भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

प्रवर्त्तयतः ।

क्वचित् पुनर्गहण एव मिथोऽगृहीतभेदे, यथा पीतः शङ्ख इति । अत्र हि विनिर्गच्छन्नयनरश्मिवच्छिन्नः पित्तद्रव्यस्य काचस्येवातिस्वच्छस्य पीतत्वं गृह्यते पित्तं तु न गृह्यते, शङ्खोऽपि दोषवशात् शुक्लगुणरहितः स्वरूपमात्रेण गृह्यते । तदनयोर्गुणगुणिनोरसंसर्गाग्रहसारूप्यात् पीततपनीयपिण्डप्रत्ययाविशेषेणाभेदव्यवहारः सामानाधिकरण्यव्यपदेशश्च, भेदाग्रहप्रसञ्जिताभेदव्यवहारबाधनाच्च नेदमिति विवेकप्रत्ययस्य बाधकत्वमप्युपपद्यते, तदुपपत्तौ च प्राक्तनस्य प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वमपि लोकसिद्धं सिद्धं भवति । तस्माद्यथार्थाः सर्वे विप्रतिपन्नाः सन्देहविभ्रमाः प्रत्ययत्वात् घटादिप्रत्ययवत् । तदिदमुक्तं ॐ यदध्यास इति ॐ । यस्मिन् शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यास इति लोकप्रसिद्धिः नासावन्यथाख्यातिनिबन्धना, किन्तु गृहीतस्य रजतादेस्तत्स्मरणस्य च गृहीततांशप्रमोषेण गृहीतमात्रस्य य इदमिति पुरोऽवस्थिताद् द्रव्यमात्रात्तत्प्रज्ञानाच्च विवेकस्तदग्रहणनिबन्धनो भ्रमः । भ्रान्तत्वं च ग्रहणस्मरणयोरितरेतरसामानाधिकरण्यव्यपदेशो रजतादिव्यवहारश्चेति ।

भामती-व्याख्या

प्रकार का समीचीन ज्ञान, क्योंकि दोनों में असंसर्ग का अग्रह समान है।

कहीं-कहीं दो प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अगृहीतभेदक होकर वैसे ही व्यवहार के जनक हो जाते हैं, जैसे 'पीतः शङ्खः'—यहाँ पर गोलक से बाहर निकलती हुई अति स्वच्छ नेत्र-रश्मियाँ अपने साथ चिपके काँच के समान पारदर्शी पित्त द्रव्य का ग्रहण न करके उसके केवल पीत वर्ण का ग्रहण करती हैं। शङ्ख का शुक्ल वर्ण भी उसी दोष के कारण गृहीत न होकर केवल शङ्ख द्रव्य ही गृहीत होता है। पीत गुण और शङ्खरूप गुणी (द्रव्य) में वैसे ही अभेद-व्यवहार और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश प्रवृत्त हो जाता है, जैसे, 'पीतं स्वर्णपिण्डम्', 'पीतं बिल्वम्'—इत्यादि प्रमा ज्ञानों के द्वारा प्रवृत्त होता है, क्योंकि उन दोनों ज्ञानों में समीचीन ज्ञान का असंसर्गाग्रह रूप सादृश्य है। भेदाग्रह के द्वारा प्रापित उक्त अभेद-व्यवहार का बाध कर देने मात्र से 'नेदम्'—इस प्रकार के भेद-ज्ञान में बाधकत्व का भी निर्वाह हो जाता है। उसका निर्वाह हो जाने के कारण उससे पूर्ववर्ती 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में लोक-प्रसिद्ध भ्रमरूपता भी उपपन्न हो जाती है। फलतः सभी ज्ञानों में यथार्थत्व की सिद्धि पर्यवसित हो जाती है—'सर्वे विप्रतिपन्ना विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वाद्, घटादिप्रत्ययवत्' । इस अख्याति का लक्षण भाष्य में किया गया है—"यदध्यासः"। जिन शुक्त्यादि आधारों में जिन रजतादि का अध्यास लोक में प्रसिद्ध है, वह अन्यथा-ख्याति-प्रयुक्त नहीं, अपितु पूर्व-गृहीत और पश्चात् स्मर्यमाण रजतादि पदार्थों के गृहीतत्व धर्म का विस्मरण हो जाता है, अतः केवल रजतरूप धर्मी का जो पुरोवर्ती इदं पदार्थ से एवं स्मरणरूप रजत-ज्ञान का जो प्रत्यक्षात्मक इदमाकार ज्ञान से भेद है, उसका ग्रहण न होने के कारण भ्रम-व्यवहार हो जाता है। उसकी भ्रम-रूपता यही है, जो कि इदमाकार प्रत्यक्षज्ञान और रजताकार स्मरण ज्ञान की एकात्मता का भान और शुक्ति में रजत पद का प्रयोग होता है [श्रीशालिकनाथ मिश्र कहते हैं—

"नन्वेवं रजताभासः कथमेष घटिष्यति ।
उच्यते शुक्तिशकलं गृहीतं भेदवर्जितम् ॥
शुक्तिकाया विशेषा ये रजताद्भेदहेतवः ।
ते न ज्ञाता अभिभवाद् ज्ञाता सामान्यरूपतः ॥
अनन्तरं च रजते स्मृतिर्जाता तथापि च ।
मनोदोषात् तदित्यंशपरामर्शविवर्जितम् ॥