भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

भ्रान्तं विज्ञानं स्वाकारमेव बाह्यतयाऽध्यवस्यति। तथा च नाहङ्कारास्पदत्वमस्य गोचरो ज्ञानाकारता पुनरस्य बाधकप्रत्ययप्रवेदनीयेति चेत्, हन्त बाधकप्रत्ययमप्यालोचयत्वायुष्मान्। किं पुरोवर्तिद्रव्यं रजताद्विवेचय- त्याहो ज्ञानाकारतामध्यस्य दर्शयति। तत्र ज्ञानाकारतोपदर्शनव्यापारं बाधकप्रत्ययस्य ब्रुवाणः श्लाघनीय- प्रज्ञो देवानां प्रियः। पुरोवर्तित्वप्रतिषेधार्थदस्य ज्ञानाकारतेति चेत्, न; असन्निधानाग्रहणनिषेधाद् असन्निहितो भवति प्रतिपत्तुरत्यन्तसन्निधानं त्वस्य प्रतिपत्त्रात्मकं कुतस्त्यम्?

न चैष रजतस्य निषेधो न चेदन्तायाः, किन्तु विवेकाग्रहप्रसञ्जितस्य रजतमिदमिति रजतव्यवहारस्य। न च रजतमेव शुक्तिकायां प्रसञ्जितं रजतज्ञानेन, नहि रजतनिर्भासस्य शुक्तिकालम्बनं युक्तमनुभवविरोधात्। न खलु सत्तामात्रेणालम्बनम्, अतिप्रसङ्गात्। सर्वेषामर्थानां सत्त्वाविशेषादालम्बनत्वप्रसङ्गात्। नापि कारण- त्वेन, इन्द्रियादीनामपि कारणत्वात्। तथा च भासमानतैवालम्बनार्थः। न च रजतज्ञाने शुक्तिका भासत इति कथमालम्बनं भासमानताभ्युपगमे वा कथं नानुभावविरोधः? अपि चेन्द्रियादीनां समीचीनज्ञानोप-

भामती-व्याख्या

को ही अहंपदार्थ माना जाता है। यदि कहा जाय कि रजत है तो विज्ञान का अपना ही आकार किन्तु भ्रान्त विज्ञान अपने आकार को ही बाह्य पदार्थ पर आरोपित कर देता है, इसलिए 'अहं रजतम्'—ऐसी प्रतीति नहीं होती। यदि रजत की विज्ञानाकारता 'नेदं रजतम्'—इस बाधक ज्ञान के द्वारा सिद्ध होती है, तब बाधक ज्ञान की परीक्षा कर ली जाय। बाधक ज्ञान क्या पुरोवर्ती (शुक्ति) द्रव्य को रजत से केवल भिन्न बताता है? अथवा रजत में ज्ञानाकारता की भी सिद्धि करता है? 'नेदं रजतम्'—इस निषेध ज्ञान को रजत की ज्ञानाकारता का साधक मानना तो निरी मूर्खता है। यदि कहा जाय कि रजत में पुरोवर्तित्व का निषेध कर देने से अर्थात् अन्तरवर्ती ज्ञानाकारता पर्यवसित होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्ति और रजत का वस्तुतः असन्निधान है, किन्तु उसका ग्रहण न होने के कारण रजत को इदं रूप से सन्निहित समझ लिया गया था, अब उस असन्निधानाग्रह का 'नेदं रजतम्'—इस प्रकार निषेध कर देने से वास्तविक असन्निधान (ज्ञाता पुरुष से दूर आपण में अवस्थान) सिद्ध होना चाहिए, अत्यन्त सन्निधान (विज्ञानरूप ज्ञाता पुरुष का आकार) क्योंकर स्थिर होगा? वस्तु-स्थिति यह है कि 'नेदं रजतम्'—यह निषेध न तो रजत का निषेधक है और न रजतगत इदन्ता का, किन्तु शुक्ति और रजत के भेदाग्रह के द्वारा आपादित 'रजतमिदम्'—इस प्रकार के व्यवहारमात्र का निषेधक होता है।

'इदं रजतम्'—इस ज्ञान के द्वारा रजत ही शुक्ति में अध्यस्त होता है'—यह कहना संगत नहीं, क्योंकि रजत-भासक ज्ञान का शुक्ति को आलम्बन (विषय) मानना अनुभव से विरुद्ध है। सदैव अनुभव यही बताता है कि जो ज्ञान जिस पदार्थ का भासक होता है, उस ज्ञान का वही आलम्बन होता है। शुक्ति उस देश में विद्यमान होने मात्र से रजत-ज्ञान का आलम्बन हो जायगी—ऐसा मानने पर यह अतिप्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है कि वहाँ विद्यमान सभी पदार्थ सभी ज्ञानों के विषय हो जायेंगे। 'रजत-ज्ञान का कारण होने से शुक्ति उसका आलम्बन है'—ऐसा मानने पर इन्द्रियादि भी रजत-ज्ञान के आलम्बन हो जायेंगे, क्योंकि वे भी उस ज्ञान के कारण हैं। अतः 'भासमानत्वमेवालम्बनत्वम्'—ऐसा ही आलम्बन का लक्षण करना चाहिए, जब 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान में शुक्ति भासित नहीं हो रही, तब वह उसका आलम्बन क्योंकर होगी? अतः 'इदं रजतम्'—इस ज्ञान की भासमानता शुक्ति में मानना अनुभव-विरुद्ध है।

दूसरी बात यह भी हैं कि ज्ञानोत्पादक इन्द्रियादि पदार्थों में समीचीन (प्रमा) ज्ञान

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