कारास्पदे रजतत्वं समारोप्य तज्जातीयस्योपकारहेतुभावमनुचिन्त्य तज्जातीयतयेदङ्कारास्पदे रजते तमनुमाय तदर्थी प्रवर्त्तते इत्यानुपूर्व्यं सिद्धम् । न च तटस्थरजत-

भामती-व्याख्या

कहा गया—'अनयोः भेदाग्रहः' । वह अत्यन्त विरुद्ध है, क्योंकि जिन पदार्थों में भेद-ग्रह नहीं, होता, उनके लिए 'अनयोः'—इस प्रकार द्विवचन का प्रयोग कैसे होगा ? यदि उनमें द्वित्व का निश्चय है, तब अनयोः का प्रयोग सम्भव हो जाने पर भी 'भेदाग्रह'—यह कहना विरुद्ध पड़ जाता है । फलतः भेदाग्रह स्वयं अगृहीत होकर सत्ता मात्र से व्यवहार का जनक है—ऐसा मानना होगा । तब जिज्ञासा होती है कि वह अज्ञात भेदाग्रह रजतादि का आरोप कराकर व्यवहार का हेतु होता है ? या रजतादि का आरोप कराए बिना ही अकेला रजार्थी का प्रवर्त्तक होता है ? वहाँ हमारा तो कहना यह है कि चेतन मनुष्य का व्यवहार केवल अग्रहण ( अज्ञान ) के आधार पर नहीं देखा जाता, अतः रजतादि का अवभास कराकर ही वह रजतार्थी का प्रवर्त्तक होगा ।

यह जो कहा जाता है कि यद्यपि चेतन पुरुष का कोई भी व्यवहार केवल अज्ञान से नहीं होता, तथापि कथित अगृहीतभेदक इदमाकार प्रत्यक्ष और रजताकार स्मरण—ये दोनों ज्ञान व्यवहार के निर्वाहक हो जाते हैं। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि प्रकृत में केवल 'रजत' पद के अर्थ का स्वतन्त्र ज्ञान प्रवृत्ति का साधक नहीं हो सकता, क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि रजतार्थी पुरुष की प्रवृत्ति इदंकारास्पद पदार्थ की ओर हो रही है । इदंकारास्पद पदार्थ की ओर उसकी प्रवृत्ति तभी बनेगी, जब कि उसे उसकी इच्छा होगी, क्योंकि अन्य वस्तु की इच्छा से अन्य वस्तु में प्रवृत्ति सम्भव नहीं । यदि इदंकारास्पद वस्तु को रजत न समझे, तब उसकी इच्छा ही क्यों होगा ? यदि अरजतरूपेण अग्रहण को प्रवर्त्तक माना जाता है, तब रजतरूपेण अग्रहण को रजतार्थी का निवर्तक मानना होगा । फलतः प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप विरोधी पदार्थों के आकर्षण में पड़ कर जब चेतन पुरुष किंकर्त्तव्य-विमूढ़ हो जाता है, तब रजतारोपपूर्वक ही भेदाग्रह उस पुरुष की प्रवृत्ति का व्यवस्थापक हो सकेगा ।

उसका क्रम इस प्रकार है कि भेदाग्रह से इदंकारास्पद पदार्थ में रजतत्वरूप धर्म का आरोप होता है, रजतजातीय पदार्थ की इष्ट-साधनता का स्मरण होता है, उसके पश्चात् इदंकारास्पदीभूत रजत में तज्जातीयत्वरूप हेतु के द्वारा इष्ट-साधनता का अनुमान होता है—'इदं मम ( रजतार्थिनः ) इष्टसाधनम्, रजतजातीयत्वाद्, आपणस्थरजतवत्' । तब रजतार्थी व्यक्ति पुरःस्थित द्रव्य की ओर प्रवृत्त होता है । इदंकारास्पद पदार्थ से भिन्न तटस्थ रजत की स्मृति इदंकारास्पद पदार्थ में इष्ट-साधनत्व का अनुमान नहीं करा सकती, क्योंकि 'इदं