भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९
भामती
अन्ये त्वत्राप्यपरितुष्यन्तो यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते। अत्रेवमाकूतम्—अस्ति तावद्रजतार्थिनो रजतमिदमिति प्रत्ययात् पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये प्रवृत्तिः सामानाधिकरण्यव्यपदेशश्चेति सर्वजनीनम्। तदेतन्न तावद् ग्रहणस्मरणयोस्तद्गोचरयोश्च मिथो भेदाग्रहमात्राद्भवितुमर्हति। ग्रहणनिबन्धनो हि चेतनस्य व्यवहारव्यपदेशौ कथमग्रहणमात्राद्भवेताम् ? ननूक्तं नाग्रहणमात्रात् किन्तु ग्रहणस्मरणे एव मिथः स्वरूपतो विषयतश्चागृहीतभेदे समीचीनपुरःस्थितरजतविज्ञानसादृश्येन अभेदव्यवहारं सामानाधिकरण्यव्यपदेशं च प्रवर्त्तयतः। अथ समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोर्गृह्यमाणं वा व्यवहारप्रवृत्तिहेतुरगृह्यमाणं वा सत्तामात्रेण ? गृह्यमाणत्वेऽपि समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोरिदमिति रजतमिति च ज्ञानयोरिति ग्रहणमथवा तयोरेव स्वरूपतो विषयतश्च मिथो भेदाग्रह इति ग्रहणम् ? तत्र न तावत्समीचीनज्ञानसदृशो इति ज्ञानं समीचीनज्ञानवद्व्यवहारप्रवर्त्तकम्। नहि गोसदृशो गवय इति ज्ञानं गवार्थिनं गवये प्रवर्त्तयति। अनयोरेव भेदाग्रह इति
भामती-व्याख्या
रजतं विषयीकृत्य नैव शुक्तेर्विवेचितम् ।
स्मृत्याऽतो रजताभास उपपन्नो भविष्यति ॥
ग्रहणस्मरणे चेमे विवेकानवभासिनी ।
सन्निहितरजतशकले रजतमतिर्भवति यादृशी सत्या ।
भेदानध्यवसायादियमपि तादृक् परिस्फुरति ॥
बाधकप्रत्ययस्यापि बाधकत्वमता मतम् ।
प्रसज्यमानरजतव्यवहारनिवारणात् ॥ (प्र० पं० पृ० ४९) ]।
( ३ ) अन्यथाख्याति—अन्य आचार्य कहते हैं कि जिस शुक्त्यादि पदार्थ में रजतादि का जो अध्यास होता है, वह शुक्ति में रजतत्वरूप विपरीत धर्म का आरोप है। इन आचार्यों का आशय यह है कि रजतार्थी पुरुष की 'रजतमिदम्'—इस प्रतीति के आधार पर पुरोवर्ती शुक्तिरूप द्रव्य में प्रवृत्ति होती है, केवल प्रवृत्ति ही नहीं, 'रजतमिदम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश भी होता है—यह सर्व-सम्मत तथ्य है। यह सब कुछ प्रत्यक्ष और स्मरण ज्ञानों और उनके विषयीभूत शुक्ति और रजतादि विषयों के पारस्परिक भेद के अग्रहण मात्र से सम्पादित नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन पुरुष की प्रत्येक क्रिया और शब्द-व्यवहार तभी सम्भव होते हैं, जब कि विषय वस्तु का ग्रहण (ज्ञान) हो जाय, अतः अग्रहण मात्र के बल पर पुरोदेश में प्रवृत्ति और 'इदं रजतम्'—ऐसा शब्द-प्रयोग क्योंकर होगा ? यह जो कहा जाता है कि केवल अग्रहण को ही प्रवृत्त्यादि का कारण नहीं माना जाता, अपितु रजत का स्मरण और इदं पदार्थ का ग्रहण (प्रत्यक्ष ज्ञान) ये दोनों ज्ञान ऐसे हैं कि जिन के न तो स्वरूपों का भेद-ग्रह होता है और न उनके विषयों का। इन दोनों ज्ञानों में 'रजत-मिदम्'—इस प्रकार के समीचीन ज्ञान का सारूप्य (असंसर्गाग्रह) भी है, अत एव ये दोनों ज्ञान शुक्ति और रजत के अभेद-व्यवहार एवं सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के प्रवर्तक माने जाते हैं। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि ('इदम्' और 'रजतम्') इन दोनों ज्ञानों में समीचीन ज्ञान का सादृश्य गृह्यमाण होकर उक्त व्यवहार का हेतु है? अथवा अगृह्यमाण होकर सत्तामात्र से ? गृह्यमाणत्व-पक्ष में भी 'समीचीनज्ञानसारूप्यमनयोर्ज्ञानयोः'—इस प्रकार सादृश्य का ग्रहण माना जाता है ? या 'अनयोः ज्ञानयोः स्वरूपतो विषयतश्च भेदाग्रहः'—इस रीति से ग्रहण होता है ? प्रथम कल्प युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि किसी वस्तु में उसका सादृश्य-ज्ञान मात्र प्रवर्तक नहीं होता, अन्यथा गवय में 'गोसदृशोऽयम्'—इस प्रकार गौ का सादृश्य-बोध रहने के कारण गवय की ओर उस व्यक्ति की प्रवृत्ति होनी चाहिए, जो गौ चाहता है ! द्वितीय कल्प में जो