भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७
भामती
जनने सामर्थ्यमुपलब्धमिति कथमेभ्यो मिथ्याज्ञानसम्भवः ? दोषसहितानां तेषां मिथ्याप्रत्ययेऽपि सामर्थ्य- मिति चेत्, न, दोषाणां कार्योपजननसामर्थ्यविघातमात्रे हेतुत्वात् । अन्यथा दुष्टादपि कुटजबीजाद् वटा- ङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । अपि च स्वगोचरव्यभिचारे विज्ञानानां सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गः । तस्मात् सर्वं ज्ञानं समीचीनमास्थेयम् । तथा च रजतमदमिति च द्वे विज्ञाने स्मृत्यनुभवरूपे तत्रेदमिति पुरोवर्त्तिद्रव्यमात्र- ग्रहणं दोषवशात् तद्गतशुक्तित्वसामान्यविशेषस्याग्रहणात् तन्मात्रं च गृहीतं सदृशतया संस्कारोद्बोधक्रमेण रजते स्मृतिं जनयति । सा च गृहीतग्रहणस्वभावापि दोषवशाद् गृहीतत्वांशप्रमोषाद् ग्रहणमात्रमवतिष्ठते । तथा च रजतस्मृतेः पुरोवर्त्तिद्रव्यमात्रग्रहणस्य च मिथः स्वरूपतो विषयतश्च भेदाग्रहात् सन्निहितरजत- गोचरज्ञानसारूप्येणेदं रजतमिति भिन्ने अपि स्मरणग्रहणे अभेदव्यवहारं च सामानाधिकरण्यव्यपदेशं च
भामती-व्याख्या
के उत्पादन का ही सामर्थ्य और स्वभाव पाया जाता है, उनसे मिथ्या ज्ञान की उत्पत्ति क्योंकर होगी ? यदि कहा जाय कि किसी दोष से युक्त हो जाने पर उन्हीं कारणों में मिथ्या ज्ञान के उत्पादन का सामर्थ्य आ जाता है । तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि दोष सदैव नैसर्गिक सामर्थ्य के घातक होते हैं, कार्यान्तर के जनक नहीं होते, अन्यथा कुटज (कुटवेर) के दुष्ट बीज से वट अङ्कुरित हो जाना चाहिए ।
'सभी ज्ञान नियमतः अपने विषय के ही भासक होते हैं'—इस नियम का यदि कहीं भी व्यभिचार माना जाता है, तब सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा, अतः सभी ज्ञानों को प्रमात्मक ही मानना चाहिए [ श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
“यथार्थं सर्वमेवेह विज्ञानमिति सिद्धये ।
प्रभाकरगुरोर्भावः समीचीनः प्रकाश्यते ॥
अत्र ब्रूमो य एवार्थो यस्यां संविदि भासते ।
वेद्यः स एव नान्यद्धि विद्याद्वेद्यस्य लक्षणम् ॥
इदं रजतमित्यत्र रजतं चावभासते ।
तदेव तेन वेद्यं स्यान्न तु शुक्तिरवेदनात् ॥
तेनान्यस्यान्यथाभानं प्रतीत्यैव पराहतम् ।
परस्मिन् भासमाने हि परं भासते यतः ॥ ( प्र. पं. पृ. ४८ )
अहो बत महानेष प्रमादो धीमतामपि ।
ज्ञानस्य व्यभिचारे हि विश्वासः किंनिबन्धनः ॥ ( प्र. पं. पृ. ५९ ) ] ।
अख्यातिवाद के अनुसार 'इदं रजतम्'—यहाँ पर 'रजतम्'—यह ज्ञान स्मृति और 'इदम्'—यह ज्ञान अनुभवरूप है । 'इदम्'—इस ज्ञान के द्वारा पुरोवर्ती शुक्ति का केवल द्रव्यत्वेन सामान्य-ज्ञान मात्र होता है, नेत्रगत दोष के कारण शुक्तिकात्वरूप विशेष जाति का ग्रहण नहीं हो पाता । चमकीले द्रव्यमात्र के ग्रहण से वैसे ही चमकीले रजत द्रव्य के संस्कार उद्बुद्ध होकर रजत का स्मरण करा देते हैं । यद्यपि स्मृति ज्ञान गृहीतमात्र का ग्राहक होता है, अतः वहाँ भी 'रजतं स्मरामि' या 'तद् रजतम्'—ऐसा स्मरण होना चाहिए, तथापि दोष-वश गृहीतत्त्वादि अंशों का प्रमोष (विस्मरण) होकर वह स्मृतिज्ञान केवल ज्ञान के रूप में अवस्थित होता है । इस प्रकार 'रजत का स्मरण' और 'पुरोवर्ती द्रव्यमात्र का प्रत्यक्ष'—इन दोनों ज्ञानों के न तो स्वरूपों का भेद-भान होता है और न उनके विषयों का । वहाँ 'इदम्' और 'रजतम्'—ये दोनों ज्ञान वैसे ही अभेद-व्यवहार और सामानाधिकरण्य-बोधक 'इदं रजतम्'—इस प्रकार शब्द-प्रयोग के प्रवर्तक हो जाते हैं, जैसे, 'इदं रजतम्'—इस